कायस्थ

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कायस्थ
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19वीं शताब्दी की पुस्तक Calcutta Kayasth से
कुल जनसंख्या
ख़ास आवास क्षेत्र
भाषाएँ
हिन्दी, असमिया, मैथिली, उर्दू, बंगला, मराठी और उड़िया
धर्म
Om.svg हिन्दुत्व

कायस्थ भारत में रहने वाले सवर्ण हिन्दू समुदाय की एक जाति है। गुप्तकाल के दौरान कायस्थ नाम की एक उपजाति का उद्भव हुआ। पुराणों के अनुसार कायस्थ प्रशासनिक कार्यों का निर्वहन करते हैं।

हिंदू धर्म की मान्यता है कि कायस्थ धर्मराज श्री चित्रगुप्त जी की संतान हैं तथा देवता कुल में जन्म लेने के कारण इन्हें ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों धर्मों को धारण करने का अधिकार प्राप्त है।[1]

वर्तमान में कायस्थ मुख्य रूप से बिसारिया , श्रीवास्तव, सक्सेना,निगम, माथुर, भटनागर, लाभ, लाल, कुलश्रेष्ठ, अस्थाना, कर्ण, वर्मा, खरे, राय, सुरजध्वज, विश्वास, सरकार, बोस, दत्त, चक्रवर्ती, श्रेष्ठ, प्रभु, ठाकरे, आडवाणी, नाग, गुप्त, रक्षित, बक्शी, मुंशी, दत्ता, देशमुख, पटनायक, नायडू, सोम, पाल, राव, रेड्डी, मेहता आदि उपनामों से जाने जाते हैं। वर्तमान में कायस्थों ने राजनीति और कला के साथ विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में सफलतापूर्वक विद्यमान हैं।[2] वेदों के अनुसार कायस्थ का उद्गम ब्रह्मा ही हैं। उन्हें ब्रह्मा जी ने अपनी काया की सम्पूर्ण अस्थियों से बनाया था, तभी इनका नाम काया+अस्थि = कायस्थ हुआ।[3]

परिचय[संपादित करें]

स्वामी विवेकानन्द ने अपनी जाति की व्याख्या कुछ इस प्रकार की है:

मैं उन महापुरुषों का वंशधर हूँ, जिनके चरण कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है और जिनके वंशज विशुद्ध रूप से क्षत्रिय हैं। यदि अपने पुराणों पर विश्वास हो तो, इन समाज सुधारकों को जान लेना चाहिए कि मेरी जाति ने पुराने जमाने में अन्य सेवाओं के अतिरिक्त कई शताब्दियों तक आधे भारत पर शासन किया था। यदि मेरी जाति की गणना छोड़ दी जाये, तो भारत की वर्तमान सभ्यता का शेष क्या रहेगा? अकेले बंगाल में ही मेरी जाति में सबसे बड़े कवि, इतिहासवेत्ता, दार्शनिक, लेखक और धर्म प्रचारक हुए हैं। मेरी ही जाति ने वर्तमान समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक (जगदीश चन्द्र बसु) से भारतवर्ष को विभूषित किया है। स्मरण करो एक समय था जब आधे से अधिक भारत पर कायस्थों का शासन था। कश्मीर में दुर्लभ बर्धन कायस्थ वंश, काबुल और पंजाब में जयपाल कायस्थ वंश, गुजरात में बल्लभी कायस्थ राजवंश, दक्षिण में चालुक्य कायस्थ राजवंश, उत्तर भारत में देवपाल गौड़ कायस्थ राजवंश तथा मध्य भारत में सातवाहन और परिहार कायस्थ राजवंश सत्ता में रहे हैं। अतः हम सब उन राजवंशों की संतानें हैं। हम केवल बाबू बनने के लिये नहीं, अपितु हिन्दुस्तान पर प्रेम, ज्ञान और शौर्य से परिपूर्ण उस हिन्दू संस्कृति की स्थापना के लिये पैदा हुए हैं।

स्वामी विवेकानन्द[4]



हिन्दुओं के प्राचीनतम ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ के अनुसार कायस्थों के पूर्व पुरुष श्री चित्रगुप्त एक शकितशाली क्षत्रिय थे। वह राजा कहलाते हैं। ‘कृष्ण यजुर्वेद’ की ‘मैत्रायनी संहिता’ में उनको एक आश्चर्य जनक शासक के रुप में दर्शाया गया है


वह ब्रह्राा के पुत्र थे तथा इन्द्र से भी अधिक शकितशाली थे। इन्द्र परिवर्तित होते रहते हैं जबकि वह स्थायी हैं।


ऋग्वेद के अस्वालयन गृह सूत्र में मंत्र का उल्लेख जिसका उच्चारण बलि देते समय चित्रगुप्त के आवहान हेतु किया जाता है -


मैं श्री चित्रगुप्त का आव्हान करता हू जो सरस्वती नदी के उत्तर-पशिचम (यहां अल्तार्इ पर्वत से संकेत है जहा यम की राजधानी थी) में रहने वाले लोगों की वेशभूषा धारण करते हैं, जो देखने में सुन्दर, कागज कलम धारी दो हाथों वाले हैं, जिनकी विरोधी देवी केतु है।’


यजुर्वेदीय मैत्रेयी संहिता में ‘चित्र’ नाम की व्याख्या भी संस्कृत श्लोकों में की है जिसका सायणाचार्य का भाष्य अर्थ इस प्रकार है


‘चित्रे चित्रा नक्षत्र अभिषिज्यनति अभिषेक कुर्वनित चित्राय चित्र नाम असिमन चित्रगुप्ते दधाति तेजो वीर्यादिक धारयनित तस्मात तत: वा एष: अभिषेक प्राप्त: चित्र आश्चर्य यथास्यतथा राजा गुप्तें अपाम नाना तीर्थोदकानां ऐनम चित्रम चित्रे विचित्रै अभिषेक अभिषियनित अभिषेक कुर्वनित।”


