सीतामढ़ी

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सीतामढ़ी
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
जनसंख्या
घनत्व
२६,६९,८८७ (२००१ के अनुसार )
• १,२२१
क्षेत्रफल २१८५ sq. kms कि.मी²

Erioll world.svgनिर्देशांक: 26°36′N 85°29′E / 26.6, 85.48 सीतामढ़ी भारत के बिहार राज्य का प्रमुख शहर है जो पौराणिक आख्यानों में सीता की जन्मस्थली के रूप में उल्लिखित है।[1]त्रेतायुगीन आख्यानों में दर्ज यह हिंदू तीर्थ-स्थल बिहार के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है । [2]

संक्षिप्त इतिहास[संपादित करें]

सीतामढ़ी प्रवेश द्वार (रेलवे स्टेशन)

सीतामढ़ी पौराणिक आख्यानों में त्रेतायुगीन शहर के रूप में वर्णित है। त्रेता युग में राजा जनक की पुत्री तथा भगवान राम की पत्नी देवी सीता का जन्म पुनौरा में हुआ था। पौराणिक मान्यता के अनुसार मिथिला एक बार दुर्भिक्ष की स्थिति उत्पन्न हो गाय थी । पुरोहितों और पंडितों ने मिथिला के राजा जनक को अपने क्षेत्र की सीमा में हल चलाने की सलाह दी । कहते हैं कि सीतामढ़ी के पूनौरा नामक स्थान पर जब राजा जनक ने खेत में हल जोता था, तो उस समय धरती से सीता का जन्म हुआ था। सीता जी के जन्म के कारण इस नगर का नाम पहले सीतामड़ई, फिर सीतामही और कालांतर में सीतामढ़ी पड़ा।[3]ऐसी जनश्रुति है कि सीताजी के प्रकाट्य स्थल पर उनके विवाह पश्चात राजा जनक ने भगवान राम और जानकी की प्रतिमा लगवायी थी। लगभग ५०० वर्ष पूर्व अयोध्या के एक संत बीरबल दास ने ईश्वरीय प्रेरणा पाकर उन प्रतिमाओं को खोजा औ‍र उनका नियमित पूजन आरंभ हुआ। यह स्थान आज जानकी कुंड के नाम से जाना जाता है। प्राचीन कल मे सीतामढी तिरहुत का अंग रहा है। इस क्षेत्र में मुस्लिम शासन आरंभ होने तक मिथिला के शासकों के कर्नाट वंश ने यहाँ शासन किया। बाद में भी स्थानीय क्षत्रपों ने यहाँ अपनी प्रभुता कायम रखी लेकिन अंग्रेजों के आने पर यह पहले बंगाल फिर बिहार प्रांत का अंग बन गया। 1908 ईस्वी में तिरहुत मुजफ्फरपुर जिला का हिस्सा रहा। स्वतंत्रता पश्चात 11 दिसंबर 1972 को सीतामढी को स्वतंत्र जिला का दर्जा मिला, जिसका मुख्यालय सीतामढ़ी को बनाया गया ।

पौराणिक महत्व[संपादित करें]

जनकपुर में स्वयंबर के दौरान भगवान राम के द्वारा शिव धनुष तोड़ने से संबंधित रवी वर्मा की पेंटिंग

वृहद विष्णु पुराण के वर्णनानुसार सम्राट जनक की हल-कर्षण-यज्ञ-भूमि तथा उर्बिजा सीता के अवतीर्ण होने का स्थान है यह , जो उनके राजनगर से पश्चिम 3 योजन अर्थात 24 मिल की दूरी पर स्थित थी । लक्षमना (वर्तमान में लखनदेई ) नदी के तट पर उस यज्ञ का अनुष्ठान एवं संपादन बताया जाता है । हल-कर्षण-यज्ञ के परिणामस्वरूप भूमि-सुता सीता धारा धाम पर अवतीर्ण हुयी, साथ ही आकाश मेघाच्छन्न होकर मूसलधार वर्षा आरंभ हो गयी, जिससे प्रजा का दुष्काल तो मिटा, पर नवजात शिशु सीता की उससे रक्षा की समस्या मार्ग में नृपति जनक के सामने उपस्थित हो गयी । उसे वहाँ वर्षा और वाट से बचाने के विचार से एक मढ़ी (मड़ई,कुटी, झोपड़ी) प्रस्तुत करवाने की आवश्यकता आ पड़ी । राजाज्ञा से शीघ्रता से उस स्थान पर एक मड़ई तैयार की गयी और उसके अंदर सीता सायत्न रखी गयी । कहा जाता है कि जहां पर सीता की वर्षा से रक्षा हेतु मड़ई बनाई गयी उस स्थान का नाम पहले सीतामड़ई , कालांतर में सीतामही और फिर सीतामढ़ी पड़ा । यहीं पास में पुनौरा ग्राम है जहां रामायण काल में पुंडरिक ऋषि निवास करते थे । कुछ लोग इसे भी सीता के अवतरण भूमि मानते हैं । परंतु ये सभी स्थानीय अनुश्रुतियाँ है ।

गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित श्रीरामचरितमानस

सीतामढ़ी तथा पुनौरा जहां है वहाँ रामायण काल में घनघोर जंगल था । जानकी स्थान के महन्थ के प्रथम पूर्वज विरक्त महात्मा और सिद्ध पुरुष थे । उन्होने "वृहद विष्णु पुराण" के वर्णनानुसार जनकपुर नेपाल से मापकर वर्तमान जानकी स्थान वाली जगह को ही राजा जनक की हल-कर्षण-भूमि बताई । पीछे उन्होने उसी पावन स्थान पर एक बृक्ष के नीचे लक्षमना नदी के तट पर तपश्चर्या के हेतु अपना आसन लगाया। पश्चात काल में भक्तों ने वहाँ एक मठ का निर्माण किया, जो गुरु परंपरा के अनुसार उस कल के क्रमागत शिष्यों के अधीन आद्यपर्यंत चला आ रहा है । सीतामढ़ी में उर्वीजा जानकी के नाम पर प्रतिवर्ष दो बार एक राम नवमी तथा दूसरी वार विवाह पंचमी के अवसर पर विशाल पशु मेला लगता है, जिससे वहाँ के जानकी स्थान की ख्याति और भी अधिक हो गयी है ।[4]

श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में ऐसा उल्लेख है कि "राजकुमारों के बड़े होने पर आश्रम की राक्षसों से रक्षा हेतु ऋषि विश्वामित्र राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को मांग कर अपने साथ ले गये। राम ने ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों को मार डाला और मारीच को बिना फल वाले बाण से मार कर समुद्र के पार भेज दिया। उधर लक्ष्मण ने राक्षसों की सारी सेना का संहार कर डाला। धनुषयज्ञ हेतु राजा जनक के निमंत्रण मिलने पर विश्वामित्र राम और लक्ष्मण के साथ उनकी नगरी मिथिला (जनकपुर) आ गये। रास्ते में राम ने गौतम मुनि की स्त्री अहिल्या का उद्धार किया, यह स्थान सीतामढ़ी से 40 कि. मी. अहिल्या स्थान के नाम पर स्थित है । मिथिला में राजा जनक की पुत्री सीता जिन्हें कि जानकी के नाम से भी जाना जाता है का स्वयंवर का भी आयोजन था जहाँ कि जनकप्रतिज्ञा के अनुसार शिवधनुष को तोड़ कर राम ने सीता से विवाह किया| राम और सीता के विवाह के साथ ही साथ गुरु वशिष्ठ ने भरत का माण्डवी से, लक्ष्मण का उर्मिला से और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति से करवा दिया ।" राम सीता के विवाह के उपलक्ष्य में अगहन विवाह पंचमी को सीतामढ़ी में प्रतिवर्ष सोनपुर के बाद एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है । इसी प्रकार जामाता राम के सम्मान में भी यहाँ चैत्र राम नवमी को बड़ा पशु मेला लगता है ।

भौगोलिक स्थिति[संपादित करें]

