ग्रन्थि

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किसी जीव के उस अंग को ग्रन्थि (gland) कहते हैं जो हार्मोन, दूध आदि का संश्लेषण करती हैं।

परिचय[संपादित करें]

जीवों के शरीर में अनेक ग्रंथियाँ होती हैं। ये विशेषतया दो प्रकार की हैं-

  • एक वे जिनमें स्राव बनकर वाहिनी द्वारा बाहर आ जाता है। (वाह्यस्रावी ग्रन्थि / exocrine gland)
  • दूसरी वे जिनमें बना स्राव बाहर न आकर वहीं से सीधा रक्त में चला जाता है। ये अंत:स्रावी ग्रंथियाँ (endocrine gland) कहलाती है।

कुछ ग्रंथियाँ ऐसी भी हैं जिनमें दोनों प्रकार के स्राव बनते हैं। एक स्राव वाहिनी द्वारा ग्रंथि से बाहर निकलता है और दूसरा वहीं रक्त में अवशोषित हो जाता है।

लसिका ग्रन्थियाँ[संपादित करें]

मानव-शरीर में सबसे अधिक संख्या लसीका ग्रंथियों (Lymbh glands) की है। वे असंख्य हैं और लसीका वाहिनियों (Lymphatics) पर सर्वत्र जहाँ-तहाँ स्थित हैं। अंग के जोड़ों पर तथा उदर के भीतर आमाशय के चारों ओर और वक्ष के मध्यांतराल में भी इनकी बहुत बड़ी संख्या स्थित है। ये वाहिनियों द्वारा परस्पर जुड़ी हुई हैं। वाहिनियों और इन ग्रंथियों का सारे शरीर में रक्तवाहिकाओं के समान एक जाल फैला हुआ है।

ये लसीका ग्रंथियाँ मटर या चने के समान छोटे, लंबोतरे या अंडाकार पिंड होते हैं। इनके एक और पृष्ठ पर हलका गढ़ा सा होता है, जो ग्रंथि का द्वार कहलाता है। इसमें होकर रक्तवाहिकाएँ ग्रंथि में आती हैं और बाहर निकलती भी हैं। ग्रंथि के दूसरी ओर से अपवाहिनी निकलती है, जो लसीका को बाहर ले जाती है और दूसरी अपवाहिनियों के साथ मिलकर जाल बनाती है। ग्रंथि को काटकर सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखने से उसमें एक छोटा बाह्य प्रांत दिखाई पड़ता है, जो प्रांतस्थ (कारटेक्स, cortex) कहलाता है। ग्रंथि में आनेवाली वाहिकाएँ इसी प्रांतस्थ में खुलती हैं। ग्रंथि का बीच का भाग अंतस्थ (Medulla) कहलाता है, जो द्वार के पास ग्रंथि के पृष्ठ तक पहुँच जाता है। यहीं से अपवाहिनी निकलती है, जो लसीका और ग्रंथि में उत्पन्न हुए उन लसीका स्त्रावों को ले जाती है जो अंत में मुख्य लसीकावाहिनी द्वारा मध्यशिरा में पहुँच जाते हैं।

अन्य ग्रन्थियाँ[संपादित करें]

यकृत (लीवर) शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि कहलाती है। प्लीहा, अग्न्याशय, अंडग्रंथि, डिंबग्रंथि - इन सबकी ग्रंथियों में ही गणना की जाती है। आमाशय की भित्तियों में बहुसंख्या में स्थित पाचनग्रंथियाँ जठर रस का निर्माण करती हैं। इसी प्रकार सारे क्षुद्रांत की भित्तियों में स्थित असंख्य ग्रंथियाँ भी रसोत्पादन करती हैं, जो आंत्र के भीतर पहुँचकर पाचन में सहायक होता है। कर्णमूल, जिह्वाघर तथा अधोहनु ग्रंथियाँ लालारस बनाती हैं, जिसका मुख्य काम कार्बोहाइड्रेट को पचाकर ग्लूकोज़ या डेक्सट्रोज़ बनाना है। त्वचा भी असंख्य सूक्ष्म ग्रंथियों से परिपूर्ण है, जो स्वेद (पसीना) तथा त्वग्वसा (Sebum) बनाती हैं।