हिन्दी अर्थ – “चित्रा नक्षत्र मेचित्र को अभिषेक करके “चित्रायचित्र” नामक राजा जो चित्रगुप्त के तेजस्वी वीर्य धारण से प्राप्त राजा चित्र (आश्चर्य) नाम से विख्यात हुआ-और उसका राज आश्चर्य युत वैभव पूर्ण मर्यादा के अनुसार नाना तीर्थों के बल से अभिसिचित ढंग से किया


बहौश्य क्षत्रिय जाता कायस्थ अगतितवे।

चित्रगुप्त: सिथति: स्वर्गे चित्रोहिभूमण्डले।।

चैत्ररथ: सुतस्तस्य यशस्वी कुल दीपक:।

ऋषि वंशे समुदगतो गौतमो नाम सतम:।।

तस्य शिष्यो महाप्रशिचत्रकूटा चलाधिप:।।


“प्राचीन काल में क्षत्रिय जाति में कायस्थ इस जगत में हुये उनके पूर्वज चित्रगुप्त स्वर्ग में निवास करते हैं तथा उनके पुत्र चित्र इस भूमण्डल में सिथत है उसका पुत्र चैत्रस्थ अत्यन्त यशस्वी और कुलदीपक है जो ऋषि-वंश के महान ऋषि गौतम का शिष्य है वह अत्यन्त महाज्ञानी परम प्रतापी चित्रकूट का राजा है।”

आदि शंकराचार्य के भाष्य में “चित्ररथ” सम्बन्धी श्लोक की व्याख्या संस्कृत भाषा में इस प्रकार की है।

“कपि गोत्र में उत्पन्न महर्षिगण कापेय कहलाते हैं- इन कापेय महर्षि ने दो रात्रियों के विधान का चित्ररथ नामक राजा को यज्ञ कराया जिससे चित्रवंश में उत्पन्न प्रथम पुत्र अत्यन्त शौर्यवान क्षत्रपति राजा हुआ और अन्य उसके अनुचर कहलाये। राजा चित्ररथ द्वारा अनुष्ठान किय जाने के कारण से ही द्विरात्री यज्ञ का कार्य चैत्ररथ अभिप्राय से विख्यात हुआ।”

अर्थवेद 06-106-32-33-35 में भी ‘चित्र’ को जीवनदाता महान देव समान तेजस्वी विजयी मित्र वरुण सूर्य और आत्मा आदि विशषज्ञों से वर्णित किया गया है।

ऋग्वेद मंडल 8 अनुवाक 3 सूत्र 21 के मंत्र में राजा चित्र के दान की प्रशंसा सायणाचार्य के द्वारा निम्न प्रकार की गर्इ है-

“चित्र नामक राजा ने सरस्वती नदी के तट पर इन्द्र के लिये यज्ञ किया उस यज्ञ में अत्यधिक धन और दान मिलने पर मंत्रदृष्टा ऋषि विकल्प करता है कि क्या इतना धन इन्द्र ने दिया या सरस्वती ने अथवा हे राजन चित्र आपने हमें इतना धन और द्रव्य प्रदान किया है। अन्य मंत्र में ऋषि निशिचत करते हैं कि यह अनन्त धन राशि सहस्त्र की संख्या में राजाओं के राजा ‘चित्र ने हमें प्रदान किया है क्योंकि सरस्वती तट पर सिथत अन्य जो छोटे छोटे राजा है उन सभी को भी तो राजा चित्र ने ही धन धान्य से परिपूर्ण किया। उसकी तुलना मंत्र में इस प्रकार की गर्इ है कि जिस प्रका मेघ की वर्षा से पृथ्वी सिंचित होकर सभी प्राणियों के लिए जीवनदायी होती है, उसी प्रकार राजा चित्र का धन भी सभी प्राणियों के लिए जीवन दायक होता है।”


तैत्तरीय ब्राáण कांड 3-1-9 खण्ड 14 में भी ऋग्वेदीय मंत्रों में वर्णित राजा चित्र के यज्ञ तथा दान की प्रशंसा के श्लोकों में राज राजेश्वर ‘चित्र’ को दाता प्रदात्ता केतु सविता, प्रसविता, शासता, भन्ता आदि विभूषणों से अलंकृत किया है।


  “चित्र केतर्ुदाता प्रदाता सविता प्रसविता शासतानुभव्ता”


यम संहिता


धर्मराज ने जिन्हें पापियों को दण्ड देने का अधिकार मिला है, श्री ब्रह्राा जी की सेवा में जाकर निवेदन किया है कि ऐसा भारी काम मुझसे नहीं चल सकता। ब्रह्राा जी ने कहा- ‘अच्छा, मैं तुम्हारी सहायता करुगा’ धर्मराज को विदा करके ब्रह्राा जी ध्यान में लग गये। देवताओं के हजार वर्ष तक तप करने पर उन्होंने आख खोली, तो देखा कि पुरुष श्यामवर्ण, कमल नयन, सुराहीदार गर्दन वाला , हाथ में कलम दवात और पाटी लिये आगे खड़े हैं। ब्रह्राा जी ने उनसे कहा कि ‘तुम मेरी काया से उत्पन्न हुए और काया में सिथत थे, इसी से तुम्हारा नाम कायस्थ रखा गया और यह चित्र वाक से हमने गुप्त रक्खा था, इसलिये पंडित तुम्हें चित्रगुप्त कहेंगे।

फिर चित्रगुप्त कोटिनगर में जाकर देवी की आराधना में लगे और परमेश्वरी का उन्होंने व्रत किया और स्तुति की। उन्होंने प्रसन्न होकर तीन वर दिये कि परोपकार हो और अपने अधिकार पर सिथर रहो और चिरायु हो।

