छायावाद

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छायावाद विशेष रूप से हिंदी साहित्य के रोमांटिक उत्थान की वह काव्य-धारा है जो लगभग ई.स. १९१८ से १९३६ तक की प्रमुख युगवाणी रही।[1] इसमें जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा आदि मुख्य कवि हुए। यह सामान्य रूप से भावोच्छवास प्रेरित स्वच्छन्द कल्पना-वैभव की वह स्वच्छन्द प्रवृत्ति है जो देश-कालगत वैशिष्ट्य के साथ संसार की सभी जातियों के विभिन्न उत्थानशील युगों की आशा, आकांक्षा में निरंतर व्यक्त होती रही है। स्वच्छन्दता की इस सामान्य भावधारा की विशेष अभिव्यक्ति का नाम हिंदी साहित्य में छायावाद पड़ा। छायावाद नामकरण का श्रेय मुकुटधर पाण्डेय को जाता है।[2] इसके आधार पर हिंदी साहित्य में छायावादी युग और छायावादी आंदोलन को भी स्थान मिला।

परिचय[संपादित करें]

अंग्रेजी में जिसे 'रोमांटिसिज़्म' (romanticism) कहते हैं, हिंदी में उसे 'छायावाद' कहते हैं। यों हिंदी कविता में छायावाद का युग द्विवेदी युग के बाद आया, किंतु उसका आरंभ द्विवेदी युग में ही हो गया था। उससे बहुत पहले बँगला में रवींद्रनाथ की रचनाओं से छायावाद प्रतिष्ठित हो चुका था। सन् १९१३ में 'गीतांजलि' पर रवींद्रनाथ को नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद उनका काव्यप्रभाव अखिल भारतीय आधुनिक साहित्य पर पड़ने लगा था, हिंदी साहित्य पर भी पड़ा। द्विवेदीयुग के प्रतिनिधि कवि मैथिलीशरण गुप्त की 'झंकार' (सन्, १९१४-१७) देखने से ज्ञात होता है कि यत्र-तत्र वे भी रवींद्रनाथ की प्रतिभा से प्रभावित हुए।

द्विवेदी युग में छायावाद के विशेष कवि सियारामशरण गुप्त और श्री मुकुटधर पांडेय हैं। सियारामशरण जी की प्रारंभिक पुस्तकों ('मौर्य्य विजय' और 'अनाथ') के बाद की कवितापुस्तकों ('दूर्वादल', 'विषाद', 'पाथेय') में रवींद्रनाथ का काव्यप्रभाव परिलक्षित है। मुकुटधर जी की भी किन्हीं कविताओं में रवींद्रनाथ का प्रभाव है, किंतु शेली के 'टु ए स्काईलार्क' की याद दिलानेवाली उनकी 'कुररी के प्रति', शीर्षक कविता देखने से ज्ञात होती है कि वे अंग्रेजी की उस रोमांटिक कविता से भी प्रेरित थे जिससे स्वयं रवींद्रनाथ भी प्रभावित थे। किशोरावस्था में उन्हें तुतलाता शैली कहा जाता था।

भारतेंदुयुग के बाद द्विवेदीयुग के भाषा और छंद की नवीनता दी थी, द्विवेदीयुग के बाद छायावाद ने भाषा और छंद की नवीनता दी। यद्यपि रवींद्रनाथ उसके कलागुरु थे तथापि हिंदी का छायावादयुग उन्हीं के प्रभाव तक सीमित नहीं रहा, उसने प्राचीन संस्कृत साहित्य (वेदों, उपनिषदों तथा कालिदास की रचनाओं) और मध्यकालीन हिंदी साहित्य (भक्ति और शृंगांर की कविताओं) से भी आदान लेकर आत्मविस्तार किया। उसकी विस्तीर्णता में बौद्ध दर्शन और सूफी दर्शन का भी समावेश हो गया। रवींद्रनाथ ने भी ऐसा ही विशद काव्यानुष्ठान (काव्यसमन्वय) किया था। सभी भारतीय भाषाओं को प्राचीन वाङ्मय का उत्तराधिकार प्राप्त था, फलत: हिंदी में भी छायावाद का सांस्कृतिक और भावात्मक संबंध तीत से स्थापित हो गया था। वह गतिशील था, अतएव अंग्रेजी की रोमांटिक कविता से भी उसका भावात्मक और कलात्मक संबंध जुड़ गया था। उसका हृदय उन्मुक्त था, स्वभावत: वह साहित्य में ही नहीं, जीवन में भी अनंत सृष्टि और असीम विश्व की ओर उन्मुख हो गया था। इसीलिए एक युग, एक दिशा और एक भाषा में आकर भी छायावाद सभी युगों, सभी देशों और सभी भाषाओं से एकात्म हो गया। जैसे सांप्रदायिक सीमाओं को तोड़कर उसने संस्कृति को आत्मसात् किया, इस तरह उसमें सभी युगों और सभी दिशाओं का उपादान एकसार हो गया। छायावादयुग उस सांस्कृतिक और साहित्यिक जागरण का सार्वभौम विकासकाल था जिसका आरंभ राष्ट्रीय परिधि में भारतेंदुयुग से हुआ था।

