नंदलाल बोस
| नन्दलाल बसु | |
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नन्दलाल बसु की स्मृति में भारत सरकार ने १९६७ में डाक टिकट जारी किया। | |
| जन्म |
3 दिसम्बर 1883 हवेली खड़गपुर, बंगाल प्रेसिडेंसी, भारत (अब बिहार में)[1] |
| मौत |
साँचा:Death date and age 83 कोलकाता, पश्चिम बंगाल, भारत |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| प्रसिद्धि का कारण | चित्रकला |
| पुरस्कार | पद्मविभूषण (1954) |

नन्दलाल बसु (3 दिसम्बर 1882 – 16 अप्रैल 1966) भारत के आधुनिक कलाकारों में अग्रणी थे। वे आधुनिक भारतीय कला के जनक माने जाते हैं। वे राष्ट्रवादी चित्रकार थेजिन्होंने भारतीय चित्रकला को शिखर तक पहुंचाया। उन्होंने संविधान के पन्नों में अपनी कूची से भारत की पहचान उकेरी । उन्होंने ही भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों- भारत रत्न और पद्मश्री प्रतीकों के भी बनाए स्केच बनाये। कला के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उहें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।
आधुनिक भारतीय कला के प्रणेता और अंतरराष्ट्रीय स्तर के ख्यातिलब्ध कलाकार नंदलाल बोस ने भारतीय संविधान के मूल हस्तलिखित पन्नों को भारतीय पहचान से समृद्ध किया। 221 पन्नों के इस दस्तावेज के सभी पन्नों पर चित्र बनाना संभव नहीं था। ऐसे में उन्होंने संविधान के हर भाग के आरम्भ में 8x13 इंच के चित्र बनाए। संविधान में कुल 22 भाग हैं। इस तरह उन्हें भारतीय संविधान की इस मूल प्रति को अपने 22 चित्रों से सजाने का मौका मिला। इन 22 चित्रों को बनाने में चार वर्ष लगे। उनका काम न केवल संविधान की ऐतिहासिकता को जीवित रखता है बल्कि यह हमें भारतीय संस्कृति, समृद्ध इतिहास, धर्म, परंपरा, उच्च मानव मूल्यों और एकता का अहसास भी कराता है। संविधान में भगवान राम, बुद्ध, महावीर स्वामी, गुरु गोविंद सिंह, गुरुकुल, भगवद्गीता के संदेश, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, नालंदा विश्वविद्यालय, नटराज का भी चित्र मिलता है। इन चित्रों के माध्यम से उन्होंने देशवासियों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाने का काम किया। इनके प्रसिद्ध चित्रों में 'डांडी मार्च', 'संथाली कन्या', 'सती का देह त्याग' शामिल है। 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान उन्होंने गांधी जी के सफेद लिनोकट प्रिंट पर काली आकृति बनाई जो काफी चर्चित रही।
नंदलाल बोस का जन्म 3 दिसंबर 1882 को बिहार के मुंगेर जिले के हवेली खडगपुर गाँव में स्थापत्य शिल्पी पूर्णचंद्र बोस और क्षेमाणी के घर हुआ। पैतृक गांव बंगाल के हुगली में था। पूर्णचंद्र बोस ऑर्किटेक्ट तथा दरभंगा के महाराजा की रियासत के प्रबन्धक थे।[2] 16 अप्रैल 1966 कोलकाता में उनका देहांत हुआ।[3] उन्होंने 1905 से 1910 के बीच कलकत्ता गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ आर्ट में अबनीन्द्ननाथ ठाकुर से कला की शिक्षा ली, इंडियन स्कूल ऑफ़ ओरियंटल आर्ट में अध्यापन किया और 1922 से 1951 तक शान्तिनिकेतन के कलाभवन के प्रधानाध्यापक रहे।