”एक समय द्विजों में श्रेष्ठ देवशर्मा ने सन्तान के लिए श्री ब्रह्राा जी की आराधना की। ब्रह्राा के प्रस™ा होने पर उनके यहाँ इरावती नाम की कन्या उत्पन्न हुर्इ। देवशर्मा ने उस का चित्रगुप्त जी के साथ विवाह कर दिया, और चित्रगुप्त जी से उससे आठ पुत्र हुए चारु सुचारु चित्र मतिमान हिमवान चित्रचारू अरुण जितेनिद्रय दूसरी मनु की कन्या दक्षिणा, जो चित्रगुप्त के साथ ब्याही गर्इ, उससे यह चार पुत्र हुए। भानु विभानु विश्वभानु और वीर्यवान।

पù पुराण, सुषिट खण्ड:

”सृषिट के आदि में भले-बुरे कामों का निर्णय करने के लिए ब्रह्राा ने क्षण भर घ्यान किया। उनकी सर्व काया में से एक दिव्य पुरुष उत्पन्न हुआ। उनका नाम चित्रगुप्त हुआ। वह धर्मराज के पास भले बुरे कामों के लिखने पर नियुक्त हुआ और बड़ा ज्ञानी, देवताओं का अग्रगण्य और यज्ञ में भोजन पाने वाला हुआ। इस कारण द्विज उसे भोजन की आहुति देते हैं। ब्रह्राा की काया से उसकी उत्पत्ति हुर्इ उससे जाति कायस्थ कहलार्इ उसकी सन्तान में अनेक गोत्र के कायस्थ पृथ्वी पर हैं।

भविष्य पुराण:

श्री ब्रह्राा जी बोले की ”तुम हमारी काया से उत्प™ा हुए इसलिए तुम्हारा नाम ‘कायस्थ हुआ। पृथ्वी पर चित्रगुप्त के नाम से प्रसिद्ध हो। भले बुरे की पहचान के लिए, हे पुत्र, तुम हमारी आज्ञा से सदा धर्मराज के पुर में सिथत रहो। क्षत्रिय वर्ण के लिए जो उचित है, उसे पालन करते हुए पृथ्वी पर सन्तान उत्प™ा करो।

गरुण पुराण

श्री कृष्ण जी बोले कि ”हे गरुड़, सुनो, मैं कहता हूं। धर्मराज का नगर अति सुन्दर है। वहां नारद आदि जा सकते हैं और वह बड़े पुण्य से मिलता है। यमकोण और नैऋत्य कोण के बीच में जो वैवस्वत का नगर है, उसी में चित्रगुप्त का एक सुन्दर घर बना हुआ है, और पचीस योजन उसका विस्तार है। वह घर बहुत ही सुन्दर है। उसकी दीवारें लोहे की हैं और उनमें सौ द्वार हैं ध्वज पताका लगी हुर्इ है। और वहां कायस्थ पाप-पुण्य देखते हैं

स्मृतियों के बचन

-विष्ष्णु धर्मसूत्र

सरकारी दस्तावेज वह है जिसे राजा के आगे उसका नियम किया हुआ कायस्थ बनाये और उस पर उसके अधिकारी के हस्ताक्षर हों।

वृहत्पराशर स्मृति

‘दंड देने के लिए राजा ऐसे लोगों को नियत करे जो धर्म जानने वाले हों और काम में चतुरु हों। लेखक कायस्थ हो जो लिपि विधा की उतपति करने वाले हैं।


अपरार्क

”कायस्थ कर के अधिकारी अर्थात तहसीलदार होते हैं।

शुक्र नीति

कोतवाल चौधरी, तहसीलदार, लेखक कर लेने वाला बरकंदाज, ये छ: हर गाँव में नियत होने चाहिए। लेखक, गणित में निपुण दस भाषाओं का जानने वाला और साफ लिखने वाला होना चाहिए, न मिले तो क्षत्रिय, वह भी न मिले तो वैश्य होना चाहिए। पर शुद्र गुणवान होने पर भी कभी नहीं होना चाहिए। तहसीलदार और कोतवाल, क्षत्रिय चौधरी ब्राáण, लेखक कायस्थ कर देने वाला वैश्य और बरकंदाज शूद्र होना चाहिए।



मनुस्मृति में जिसमें जातियों / मिश्र जातियों का वर्णन है, कायस्थ शब्द का न होना यह दर्शाता है कि वे ब्राह्राण अथवा क्षत्रिय वर्ण के अन्तर्गत आते हैं।

मनु पर आधारित नारद स्मृति में पहली बार न्याय व्यवस्था में धर्म को सीमित किया गया है। इसके अनुसार कायस्थ शानित एवं युद्व के मंत्री थे। कायस्थों के विषय में दूसरा उल्लेख विष्णु स्मृति में मिलता है (अपपप.3) जहां कायस्थों को न्यायाधीश के साथ संयुक्त कर निर्धारक अथवा आयुक्त कहा गया


 कायस्थ का प्रथम उल्लेख ई पू दूसरी सदी की याज्ञवल्क्य स्मृति में ही मिलता है -

पिड्यमानाप्रजारक्षेत् कायस्थै ”चविशेषत:


याज्ञवल्कय के सर्वप्रमुख टीकाकार और मित्ताक्षर के संग्राहक बिजनेश्वर ने लिखा है कि एक राजा अपने प्रजाजनों को विशेषकर कायस्थों के उत्पीड़न से बचावे जो कि राजवल्लभ (राजा के कृपापात्र) चतुर और उदण्ड अधिकारी हैं। याज्ञवल्कय के एक अन्य टीकाकार ने अपनी ‘दपिकालिका’ में लिखा है कि शासकों से सम्बन्ध के कारण कायस्थ अत्यन्त प्रभावशाली थे।)


अतएव स्मृतियों के अनुसार कायस्थ एक राज्य अधिकारी के रुप में कार्यरत थे। वे लेखक, लेखाकार, कर संग्रहक, मजिस्ट्रेट और शांति और युद्व के मंत्री थे।’


