"मौर्य राजवंश" के अवतरणों में अंतर

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'''मौर्य राजवंश''' (322-185 ईसापूर्व) [[प्राचीन भारत]] का एक शक्तिशाली राजवंश था। मौर्य राजवंश ने १३७ वर्ष भारत में राज्य किया। इसकी स्थापना का श्रेय [[चन्द्रगुप्त मौर्य]] और उसके मन्त्री [[चाणक्य|चाणक्य (कौटिल्य)]] को दिया जाता है।
 
जैन और बौद्ध ग्रंथों से ये प्राप्त होता हैं कि महापद्मनंद की दो रानियों थी (1)रानी अवंतिका और (2)रानीमुरा और दोनों महारानियां ही बेहद सुंदर और खूबसूरत थी महापद्मनंद की रानियों के बारे में अधिक जानकारी नही मिलती हैं
महान सम्राट महाराजा महापद्मनंद जो एक नंद वंशी क्षत्रिय थे इनके 10 पुत्र निम्न लिखित है:-
 
पुराणों में महापद्मनंद के दस पुत्र उत्तराधिकारी बताए गए हैं। वहाँ उनके नाम मिलते हैं
(1) पंडुक(2) गंगन पाल(3) पंडुगति(4) भूतपाल(5) राष्ट्रपाल(6) गोविषाणक(7) दशसिद्धक(8) कैवर्त और(9) घनानंद (10) चन्द्रनंद (चन्द्रगुप्त मौर्या)
 
(1) पंडुकगंगन पाल, (2) गंगनपंडुक, पाल(3) पंडुगति, (4) भूतपाल, (5) राष्ट्रपाल, (6) गोविषाणक, (7) दशसिद्धक, (8) कैवर्त और (9) घनानंदधननन्द, (10) चन्द्रनंदचन्द नन्द (चन्द्रगुप्त मौर्यामौर्य)
 
 
चन्द्रगुप्त मौर्य नन्द वंश के सस्थाषक चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनंद (नाई ) के (10)वे पुत्र थे जिनका वास्तविक नाम चंद्रनन्द था जिनकी मा (मुरा) एक ब्राह्रमण परिवार से थी महापद्मनंद के बाद उनके पुत्र धननन्द राजा हुए जिनके डर से सिकन्दर भी भाग गया था। धननन्द ने मंत्री चाणक्य (विष्णुगुप्त) को पीटकर सभा से इसलिये बाहर निकाला दिया चाणक्य धननन्द से पहले सिंहासन पर बैठ गये थे । चाणक्य ने धननन्द के सौतेले भाई चन्द्रनन्द को भड़काकर धननन्द को धोखे से चन्द्रनन्द से मरवाकर चन्द्रनन्द क्रो राजा बनाया और चन्द्रनन्द क्रो मा मुरा के नाम पर चन्द्रगुप्त मौर्य नाम दिया ।
 
पुराणों के सुमाल्य को बौद्ध ग्रंथों में उल्लिखित महापद्म के अतिरिक्त अन्य आठ नामों में किसी से मिला सकना कठिन प्रतीत होता है। किंतु सभी मिलाकर संख्या की दृष्टि से नवनंद कहे जाते थे। इसमें कोई विवाद नहीं। पुराणों में उन सबका राज्यकाल 100 वर्षों तक बताया गया है - 88 वर्षों तक महापद्मनंद का और 12 वर्षों तक उसके पुत्रों का। किंतु एक ही व्यक्ति 88 वर्षों तक राज्य करता रहे और उसके बाद के क्रमागत 8 राजा केवल 12 वर्षों तक ही राज्य करें, यह बुद्धिग्राह्य नहीं प्रतीत होता। सिंहली अनुश्रुतियों में नवनंदों का राज्यकाल 40 वर्षों का बताया गया है और उसे हम सही मान सकते हैं। तदनुसार नवनंदों ने लगभग 364 ई. पू. से 324 ई. पू. तक शासन किया। इतना निश्चित है कि उनमें अंतिम राजा अग्रमस् (औग्रसैन्य (?) अर्थात् उग्रसेन का पुत्र) सिकंदर के आक्रमण के समय मगधा (प्रसाई-प्राची) का सम्राट् था, जिसकी विशाल और शक्तिशाली सेनाओं के भय से यूनानी सिपाहियों ने पोरस से हुए युद्ध के बाद आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। प्लूटार्क कहता है कि चंद्रगुप्त (सैंड्राकोट्टस) मौर्य ने सिकंदर से मिलकर उसकी नीचकुलोत्पत्ति और जनता में अप्रियता की बात कही थी। संभव है, धननंद को उखाड़ फेंकने के लिए चंद्रगुप्त ने उस विदेशी आक्रमणकारी के उपयोग का भी प्रयत्न किया हो। "महावंशटीका" से ज्ञात होता है कि अंतिम नंद कठोर शासक तथा लोभी और कृपण स्वभाव का व्यक्ति था। संभवत: इस लोभी प्रकृति के कारण ही उसे धननंद कहा गया। उसने चाणक्य का अपमान भी किया था। इसकी पुष्टि मुद्राराक्षस नाटक से होती है, जिससे ज्ञात होता है कि चाणक्य अपने पद से हटा दिया गया था। अपमानित होकर उसने नंद साम्राज्य के उन्मूलन की शपथ ली और राजकुमार चंद्रगुप्त मौर्य के सहयोग से उसे उस कार्य में सफलता मिली। उन दोनों ने उस कार्य के लिए पंजाब के क्षेत्रों से एक विशाल सेना तैयार की, जिसमें संभवत: कुछ विदेशी तत्व और लुटेरे व्यक्ति भी शामिल थे। यह भी ज्ञात होता है कि चंद्रगुप्त ने धननंद को उखाड़ फेंकने में पर्वतक (पोरस) से भी संधि की थी। उसने मगध पर दो आक्रमण किए, यह सही प्रतीत होता है, परंतु "दिव्यावदान" की यह अनुश्रुति कि पहले उसने सीधे मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर ही धावा बोल दिया तथा असफल होकर उसे और चाणक्य को अपने प्राण बचाने के लिए वेष बनाकर भागना पड़ा, सही नहीं प्रतीत होती। उन दोनों के बीच संभवत: 324 ई. पू. में युद्ध हुआ, जब मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में चंद्रगुप्त ने मौर्यवंश का प्रारंभ किया।
 
इनमें से घनानंद नौवां पुत्र था। जो नंदवंश का आगे चलकर उत्तराधिकारी बना।
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