धान की खेती करता किसान

सीतामढ़ी शहर 26.6 ° उत्तर और 85.48° पूर्व में स्थित है । इसकी औसत ऊंचाई 56 मीटर (183 फीट) है । यह शहर लखनदेई नदी के तट पर स्थित है । यह बिहार राज्य का एक जिला मुख्यालय है और तिरहुत कमिश्नरी के अंतर्गत है । वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार यहाँ की जनसंख्या 2,669,887 है । क्षेत्रफल 1,200/km2 (3,200/sq mi) है । यह शहर बिहार नेपाल की सीमा पर अवस्थित है । बिहार की राजधानी पटना से इसकी दूरी 105 किलो मीटर है । इसके आसपास की भूमि प्रायः सर्वत्र उपजाऊ एवं कृषियोग्य है। धान, गेंहूँ, दलहन, मक्का, तिलहन, तम्बाकू,सब्जी तथा केला, आम और लीची जैसे कुछ फलों की खेती की जाती है। यहाँ औसत तापमान गृष्म ऋतु में 35-45 डिग्री सेल्सियस तथा जाड़े में 5-15 डिग्री सेल्सियस रहता है। जाड़े का मौसम नवंबर से मध्य फरवरी तक रहता है। अप्रैल में गृष्म ऋतु का आरंभ होता है जो जुलाई के मध्य तक रहता है। जुलाई-अगस्त में वर्षा ऋतु का आगमन होता है जिसका अवसान अक्टूबर में होने के साथ ही ऋतु चक्र पूरा हो जाता है। औसतन 1205 मिलीमीटर वर्षा का का वार्षिक वितरण लगभग 52 दिनों तक रहता है जिसका अधिकांश भाग मानसून से होनेवाला वर्षण है।यह बिहार का संवेदनशील बाढ़ग्रस्त इलाका है । इस शहर के आसपास हिमालय से उतरने वाली कई नदियाँ तथा जलधाराएँ प्रवाहित होती है और अंतत: गंगा में विसर्जित होती हैं। वर्षा के दिनों में इन नदियों में बाढ़ एक बड़ी समस्या के रूप में उत्पन्न हो जाती है। यहाँ मुख्य रूप से हिन्दी और स्थानीय भाषा के रूप में बज्जिका बोली जाती है । बज्जिका भोजपुरी और मैथली का मिलाजुला रूप है । यह बिहार का एक संसदीय क्षेत्र भी है, जिसके अंतर्गत बथनाहा, परिहार, सुरसंड, बाजपट्टी, रुनी सैदपुर और सीतामढ़ी बिधान सभा क्षेत्र आते हैं । [5]यह सीतामढ़ी जिले का मुख्यालय है । गंगा के उत्तरी मैदान में बसे सीतमढी जिला की समुद्रतल से औसत ऊँचाई लगभग ८५ मीटर है। २२९४ वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला इस जिले की सीमा नेपाल से लगती है। अंतरराष्ट्रीय सीमा की कुल लंबाई ९० किलोमीटर है। दक्षिण, पश्चिम तथा पुरब में इसकी सीमा क्रमश: मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण एवं शिवहर तथा दरभंगा एवं मधुबनी से मिलती है। उपजाऊ समतल भूमि होने के बावजूद यहाँ की नदियों में आनेवाली सालाना बाढ के कारण यह भारत के पिछड़े जिले में एक है।

जलवायु[संपादित करें]

सीतामढी में औसत सालाना वर्षा 1100 मि•मी• से 1300 मि•मी• तक होती है। यद्यपि अधिकांश वृष्टि मानसून के दिनों में होता है लेकिन जाड़ॅ के दिनों में भी कुछ वर्षा हो जाती है जो यहाँ की रबी फसलों के लिए उपयुक्त है। वार्षिक तापान्तर 32 से• से 41 से• के बीच रहता है। हिमालय से निकटता के चलते वर्षा के दिनों में आ‍द्रता अधिक होती है जिसके फलस्वरूप भारी ऊमस रहता है।

मृदा एवं जलस्रोत[संपादित करें]

कृषि[संपादित करें]

धान, गेहूँ, मक्का, दलहन, तिलहन, गन्ना, तम्बाकू आदि ।

प्रशासनिक विभाजन[संपादित करें]

सीतामढी जिले में 3 अनुमंडल,17 प्रखंड एवं 17 राजस्व सर्किल है। सीतामढी नगर परिषद के अलावे जिले में ४ नगर पंचायत हैं। जिले के 273 पंचायतों के अंतर्गत 835 गाँव आते हैं। जिले का मुख्यालय एवं प्रशासनिक विभाजन इस प्रकार है:-