शतपथब्राह्मण के अनुसार ब्रह्म ने पहले केवल ब्राह्मण वर्ण की रचना की. पर वह विभूतियुक्त कर्म करने में असमर्थ रहा. तब उसने क्षत्रिय वर्ण की रचना की. फिर भी वह विभूतियुक्त कार्य करने में असमर्थ रहने पर वैशय वर्ण और तदनंतर शूद्र वर्ण की रचना की  वृहदारण्यक उपनिषद में भी ठीक इसी प्रकार चतुर्वर्ण की रचना बताई र्गई है. पर एक कदम आगे बढ़कर यहाँ कहा गया है कि फिर भी उस बह्म्र ने क्षत्रियों की उग्रता और नियंत्रण में न रह सकने को ध्यान में रखते हुए पाँचवें वर्ण श्रेयोरूप धर्म वर्ण की रचना की-वृहदारण्यकोपनिषद् ऋचा (1. 4. 14) 

   जिस हेतु से इस ऋचा में श्रेयरूप पाँचवें धर्म वर्ण की रचना की चर्चा है वे व्यवहार धर्म और लौकिक न्याय सेेेे जुड़े हुए गुण कायस्थों में मिलते हैं. पद्मपुराण के सृष्टि खंड में चित्ररगुप्त के न्याय का विवरण मिलता है. कुछ लोग उसमें 'कायस्थ' के उद्भव के स्रोत होने की संभावना व्यक्त करते हैं.  कदाचित यही कारण हो कि कुछ लोग ‘कायस्थ’ को पाँचवाँ वर्ण मानने के पक्ष में हैं.


‘वशिष्ठ पद्वति’ में हम पाते हैं कि अयोध्या के राजा रामचन्द्र के विवाह के अवसर पर चित्रगुप्त के लिए आहुति दी गर्इ थी।


पंडित शिवराम द्वारा बनार्इ गयी ‘कायस्थ वंशावली’ के अनुसार श्री रुद्र माथुर, अयोध्या के राजा अम्बरीष के मंत्री थे। यह पद उनकी 19 पीढि़यों तक बना रहा। उन्नीसवें मंत्री राजा बाल प्रताप स्वतंत्र होकर स्वंय राजा बन गये। उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ किया। उन्हीं के वंशज श्रुत्सखा राजा रघु के मंत्री थे। तत्पश्चात श्री रंगा राजा आज के मंत्री हुए। उनके पुत्र कमलदल महाराज दशरथ के मंत्री रहे और उनका पुत्र विचिकश महाराज रामचन्द्र का।


अशोक के अभिलेख में कायस्थों की चर्चा है। उसमें कायस्थों को ‘लजुक’ (स्ंरनां) तपजमत अथवा राजुक (त्ंरनाें) प्रान्तीय राज्यपाल पद से सम्बोधित किया गया है। डा0 ब्युलर ने राजुक को मुख्यत: कायस्थ ही कहा है।


डाँ धर्मवीर अपनी पुस्तक ‘‘हिंदी की आत्मा’’ में श्रीरामगोयल के ‘‘प्राचीन भारतीय अभिलेख संग्रह’’ के हवाले से लिखा है कि मथुरा से प्राप्त कुषाणकालीन (प्रथम सदी) बुद्ध प्रतिमा पर किसी कायस्थ की पत्नी का लिखवाया एक अभिलेख उकेरा मिलता है जिसमें ‘कायस्थ’ शब्द का प्रयोग है. अभिलेख के रूप में ‘कायस्थ’ का संभवत: यह प्रचीनतम उल्लेख है. 

कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार प्रशासनिक कार्यों का निर्वहन करने वाले ब्राह्मण कायस्थ कहलाये कायस्थ कश्मीरी शासकों के अधीन बहुत उँचे पदों पर थे।

 कार्कोट कायस्थ राजवंश :-

कार्कोटा एक नाग का नाम है कार्कोट राजवंश की स्थापना दुर्र्लभवर्धन ने की थी। दुर्र्लभवर्धन गोन्दडिया वंश के अंतिम राजा बालादित्य के राज्य में अधिकारी थे। बलादित्य ने अपनी बेटी अनांगलेखा का विवाह कायस्थ जाति के एक सुन्दर लेकिन गैर-शाही व्यक्ति दुर्र्लभवर्धन के साथ किया। गोन्दडिया वंश के अंतिम राजा बालादित्य की मृत्यु के पश्चात दुर्र्लभवर्धन ने कश्मीर पर शासन किया और कार्कोट राजवंश की स्थापना की । इसी वंश के कायस्थ राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ आठवीं सदी में कश्मीर पर शासन कर रहे थे.

साहस और पराक्रम की प्रतिमूर्ति सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड का नाम कश्मीर के इतिहास में सर्वोच्च स्थान पर है।कश्मीर उस समय सबसे शक्तिशाली राज्य था। उत्तर में तिब्बत से लेकर द्वारिका और उड़ीसा के सागर तट और दक्षिण तक, पूर्व में बंगाल, पश्चिम में विदिशा और मध्य एशिया तक कश्मीर का राज्य फैला हुआ था जिसकी राजधानी प्रकरसेन नगर थी। ललितादित्य की सेना की पदचाप अरण्यक (ईरान) तक पहुंच गई थी।


यूरोप के इतिहासज्ञ, के अनुसार छठी शताब्दी में बंगाल में कायस्थ राजाओं का शासन था। कुछ वर्ष पूर्व जिला फरीदपुर में चार ताम्रपत्र प्राप्त हुये जिससे यह प्रमाणित होता है।


चौथी सदी में गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत बंगाल में पहली बार आर्यों, कायस्थों और ब्राह्मणों की कालोनियाँ बनीं तो गुप्त शासकों ने इसकी व्यवस्था में कायस्थों की सहायता ली.


