पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र

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[[चित्र:|thumb|right|200px|]];पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर- West Zone Cultural Centre (WZCC) Udaipur

भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय के संस्कृति विभाग के अन्तर्गत एक महत्वाकांक्षी परियोजना कें अंतर्गत 1985-86 में निम्नांकित सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र स्थापित किए गए थे-

1. उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, पटियाला

2. पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर

3. दक्षिण क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, तंजावूर

4. दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, नागपुर

5. पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, कोलकाता

6. उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, इलाहाबाद

7. उत्तर पूर्व क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, दीमापुर

प्रमुख उद्देश्य

इन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की स्था्पना के प्रमुख उद्देश्य निम्नांकित हैं -

> प्रादेशिक और क्षेत्रीय सीमाओं के परे सांस्कृतिक भ्रातृत्व की भावना विकसित करना।

> स्थानीय सांस्कृतिक रूपों के प्रति गहन जागरूकता पैदा करना और यह दिखाना कि ये संस्कृतियां किस प्रकार क्षेत्रीय पहचान से घुलमिल जाती हैं तथा अंतत: भारत की समृद्ध विविधतापूर्ण संस्कृति में समाहित हो जाती हैं।

इन्हीं उद्देश्यों के दृष्टिगत राजस्थान के उदयपुर शहर में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की स्थापना की गई थी। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर भारत के पश्चिम राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, दमण दीव, दादरा नगर हवेली की प्रदर्शनकारी कलाओं, चाक्षुष-कलाओं तथा वहां की लोक एवं आदिम कलाओं के सृजनात्मक विकास एवं उन्हें सुविधाएं प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया है।

इसका कार्यालय उदयपुर में अत्यंत मनोहारी पिछोला झील के किनारे स्थित प्राचीन व ऐतिहासिक "बागोर की हवेली" में है जहाँ एक जीवंत संग्रहालय भी स्थापित है। देश के शेष छः केंद्रों के साथ साथ उदयपुर स्थित यह केन्द्र समूचे देश में संस्कृति को बढ़ावा देने, उसका संरक्षण और विस्तार करने वाली अग्रणी संस्था का दर्जा प्राप्त कर चुका है। यह मंचन कलाओं को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ साहित्य तथा दृश्य-कलाओं के संबद्ध क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान कर रहा है।

पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर एक 'रजिस्टर्ड सोसायटी' है जिसकी संचालन-परिषद् के स्थाई अध्यक्ष राजस्थान के राज्यपाल हैं। इसमें केन्द्र सरकार व पश्चिम क्षेत्र के सदस्य राज्यों की सरकारों के प्रतिनिधि होते हैं। इसका दैनिक कार्य भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ सदस्य- निदेशक द्वारा संचालित किया जाता है।

केन्द्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति से प्रत्येक क्षेत्रीय संस्कृति केंद्र के लिए अलग-अलग सहायता (कॉर्पस) कोष स्थापित किया गया था जिसमें केंद्र सरकार और संबद्ध राज्य सरकारें भी अंशदान करती हैं और इस कोष में जमा राशि पर मिलने वाले ब्याज से इन केंद्रों की गतिविधियों का खर्च वहन किया जाता है। भारत सरकार ने प्रत्येक केंद्र को पांच करोड़ रुपए का अनुदान दिया था और संबद्ध राज्य सरकार ने एक करोड़ रुपए का। ये क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र 1993 से हर वर्ष गणतंत्र दिवस पर होने वाले 'लोकनृत्य समारोह' में भाग लेने के लिए अपने लोक कलाकारों को भेजते हैं। भारत के राष्ट्रपति 24/25 जनवरी को तालकटोरा इनडोर स्टेडियम में इस समारोह का उद्घाटन करते हैं। इस समारोह के माध्य म से लोक कलाकारों को राष्ट्रीय मंच पर अपनी कला प्रदर्शित करने का दुर्लभ अवसर प्राप्त होता है।

'शिल्पग्राम मेला' और उत्सव-

उदयपुर की झील फतह सागर के पास में स्थित हवाला गाँव में केन्द्र द्वारा एक शिल्पग्राम स्थापित किया गया है। इस शिल्पग्राम में हस्तशिल्प मेला प्रतिवर्ष दिसंबर माह अंतिम सप्ताह में लगाया जाता है। इस मेले में विभिन्न क्षेत्रीय संस्कृति केंद्रों के जाने-माने कुशल हस्तिशिल्पी और कारीगर भाग लेते हैं। हस्तशिल्प मेले के माध्यम से देश के विभिन्न भागों के हस्तेशिल्पियों और कारीगरों को अपने उत्पारद ग्राहकों के समक्ष प्रदर्शित करने, बेचने और उनके सामने ही इन उत्पाकदों की निर्माण-प्रक्रिया दिखाने का अनोखा अवसर प्राप्ता होता है।

केन्द्र की प्रमुख योजनाएँ-

1- राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना > यहाँ राष्ट्रीय सांस्कृ्तिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के अंतर्गत देश के विभिन्न क्षेत्रों के कलाकारों, संगीतकारों और विद्वानों का आदान-प्रदान किया जाता है।

2- रंगमंच प्रोत्साहन योजना > यहाँ रंगमंच के कलाकारों, विद्यार्थियों, निर्देशकों और लेखकों को साझे मंच पर काम करने और परस्पंर एक-दूसरे को देखने-समझने का अवसर जुटाने के उद्देश्यह से भी एक योजना चलाई जा रही है।

3- गुरु-शिष्य-परंपरा योजना- > संगीत और नृत्य के क्षेत्र में नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए 'गुरु-शिष्य परंपरा' योजना है जिसके अंतर्गत हर क्षेत्र में गुरुओं की पहचान करके शिष्य उनके सुपुर्द कर दिए जाते हैं। इस उद्देश्य के लिए उन्हें छात्रवृत्ति भी दी जाती है।

4- युवा-कलाकार-प्रतिभा योजना > क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र में युवा प्रतिभाओं की पहचान करके इन्हें प्रोत्सा‍हन देने की एक नई योजना भी शुरू की है जिसके तहत अपने-अपने क्षेत्र में मंचन/लोक कलाकारों का पता लगाना और हर क्षेत्र में एक या अधिक प्रतिभाशाली कलाकारों का चुनाव करके प्रोत्साहित करना शामिल है।

5- प्रलेखन-योजना > यह केंद्र विभिन्न लोक व जनजातीय कलाओं तथा खास तौर पर दुर्लभ एवं लुप्त होती कलाविधाओं के प्रलेख तैयार करने पर विशेष ध्यान देता है।

इस अनुभाग का सर्वाधिक मूल्यवान प्रकाशन है- साहित्य और अन्य कलाओं पर एकाग्र द्विभाषी सांस्कृतिक त्रैमासिक’ “कला-प्रयोजन”, जिसका गत अनेक वर्षों से नियमित/ मानद संपादन हिन्दी के जाने-माने लेखक और संपादक हेमंत शेष कर रहे हैं। इस पत्रिका में हिन्दी और अंग्रेज़ी में संग्रहणीय और दुर्लभ सामग्री प्रकाशित होती आ रही है।

6. अन्य योजना-

> हस्तशिल्पियों को बढ़ावा देने के लिए उन्हें शिल्पग्राम में हाट-सुविधाएं उपलब्ध कराना।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

http://www.wzccindia.com/index.php?q=Home/SetLanguage&lang=hi