छायावाद की शब्दावली (प्रेम, मूक भाषण, अव्यक्त वेदना, इत्यादि) से सूचित होता है कि उसके भाव अतींद्रिय अथवा अनिर्वचनीय थे। उसके सामने भी सूरदास की तरह 'अविगत गति' (परीक्षा अनुभूति) को अभिव्यक्ति देने की समस्या थी। निर्गुण (रहस्यवाद) में केवल अविगत गति थी, किंतु छायावाद निर्गुण की तरह वीतराग नहीं, सगुण की तरह सानुराग था। वह हिंदी का नवीन सगुण काव्य था। मध्ययुग का सगुण 'अवतार' को लेकर चला था, छायावाद उस स्वात्म को लेकर अग्रसर हुआ था जिसे तुलसीदास ने 'स्वांत:' कहा है। कवि का स्वात्म वह 'चित्त' है जो अपनी ही तरह निखिल सृष्टि को सचेतन रूप में उपलब्ध करता है। इसीलिए छायावाद ने प्रकृति को भी सजीव रूप में देखा। मध्ययुग के सगुण और श्रृगांर काव्य में प्रकृति केवल जड़ उपकरण है, उद्दीपन और अलंकरण का साधन है। छायावाद ने उसे अपना अंत:करण देकर काव्य में एक विशेष भावात्मक सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया।

छायावाद का 'छाया' शब्द सूक्ष्मता का बोधक है। वह पंचभूतों को स्थूल रूप (वस्तुरूप) में नहीं ग्रहण करता। छायावाद के काव्यजगत् के लिए भी कवि के शब्दों में यही कहा जा सकता है जो उसने अपने मनोजगत् ('छाया का देश') के लिए कहा है:

यह छाया का देश, कल्पना का क्रीड़ास्थल,
वस्तुजगत् अपना घनत्व खोकर इस जग में
सूक्ष्म रूप धारण कर लेता, भावद्रवित हो।

कवि के केवल सूक्ष्म भावात्मक दर्शन का ही नहीं, 'छाया' से उसके सूक्ष्म कलाभिव्यजंन का भी परिचय मिलता है। उसकी काव्यकला में वाच्यार्थ की अपेक्षा लाक्षणिकता और ध्वन्यात्मकता है। अनुभूति की निगूढ़ता के कारण अस्फुटता भी है। शैली में राग की नवोद्बुद्धता अथवा नवीन व्यंजकता है।

द्विवेदी युग में कविता का ढाँचा पद्य का था। वस्तुत: गद्य का प्रबंध ही उसमें पद्य हो गया था, भाषा भी गद्यवत् हो गई थी। छायावाद ने पद्य का ढाँचा तोड़कर खड़ी बोली को काव्यात्मक बना दिया। पद्य में स्थूल इतिवृत्त था, छायावाद के काव्य में भावात्मक अतंर्वृत्त था, छायावाद के काव्य में भावात्मक अंतर्वृत्त आ गया। भाव के अनुरूप ही छायावाद की भाषा और छंद भी रागात्मक और रसात्मक हो गया। ब्रजभाषा के बाद छायावाद द्वारा गीतकाव्य का पुनरुत्थान हुआ। छायावाद युग के प्रतिनिधि कवि हैं- प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, रामकुमार। पूर्वानुगामी सहयोगी हैं- माखनलाल और 'नवीन'।