श्री नगेन्द्र नाथ बसु द्वारा लिखित ‘सोशल हिस्ट्री ऑफ कामरुप’ के अनुसार  कामरुप कायस्थों में नाग शंकर व नागाक्ष ने चतुर्थ शताब्दी में राज्य किया और प्रतापगढ़ को राजधानी बनाया। इनके वंशज मीनाक्ष, गजंग, श्री रंग तथा मृगंग ने लगभग 200 वर्ष तक राज्य किया  कालान्तर में नाग कायस्थ, क्षत्रिय वंश कायस्थ भुइयाँ कहलाया। इस वंश के अंतिम शासक को मार कर जिताशी वंश के प्रताप सिंह ने आधिपत्य स्थापित किया। सातवीं शताब्दी के अंतिम चरण से ‘स्तम्भ’ वंश ने प्रागज्योतिषपुर पर दसवीं शताब्दी के अंत तक राज्य किया। इन्हीं के समय में कायस्थ घोष वंश कामरुप के पछिमी भाग में राज करने लगा। यह भाग ‘धाकुर’ के नाम से विख्यात था। धाकुर के पूर्व में वर्तमान गोआल पाड़ा जिले में क्षत्रिय कायस्थ धूत्र्तघोष ने राज्य बना लिया। इनके वंशज र्इश्वर घोष को कामरुप-कामाक्षा के शासक धर्मनारायण ने पराजित किया।चौदहवीं शताब्दी के आरम्भ में प्रताप ध्वज के पुत्र दुर्लभ नारायण गौर सिंहासनारुढ़ हुए। जितारी वंश के धर्म नारायण ने कामातापुर को अपनी राजधानी बनाया। ये दोनों ही शासक कायस्थ थे। चौदहवीं शताब्दी में ही सिला ग्राम (वर्तमान नलवारी जिलान्तर्गत) के कायस्थ शिक्षाविद कविरत्न सरस्वती ने अपने काव्य ‘जयद्रथ वध’ में पाल शासक दुर्लव नारायण और इन्द्र नारायण का उल्लेख कायस्थ के रुप में किया है।

जैसोर का राजा प्रतापदित्य, चन्द्रदीप का राजा कन्दर्पनारायण तथा विक्रमपुर (ढाका) का केदार राम, जिसने अकबर का प्रबल विरोध किया था, अनेक वर्षों तक मुग़लों को बंगाल पर अधिकार करने नहीं दिया, सभी कायस्थ थे।

अकबर के प्रधान मंत्री अबुल फजल के अनुसार ‘बंगाल पर पहले एक क्षत्रिय वंश ने राज्य किया था। उसकी अवनति के पश्चात चार कायस्थ वंशों ने वहां कर्इ हजारों वर्षों (शताब्दियों) तक शासन किया। उनके नाम क्रमश: भोज, सूर, पाल एवं सेन वंश है। पठानों ने गौड़ देश को सेन राजाओं से जीता और बाद में उन्हें मुगलों ने पराजित किया। सेन राजाओं की अवनति के पश्चात कर्ण सुवर्ण के देव वंश के कायस्थ सरदार स्वतन्त्रता के लिये लगभग दो शताब्दियों तक लड़ते रहे और उस समय भी जबकि मुगल शक्ति अपने शिखर पर थी, सरदार प्रतापादित्य, मुकुन्दराम तथा सीताराम ने मुगलों से लड़ार्इ की और हिन्दू राज्य स्थापित करने का प्रयत्न किया।’

 स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक ब्रिटिश शासन की सेवा में होने का इनका प्रतिशत बहुत ऊँचा था. सन् 1765 ई में बक्सर की लड़ाई में मुगल शासक शाह आलम के अंग्रेजों से हारने के बाद कंपनी सरकार को जब बिहार और उड़िसा की दीवानी मिली थी तो राजा सिताब राय को दोनों प्रांतो का दीवान बनाया गया था जो कायस्थ थे

श्री शकटार मगध सम्राट महापद्मनंद के प्रधान मंत्री। [(उनके पुत्र स्थूलभद्र जैन मुनि बन गये तथा श्री चक्र ने मंत्री पद सुशोभित किया)श्री शकटार ने मगघ की प्राचीन राजधानी पाटलिपुत्र में श्री चित्रगुप्त मंदिर का निर्माण कराया इस मंदिर का पुर्ननिर्माण राजा टोडरमल ने कराया]

श्री ब्रहमकांत (सूर्यकांन) सम्राट विक्रमादित्य के प्रधान सेनापति।

राजा टोडरमल सम्राट अकबर के नवरत्न लगानव्यवस्था के प्रवर्तक।

हिम्मतराय सम्राट अकबर के मंत्री।

श्री चतुर्भज सक्सेना जहाँगीर बादशाह के मंत्री।

श्री नागरदासविजय सिंह औरंगजेब के मंत्री।

राजा मानराय भटनागर मोहम्मदशाह के अवध के हाकिम।

राजा नवलराय नवाब सफरजंग के द्वारा नियुक्त बुंदेलखण्ड के शासक।

आनन्दधन मोहम्मद शाह के दीवान।

श्री मनजीत सिसोलिया बादशाह गयासुद्दीन वलवन के दीवान।

मदनमोहन श्रीवास्तव बुन्देलखण्ड के महाराजा छत्रसाल के दीवान


महाराजा सर किशन प्रसाद निजाम राज्य के प्रधानमंत्री

राजा धरम करण निजाम के मंत्री

चंदूलाल हैदराबाद राज्य के दीवान

बख्शी सदानंद काशी नरेश के दीवान(डॉ. संपूर्णानंद के पितामह)

महाराजा गिरिजा नाथ राय दीनाजपुर के महाराज

महाराजा प्रतापदित्य जैसोर के महाराज


‘सोशियल हिस्ट्री आफ ए इंडियन कास्ट-सब-कास्ट कायस्थ’ पर थीसिस लिखकर करेन ल्योनर्इ नामक अमरीकी महिला ने कैलीफोर्निया विश्वविधालय (अमरीका) से डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। यह हैदराबादी कायस्थों पर उनके द्वारा किये शोध पर आधारित थी। इस शोघ पर आधारित उसकी पुस्तक सन 1978 में प्रकाशित हुर्इ तथा इसके मुखपृष्ट पर राजा गिरधारी प्रसाद सक्सेना उर्फ बन्सी राजा चित्र हैं।



परिवार[संपादित करें]

