बाबूलाल मरांडी

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
बाबूलाल मरांडी
Babulal.jpg
बाबूलाल मरांडी

बाबूलाल मराण्डी (जन्म 11 जनवरी 1958) झारखण्ड प्रान्त के पहले मुख्यमन्त्री थे। इन्होंने 2006 में भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर झारखण्ड विकास मोर्चा की स्थापना की। ये कोडरमा से लोकसभा सांसद थे।

प्रारम्भिक जीवन[संपादित करें]

इनका जन्म 11 जनवरी 1958 को वर्तमान झारखण्ड के गिरिडीह जिले के कोदाईबांक नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम छोटे लाल मराण्डी तथा माता का नाम श्रीमती मीना मुर्मू है।

इनकी शिक्षात्मक योग्यता स्नातक है। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान मराणृडी आरएसएस से जुड़ गए। आरएसएस से पूरी तरह जुड़ने से पहले मरांडी ने गाँव के स्‍कूल में कुछ सालों तक कार्य किया। इसके बाद वे संघ परिवार से जुड़ गए। उन्‍हें झारखण्ड क्षेत्र के विश्‍व हिन्‍दू परिषद का संगठन सचिव बनाया गया।

1983 में वे दुमका जाकर सन्थाल परगना डिवीजन में कार्य करने लगे। 1989 में इनकी शादी शान्तिदेवी से हुई। एक बेटा भी हुआ अनूप मराण्डी, जिसकी 27 अक्टूबर 2007 को झारखण्ड के गिरिडीह क्षेत्र में हुए नक्‍सली हमले में मौत हो गई।

1991 में मराण्डी भाजपा के टिकट पर दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। 1996 में वे फिर शिबू शोरेन से हारे। इसके बाद बीजेपी ने 1998 में उन्हेंविधानसभा चुनाव के दौरान झारखण्ड बीजेपी का अध्‍यक्ष बनाया। पार्टी ने उनके नेतृत्‍व में झारखण्ड क्षेत्र की 14 लोकसभा सीटों में से 12 पर कब्‍जा किया।

1998 के चुनाव में उन्होंने शिबू शोरेन को सन्थाल से हराकर चुनाव जीता था, जिसके बाद एनडीए की सरकार में बिहार के 4 सांसदों को कैबिनेट में जगह दी गई। इनमें से एक बाबूलाल मराण्डी थे।

2000 में बिहार से अलग होकर झारखण्ड राज्‍य बनने के बाद एनडीए के नेतृत्‍व में बाबूलाल मराण्डी ने राज्‍य की पहली सरकार बनाई।

उस समय के राजनीति विशेषज्ञों के अनुसार मराण्डी राज्‍य को बेहतर तरीके से विकसित कर सकते थे। राज्‍य की सड़कें, औद्योगिक क्षेत्र तथा राँची को ग्रेटर राँची बना सकते थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने कई सराहनीय कदम उठाये। छात्राओं के लिए साइकिल की व्यवस्था, ग्राम शिक्षा समिति बनाकर स्थानीय विद्यालयों में पारा शिक्षकों की बहाली, आदिवासी छात्र छात्राओं के लिए प्लेन पायलट की प्रशिक्षण, सभी गाँवों, पंचायतों और प्रखण्डों में आवश्यकतानुसार विद्यालयों का निर्माण, राज्य में सड़कें, बिजली और पानी की उचित व्यवस्था के लिए अन्य योजनाओं की शुरुआत की। जनता को विश्वास होने लगा था झारखण्ड राज्य विकास की ओर अग्रेसित हो रहा है। हालाँकि मराण्डी उनके इस विश्‍वास को कम समय में पूरा नहीं कर सके और उन्‍हें जदयू के हस्‍तक्षेप के बाद सत्‍ता छोड़ अर्जुन मुण्डा को सत्‍ता सौंपनी पड़ी।

इसके बाद उन्‍होंने राज्‍य में एनडीए को विस्‍तार (विशेषकर राँची में) देने का कार्य किया। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्‍होंने कोडरमा सीट से चुनाव जीता, जबकि अन्‍य उम्‍मीदवार हार गए। मराण्डी ने [[२००६|20 में कोडरमा सीट सहित बीजेपी की सदस्‍यता से भी इस्तीफा देकर 'झारखण्ड विकास मोर्चा' नाम से नई राजनीतिक दल बनाया।

बीजेपी के 5 विधायक भी भाजपा छोड़कर इसमें शामिल हो गए। इसके बाद कोडरमा उपचुनाव में वे निर्विरोध चुन लिए गए। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्‍होंने अपनी पार्टी की ओर से कोडरमा सीट से चुनाव लड़कर बड़ी जीत हासिल की।

राजनीतिक जीवन[संपादित करें]

-1991 में भाजपा के महामंत्री गोविन्दाचार्य ने भाजपा में शामिल किया

-1991 में पहली बार झामुमो के शिबू सोरेन के विरुद्ध दुमका लोकसभा से खड़े हुए, हार मिली।

-1996 में महज 5000 वोट से शिबू सोरेन से हारे

-1996 में पार्टी ने उन्हें वनांचल भाजपा का अध्यक्ष नियुक्त किया

-1998 के लोकसभा चुनाव में उन्हें शिबू सोरेन को हराने में सफलता पाई

-1999 के चुनाव में उन्होंने शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन को दुमका से हराया

-1999 में अटल सरकार में उन्हें वन पर्यावरण राज्य मन्त्री बनाया गया

-2000 में झारखण्ड के पहले मुख्यमन्त्री चुने गए

-2003 में दल के आन्तरिक विरोध के कारण उन्हें मुख्यमन्त्री पद त्यागना पड़ा।

-2006 में झारखण्ड विकास मोर्चा नामक दल का गठन किया।

सन्दर्भ[संपादित करें]