सुमित्रानन्दन पन्त

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
(सुमित्रानंदन पंत से अनुप्रेषित)
Jump to navigation Jump to search
सुमित्रानंदन पंत
Sumitran pant.jpg
सुमित्रानंदन पंत
जन्म: २० मई, १९००
कौसानी, बागेश्वर, उत्तराखंड, भारत
मृत्यु: २९ दिसम्बर, १९७७
इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत
कार्यक्षेत्र: कवि और लेखक
राष्ट्रीयता: भारतीय
भाषा: हिन्दी
काल: आधुनिक काल
विधा: काव्य और गद्य
विषय: गीत, कविताएँ
साहित्यिक
आन्दोलन
:
छायावाद,
रहस्यवाद व प्रगतिवाद
प्रमुख कृति(याँ): पल्लव(काव्य), चिदम्बरा(काव्य संकलन), लोकायतन (महाकाव्य)
हस्ताक्षर: Signaturesnp.jpg


सुमित्रानंदन पंत (२० मई १९०० - २९ दिसम्बर १९७७) हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है। उनका जन्म कौसानी बागेश्वर में हुआ था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था। गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, सुगठित शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था।[1]

जीवन परिचय[संपादित करें]

सुमित्रानंदन पंत का जन्म अल्मोड़ा(अब बागेश्वर) ज़िले के कौसानी नामक ग्राम में २० मई १९०० ई. को हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही उनकी माँ का निधन हो गया। उनका लालन-पालन उनकी दादी ने किया। उनका नाम गोसाईं दत्त रखा गया।[2] वह गंगादत्त पंत की आठवीं संतान थे। १९१० में शिक्षा प्राप्त करने गवर्नमेंट हाईस्कूल अल्मोड़ा गये। यहीं उन्होंने अपना नाम गोसाईं दत्त से बदलकर सुमित्रनंदन पंत रख लिया। १९१८ में मँझले भाई के साथ काशी गये और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण कर म्योर कालेज में पढ़ने के लिए इलाहाबाद चले गए। १९२१ में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के भारतीयों से अंग्रेजी विद्यालयों, महाविद्यालयों, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के आह्वान पर उन्होंने महाविद्यालय छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषा-साहित्य का अध्ययन करने लगे। इलाहाबाद में ही उनकी काव्यचेतना का विकास हुआ। कुछ वर्षों के बाद उन्हें घोर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। कर्ज से जूझते हुए पिता का निधन हो गया। कर्ज चुकाने के लिए जमीन और घर भी बेचना पड़ा। इन्हीं परिस्थितियों में वह मार्क्सवाद की ओर उन्मुख हुये। १९३१ में कुँवर सुरेश सिंह के साथ कालाकांकर, प्रतापगढ़ चले गये और अनेक वर्षों तक वहीं रहे। महात्मा गाँधी के सान्निध्य में उन्हें आत्मा के प्रकाश का अनुभव हुआ। १९३८ में प्रगतिशील मासिक पत्रिका 'रूपाभ' का सम्पादन किया। श्री अरविन्द आश्रम की यात्रा से आध्यात्मिक चेतना का विकास हुआ। १९५० से १९५७ तक आकाशवाणी में परामर्शदाता रहे। १९५८ में 'युगवाणी' से 'वाणी' काव्य संग्रहों की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन 'चिदम्बरा' प्रकाशित हुआ, जिसपर १९६८ में उन्हें 'भारतीय ज्ञानपीठ' पुरस्कार प्राप्त हुआ। १९६० में 'कला और बूढ़ा चाँद' काव्य संग्रह के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' प्राप्त हुआ। १९६१ में 'पद्मभूषण' की उपाधि से विभूषित हुये। १९६४ में विशाल महाकाव्य 'लोकायतन' का प्रकाशन हुआ। कालान्तर में उनके अनेक काव्य संग्रह प्रकाशित हुए। वह जीवन-पर्यन्त रचनारत रहे। अविवाहित पंत जी के अंतस्थल में नारी और प्रकृति के प्रति आजीवन सौन्दर्यपरक भावना रही। उनकी मृत्यु २९ दिसम्बर १९७७ को हुई।

साहित्य सृजन[संपादित करें]

सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था। १९१८ के आसपास तक वे हिंदी के नवीन धारा के प्रवर्तक कवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे। इस दौर की उनकी कविताएं वीणा में संकलित हैं। १९२६ में उनका प्रसिद्ध काव्य संकलन ‘पल्लव’ प्रकाशित हुआ। कुछ समय पश्चात वे अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गये। इसी दौरान वे मार्क्सफ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आये। १९३८ में उन्होंने 'रूपाभ' नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर, रघुपति सहाय आदि के साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे रहे। वे १९५० से १९५७ तक आकाशवाणी से जुडे रहे और मुख्य-निर्माता के पद पर कार्य किया। उनकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की उनकी रचनाओं 'स्वर्णकिरण' और 'स्वर्णधूलि' में देखी जा सकती है। “वाणी” तथा “पल्लव” में संकलित उनके छोटे गीत विराट व्यापक सौंदर्य तथा पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं। “युगांत” की रचनाओं के लेखन तक वे प्रगतिशील विचारधारा से जुडे प्रतीत होते हैं। “युगांत” से “ग्राम्या” तक उनकी काव्ययात्रा प्रगतिवाद के निश्चित व प्रखर स्वरों की उद्घोषणा करती है। उनकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुख पडाव हैं – प्रथम में वे छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से प्रेरित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी। १९०७ से १९१८ के काल को स्वयं उन्होंने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वाणी में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छ्वास और १९२६ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम आदि। उनके जीवनकाल में उनकी २८ पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविताएं, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। पंत अपने विस्तृत वाङमय में एक विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी के रूप में सामने आते हैं किंतु उनकी सबसे कलात्मक कविताएं 'पल्लव' में संगृहीत हैं, जो १९१८ से १९२५ तक लिखी गई ३२ कविताओं का संग्रह है। इसी संग्रह में उनकी प्रसिद्ध कविता 'परिवर्तन' सम्मिलित है। 'तारापथ' उनकी प्रतिनिधि कविताओं का संकलन है। [3]

विचारधारा[संपादित करें]

उनका संपूर्ण साहित्य 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' के आदर्शों से प्रभावित होते हुए भी समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। जहां प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति और सौंदर्य के रमणीय चित्र मिलते हैं वहीं दूसरे चरण की कविताओं में छायावाद की सूक्ष्म कल्पनाओं व कोमल भावनाओं के और अंतिम चरण की कविताओं में प्रगतिवाद और विचारशीलता के। उनकी सबसे बाद की कविताएं अरविंद दर्शन और मानव कल्याण की भावनाओं से ओतप्रोत हैं।[4] पंत परंपरावादी आलोचकों और प्रगतिवादी तथा प्रयोगवादी आलोचकों के सामने कभी नहीं झुके। उन्होंने अपनी कविताओं में पूर्व मान्यताओं को नकारा नहीं। उन्होंने अपने ऊपर लगने वाले आरोपों को 'नम्र अवज्ञा' कविता के माध्यम से खारिज किया। वह कहते थे 'गा कोकिला संदेश सनातन, मानव का परिचय मानवपन।'

पुरस्कार व सम्मान[संपादित करें]

हिंदी साहित्य सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968)[5], साहित्य अकादमी[6], तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार[7] जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। सुमित्रानंदन पंत के नाम पर कौसानी में उनके पुराने घर को, जिसमें वह बचपन में रहा करते थे, 'सुमित्रानंदन पंत वीथिका' के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है।[8] इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है।[9][10]

स्मृति विशेष[संपादित करें]

उत्तराखंड में कुमायूँ की पहाड़ियों पर बसे कौसानी गांव में, जहाँ उनका बचपन बीता था, वहां का उनका घर आज 'सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका' नामक संग्रहालय बन चुका है। इस में उनके कपड़े, चश्मा, कलम आदि व्यक्तिगत वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं। संग्रहालय में उनको मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रशस्तिपत्र, हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा मिला साहित्य वाचस्पति का प्रशस्तिपत्र भी मौजूद है। साथ ही उनकी रचनाएं लोकायतन, आस्था आदि कविता संग्रह की पांडुलिपियां भी सुरक्षित रखी हैं। कालाकांकर के कुंवर सुरेश सिंह और हरिवंश राय बच्चन से किये गये उनके पत्र व्यवहार की प्रतिलिपियां भी यहां मौजूद हैं।