  • मुख्यालय: सीतामढी
  • अनुमंडल: सीतामढी सदर, पुपरी एवं बेलसंड
  • प्रखंड: बथनाहा, परिहार, नानपुर, बाजपट्टी, बैरगनिया, बेलसंड, रीगा, सुरसंड, पुपरी, सोनबरसा, डुमरा, रुन्नी सैदपुर, मेजरगंज, पुरनिया, सुप्पी, परसौनी, बोखरा, चौरौत

जनसंख्या एवं जीवन स्तर[संपादित करें]

वर्ष 2011की जनगणना के अनुसार इस जिले की जनसंख्या:[6] 3,419,622 है जो राज्य की कुल जनसंख्या का 3.29% है। जनंख्या का घनत्व 899 है जो राष्ट्रीय औसत से कफी आगे है। राज्य की जनसंख्या में बारहवें स्थान पर आनेवाले इस जिले की दशकीय वृद्धि दर 27.47 है। साक्षरता की दर मात्र53.53% है।

  • शहरी क्षेत्र:- 1,53,313
  • देहाती क्षेत्र:- 25,29,407
  • कुल जनसंख्या:- 3,419,622
  • स्त्री-पुरूष अनुपातः- 899 प्रति 1000

भाषा-बोली[संपादित करें]

बज्जिका यहाँ की बोली है लेकिन हिंदी और उर्दू राजकाज़ की भाषा और शिक्षा का माध्यम है। यहाँ की स्थानीय संस्कृति, रामायणकालीन परंपरा तथा धार्मिकता नेपाल के तराई प्रदेश तथा मिथिला के समान है।

प्रमुख पर्यटन स्थल[संपादित करें]

सीतामढ़ी स्थित भव्य जानकी स्थान
सीतामढ़ी स्थित उर्वीजा कुंड मे सीता जन्म से संबंधित प्रतिकात्मक मूर्तियाँ
  • जानकी स्थान और उर्बीजा कुंड:

सीतामढ़ी नगर के पश्चिमी छोर पर जानकी स्थान और उर्बीजा कुंड है। सीतामढी रेलवे स्टेशन से डेढ किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह स्थल हिंदू धर्म में विश्वास रखने वालों के लिए अति पवित्र है। ऐसा कहा जाता है कि उक्त कुंड के जीर्णोद्धार के समय, आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व उसके अंदर उर्बीजा सीता की एक प्रतिमा प्राप्त हुयी थी , जिसकी स्थापना जानकी स्थान के मंदिर मे की गयी । कुछ लोगों का कहना है कि वर्तमान जानकी स्थान के मंदिर में स्थापित जानकी जी की मूर्ति वही है, जो कुंड की खुदाई के समय उसके अंदर से निकली थी ।[7]

पूनौरा स्थित जानकी मंदिर
पुनौरा स्थित जानकी कुंड
  • पुनौरा और जानकी कुंड :

यह स्थान पौराणिक काल में पुंडरिक ऋषि के आश्रम के रूप में विख्यात था । कुछ लोगों का यह भी मत है कि सीतामढी से ५ किलोमीटर पश्चिम स्थित पुनौरा में हीं देवी सीता का जन्म हुआ था। मिथिला नरेश जनक ने इंद्र देव को खुश करने के लिए अपने हाथों से यहाँ हल चलाया था। इसी दौरान एक मृदापात्र में देवी सीता बालिका रुप में उन्हें मिली। मंदिर के अलावे यहाँ पवित्र कुंड है।

  • हलेश्वर स्थान:

सीतामढी से ३ किलोमीटर उत्तर पश्चिम में इस स्थान पर राजा जनक ने पुत्रेष्टि यज्ञ के पश्चात भगवान शिव का मंदिर बनवाया था जो हलेश्वर स्थान के नाम से प्रसिद्ध है।

  • पंथ पाकड़:

सीतामढी से ८ किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में बहुत पुराना पाकड़ का एक पेड़ है जिसे रामायण काल का माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि देवी सीता को जनकपुर से अयोध्या ले जाने के समय उन्हें पालकी से उतार कर इस वृक्ष के नीचे विश्राम कराया गया था।

बगही मठ
  • बगही मठ:

सीतामढी से ७ किलोमीटर उत्तर पश्चिम में स्थित बगही मठ में १०८ कमरे बने हैं। पूजा तथा यज्ञ के लिए इस स्थान की बहुत प्रसिद्धि है।

  • देवकुली (ढेकुली):

ऐसी मान्यता है कि पांडवों की पत्नी द्रौपदी का यहाँ जन्म हुआ था। सीतामढी से १९ किलोमीटर पश्चिम स्थित ढेकुली में अत्यंत प्राचीन शिवमंदिर है जहाँ महाशिवरात्रि के अवसर पर मेला लगता है।

  • गोरौल शरीफ:

सीतामढी से २६ किलोमीटर दूर गोरौलशरीफ बिहार के मुसलमानों के लिए बिहारशरीफ तथा फुलवारीशरीफ के बाद सबसे अधिक पवित्र है।

सीतामढी से लगभग ३५ किलोमीटर पूरब एन एच १०४ से भारत-नेपाल सीमा पर भिट्ठामोड़ जाकर नेपाल के जनकपुर जाया जा सकता है। सीमा खुली है तथा यातायात की अच्छी सुविधा है इसलिए राजा जनक की नगरी तक यात्रा करने में कोई परेशानी नहीं है। यह वहु भूमि है जहां राजा जनक के द्वारा आयोजित स्वयंबर में शिव के धनुष को तोड़कर भगवान राम ने माता सीता के साथ विवाह रचाया था ।


अन्य प्रमुख स्थल[संपादित करें]

  • बोधायन सरः संस्कृत वैयाकरण पाणिनी के गुरू महर्षि बोधायन ने इस स्थान पर कई काव्यों की रचना की थी। लगभग ४० वर्ष पूर्व देवरहा बाबा ने यहाँ बोधायन मंदिर की आधारशिला रखी थी।
  • शुकेश्वर स्थानः यहाँ के शिव जो शुकेश्वरनाथ कहलाते हैं, हिंदू संत सुखदेव मुनि के पूजा अर्चना का स्थान है।
  • सभागाछी ससौला: सीतामढी से २० किलोमीटर पश्चिम में इस स्थान पर प्रतिवर्ष मैथिल ब्राह्मण का सम्मेलन होता है और विवाह तय किए जाते हैं।
  • वैष्णो देवी मंदिर: शहर के मध्य में स्थित भव्य वैष्णो देवी मंदिर हैं जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन करने जाते हैं । यह भी यहां के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। इसके अलावा शहर का सबसे पुराना सनातन धर्म पुस्तकालय है जहां दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह है ।[8]

साहित्य में सीतामढ़ी[संपादित करें]

रामधारी सिंह `दिनकर'
रवीन्द्र प्रभात

यदि साहित्यिक दृष्टि से आँका जाये तो यह स्पष्ट विदित होगा कि सीतामढ़ी जिला ने अनेक विलक्षण प्रतिभा पुत्रों को अवतरित किया है । यह वही पावन भूमि है जहां से राष्ट्रकवि रामधारी सिंह `दिनकर' का द्वंद्वगीत गुंजा था तथा बिहार के पंत नाम से चर्चित आचार्य जय किशोर नारायण सिंह ने अपनी सर्जन धर्मिता को धार दी । हिन्दी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान सांवलिया बिहारी लाल वर्मा ने "विश्व धर्म दर्शन" देकर धर्म-संस्कृति के शोधार्थियों के लिए प्रकाश का द्वार खोल दिया था। गाँव-गंवई भाषा मे जनता के स्तर की कवितायें लिखकर नाज़िर अकवरावादी को चुनौती देने वाले आशु कवि बाबा नरसिंह दास का नाम यहाँ आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है । इसके अलावा रामवृक्ष बेनीपुरी के जीवन का वहुमूल्य समय यहीं व्यतीत हुआ था । साहित्य मर्मज्ञ लक्षमी नारायण श्रीवास्तव,डॉ रामाशीष ठाकुर, डॉ विशेश्वर नाथ बसु, राम नन्दन सिंह,पंडित बेणी माधव मिश्र, मुनि लाल साहू, सीता राम सिंह, रंगलाल परशुरामपुरिया,हनुमान गोएन्दका, राम अवतार स्वर्ङकर, पंडित उपेन्द्रनाथ मिश्र मंजुल,पंडित जगदीश शरण हितेन्द्र,ऋषिकेश,राकेश रेणु, राकेश कुमार झा, बसंत आर्य,राम चन्द्र बिद्रोही, माधवेन्द्र वर्मा, उमा शंकर लोहिया, गीतेश, इस्लाम परवेज़, बदरुल हसन बद्र,डॉ मोबिनूल हक दिलकश आदि सीतामढ़ी की साहित्यिक गतिविधियों में समय-समय पर जीवंतता लाने में सक्रिय रहे हैं ।

