कोइरी

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कोइरी एक भारतीय जाति है जिसका निवास क्षेत्र बिहारउत्तर प्रदेश है, और अब बिहार-झारखंड अलग होने के वजह से कुछ कोइरी झारखंड मे भी निवास करते हैं।[1][2]

कोइरी उत्तर भारत की एक प्रभावशाली कृषक जाति है। कोइरी लोग पारंपरिक रूप से खेती करने के लिए जाने जाते रहे है परन्तु आजादी के बाद वो बिहार और भारत की राजनीति में बहुत सक्रिय भूमिका निभाने लगे है। "[1] वर्तमान में केंद्र और प्रदेश के नामी नेता इस जाति से सम्बंध रखते है। इसके अलावा कोइरी जाति के लोग आजकल व्यापार, शिक्षा, और दूसरे क्षेत्र में भी सक्रिय हैं।

उत्पत्ति की किवदन्तिया

कोइरी जाति के लोग भगवान राम के पुत्र कुश से अपनी वंशावली जोड़ते है। [3] परन्तु ये लोग मौर्य शासक चन्द्रगुप्त मौर्य से भी उत्पत्ति का दावा करते है। वर्तमान में कोइरी समुदाय के लोग शाक्य; मौर्य; सैनी; गहलोत और कुशवाहा उपनाम का प्रयोग करते है ।भारत सरकार और विभिन्न राज्यो की सूची में इनको अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में रखा गया है।.[4]

राजनीति

राजनीति के क्षेत्र में इनका वर्चस्व मुख्यता 1980 से शुरू हुआ परन्तु 1937 में ही इन्होंने बिहार की अन्य दो प्रभावशाली पिछरी जातियों कुर्मी और यादवों के साथ त्रिवेणी संघ नाम की राजनीतिक पार्टी बनाई जो कांग्रेस से हार गई।बाद में 1980 में*[1] ये तीन जातियां फिर से एक हुई और सफतापूर्वक राजनीति में अपना प्रभाव स्थापित किया।व्यक्तिगत टकराव की वजह से कोइरी कुर्मी जाति के नेता यादवों से अलग हुए और दो प्रमुख राजनीतिक दल जनता दल (यूनाइटेड) और राष्ट्रीय जनता दल का निर्माण हुआ। .[5] कोइरी जाति के नेता बी पी मौर्य उत्तर प्रदेश की राजनीति के पुरोधा रहे है।उन्हें अपनी जाति के साथ साथ दलित वर्ग का भी समर्थन प्राप्त था। [6] बिहार के राजनीतिक इतिहास में बाबू जगदेव प्रसाद का भी खासा नाम रहा है जो कोइरी समुदाय से ही थे उन्हें बिहार के लेनिन के नाम से जाना जाता है। 1990 के बाद से मंडल कमिशन की रिपोर्ट आने के बाद पिछरी जातियों में जो लामबंदी हुई उसका फायदा प्रमुख रूप से इन तीन जातियों को मिला और ये आर्थिक और राजनीतिक रूप से और मजबूत हुए।[7]

सामाजिक स्थिति

वर्तमान में ये लोग हर क्षेत्र में सक्रिय है।भारत सरकार की सकारात्मक भेदभाव की नीति के तहत मिलने वाले लाभ से ये अब शिक्षा व्यवसाय आदि में भी संलग्न है।

प्रमुख लोग

बाहरी सूत्र

  • [2] त्रिवेणी संघ
  • [3] उत्पति की दंतकथाएं

सन्दर्भ

  1. Bhattacharya, Jogendra Nath (1896). Hindu castes and sects: an exposition of the origin of the Hindu caste system and the bearing of the sects towards each other and towards other religious systems. Thacker, Spink. पपृ॰ 274–275. अभिगमन तिथि 2011-06-17.
  2. Jaffrelot, Christophe (2003). India's silent revolution: the rise of the lower castes in North India. London: C. Hurst & Co. पृ॰ 197. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-85065-670-8. अभिगमन तिथि 2011-08-29.
  3. Pinch, William R. (1996). Peasants and monks in British India. University of California Press. पपृ॰ 12, 91–92. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-520-20061-6. अभिगमन तिथि 2012-02-22.
  4. Hasan, A.; Das, J. C. (संपा॰). People of India Uttar Pradesh Volume XLII Part Two. Manohar Publications. पृ॰ 828.
  5. Arnold P. Kaminsky, Roger D. Long (2011). इंडिया टुडे: An Encyclopedia of Life in the Republic. ABC-CLIO. पृ॰ 95-96. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-313-37462-3. अभिगमन तिथि 4 March 2012.
  6. Jaffrelot, Christophe (2003). India's silent revolution: the rise of the lower castes in North India. London: C. Hurst & Co. पृ॰ 109. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-85065-670-8. अभिगमन तिथि 2011-08-29.
  7. "Redesigning reservations: Why removing caste-based quotas is not the answer".