संग्रहालय में उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष पंत व्याख्यान माला का आयोजन होता है। यहाँ से 'सुमित्रानंदन पंत व्यक्तित्व और कृतित्व' नामक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है। उनके नाम पर इलाहाबाद शहर में स्थित हाथी पार्क का नाम 'सुमित्रानंदन पंत बाल उद्यान' कर दिया गया है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "निसर्ग में वैश्विक चेतना की अनुभूति: सुमित्रानंदन पंत" (पीएचपी). ताप्तिलोक. http://taptilok.com/pages/details.php?detail_sl_no=294&cat_sl_no=8. अभिगमन तिथि: 2007. 
  2. "सुमित्रानंदन पंत" (एचटीएम). उत्तरांचल. http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/utrn0002.htm. अभिगमन तिथि: 2007. 
  3. "सुमित्रानंदन पंत" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएमएल). कल्चरोपेडिया. http://www.culturopedia.com/Personalities/indianpersonality-sumitranandanpant.html. अभिगमन तिथि: 2007. 
  4. "हिंदी लिटरेचर" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). सीज़ंस इंडिया. http://www.seasonsindia.com/art_culture/lit_hindi_sea.htm. अभिगमन तिथि: 2007. 
  5. "ज्ञानपीठ अवार्ड" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). वेबइंडिया123.कॉम. http://www.webindia123.com/government/award/jnanpith.htm. अभिगमन तिथि: 2007. 
  6. "साहित्य एकेडमी अवार्ड एंड फ़ेलोशिप्स" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). साहित्य अकादमी. http://www.sahitya-akademi.org/sahitya-akademi/awa10306.htm#hindi. अभिगमन तिथि: 2007. 
  7. "सुमित्रानंदन पंत" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). इंडियानेटज़ोन.कॉम. http://www.indianetzone.com/9/sumitranandan_pant.htm. अभिगमन तिथि: 2007. 
  8. "कौशानी" (अंग्रेज़ी में) (एएसपी). मेड इन इंडिया. http://www.medindia.net/taste_of_india/travel/kaushani.asp. अभिगमन तिथि: 2007. 
  9. "सुमित्रानंदन पंत वीथिका" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). इंडिया9.कॉम. http://www.india9.com/i9show/Sumitranandan-Pant-Vithika-27030.htm. अभिगमन तिथि: 2007. 
  10. "सुमित्रानंदन पंत वीथिका" (अंग्रेज़ी में) (एएसपी). क्राफ़्ट रिवाइवल ट्रस्ट. http://craftrevivaltrust.org/detailsMuseums.asp?CountryName=India&MuseumCode=001851. अभिगमन तिथि: 2007. 

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सुमित्रानंदन पंत (कविता कोश)[भारत माता ग्रामवासिनी। खेतों में फैला है श्यामल धूल भरा मैला सा आँचल, गंगा यमुना में आँसू जल, मिट्टी कि प्रतिमा उदासिनी। दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन, अधरों में चिर नीरव रोदन, युग युग के तम से विषण्ण मन, वह अपने घर में प्रवासिनी। तीस कोटि संतान नग्न तन, अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन, मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन, नत मस्तक तरु तल निवासिनी! स्वर्ण शस्य पर -पदतल लुंठित, धरती सा सहिष्णु मन कुंठित, क्रन्दन कंपित अधर मौन स्मित, राहु ग्रसित शरदेन्दु हासिनी। चिन्तित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित, नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित, आनन श्री छाया-शशि उपमित, ज्ञान मूढ़ गीता प्रकाशिनी! सफल आज उसका तप संयम, पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम, हरती जन मन भय, भव तम भ्रम, जग जननी जीवन विकासिनी। 1]


सन्दर्भ त्रुटि: "भारत माता ग्रामवासिनी। खेतों में फैला है श्यामल धूल भरा मैला सा आँचल, गंगा यमुना में आँसू जल, मिट्टी कि प्रतिमा उदासिनी। दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन, अधरों में चिर नीरव रोदन, युग युग के तम से विषण्ण मन, वह अपने घर में प्रवासिनी। तीस कोटि संतान नग्न तन, अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन, मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन, नत मस्तक तरु तल निवासिनी! स्वर्ण शस्य पर -पदतल लुंठित, धरती सा सहिष्णु मन कुंठित, क्रन्दन कंपित अधर मौन स्मित, राहु ग्रसित शरदेन्दु हासिनी। चिन्तित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित, नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित, आनन श्री छाया-शशि उपमित, ज्ञान मूढ़ गीता प्रकाशिनी! सफल आज उसका तप संयम, पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम, हरती जन मन भय, भव तम भ्रम, जग जननी जीवन विकासिनी।" नामक सन्दर्भ-समूह के लिए <ref> टैग मौजूद हैं, परन्तु समूह के लिए कोई <references group="भारत माता ग्रामवासिनी। खेतों में फैला है श्यामल धूल भरा मैला सा आँचल, गंगा यमुना में आँसू जल, मिट्टी कि प्रतिमा उदासिनी। दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन, अधरों में चिर नीरव रोदन, युग युग के तम से विषण्ण मन, वह अपने घर में प्रवासिनी। तीस कोटि संतान नग्न तन, अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन, मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन, नत मस्तक तरु तल निवासिनी! स्वर्ण शस्य पर -पदतल लुंठित, धरती सा सहिष्णु मन कुंठित, क्रन्दन कंपित अधर मौन स्मित, राहु ग्रसित शरदेन्दु हासिनी। चिन्तित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित, नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित, आनन श्री छाया-शशि उपमित, ज्ञान मूढ़ गीता प्रकाशिनी! सफल आज उसका तप संयम, पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम, हरती जन मन भय, भव तम भ्रम, जग जननी जीवन विकासिनी।"/> टैग नहीं मिला। यह भी संभव है कि कोई समाप्ति </ref> टैग गायब है।