पद्म पुराण के अनुसार कायस्थ कुल के ईष्ट देव श्री चित्रगुप्त जी के दो विवाह हुए। इनकी प्रथम पत्नी सूर्यदक्षिणा (जिन्हें नंदिनी भी कहते हैं) सूर्य-पुत्र श्राद्धदेव की कन्या थी, इनसे ४ पुत्र हुए-भानू, विभानू, विश्वभानू और वीर्यभानू । इनकी द्वितीय पत्नी ऐरावती (जिसे शोभावती भी कहते हैं) धर्मशर्मा नामक ब्राह्मण की कन्या थी, इनसे ८ पुत्र हुए चारु, चितचारु, मतिभान, सुचारु, चारुण, हिमवान, चित्र एवं अतिन्द्रिय कहलाए। इसका उल्लेख अहिल्या, कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों में भी किया गया है। चित्रगुप्त जी के बारह पुत्रों का विवाह नागराज वासुकी की बारह कन्याओं से सम्पन्न हुआ। इसी कारण कायस्थों की ननिहाल नागवंश मानी जाती है और नागपंचमी के दिन नाग पूजा की जाती है। नंदिनी के चार पुत्र काश्मीर के निकटवर्ती क्षेत्रों में जाकर बस गये तथा ऐरावती के आठ पुत्रों ने गौड़ देश के आसपास (वर्तमान बिहार, उड़ीसा, तथा बंगाल) में जा कर निवास किया। वर्तमान बंगाल उस काल में गौड़ देश कहलाता था[5][6]

शाखाएं[संपादित करें]

इन बारह पुत्रों के दंश के अनुसार कायस्थ कुल में १२ शाखाएं हैं जो - श्रीवास्तव, सूर्यध्वज, वाल्मीक, अष्ठाना, माथुर, गौड़, भटनागर, सक्सेना, अम्बष्ठ, निगम, कर्ण, कुलश्रेष्ठ नामों से चलती हैं।[6] अहिल्या, कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों के अनुसार इन बारह पुत्रों का विवरण इस प्रकार से है:

नंदिनी-पुत्र[संपादित करें]

भानु[संपादित करें]

प्रथम पुत्र भानु कहलाये जिनका राशि नाम धर्मध्वज था| चित्रगुप्त जी ने श्रीभानु को श्रीवास (श्रीनगर) और कान्धार क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था| उनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री पद्मिनी से हुआ था एवं देवदत्त और घनश्याम नामक दो पुत्रों हुए। देवदत्त को कश्मीर एवं घनश्याम को सिन्धु नदी के तट का राज्य मिला। श्रीवास्तव २ वर्गों में विभाजित हैं - खर एवं दूसर। इनके वंशज आगे चलकर कुछ विभागों में विभाजित हुए जिन्हें अल कहा जाता है। श्रीवास्तवों की अल इस प्रकार हैं - वर्मा, सिन्हा, अघोरी, पडे, पांडिया,रायजादा, कानूनगो, जगधारी, प्रधान, बोहर, रजा सुरजपुरा,तनद्वा, वैद्य, बरवारिया, चौधरी, रजा संडीला, देवगन, इत्यादि।[6]

विभानू[संपादित करें]

द्वितीय पुत्र विभानु हुए जिनका राशि नाम श्यामसुंदर था। इनका विवाह मालती से हुआ। चित्रगुप्त जी ने विभानु को काश्मीर के उत्तर क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। इन्होंने अपने नाना सूर्यदेव के नाम से अपने वंशजों के लिये सूर्यदेव का चिन्ह अपनी पताका पर लगाने का अधिकार एवं सूर्यध्वज नाम दिया। अंततः वह मगध में आकर बसे।[6]

विश्वभानू[संपादित करें]

तृतीय पुत्र विश्वभानु हुए जिनका राशि नाम दीनदयाल था और ये देवी शाकम्भरी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने उनको चित्रकूट और नर्मदा के समीप वाल्मीकि क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इनका विवाह नागकन्या देवी बिम्ववती से हुआ एवं इन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा भाग नर्मदा नदी के तट पर तपस्या करते हुए बिताया जहां तपस्या करते हुए उनका पूर्ण शरीर वाल्मीकि नामक लता से ढंक गया था, अतः इनके वंशज वाल्मीकि नाम से जाने गए और वल्लभपंथी बने। इनके पुत्र श्री चंद्रकांत गुजरात जाकर बसे तथा अन्य पुत्र अपने परिवारों के साथ उत्तर भारत में गंगा और हिमालय के समीप प्रवासित हुए। वर्तमान में इनके वंशज गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं , उनको "वल्लभी कायस्थ" भी कहा जाता है।[6]

वीर्यभानू[संपादित करें]

चौथे पुत्र वीर्यभानु का राशि नाम माधवराव था और इनका विवाह देवी सिंघध्वनि से हुआ था। ये देवी शाकम्भरी की पूजा किया करते थे। चित्रगुप्त जी ने वीर्यभानु को आदिस्थान (आधिस्थान या आधिष्ठान) क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। इनके वंशजों ने आधिष्ठान नाम से अष्ठाना नाम लिया एवं रामनगर (वाराणसी) के महाराज ने उन्हें अपने आठ रत्नों में स्थान दिया। वर्तमान में अष्ठाना उत्तर प्रदेश के कई जिले और बिहार के सारन, सिवान , चंपारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी,दरभंगा और भागलपुर क्षेत्रों में रहते हैं। मध्य प्रदेश में भी उनकी संख्या है। ये ५ अल में विभाजित हैं |[6]

ऐरावती-पुत्र[संपादित करें]

चारु[संपादित करें]