इसके अलावा वैद्यनाथ प्रसाद गुप्त "चर्चरीक", मदन साहित्य भूषण,राम चन्द्र आशोपुरी, मुन्नी लाल आर्य शास्त्री, परम हंश जानकी बल्लभ दास, योगेंद्र रीगावाल,संत रस्तोगी, नरेंद्र कुमार, सीता राम दीन, आचार्य सारंग शास्त्री,डॉ मदन मोहन वर्मा पूर्णेंदू,डॉ वीरेंद्र वसु,डॉ कृष्ण जीवन त्रिवेदी,डॉ महेंद्र मधुकर,डॉ पदमाशा झा और डॉ शंभूनाथ सिंह नवगीत सम्मान पाने वाले बिहार के पहले नवगीतकार राम चन्द्र चंद्रभूषण आदि सीतामढ़ी के दीप्तिमान रत्न सिद्ध हुये हैं ।शमशेर जन्म शती काव्य सम्मान से अलंकृत अंतर्जाल की वहुचर्चित कवयित्री रश्मि प्रभा का जन्म भी सीतामढ़ी मे ही हुआ है।[9]

अपने सीतामढ़ी प्रवास में कुछ साहित्यकारों ने यहाँ की साहित्यिक गतिविधियों में प्राण फूंकने का कार्य किया था, जिनमें सर्व श्री पांडे आशुतोष,तिलक धारी साह, ईश्वर चन्द्र सिन्हा, श्री राम दुबे, अदालत सिंह अकेला, डॉ हरेकृष्ण प्रसाद गुप्त अग्रहरी,हृदयेश्वर आदि । यहाँ की दो वहुचर्चित साहित्यिक प्रतिभाओं क्रमश: आशा प्रभात और रवीन्द्र प्रभात ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस शहर का नाम रोशन किया है ।[10]

रवीन्द्र प्रभात [11] अंतर्जाल पर सक्रिय लेखकों मे अग्रणी और चर्चित हैं। इनका जन्म सीतामढ़ी के रून्नी सैदपुर थाना अंतर्गत महिंदवारा के एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनका मूल नाम रवीन्द्र कुमार चौबे है। रवीन्द्र प्रभात[12] हिन्दी के लोकप्रिय कवि, कथाकार और मुख्य ब्लॉग विश्लेषक हैं। ये पिछले लगभग दो दशक से हिन्दी में निरंतर लेखन कर रहे हैं। इनके अब तक 3 उपन्यास, एक काव्य संग्रह, दो गजल संग्रह, दो संपादित पुस्तक और एक ब्लॉगिंग का इतिहास प्रकाशित है।[13]हिन्दी के उन्नयन हेतु कई देशों की यात्रा कर चुके और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके रवीन्द्र प्रभात को "ब्लॉग श्री" और "ब्लॉग भूषण" अलंकरण के साथ-साथ संवाद सम्मान-2009, सृजनश्री सम्मान-2011, हिन्दी साहित्यश्री सम्मान-2011, बाबा नागार्जुन जन्मशती कथा सम्मान-2012, प्रबलेस चिट्ठाकारिता शिखर सम्मान-2012 आदि से सम्मानित किया जा चुका है ।[14]धरती पकड़ निर्दलीय भारतीय राजनीति पर आधारित इनका सर्वाधिक चर्चित उपन्यास है, जो हिन्दी मे है। उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास का एक साथ विश्व की पाँच भाषाओं क्रमश: अँग्रेजी,रूसी, जर्मन, फ्रांसीसी और उड़िया भाषाओं मे प्रस्तावित है।

