सुदामा

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सुदामा ( IAST: Sudāmā) जिसे कुचेला (दक्षिणी भारत में) के नाम से भी जाना जाता है, श्रीकृष्ण के बचपन के दोस्त थे, जिनकी कहानी कृष्ण से मिलने के लिए द्वारका की यात्रा का उल्लेख भागवत पुराण में किया गया है। पारलौकिक लीलाओं का आनंद लेने के लिए उनका जन्म एक गरीब व्यक्ति के रूप में हुआ था। सुदामा पोरबंदर के रहने वाले थे। कहानी में उन्होंने सुदामापुरी से बेयत द्वारका की यात्रा की। सुदामा और कृष्ण ने उज्जयिनी के सान्दीपनि आश्रम में एक साथ अध्ययन किया था।

कथा[संपादित करें]

सुदामा का जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था। प्रकृष्टनंदोक्त आगम के महाकाल सहस्रनाम के अनुसार उनके पिता का नाम सुधामय था जबकि निग्रहाचार्य के अनुसार निग्रहागमों में उनके पिता का नाम दर्पकर्दम बताया गया है।

"सुधामयसुतः श्रीमान् सुदामा नाम वै द्विजः। तेन गोपीपतिः कृष्णो विद्यामभ्यसितुङ्गतः॥ (प्रकृष्टनन्दोक्तागम)"

"सुदामा समदृग्विप्रो दर्पकर्दमसम्भवः। शिरोमणिर्विरक्तानां कृष्णस्य दयितः सखा॥ (निग्रहागम)"

श्रीकृष्ण यदुवंश के राजकीय परिवार से थे और भगवान विष्णु के अवतार थे। लेकिन यह सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अंतर उनकी शिक्षा के मध्य नहीं आया। सभी विद्यार्थी गुरु की सब प्रकार से सेवा करते थे। एक बार कृष्ण और सुदामा गुरु सान्दीपनि मुनि के कहने पर लकड़ी लेने के लिए जंगल में गये। बारिश होने लगी और वे एक पेड़ के नीचे रुक गए। सुदामा के पास नाश्ते के लिए थोड़ा पोहा था। सर्वज्ञ श्रीकृष्ण ने कहा कि वह भूखे हैं। सुदामा ने पहले तो कहा कि उनके पास कुछ नहीं है। हालांकि, श्रीकृष्ण की अवस्था को देखते हुए उन्होंने उनके साथ अपना नाश्ता बांटा। तब भगवान कृष्ण ने उन्हें कहा कि पोहा उनका पसंदीदा नाश्ता है। इस तरह उनकी दोस्ती आगे बढ़ी। जब वे बड़े हुए तो अपने-अपने रास्ते चले गए। उन्होंने वर्षों में संपर्क खो दिया और जब श्रीकृष्ण द्वारका में महान् ख्यातिप्राप्त राजपरिवार का एक शक्तिशाली भाग बन गए, तो सुदामा एक विनम्र लेकिन एक गरीब ग्रामीण बने रहे।

जब कृष्ण शासन कर रहे थे, सुदामा अत्यधिक गरीबी से गुजर रहे थे, और परिवार का भरण-पोषण करने के लिए भी पर्याप्त धन नहीं था, उनकी पत्नी सुशीला ने उन्हें कृष्ण के साथ अपनी दोस्ती स्मरण करवाया। सुदामा ने राजा श्रीकृष्ण से कृपा नहीं मांगी। उसने सोचा कि यह मैत्री का सिद्धांत नहीं है और अपने अल्प साधनों के द्वारा रहने लगे। एक दिन कृष्ण उनसे मिलने गए (सर्वज्ञ भगवान जानते थे कि उनका मित्र कठिन समय से गुजर रहा है)। सुदामा अपनी गरीबी से इतने संकुचित थे कि उन्होंने कृष्ण को अपने घर में आमंत्रित नहीं किया। कृष्ण ने उपहास में उसे एक नाश्ता परोसने के लिए कहा क्योंकि वह एक अतिथि थे (अतिथि देवो भवः)। सुदामा, अपनी गरीबी के बावजूद, अंदर गए और पोहे के आखिरी दाने मिले (उसे स्मरण आया कि पोहा श्रीकृष्ण का प्रियतम खाद्य है)। श्रीकृष्ण ने नाश्ते को बड़े चाव से खाया और मिठाईयां लेकर निकल गए। जब सुदामा वापस घर में जाने के लिए मुड़े, तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि उनका घर कुटिया के बजाय एक महलनुमा हवेली में बदल गया। उसने अपने परिवार को भी भव्य पोशाक पहने और उसकी प्रतीक्षा करते हुए पाया।

