बरवै

From विकिपीडिया
Jump to navigation Jump to search

बरवै रामायण सगुण भक्ति धारा के रामभकती शाखा के कवि तुलसीदास द्वारा लिखी गई है ।

परिभाषा[edit]

इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में १२ -१२ मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में ७-७ मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में जगण (ISI )होता है। [1]

उदहारण[edit]

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित बरवै रामायण से लिया गया छंद:

चम्पक हरवा अंग मिलि,अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे ,जब कुंभिलाय।।

प्रेम प्रीति को बिरवा ,चले लगाय।

सियाहि की सुधि लीजो ,सुखी न जाय।।


ab jivaan ki hai kapii asha koye, kanguriya ki mudri, kangna house.

इन्हें भी देखें[edit]

  1. बरवै रामायण
  2. तुलसीदास

सन्दर्भ[edit]