गीतकाव्य के बाद छायावाद में भी महाकाव्य का निर्माण हुआ। तुलसीदास जैसे 'स्वांत:' को लेकर लोकसंग्रह के पथ पर अग्रसर हुए थे वैसे ही छायावाद के कवि भी 'स्वात्म' को लेकर एकांत के स्वगत जगत् से सार्वजनिक जगत् में अग्रसर हुए। प्रसाद की 'कामायनी' और पंत का 'लोकायतन' इसका प्रमाण है। 'कामायनी' सिंधु में विंदु (एकांत अंतर्जगत्) की ओर है, 'लोकायतन' विंदु में सिंधु (सार्वजनिक जगत्) की ओर।

प्रमुख आलोचकों की दृष्टि में छायावाद[संपादित करें]

आचार्य रामचंद्र शुक्ल[संपादित करें]

संवत् १९१७ के आसपास मैथिलीशरण गुप्त, मुकुटधर पांडेय आदि कवि खड़ीबोली काव्य को अधिक कल्पनामय, चित्रमय और अंतर्भाव व्यंजक रूप-रंग देने में प्रवृत्त हुए यह स्वच्छन्द और नूतन पद्धति अपना रास्ता निकाल रही थी कि रवीन्द्रनाथ की रहस्यात्मक कविताओं की धूम हुई। और कई कवि एक साथ रहस्यवाद और प्रतीकवाद अथवा चित्रभाषावाद को ही एकांत धैर्य बनकर चल पड़े। चित्रभाषा या अभिव्यंजन पद्धति पर ही जब लक्ष्य टिक गया तब उसके प्रदर्शन के लिए लौकिक या अलौकिक प्रेम का क्षेत्र ही बाकी समझा गया। इस बँधे हुए क्षेत्र के भीतर चलनेवाले काव्य ने छायावाद नाम ग्रहण किया।

छायावादी शब्द का प्रयोग दो अर्थों में समझना चाहिये। एक तो रहस्यवाद के अर्थ में, जहाँ उसका संबंध काव्य-वस्तु से होता है अर्थात् जहाँ कवि उस अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलंबन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम का अनेक प्रकार से व्यंजन करता है। इस अर्थ का दूसरा प्रयोग काव्य-शैली या पद्धति-विशेष के व्यापक अर्थ में होता है’ छायावाद का सामान्यतः अर्थ हुआ प्रस्तुत के स्थान पर उसकी व्यंजना करनेवाली छाया के रूप में अप्रस्तुत का कथन। छायावाद का चलन द्विवेदी काल की रूखी इतिवृत्तात्मक (कथात्मकता) की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। जैसे, धूल की ढेरी में अनजाने, छिपे हैं मेरे मधुमय गान।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी[संपादित करें]

द्वितीय महायुद्ध के समाप्त होते सारे देश में नई चेतना की लहर दौड़ गई। सन् १९२९ में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतवर्ष विदेशी गुलामी को झाड़-फेंकने के लिए कटिबद्ध हो गया। इसे सिर्फ राजनीति तक ही सीमित नहीं समझना चाहिये। यह संपूर्ण देश का आत्म स्वरूप समझने का प्रयत्न था और अपनी गलतियों को सुधार कर संसार की समृद्ध जातियों की प्रति- द्वंद्विता में अग्रसर होने का संकल्प था। संक्षेप में, यह एक महान सांस्कृतिक आंदोलन था। चित्तगत उन्मुखता इस कविता का प्रधान उद्गम थी और बदलते हुए मानो के प्रति दृढ आस्था इसका प्रधान सम्बल। इस श्रेणी के कवि ग्राहिकाशक्ति से बहुत अधिक संपन्न थे और सामाजिक विषमता और असामंजस्यों के प्रति अत्यधिक सजग थे। शैली की दृष्टि से भी ये पहले के कवियों से एकदम भिन्न थे। इनकी रचना मुख्यतः विषयि प्रधान थी। सन् 1920 की खड़ीबोली कविता में विषयवस्तु की प्रधानता बनी हुई थी। परंतु इसके बाद की कविता में कवि के अपने राग-विराग की प्रधानता हो गई। विषय अपने आप में कैसा है ? यह मुख्य बात नहीं थी। बल्कि मुख्य बात यह रह गई थी कि विषयी (कवि) के चित्त के राग-विराग से अनुरंजित होने के बाद विषय कैसा दीखता है ? परिणाम विषय इसमें गौण हो गया और कवि प्रमुख’