ऐरावती के प्रथम पुत्र का नाम चारु था एवं ये गुरु मथुरे के शिष्य थे तथा इनका राशि नाम धुरंधर था। इनका विवाह नागपुत्री पंकजाक्षी से हुआ एवं ये दुर्गा के भक्त थे। चित्रगुप्त जी ने चारू को मथुरा क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था अतः इनके वंशज माथुर नाम से जाने गये। तत्कालीन मथुरा राक्षसों के अधीन था और वे वेदों को नहीं मानते थे। चारु ने उनको हराकर मथुरा में राज्य स्थापित किया। तत्पश्चात् इन्होंने आर्यावर्त के अन्य भागों में भी अपने राज्य का विस्तार किया। माथुरों ने मथुरा पर राज्य करने वाले सूर्यवंशी राजाओं जैसे इक्ष्वाकु, रघु, दशरथ और राम के दरबार में भी कई महत्त्वपूर्ण पद ग्रहण किये। वर्तमान माथुर ३ वर्गों में विभाजित हैं -देहलवी,खचौली एवं गुजरात के कच्छी एवं इनकी ८४ अल हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कटारिया, सहरिया, ककरानिया, दवारिया,दिल्वारिया, तावाकले, राजौरिया, नाग, गलगोटिया, सर्वारिया,रानोरिया इत्यादि। एक मान्यता अनुसार माथुरों ने पांड्या राज्य की स्थापना की जो की वर्तमान में मदुरै, त्रिनिवेल्ली जैसे क्षेत्रों में फैला था।[7] माथुरों के दूत रोम के ऑगस्टस कैसर के दरबार में भी गए थे।[6]

सुचारु[संपादित करें]

द्वितीय पुत्र सुचारु गुरु वशिष्ठ के शिष्य थे और उनका राशि नाम धर्मदत्त था। ये देवी शाकम्बरी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने सुचारू को गौड़ देश में राज्य स्थापित करने भेजा था एवं इनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री देवी मंधिया से हुआ।[6] इनके वंशज गौड़ कहलाये एवं ये ५ वर्गों में विभाजित हैं: - खरे, दुसरे, बंगाली, देहलवी, वदनयुनि। गौड़ कायस्थों को ३२ अल में बांटा गया है। गौड़ कायस्थों में महाभारत के भगदत्त और कलिंग के रुद्रदत्त राजा हुए थे।

चित्र[संपादित करें]

तृतीय पुत्र चित्र हुए जिन्हें चित्राख्य भी कहा जाता है, गुरू भट के शिष्य थे, अतः भटनागर कहलाये। इनका विवाह देवी भद्रकालिनी से हुआ था तथा ये देवी जयंती की अराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने चित्राक्ष को भट देश और मालवा में भट नदी के तट पर राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इन क्ष्त्रों के नाम भी इन्हिं के नाम पर पड़े हैं। इन्होंने चित्तौड़ एवं चित्रकूट की स्थापना की और वहीं बस गए।[6] इनके वंशज भटनागर के नाम से जाने गए एवं ८४ अल में विभाजित हैं, इनकी कुछ अल इस प्रकार हैं- डसानिया, टकसालिया, भतनिया, कुचानिया, गुजरिया,बहलिवाल, महिवाल, सम्भाल्वेद, बरसानिया, कन्मौजिया इत्यादि| भटनागर उत्तर भारत में कायस्थों के बीच एक आम उपनाम है।

मतिभान[संपादित करें]

चतुर्थ पुत्र मतिमान हुए जिन्हें हस्तीवर्ण भी कहा जाता है। इनका विवाह देवी कोकलेश में हुआ एवं ये देवी शाकम्भरी की पूजा करते थे। चित्रगुप्त जी ने मतिमान को शक् इलाके में राज्य स्थापित करने भेजा। उनके पुत्र महान योद्धा थे और उन्होंने आधुनिक काल के कान्धार और यूरेशिया भूखंडों पर अपना राज्य स्थापित किया। ये शक् थे और शक् साम्राज्य से थे तथा उनकी मित्रता सेन साम्राज्य से थी, तो उनके वंशज शकसेन या सक्सेना कहलाये। आधुनिक इरान का एक भाग उनके राज्य का हिस्सा था।[6] वर्तमान में ये कन्नौज, पीलीभीत, बदायूं, फर्रुखाबाद, इटाह,इटावा, मैनपुरी, और अलीगढ में पाए जाते हैं| सक्सेना लोग खरे और दूसर में विभाजित हैं और इस समुदाय में १०६ अल हैं, जिनमें से कुछ अल इस प्रकार हैं- जोहरी, हजेला, अधोलिया, रायजादा, कोदेसिया, कानूनगो, बरतरिया, बिसारिया, प्रधान, कम्थानिया, दरबारी, रावत, सहरिया,दलेला, सोंरेक्षा, कमोजिया, अगोचिया, सिन्हा, मोरिया, इत्यादि|

हिमवान[संपादित करें]

पांचवें पुत्र हिमवान हुए जिनका राशि नाम सरंधर था उनका विवाह भुजंगाक्षी से हुआ। ये अम्बा माता की अराधना करते थे तथा चित्रगुप्त जी के अनुसार गिरनार और काठियवार के अम्बा-स्थान नामक क्षेत्र में बसने के कारण उनका नाम अम्बष्ट पड़ा। हिमवान के पांच पुत्र हुए: नागसेन, गयासेन, गयादत्त, रतनमूल और देवधर। ये पाँचों पुत्र विभिन्न स्थानों में जाकर बसे और इन स्थानों पर अपने वंश को आगे बढ़ाया। इनमें नागसेन के २४ अल, गयासेन के ३५ अल, गयादत्त के ८५ अल, रतनमूल के २५ अल तथा देवधर के २१ अल हैं। कालाम्तर में ये पंजाब में जाकर बसे जहाँ उनकी पराजय सिकंदर के सेनापति और उसके बाद चन्द्रगुप्त मौर्य के हाथों हुई। मान्यता अनुसार अम्बष्ट कायस्थ बिजातीय विवाह की परंपरा का पालन करते हैं और इसके लिए "खास घर" प्रणाली का उपयोग करते हैं। इन घरों के नाम उपनाम के रूप में भी प्रयोग किये जाते हैं। ये "खास घर" वे हैं जिनसे मगध राज्य के उन गाँवों का नाम पता चलता है जहाँ मौर्यकाल में तक्षशिला से विस्थापित होने के उपरान्त अम्बष्ट आकर बसे थे। इनमें से कुछ घरों के नाम हैं- भीलवार, दुमरवे, बधियार, भरथुआर, निमइयार, जमुआर,कतरयार पर्वतियार, मंदिलवार, मैजोरवार, रुखइयार, मलदहियार,नंदकुलियार, गहिलवार, गयावार, बरियार, बरतियार, राजगृहार,देढ़गवे, कोचगवे, चारगवे, विरनवे, संदवार, पंचबरे, सकलदिहार,करपट्ने, पनपट्ने, हरघवे, महथा, जयपुरियार, आदि|[6]

