बलिया जिला

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बलिया
—  शहर  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला बलिया
जनसंख्या 102,226 (2001 के अनुसार )
क्षेत्रफल
ऊँचाई (AMSL)

• 159 मीटर (522 फी॰)
आधिकारिक जालस्थल: www.Ballia.nic.in

निर्देशांक: 25°50′49″N 84°06′14″E / 25.847°N 84.104°E / 25.847; 84.104 बलिया जिला भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में सबसे पूर्वी जिला है, जिसका मुख्यालय बलिया शहर है। बलिया जिले की उत्तरी और दक्षिणी सीमा क्रमशः सरयू और गंगा नदियों द्वारा बनाई जाती है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इस जिले के निवासियों के विद्रोही तेवर के कारण इसे बागी बलिया के नाम से भी जाना जाता है।

भोजपुरी भाषा इस जिले में बहुतायत से बोली जाती है। सन १८५७ के प्रथम स्वातन्त्र्य समर के बागी सैनिक मंगल पांडे का सम्बन्ध भी इस जिले से रहा है। बलिया का नाम बलिया राक्षस राज बलि के नाम पर पड़ा राजा बलि ने बलिया को अपनी राजधानी बनाया था। राक्षसो के गुरू शुक्राचार्य भृगु मुनि के पुत्र थे।

इतिहास[संपादित करें]

बलिया सन् 1886 में गाजीपुर से अलग हुआ, अग्रेजो ने इसे लगातार अशांत रहने के कारण गाजीपुर से अलग कर दिया। 1942 के आंदोलन में बलिया के निवासियों ने स्थानीय अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फेंका था। चित्तू पांडेय के नेतृत्व में कुछ दिनों तक स्थानीय सरकार भी चली, लेकिन बाद में अंग्रेजों ने वापस अपनी सत्ता कायम कर ली। इसी ज़िले के रतसर गाँव में एक और व्यक्ति हुए जिनका नाम शारदानन्द सिंह था जो इस देश के ऊँचे पद पर आसीन हुए। यहां बलदेव सिंह नाम के पहलवान थे जो बहोरापुर गांव के थे और भारत के लिए कुश्ती लङते थे (मोहित सिंह)। भारत के पूर्व प्रधान मन्त्री चन्द्रशेखर भी इसी जिले के मूल निवासी थे। आपात काल के बाद हुई क्राति के जनक तथा महान स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण भी इसी जिले के मूल निवासी थे। समाजवादी चिंतक तथा देश में छोटे लोहिया के नाम से विख्यात जनेश्वर मिश्र भी यही के निवासी थे। जिले के अन्य प्रमुख नेताओ में स्व गौरी शंकर भइया , काशीनाथ मिश्र , मैनेजर सिह , रामगोविन्द चौधरी आदि प्रसिघ्द है।

