होमी व्यारावाला

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होमी व्यारावाला (Homai Vyarawalla) भारत की प्रथम महिला फोटोग्राफर थीं। गुजरात के नवसारी में मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी व्यारावाला ने 1938 में फोटोग्राफी के क्षेत्र में प्रवेश किया। उस वक्त कैमरा ही अपने आप में एक आश्चर्य कहलाता था। उस पर भी एक महिला का इस क्षेत्र में प्रवेश करना बड़े अचरज की बात थी। उन्होंने 1970 में पेशेवर फोटोग्राफी छोड़ दी थी। सन् २०११ में उन्हें भारत सरकार ने पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

परिचय[संपादित करें]

सिगरेट पीते हुए जवाहरलाल नेहरू और साथ ही भारत में तत्कालीन ब्रिटिश उच्चायुक्त की पत्नी सुश्री सिमोन की मदद करते हुए एक तस्वीर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की एक अलग ही छवि दर्शाती है। यह तस्वीर भारत की पहली तथा लंबे समय तक भारत की एकमात्र महिला फोटो पत्रकार द्वारा हो गई।

अपनी तस्वीरों के माध्यम से उन्होंने परिवर्तशील राष्ट्र के सामाजिक तथा राजनैतिक जीवन को दर्शाया। इनमें नेहरू से माउन्टवेटन व दलाई लामा का भारत में प्रवेश, उनकी ली गई तस्वीरे विशेष निशान छोड़ गए- वे स्वतंत्र भारत से पूर्व तथा इसके पश्चात की कहानी बताते हैं। जहां नेताओं ने देश के बंटवारे के लिए वोट किया उसकी बैठक समेत प्रमुख अवसरों परे ली गए उनकी तस्वीरे भारतीय इतिहास पर पड़े निर्णायक प्रभाव की झलक दर्शाती है।

उन्होंने 16 अगस्त 1947 को लाल किले पर पहली बार फहराये गये झंडे, भारत से लॉर्ड माऊन्टबेन्टन के प्रस्थान, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू तथा लाल बहादुर शास्त्री की अंतिम यात्रा के भी छायाचित्र लिए। उनके कार्य में चार दशकों का फैलाव जिसमें स्वतंत्रता की ललक के साथ-साथ नए राष्ट्र में नहीं निभाये गए वायदों के प्रति हताशा भी दिखाई देती है। व्यारवाला का जन्म 13 दिसम्बर 1913 को नवसारी गुजरात में मध्य वर्ग पारसी परिवार में होमई हाथीराम के रूप में हुआ। उनके पिता पारसी उर्दू थियेटर में अभिनेता थे। उनका पालन पोषण मुंबई में हुआ तथा उन्होंने पहले-पहल फोटोग्राफी अपने मित्र मानेकशां व्यारवाला से तथा बाद में जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से सीखी।

उनकी पहली तस्‍वीर बोम्‍बे क्रोनिकल में प्रकाशित हुई जिसमें उन्‍हें प्रत्‍येक छायाचित्र के लिए एक रुपया प्राप्‍त हुआ। वह अपने पति के साथ दिल्‍ली आ गई और ब्रिटिश सूचना सेवाओं के कर्मचारी के रूप में स्‍वतंत्रता के दौरान के फोटो लिए।

दिूतीय विश्‍व युद्ध के हमले के बाद, उन्‍होंने इलेस्‍ट्रेटिड वीकली ऑफ इंडिया मैगजीन के लिए कार्य करना शुरू किया जो 1970 तक चला। इसमें इनकी श्‍वेत-श्‍याम छायाचित्र हुए। उनके कई फोटोग्राफ टाईम, लाईफ, दि ब्‍लेक स्‍टार तथा कई अन्‍य अन्‍तरराष्‍ट्रीय प्रकाशनों में फोटो-कहानियों के रूप में प्रकाशित हुए।

व्‍यारवाला के कार्य एवं जीवन के बारे में सबीना गडिहोक ने अपनी पुस्‍तक इन्डिया इन फोकस –केमरा क्रोनिकल ऑफ होमेएव्‍यारवाला में बेहतर ढंग से उल्‍लेख किया है। फोटोग्राफरों से किए गए साक्षात्‍कारों के आधार पर उनकी फोटो-आत्‍मकथा तैयार की गई है।

व्‍यारवाला का पसन्‍दीदा विषय जवाहर लाल नेहरू थे। वे फोटो ग्राफर के लिए उन्‍हें उपयुक्‍त छवि मानती थीं। वह ब्‍लेक एण्‍ड वाईट माध्‍यम को वरियता देती थी।

फोटोग्राफी में वह फोटो-पत्रकारों के बीच उपयोग करती थी। दिन की रौशनी के दौरान, लो-एंगल शॉट तथा छवियों के विस्‍तार के लिए बैक लाईट का उपयोग करती थी, जिससे विषय-वस्‍तु की गहराई तथा ऊचाई को दिर्शाया जा सके। उनके कई फोटोग्राफ ‘’डालडा 13’’ के अंतर्गत प्रकाशित किए गए थे। इस नाम के पीछे जो उन्‍होंने कारण बतायें उनमें 1913 में उनका जन्‍म होना, 13वें में उनका विवाह होना तथा उनकी कार की नम्‍बर प्‍लेट डी एल डी 13 होना गिनाया।

1970 में, अपने पति के निधन के बाद उन्‍होंने फोटोग्राफी छोड़ने का निश्‍चय कर लिया।

पिछले 40 वर्षों में एक भी फोटोग्राफ न लेने के बावजूद होमई व्‍याखाला सदैव एक महान विभूति बनी रही तथा उनके द्वारा ली गई तस्‍वीरें नेशनल गैलरी ऑफ माडर्न आर्ट ने पिछले वर्ष मार्च में प्रदर्शित की। उन्‍हें पदम विभूषण पुरस्‍कार से नवाजा गया।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]