डॉ॰ नगेन्द्र[संपादित करें]

1920 के आसपास, युग की उद्बुद्ध चेतना ने बाह्य अभिव्यक्ति से निराश होकर, जो आत्मबद्ध अंतर्मुखी साधना आरंभ की, वह काव्य में छायावाद के रूप में अभिव्यक्त हुई’

डॉ॰ नामवर सिंह[संपादित करें]

‘ छायावाद शब्द का अर्थ चाहे जो हो, परंतु व्यावहारिक दृष्टि से यह प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी की उन समस्त कविताओं का द्योतक है, जो १९१८ से ३६ ई. के बीच लिखी गईं।’ वे आगे लिखते हैं- ‘छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो एक ओर पुरानी रूढि़यों से मुक्ति चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से।’

जयशंकर प्रसाद[संपादित करें]

‘काव्य के क्षेत्र में पौराणिक युग की किसी घटना अथवा देश-विदेश की सुंदरी के बाह्य वर्णन से भिन्न जब वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्ति होने लगी तब हिंदी में उसे छायावाद नाम से अभिहित किया गया।’ प्रसाद जी अंत में कहते हैं- छायावादी कविता भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है। ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौंदर्य, प्रकृति-विधान तथा उपचार वक्रता के साथ स्वानुभूति की विवृत्ति छायावाद की विशेषताएँ हैं।’

सुमित्रानंदन पंत[संपादित करें]

छायावाद को पाश्चात्य साहित्य के रोमांटिसिज्म से प्रभावित मानते हैं।

महादेवी वर्मा[संपादित करें]

वे छायावाद का मूल दर्शन सर्वात्मवाद को मानती हैं और प्रकृति को उसका साधन। उनके छायावाद ने मनुष्य के ह्रृदय और प्रकृति के उस संबंध में प्राण डाल दिए जो प्राचीन काल से बिम्ब-प्रतिबिम्ब के रूप में चला आ रहा था और जिसके कारण मनुष्य को प्रकृति अपने दुख में उदास और सुख में पुलकित जान पड़ती थी’इस प्रकार महादेवी के अनुसार छायावाद की कविता हमारा प्रकृति के साथ रागात्मक संबंध स्थापित कराके हमारे ह्रृदय में व्यापक भावानुभूति उत्पन्न करती है और हम समस्त विश्व के उपकरणों से एकात्म भाव संबंध जोड़ लेते हैं। वे रहस्यवाद को छायावाद का दूसरा सोपान मानती हैं।

नंददुलारे वाजपेयी[संपादित करें]

प्रकृति के सूक्ष्म किन्तु व्यक्त सौंदर्य में आध्यात्मिक छाया का भान मेरे विचार से छायावाद की एक सर्वमान्य व्याख्या होनी चाहिए।’

छायावाद की मुख्य विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ)[संपादित करें]

छायावाद की प्रमुख प्रवृत्तियों का विभाजन हम तीन या दो शीर्षकों के अंतर्गत कर सकते हैं।

  • पहले के अनुसार- 1. विषयगत, 2. विचारगत और 3. शैलीगत।
  • दूसरे के अनुसार- 1. वस्तुगत और 2. शैलीगत।

विषयगत प्रवृत्तियाँ[संपादित करें]

छायावादी कवियों ने मूलतः सौंदर्य और प्रेम की व्यंजना की है जिसे हम तीन खण्डों में विभाजित कर सकते हैं-

  • 1. नारी-सौंदर्य और प्रेम-चित्रण तथा
  • 2. प्रकृत्ति-सौंदर्य और प्रेम की व्यंजना
  • 3. इसके आगे चलकर छायावाद अलौकिक प्रेम या रहस्यवाद के रूप में सामने आता है। कुछ आचार्य इसे छायावाद की ही एक प्रवृत्ति मानते हैं और कुछ इसे साहित्य का एक नया आंदोलन।