आजादी का आंदोलन और बलिया की बगावत

सौरभ सिंह। बलिया अगस्त का महीना हो, गंगा एवं घाघरा दोनों नदियां अपनी सीमाएं तोड़ने को आतुर हों और ऐसे मौके पर बलिया की बगावत की चर्चा न हो तो यह बलिया के साथ अन्याय होगा। और बलिया ने न तो कभी अन्याय बर्दास्त किया है और न ही आगे करेगा। ऐसा हो भी क्यों नहीं, आखिर इसी ऋषि मुनियों की धरती बलिया ने महर्षि बाल्मीकि को रामायण की रचना के लिए प्रेरित किया तो दर्दर ऋषि एवं भृगु मुनि ने इस धरती को अपने तपोबल से सींचा है। रही बात बलिया के बगावत की है तो उसे 19 अगस्त 1942 को पूरे देश ने देखा। जी हां, बलिया के इसी बगावत ने आजादी के आंदोलन की कई तारीखें लिखी, देश वासियों को जुल्म एवं अन्याय के खिलाफ बगावत सिखाया और खुद बागी बलिया बन गया। गंगा एवं घाघरा के बीच बसी बलिया हजारों साल पुरानी सभ्यता एवं संस्कृतियों को समेटे हुए हैं। कौशल राज से शुरू हुए बलिया के इतिहास के विवरण कई पौराणिक एवं ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलते हैं। तीखे तेवर, फौलादी इरादे एवं मातृभूमि पर मर मिटने का जज्बा बलिया वासियों को विरासत में मिली है और इसे ही समूचे देश ने बगावत का नाम दिया है। 1857 की मेरठ क्रांति तो आप सभी को याद ही होगी। बलिया के ही बीर सपूत मंगल पांडे ने इस क्रांति का आगाज कर अंग्रेजों की चूलें हिला दी थी। आजादी का पहला शंखनाद मेरठ में हुआ ही था कि पूरा देश आजादी को जोश में उबलने लगा। बलिया में बाबू जगन्नाथ सिंह ने ब्रिटेन के प्रिंस का ताज अपने जूते के फीते में बांध कर बगावत की मशाल उठा ली। इसके बाद चाहे असहयोग आंदोलन हो या झंडा सत्याग्रह या फिर सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह हर जगह बलिया के लोगों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। अगस्त 1942 में महात्मा गांधी, पंडित नेहरु एंव सरदार पटेल आदि बंबई में थे। वहां गांधी जी ने करो या मरो का नारा दिया, लेकिन साथ में यह अपील भी कर दी कि अहिंसा सर्वोपरि है। लेकिन इस बात को बलिया के लोग नहीं समझ पाए कि आखिर अहिंसा के साथ करो या मरो कैसे संभव है। इसे बलिया वालों की नासमझी कह सकते हैं, लेकिन इसी ने बलिया की बागी बना दिया। कब क्या हुआ 9 अगस्त 1942: बलिया के लोग गांधी जी का मंतव्य का अर्थ ढूंढने के लिए बेचैन थे। इसी बीच बंबई में गांधी, नेहरु एवं पटेल समेत पचास से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हो गई। यह खबर जंगल की आग की तरह बलिया पहुंच गई, लोग आर पार की लड़ाई की तैयारी में लग गए। 10 अगस्त: सुबह होने से पहले ही पूरा बलिया जाग गया। सूर्य की पहली किरण के साथ ही भारत माता की जय के नारों से पूरा बलिया गूंज उठा और इसी के साथ बलिया में जनांदोलन शुरू हो गया। 11 अगस्त: लोग जुलूश लेकर मुख्यालय पहुंच गए। लोगों का हुजूम एवं उनके आक्रोश को देखते हुए बलिया के तत्कालीन कलेक्टर जगदीश्वर निगम डर गए और उन्होंने बरतानिया हुकुमत को बलिया की आजादी की सिफारिश कर दी। इस बीच पुलिस ने आजादी के कई दिवानों को गिरफ्तार कर लिया। 12 अगस्त: पूरे जिले में बगावत चरम पर थी। कोई नेता नहीं था, लेकिन सभी बागी थे। जुलूश निकल रहा था, इसमें कलेक्टर जगदीश्वर निगम के बेटे शैलेश निगम भी शामिल थे। इसी बीच पुलिस ने एक बार फिर जुलूश में से 30 छात्रों को उठा लिया और नंगा कर यातानाएं दी। 13 अगस्त: बलिया वासियों ने रेलवे स्टेशन पर कब्जा कर लिया, वहीं महिलाओं ने कचहरी पर कब्जा करते हुए कचहरी की मुंडेर पर तिरंगा फहरा दिया। उधर, क्रांतिबीरों ने टाउन हाल पर कब्जा करते हुए अंग्रेजी झंडे को उखाड़ फेंका। 14 अगस्त: क्रांतिबीरों ने डाकघर पर कब्जा कर सारा खजाना एवं कागजात लूट लिए। इसके बाद शहर कोतवाल ने भीड़ पर घोड़े दौड़ाए तो लोगों ने इस कदर मुकाबला किया भारी फोर्स के बीच वह खुद अपनी जान की भीख मांगता नजर आया। 15 अगस्त: आंदोलन के लिए बलिया आ रहे छात्रों के समूह को पुलिस ने स्टेशन पर ही गिरफ्तार कर लिया। ऐसे में आक्रोशित छात्रों ने पुलिस स्टेशन पर ही कब्जा कर उसे आग के हवाले कर दिया। 16 अगस्त: छात्रों ने रेलवे स्टेशन में आग लगा दी और एक ट्रेन को अगवा कर उसे आजाद ट्रेन के नाम से चला दिया। 17 अगस्त: जिले भर में चरम पर पहुंचे बगावत ने तहसीलों को अपने कब्जे में ले लिया। आज के आंदोलन में बच्चों से लेकर बुजुर्गो तक एवं मजदूरों से लेकर व्यापारियों तक सभी ने अपनी अहम भूमिका निभाई। 18 अगस्त: लोगों का जोश उफान पर था। प्रशासन एवं पुलिस के लोग खुद अपने बचाव की जगह तलाश रहे थे। इसी बीच बैरिया में खून संघर्ष हुआ और 20 क्रांतिबीर पुलिस की गोली से शहीद हो गए। फिर क्या था, लाठी, डंडे, लेकर थाने पर पहुंचे लोगों ने बैरिया थाने पर कब्जा करते हुए थानेदार समेत सभी को हवालात में बंद कर दिया और थाने पर तिरंगा फहरा दिया। 19 अगस्त: बलिया के लोग आखिरी एवं निर्णायक जंग के लिए तैयार थे। सुबह होने से पहले जिले भर से लोग आजादी की सांस लेने के लिए बेचैन हो उठे। देखते ही देखते चारो ओर से लोग बलिया को आजाद करने के लिए निकल पड़े। इसकी भनक कलेक्टर जगदीश्वर निगम को लगी तो लोगों के पहुंचने से पहले वह खुद ही जेल पहुंच कर क्रांतिबीरों के लिए दरवाजे खोल दिया। उन्होंने चित्तूपांडे से आग्रह किया कि वह बलिया की बगावत के सामने घुटने टेक रहे हैं। इसी के साथ उन्होंने अपना पद छोड़ दिया और बलिया 19 अगस्त 1942 को देश में सबसे पहले आजाद हो गया।