सुदामा कृष्ण के पास यह पूछने के लिए जाते हैं कि क्या हुआ (फिर से अपने दोस्त के लिए पोहे का उपहार लेते हुए)। कृष्ण अपने पुराने मित्र को देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं। वह उसके साथ राजकीय व्यवहार करते हैं और बहुत प्यार से पेश आता है। इन सभी से अभिभूत सुदामा रोते हैं और कृष्ण कहते हैं, "मुझे पोहा प्रिय है जो तुमने सदा मुझे दिया है" (अनुष्ठान के अनुसार, भोजन करने से पहले, यह भगवान को अर्पित किया जाता है)। जब सुदामा चले जाते हैं, तो कृष्ण महल में सभी को समझाते हैं, "मैंने उन्हें जो कुछ दिया है वह केवल उनकी भक्ति के कारण है"। कृष्ण को अपने भक्त की बहुत चिंता है। अपनी वापसी की यात्रा पर, सुदामा अपनी परिस्थितियों पर विचार करते हैं और भगवान कृष्ण के रूप में अपने महान् मित्र के लिए आभारी हैं और उसके बाद एक तपस्वी जीवन जीते हैं, सदैव भगवान के लिए आभार रखकर। द्वारका में भगवान् कृष्ण और सुदामा की आस्था और मित्रता का यह चमत्कार अक्षय तृतीया के उत्सव के साथ जुड़ा हुआ है।

सीख[संपादित करें]

यह कहानी यह बताने के लिए बताई गई है कि भगवान लोगों के बीच उनकी वित्तीय स्थिति के आधार पर अंतर नहीं करते हैं और वे हमेशा भक्ति को पुरस्कृत करते हैं। इस कहानी द्वारा सिखाया गया एक और नैतिक तथ्य यह है कि जीवन में कभी भी कुछ भी निःशुल्क पाने की आशा न करें; भगवान आपके अच्छे कर्मों के लिए उचित फल प्रदान करेंगे। एक और नीति बदले में किसी वस्तु के लिए भक्ति का व्यापार नहीं करना चाहिए। सुदामा ने श्रीकृष्ण से कुछ नहीं मांगा। दरिद्र होने के पश्चात् भी सुदामा ने श्रीकृष्ण को वह सब कुछ दिया जो उनके पास था (पोहा); बदले में, भगवान ने सुदामा को उनकी आवश्यकता की हर वस्तु दी।

श्रीकृष्ण सच्चे व्यक्तियों को कैसे पुरस्कृत करते हैं, इस बारे में एक सबक भी है। श्रीकृष्ण ने सुदामा को केवल मित्र होने के कारण पुरस्कृत नहीं किया। सुदामा ने अपना सारा समय और प्रयास एक सच्चे व्यक्ति के लिए सांस्कृतिक प्रयासों में लगाया, जिससे समझा जा सकता है कि वह आर्थिक रूप से समृद्ध क्यों नहीं थे। इसमें धर्म की शिक्षा, नैतिक कर्तव्य और समाज में आध्यात्मिकता का प्रसार शामिल था। यह इस प्रयास के लिए है कि कृष्ण सुदामा के परिवार को धन से पुरस्कृत करते हैं ताकि सुदामा उस कार्य को जारी रख सकें।

एक अन्य व्याख्या में सुदामा की भगवान् कृष्ण से मुलाकात और उनके घर वापस आने को ध्यान की प्रक्रिया के एक रूपक के रूप में देखा गया है: मन द्वारा आग्रह किया जाता है और बुद्धि आत्मा के साथ जाती है और स्वयं को पहचानती है, जो सभी स्तरों पर कायाकल्प करती है और जगाती है वेदों की स्मृति को। संबंधी के पास लौटने के बाद, बुद्धि को पता चलता है कि सभी अनुभव महिमामंडित हैं।

उपहार[संपादित करें]

सुदामा भगवान् कृष्ण के सहपाठी और बहुत घनिष्ठ मित्र थे। भगवान् कृष्ण एक राजा थे। सुदामा एक दरिद्र ब्राह्मण थे। यह अंतर उनकी सच्ची मैत्री में बीच नहीं आया। सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका गए। उन्होंने भगवान कृष्ण को भेंट करने के लिए एक बहुत ही विनम्र उपहार रखा। वह क्या ले गये? कुछ पुस्कतकें कहती हैं कि वे पोहा (पीटा चावल) ले गये, जबकि कुछ पुस्तकें और चलचित्रें कहती हैं कि उन्होंने सत्तू (पीठ) रखा। यह भ्रमित करने वाला अंतर इसलिए है क्योंकि सुदामा न सत्तू ले गये और न ही पोहा। वह अपने साथ सत्तू और पोहे के संयोजन को "सत्तू-पीठ पोहे" या तेलुगु में अटुकुलु कहते थे। यह सामवादी लाड ब्राह्मणों का एक विशेष खाद्य है जिससे सुदामा संबंधित थे। सुदामा एक सामवादी ब्राह्मण थे, कमोबेश व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है; पर उनका गृहनगर भुर्गकचा (भदोच) था या पोरबंदर एक ऐसा बिंदु है जिस पर थोड़ा मतभेद मौजूद है।

श्री कृष्ण-सुदामा वास्तविक, अभौतिक मित्रता का एक अमर उदाहरण हैं। यह वास्तविक मित्रता की शाश्वत प्रतीकात्मक परिभाषा है। सत्तू-पीठ पोहे एक बहुत ही स्वादिष्ट, परोसने के लिए तैयार, आसानी से ले जाया जाने वाला भोजन है। इसमें पोहा को तलते समय सत्तू के साथ लगाया जाता है। सत्तू पीठ चना (फुटाना) और गेहूं के आटे से तैयार किया जाता है।

रूपांतरण[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

यह सभी देखें[संपादित करें]

अक्षय तृतीया


हिन्दू देवी देवता