बचपन से ही मूर्तिकला और चित्रकला गहरी रूचि को देखते हुए उनके माता-पिता ने कोलकाता के कला विद्यालय में प्रवेश दिलवाया। चित्रकारों और कला अध्यापन के अतिरिक्त तीन पुस्तिकाएं रूपावली, शिल्प कला और शिल्प चर्चा भी लिखीं। 1930 में जब महात्मा गांधी को दांडी मार्च के दौरान गिरफ्तार किया गया था, तब नंदलाल बोस ने चित्र बनाया, जिसमें गांधी जी अपनी लाठी के साथ चलते हुए दिखाए गए। यहां से नंदलाल बोस की स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी शुरू हुई। अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के शिष्य रहे नंदलाल बोस ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
गांधीजी चाहते थे कि वे भारत में रहने वाले लोगों की जीवनशैली को कला के माध्यम से दिखाएं और उनकी इस कला का प्रदर्शन अधिवेशन के दौरान हो। उन्होंने हरिपुरा के आसपास के गांव का दौरा किया और आखिर में ग्रामीण भारत के जीवन को दर्शाते हुए कुछ आर्ट कैनवास बनाये।[4]। इस अनमोल कलाकारी की 2019 में प्रसिद्ध कला प्रदर्शनी वेनिस बिनाले में जबरदस्त चर्चा हुई थी।
विरासत
[संपादित करें]भारत के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी 17 दिसंबर 2024 को राज्यसभा में भारत के संविधान के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर नंदलाल बोस को याद किया था। उन्होंने कहा था कि नंदलाल बोस, गुरुवर रवींद्रनाथ टैगोर के अंतेवासी थे और बहुत बड़े कलाकार थे। लिखे गए संविधान के अनुरूप नंदलाल बोस ने इतिहास, धर्म, संस्कृति और परंपरा एवं मानव जीवन को उच्च मूल्य देने वाली घटनाओं को यहां चित्र रूप में उकेरा। यहां भगवान राम, बुध और महावीर हैं तो गुरुकुल से हमारी शिक्षा नीति कैसी होनी चाहिए इसका संदेश भी मिलता है। भगवत गीता के संदेश के चित्र के साथ शिवाजी और लक्ष्मीबाई को भी यहां पर स्थान देकर देशभक्ति का पाठ पढ़ाया गया है। प्रचीन शिक्षा पद्धति का स्मरण कराने वाले गुरुकुल के साथ ही नटराज का चित्र बताता है कि जीवन में संतुलन कैसा होना चाहिए। इतना ही नहीं, 26 जनवरी 2025 की गणतंत्र दिवस परेड में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की झांकी में संविधान के 75 वर्षों के गौरवशाली सफर का प्रस्तुतीकरण किया गया था। उसमें भी नंदलाल बोस की कलाकृतियों को मूर्ति कला पैनलों पर प्रमुखता से दर्शाया गया था। 16 अप्रैल 1966 को नंदलाल बोस का निधन हो गया।
प्रकाशन
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- दृष्टि ओ सृष्टि [Vision and the Creation] by Nandalal Bose, published by Visva-Bharati Granthana Vibhaga [ Edition Language - Bengali ]
- शिल्प चर्चा [ শিল্প চর্চা ] by Nandalal Bose, published April 1956 by Visva Bharati [ Edition Language - Bengali ]
- Pictures from the life of buddha
- रूपावली
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ C. H. Prahlada Rao. "Nanadlal Bose". Rashtrotthana Sahitya.
- ↑ "नन्दलाल बोस" (अंग्रेज़ी भाषा में). ग्रेट बनयान ऑक्शन कं. मूल से (एएसपी) से 30 सितंबर 2007 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 20 जून 2007.
{{cite web}}: Check date values in:|access-date=(help) - ↑ "नन्दलाल बोस" (अंग्रेज़ी भाषा में). इंडियन आर्ट सर्किल. मूल से (एसएचटीएमएल) से 14 अप्रैल 2008 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 20 जून 2007.
{{cite web}}: Check date values in:|access-date=(help) - ↑ लोक शैली के सार्थक प्रतिनिधि नन्दलाल बसु के हरिपुरा पोस्टस