भौगोलिक संरचना[संपादित करें]

संरक्षित जीव[संपादित करें]

नील गाय जिसे बलिया की स्थानीय भोजपुरी भाषा में घोंपड़ास अथवा घड़रोज कहा जाता है ,उत्तर प्रदेश शासन द्वारा शिकार निरोध के लिए बने वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षण का दर्जा प्राप्त पशु है। इसके शिकार पर सात साल के सश्रम कारावास और अर्थदण्ड का कठोर प्रावधान है। प्रतिवर्ष रूस के साइबेरिया से सुरहा ताल में विचरण करने आने वाले प्रवासी पक्षियों का शिकार भी प्रतिबन्धित है।

जलवायु[संपादित करें]

जिले की जलवायु नम है और गर्मी और ठंड मौसम को छोड़कर आराम. इस वर्ष चार मौसम: जो फरवरी के लिए नवंबर के बाद के बारे में आधे से रहता ठंड,: में विभाजित किया जा सकता है गर्म, मार्च जून के बीच में से, जो कि इस अवधि के बारे में से है जो दक्षिण पश्चिम मानसून मौसम, सितंबर के अंत करने के लिए जून के बीच: और बाद मानसून या जो अक्टूबर और नवंबर के पहले आधे शामिल संक्रमणकालीन मौसम.

तापमान और आर्द्रता[संपादित करें]

ताप मान लगभा गर्मि के दिनो में 46 से 50 अंस सेलसियस तक चला जाता है। और सर्दी के दिनों में 6 से 10 अंस सेल्सियस तक चला जाता है।

वर्षा[संपादित करें]

विशेष मौसम घटना[संपादित करें]

कुछ ने बंगाल की खाड़ी के कदम से मानसून depressions का एक पच्छमी में उत्तर-पच्छमी दिशा करने के लिए हैं और जिले के मौसम व्यापक भारी वर्षा और वातमय हवाओं कारण प्रभावित करती है। धूल तूफानों और गरज का तूफ़ान गर्मियों के मौसम में पाए जाते हैं। मानसून के मौसम में वर्षा अक्सर गड़गड़ाहट के साथ जुड़ा हुआ है। कोहरा बार में ठंड के मौसम के प्रारंभिक भाग में होता है।

जनसांख्यिकी[संपादित करें]

2001 की भारतीय जनगणना में, बलिया की आबादी 102,226 थी। पुरुषों और महिलाओं की जनसंख्या 46% से 54% क्रमशः थी। यह महिलाओं के पुरुष और 42% से 58% साक्षर के साथ 65% की औसत साक्षरता दर 59.5% के राष्ट्रीय औसत से अधिक था। जनसंख्या के ग्यारह प्रतिशत उम्र के छह वर्षों के तहत किया गया।

स्थानीय क्षेत्र[संपादित करें]

एक वार्षिक मेले के ददरी-मेला (आश्विन मास में), एक मैदान पर शहर की पूर्वी सीमा पर गंगा और सरयू नदियों के संगम पर मनाया जाता है। मऊ, आजमगढ़, देवरिया, गाजीपुर और वाराणसी के रूप में पास के जिलों के साथ नियमित संपर्क में रेल और सड़क के माध्यम से मौजूद है। यह बिहार की सीमा को छुता हुआ जिला है, इसके पश्चिमी क्षेत्रों में बिसेन क्षत्रियो का गाँव कसेसर है व बघेलो का भीमपुरा जो की विकसित है, इनके बाद उत्तर प्रदेश का मऊ जिला शुरू हो जाता है।

उल्लेखनीय व्यक्तित्व[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]