नारी-सौंदर्य और प्रेम-चित्रण छायावादी कवियों ने नारी को प्रेम का आलंबन माना है। उन्होंने नारी को प्रेयसी के रूप में ग्रहण किया जो यौवन और ह्रृदय की संपूर्ण भावनाओं से परिपूर्ण है। जिसमें धरती का सौंदर्य और स्वर्ग की काल्पनिक सुषमा समन्वित है। अतः इन कवियों नो प्रेयसी के कई चित्र अंकित किये हैं। कामायनी में प्रसाद ने श्रद्धा के चित्रण में जादू भर दिया है। छायावादी कवियों का प्रेम भी विशिष्ट है।

    • इनके प्रेम की पहली विशेषता है कि इन्होंने स्थूल सौंदर्य की अपेक्षा सूक्ष्म सौंदर्य का ही अंकन किया है। जिसमें स्थूलता, अश्लीलता और नग्नता नहींवत है। जहाँ तक प्रेरणा का सवाल है छायावादी कवि रूढि, मर्यादा अथवा नियमबद्धता का स्वीकार नहीं करते। निराला केवल प्राणों के अपनत्व के आधार पर, सब कुछ भिन्न होने पर अपनी प्रेयसी को अपनाने के लिए तैयार हैं।
    • इन कवियों के प्रेम की दूसरी विशेषता है - वैयक्तिकता। जहाँ पूर्ववर्ती कवियों ने कहीं राधा, पद्मिनी, ऊर्मिला के माध्यम से प्रेम की व्यंजना की है तो इन कवियों ने निजी प्रेमानुभूति की व्यंजना की है।
    • इनके प्रेम की तीसरी विशेषता है- सूक्ष्मता। इन कवियों का श्रृंगार-वर्णन स्थूल नहीं, परंतु इन्होंने सूक्ष्म भाव-दशाओं का वर्णन किया है। चौथी विशेषता यह है कि इनकी प्रणय-गाथा का अंत असफलता में पर्यवसित होता है। अतः इनके वर्णनों में विरह का रुदन अधिक है। ह्रृदय की सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावनाओं को साकार रूप में प्रस्तुत करना छायावादी कविता का सबसे बड़ा कार्य है।

प्रकृत्ति-सौंदर्य और प्रेम की व्यंजना प्रकृति सौंदर्य का सरसतम वर्णन और उससे प्रेम का वर्णन भी छायावादी कवियों की शृंगारिकता का दूसरा रूप है।

    • छायावाद के प्रकृतिप्रेम की पहली विशेषता है कि वे प्रकृति के भीतर नारी का रूप देखते हैं, उसकी छवि में किसी प्रेयसी के सौंदर्य-वैभव का साक्षात्कार करते हैं। प्रकृति की चाल-ढाल में किसी नवयौवना की चेष्टाओं का प्रतिबिंब देखते हैं। उसके पत्ते के मर्मर में किसी बाला-किशोरी का मधुर आलाप सुनते हैं। प्रकृति में चेतना का आरोपण सर्व प्रथम छायावादी कवियों ने ही किया है। जैसे,