शहर के कोट बाजार निवासी आशा प्रभात ने हिंदीउर्दू रचनाओं का एक अनोखा बागवान सजाया है। इनकी पहली कृति 'दरीचे' नामक काव्य संग्रह के रूप में वर्ष 1990 में प्रकाशित हुयी। उसके बाद 'धुंध में उगा पेड़' नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास हिंदी व उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित हो कर कामयाबी की राह आसान कर दी। 'मै और वह' नामक आशा प्रभात का उपन्यास अब तेलगू भाषा में अनुवादित होने जा रहा है।[15]

उद्योग[संपादित करें]

चीनी उद्योग, चावल, तेल मिल

संस्कृति[संपादित करें]

सीतामढी की माटी में तिरहुत और मिथिला क्षेत्र की संस्कृति की गंध है। इस भूभाग को देवी सीता की जन्मस्थली तथा विदेह राज का अंग होने का गौरव प्राप्त है। लगभग २५०० वर्ष पूर्व महाजनपद का विकास होनेपर यह वैशाली के गौरवपूर्ण बज्जिसंघ का हिस्सा रहा। लोग बज्जिका में बात करते हैं लेकिन मधुबनी से सटे क्षेत्रों में मैथिली का भी पुट होता है। मुस्लिम परिवारों में उर्दू में प्रारंभिक शिक्षा दी जाती है किंतु सरकारी नौकरियों में प्रधानता न मिलने के कारण अधिकांश लोग हिंदी या अंग्रेजी को ही शिक्षा का माध्यम बनाते हैं।

शादी-विवाह
हिंदू प्रधान समाज होने के कारण यहाँ जाति परंपराएँ प्रचलन में है। अधिकांश शादियाँ माता-पिता द्वारा अपनी जाति में ही तए किए जाते हैं। मुस्लिम समाज में भी शादी तय करने के समय जाति भेद का ख्याल रखा जाता है।
लोक कलाएँ
शादी-विवाह या अन्य महत्वपूर्ण आयोजनों पर वैदेही सीता के भगवान श्रीराम से विवाह के समय गाए गए गीत अब भी यहाँ बड़े ही रसपूर्ण अंदाज में गाए जाते हैं। कई गीतों में यहाँ आनेवाली बाढ की बिभीषिका को भी गाकर हल्का किया जात है। जटजटनि तथा झिझिया सीतामढी जिले का महत्वपूर्ण लोकनृत्य है। जट-जटिन नृत्य राजस्थान के झूमर के समान है। झिझिया में औरतें अपने सिर पर घड़ा रखकर नाचती हैं और अक्सर नवरात्र के दिनों में खेला जाता है। कलात्मक डिजाईन वाली लाख की चूड़ियों के लिए सीतामढी शहर की अच्छी ख्याति है।

शिक्षण संस्थान[संपादित करें]

  • प्राथमिक विद्यालय- 1479
  • मध्य विद्यालय- 619
  • उच्च विद्यालय- 64
  • बुनियादी विद्यालय- 9
  • डिग्री कॉलेज- 25
  • संस्कृत विद्यालय- 20
  • प्रोजेक्ट बालिका विद्यालय -17
  • मदरसा -26
  • अन्य प्रमुख विद्यालय- सूर्यवंशी चौधरी अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन संस्थान सीतामढ़ी, जवाहर नवोदय विद्यालय, केन्द्रीय विद्यालय जवाहरनगर, अनुसूचित जाति आवासीय विद्यालय आदि

यातायात तथा संचार सुविधाएं[संपादित करें]