बीती विभावरी जाग री,
अम्बर पनघट में डूबो रही
तारा घट उषा नागरी। (प्रसाद) या

दिवसावसान का समय
मेघमय आसमान से
उतर रही

वह संध्या सुंदरी परी-सी धीरे-धीरे। (निराला)
    • प्रकृति सौंदर्य की दूसरी प्रवृत्ति है- मुग्धता की। जहाँ कवि प्रकृति में चेतनता का आरोप करता है तो प्रकृति उसे सप्राण लगती है। इससे कवि विस्मय प्रकट करता है। जैसे पंत की मौन निमंत्रण कविता।
    • कवि मानव-जीवन की समस्त भावनाओं और अनुभूतियों को प्रकृति के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। छायावादी कवियों में प्रधान रूप से महादेवी में यह प्रवृत्ति विशेष लक्षित होती है। जैसे, मैं बनी मधुमास आली।
    • आध्यात्मिक प्रेम-भावना या अलौकिक प्रेम-भावना का स्वरूप अधिकांश महादेवी जी की कविता में मिलता है। वे अपने को प्रेम के उस स्थान पर बताती है जहाँ प्रेमी और उसमें कोई अंतर नहीं। जैसे, तुममुझमें प्रिय फिर परिचय क्या ?
    • रहस्यवाद के अंतर्गत प्रेम के कई स्तर होते हैं। प्रथम स्तर है अलौकिक सत्ता के प्रति आकर्षण। द्वितीय स्तर है- उस अलौकिक सत्ता के प्रति दृढ अनुराग। तृतीय स्तर है विरहानुभूति। चौथा स्तर है- मिलन का मधुर आनंद। महादेवी और निराला में आध्यात्मिक प्रेम का मार्मिक अंकन मिलता है। यद्यपि छायावाद और रहस्यवाद में विषय की दृष्टि से अंतर है। जहाँ रहस्यवाद का विषय - आलंबन अमूर्त, निराकार ब्रह्म है, जो सर्व व्यापक है, वहाँ छायावाद का विषय लौकिक ही होता है।

स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्ति इस प्रवृत्ति का प्रारंभ श्रीधर पाठक की कविताओं से होता है। पद्य के स्वरूप, अभिव्यंजना के ढंग और प्रकृति के स्वरूप का निरीक्षण आदि प्रवृत्तियाँ छायावाद में प्रकट हुई। साथ-साथ स्वानुभूति की प्रत्यक्ष विवृत्ति, जो व्यक्तिगत प्रणय से लेकर करुणा और आनंद तक फैली हुई है। आलोचकों ने छायावाद पर स्वच्छन्दता का प्रभाव बताया है तो दूसरी ओर इसका विरोध भी प्रकट किया है।

स्वच्छन्दतावाद की यह प्रवृत्ति देशगत, कालगत, रूढियों के विरुद्ध हमेशा रहती हैं। जहाँ कहीं भी बंधन हैं, समाज, राज्य, कविता और जीवन- तमाम स्तरों पर इन रूढियों का स्वच्छन्दतावादी कवि विरोध करता है। अंग्रेजी साहित्य में स्वच्छन्दतावादी काव्य से पहले कठोर अनुशासन था और उसका रूप धार्मिक, नैतिक और काव्यशास्त्रीय भी था। अतः अंग्रेजी कवियों ने इन बंधनों का तिरस्कार किया। लेकिन छायावादी कवियों से पूर्व द्विवेदीयुग में नैतिक दृष्टि की प्रधानता मिलती है और छायावादी में उसका विरोध भी दिखाई देता है। छायावादी प्रवृत्ति स्वच्छन्द प्रणय की नहीं किन्तु पुनरुत्थानवादी ज्यादा थी। क्योंकि रीतिकालीन श्रृंगार-चित्रण का उस पर प्रभाव है। जहाँ दार्शनिक सिद्धांतों का संबंध है छायावादी काव्य में सर्ववाद, कर्मवाद, वेदांत, शैव-दर्शन, अद्वैतवाद आदि पुराने सिद्धांतों की अभिव्यक्ति मिलती है। जहाँ तक भाषा-शैली का सवाल है, छायावादी की अभिव्यंजना पद्धति नवीन और ताज़ा है।

द्विवेदीयुगीन खड़ीबोली में स्थूलता, वर्णनात्मकता अधिक है। परंतु छायावादी काव्य में सूक्ष्मता के निरूपण के कारण उपचार-वक्रता और मानवीकरण की विशेषताएँ दिखाई देती हैं। द्विवेदीयुगीन काव्य विषयनिष्ठ (वस्तुपरक), वर्णन- प्रधान और स्थूल है तो छायावादी काव्य व्यक्तिनिष्ठ और कल्पना-प्रधान है। द्विवेदीयुगीन कविता में सृष्टि की व्यापकता और अनेकरूपता को समेटा गया है। उसी प्रकार छायावाद की कविता में मनोजगत की वाणी को प्रकट करने का प्रयत्न है। मनोजगत के सूक्ष्म सत्य को साकार करने के लिए छायावादी कवियों ने ऊर्वरा कल्पनाशक्ति का उपयोग किया है।

विचारगत प्रवृत्तियाँ[संपादित करें]

  • 1.दार्शनिक क्षेत्र में अद्वैतवाद या सर्ववादः जैसे,

तुम तृंग हिमालय श्रृंग और मैं चंचल गति सुर सरिता। तुम विमल ह्रृदय उच्छवास और मैं कान्त कामिनी कविता। (निराला)

  • 2.धर्म के क्षेत्र में रूढियों एवं बाह्याचारों से मुक्त व्यापक मानव हित वादः जैसे,

औरों को हँसते देखो मनु, हँसो और सुख पाओ। अपने सुख को विस्मृत कर लो, सबको सुखी बनाओ। (कामायनी-प्रसाद)

  • 3.समाज के क्षेत्र में समन्वयवादः जैसे,

ज्ञान दूर, कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा पूरी क्यों हो मन की, दोनों मिल एक न हो सके, यही विडम्बना है जीवन की। (कामायनी-प्रसाद)

  • 4. राजनीति के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीयता।
  • 5. ग्राहस्थ्य (पारिवारिक) एवं दांपत्य-जीवन के क्षेत्र में ह्रृदयवाद अथवा प्रेम-पूर्ण व्यवहारः जैसे,

तप रे मधुर-मधुर मन, विश्व-वेदना में तप प्रतिपल, तेरी मधुर मुक्ति ही बंधन, गंध हीन तू गंध युक्त बन। (महादेवी)

  • 6. साहित्य के क्षेत्र में कलावाद या सौंदर्यवाद।

इस तरह छायावादी कवियों ने प्रत्येक क्षेत्र में व्यापक आदर्श एवं सूक्ष्म दृष्टिकोण को अपनाया। एक बात निश्चित है कि जहाँ तक भावों का सवाल है उन भावों की सरस अभिव्यक्ति छायावादी कविता में मिलती है। किन्तु जहाँ तक विचारों का सवाल है सर्वत्र इनके काव्यों में वही सरसता नहीं आयी है।

शैलीगत प्रवृत्तियाँ[संपादित करें]

  • 1.मुक्तक गीति शैली (गीति शैली के सभी तत्व -1.वैयक्तिक्ता 2.भावात्मकता 3.संगीतात्मकता 4.संक्षिप्तता 5.कोमलता छायावादी कवियों के काव्य में मिलते हैं।)
  • 2. प्रतीकात्मकता
  • 3. प्राचीन एवं नवीन अलंकारों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग (मानवीकरण, विरोधाभास, विशेषण विपर्यय)
  • 4.कोमलकांत संस्कृतमय शब्दावली

जयशंकर प्रसाद की कुछ रचनाओं के उदाहरण देखें- प्रतीकों के द्वारा इन्होंने अपनी अभिव्यक्ति की मार्मिकता में वृद्धि की है। मूर्त को अमूर्त और अमूर्त को मूर्त रूप में चित्रित करने के लिए इन्होंने अनेक प्रयोग किए हैं। जैसे,

1. मूर्त के लिए अमूर्त उपमान- बिखरी अलकें ज्यों तर्क जाल। (कामायनी)
2. अमूर्त के लिए मूर्त उपमान- कीर्ति किरण-सी नाच रही है। (कामायनी)
3. विशेषण विपर्यय- तुम्हारी आँखों का बचपन खेलता जग का अल्हड़ खेल।
4. विरोधाभास- शीतल ज्वाला जलती है। (आँसू - प्रसाद)
5. रूपकातिशयोक्ति- बाँधा था विधु के किसने, इन काली जंजीरों से। (आँसू - प्रसाद)
6. कोमलकांत पदावली- मृदु मन्द-मन्द मंथर-मंथर लघुतरिणी-सी सुंदर।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. हिन्दी साहित्य कोश, भाग १, प्रधान सम्पादक - धीरेन्द्र वर्मा, प्रकाशक- ज्ञानमण्डल लिमिटिड वाराणसी, तृतीय संस्करण १९८५, पृष्ठ २५१
  2. हिन्दी साहित्य का अद्यतन इतिहास, डा॰ मोहन अवस्थी, संस्करण १९८३, प्रकाशक- सरस्वती प्रेस इलाहाबाद, पृष्ठ २५९

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]