  • सड़क: सीतामढी से गुजरने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग 77 तथा राष्ट्रीय राजमार्ग 104 नेपाल की सीमा तक जाती है। राजकीय राजमार्ग 52 पुपरी होते सीतामढी को मधुबनी से जोड़ती है। इसके अलावे जिले के सभी भागों में पक्की सड़कें जाती है। मॉनसून के दिनों में यातायात मार्ग अक्सर बाढ का शिकार बनती है और लोगों को नाव का सहारा लेना पड़ता है।[16] पटना से यहाँ सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है । पटना से यहाँ की दूरी 105 किलो मीटर तथा मुजफ्फरपुर से 53 किलोमीटर है ।
  • रेल मार्गः सीता़मढी रेलखंड पूर्व मध्य रेलवे क्षेत्र में पड़ता है। हाल में यहाँ से गुजरनेवाली मीटर गेज को दरभंगा तक ब्रॉड गेज में बदल दिया गया है। सीतामढी-नरकटियागंज खंड भी ब्रॉड गेज में बदल दिया गया है। साथ में सीतामढी से सैदपुर तक ब्रॉड गेज बन गया है तथा सैदपुर से मुजफ्फरपुर रेल लाईन का काम अभी चल रहा है। रेल अमान परिवर्तन के बाद दिल्ली को जानेवाली लिच्छवी एक्सप्रेस अब सीतामढी से चलती है। सीतामढ़ी मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी के बीच ब्रॉड गेज लाइन का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन का निर्माण कार्य चल रहा है । निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है , इसके पूरा होते ही सीतामढ़ी से मुजफ्फरपुर होते हुये नई दिल्ली, कोलकाता, वाराणसी, कानपुर और लखनऊ के लिए सीधी ट्रेन सेवा का लाभ लिया जा सकता है ।
  • हवाई मार्गः यहाँ का निकटतम हवाई अड्डा 130 किलोमीटर दूर राज्य की राजधानी पटना में है।
  • दूरभाष सेवाएँ: सूचना क्षेत्र में क्रांति होने का फायदा सीतामढी को भी मिला है। बीएसएनएल सहित अन्य मोबाईल कंपनियाँ जिले के हर क्षेत्र में अपनी पहुँच रखती है। बेसिक फोन (लैंडलाईन) तथा इंटरनेट की सेवा सिर्फ बीएसएनएल प्रदान करती है।
  • डाक व्यवस्था: सभी प्रखंड में डाकघर की सेवा उपलब्ध है। सीतामढी शहर तथा बड़े बाजारों में निजी कूरियर कंपनियाँ कार्यरत है जो ज्यादातर स्थानीय व्यापारियों के काम आती है।
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सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. [जानकी उत्पत्ति महात्म्य, लेखक : राम स्वार्थ सिंह पूनम,पृष्ठ संख्या:24]
  2. यात्रा सलाह : सीतामढ़ी
  3. [राष्ट्रीय सहारा, हिंदी दैनिक,नयी दिल्ली, पृष्ठ संख्या -1 (उमंग),26 सितंबर 1994, शीर्षक -सीतामढ़ी : एक गौरवशाली अतीत ]
  4. [मिथिला का इतिहास,लेखक : डॉ राम प्रकाश शर्मा, प्रकाशक : कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विषविद्यालय, दरभंगा, पृष्ठ संख्या : 460]
  5. BRAND BIHAR DOT COM
  6. सीतामढी की जनसंख्या
  7. [मिथिला का इतिहास,लेखक : डॉ राम प्रकाश शर्मा, प्रकाशक : कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विषविद्यालय, दरभंगा, पृष्ठ संख्या : 460]
  8. आज,राष्ट्रीय हिंदी दैनिक,पटना संस्करण,14.11.1994,पृष्ठ संख्या :9,आलेख शीर्षक : साहित्य में सीतामढ़ी
  9. कविता कोश में रश्मि प्रभा का परिचय
  10. आज,राष्ट्रीय हिंदी दैनिक,पटना संस्करण,14.11.1994,पृष्ठ संख्या :9,आलेख शीर्षक : साहित्य में सीतामढ़ी,लेखक: रवीन्द्र प्रभात
  11. [राष्ट्रीय सहारा, हिंदी दैनिक,नयी दिल्ली, पृष्ठ संख्या -1 (उमंग),26 सितंबर 1994, शीर्षक : एक गौरवशाली अतीत ]
  12. A Short Introduction of Ravindra Prabhat
  13. [मौन के स्वर, संपादक : श्री राम दूबे,प्रकाशन वर्ष: 1994,पृष्ठ संख्या : 58,प्रकाशक : काव्य संगम प्रकाशन, इन्दिरा नगर, सीतामढ़ी-843302]
  14. [लीगेसी इंडिया, मासिक के अक्‍टूबर 2012 अंक के ब्‍लॉगरी स्‍तंभ में प्रकाशित समाचार]
  15. http://www.jagran.com/bihar/sitamarhi-8432354.html
  16. सीतामढी में बाढ संबधी ख़बरें]

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