चित्रचारु[संपादित करें]

छठवें पुत्र का नाम चित्रचारु था जिनका राशि नाम सुमंत था और उनका विवाह अशगंधमति से हुआ। ये देवी दुर्गा की अराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने चित्रचारू को महाकोशल और निगम क्षेत्र (सरयू नदी के तट पर) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। उनके वंशज वेदों और शास्त्रों की विधियों में पारंगत थे जिससे उनका नाम निगम पड़ा। वर्तमान में ये कानपुर, फतेहपुर, हमीरपुर, बंदा, जलाओं,महोबा में रहते हैं एवं ४३ अल में विभाजित हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कानूनगो, अकबरपुर, अकबराबादी, घताम्पुरी,चौधरी, कानूनगो बाधा, कानूनगो जयपुर, मुंशी इत्यादि।

चित्रचरण[संपादित करें]

सातवें पुत्र चित्रचरण थे जिनका राशि नाम दामोदर था एवं उनका विवाह देवी कोकलसुता से हुआ। ये देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे और वैष्णव थे। चित्रगुप्त जी ने चित्रचरण को कर्ण क्षेत्र (वर्तमाआन कर्नाटक) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इनके वंशज कालांतर में उत्तरी राज्यों में प्रवासित हुए और वर्तमान में नेपाल, उड़ीसा एवं बिहार में पाए जाते हैं। ये बिहार में दो भागों में विभाजित है: गयावाल कर्ण – गया में बसे एवं मैथिल कर्ण जो मिथिला में जाकर बसे। इनमें दास, दत्त, देव, कण्ठ, निधि,मल्लिक, लाभ, चौधरी, रंग आदि पदवी प्रचलित हैं। मैथिल कर्ण कायस्थों की एक विशेषता उनकी पंजी पद्धति है, जो वंशावली अंकन की एक प्रणाली है। कर्ण ३६० अल में विभाजित हैं। इस विशाल संख्या का कारण वह कर्ण परिवार हैं जिन्होंने कई चरणों में दक्षिण भारत से उत्तर की ओर प्रवास किया। यह ध्यानयोग्य है कि इस समुदाय का महाभारत के कर्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है।

चारुण[संपादित करें]

अंतिम या आठवें पुत्र चारुण थे जो अतिन्द्रिय भी कहलाते थे। इनका राशि नाम सदानंद है और उन्होंने देवी मंजुभाषिणी से विवाह किया। ये देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने अतिन्द्रिय को कन्नौज क्षेत्र में राज्य स्थापित करने भेजा था। अतियेंद्रिय चित्रगुप्त जी की बारह संतानों में से सर्वाधिक धर्मनिष्ठ और सन्यासी प्रवृत्ति वाले थे। इन्हें 'धर्मात्मा' और 'पंडित' नाम से भी जाना गया और स्वभाव से धुनी थे। इनके वंशज कुलश्रेष्ठ नाम से जाने गए तथा आधुनिक काल में ये मथुरा, आगरा, फर्रूखाबाद, एटा, इटावा और मैनपुरी में पाए जाते हैं | कुछ कुलश्रेष्ठ जो की माता नंदिनी के वंश से हैं, नंदीगांव - बंगाल में पाए जाते हैं | [8]

ध्यानयोग्य

इतिहासकार[संपादित करें]

खेल जगत[संपादित करें]

स्वतन्त्रता सेनानी[संपादित करें]

पत्रकार[संपादित करें]

प्रशासक[संपादित करें]



भारत के कुछ उल्लेखनीय लोग

ललितादित्य मुक्तपीड

बाजीप्रभु देशपाण्डे

बाजी नरस प्रभु

बहिरजी नायक

मुराबजी देशपाण्डे

बालाजी आवजी चिटनवीस

शंकरदेव

नरोत्तमदास

भक्तिविनादा ठाकुर

स्वामी विवेकानन्द

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद

महर्षि महेश योगी

निर्मला श्रीवास्तव

शारदा चरण मित्र

शान्ति स्वरूप भटनागर

जगदीश चन्द्र बसु

जयप्रकाश नारायण सम्पूर्ण क्रांति

राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति

लालबहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमन्त्री

कृष्ण वल्लभ सहाय मुख्यमंत्री

संपूर्णानन्द मुख्यमंत्री

ज्योति बसु (मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री)

बीजू पटनायक मुख्यमंत्री, उधोगपति

जानकी बल्लभ पटनायक, मुख्यमंत्री राज्यपाल

नवीन पटनायक – मुख्यमंत्री

शिव चंद्र माथुर मुख्यमंत्री राज्यपाल

बाल ठाकरे (शिवसेना प्रमुख)

सी॰ डी॰ देशमुख

रवि शंकर प्रसाद

यशवंत सिन्हा

शत्रुघन सिन्हा

हरिवंश राय बच्चन

राम गणेश गडकरी

भगवती चरण वर्मा

प्रेमचंद

महादेवी वर्मा

अमिताभ बच्चन

अभिषेक बच्चन

सोनाक्षी सिन्हा-फिल्म अभिनेत्री (हिंदी)

श्रिया सरन-फिल्म्स अभिनेत्री (तेलगु, तमिल, हिंदी, कन्नड़, मलयालम)



सन्दर्भ[संपादित करें]

^क कुछ विद्वानों के अनुसार वीर्यभानू (वाल्मीकि ) और विश्वभानू (अष्ठाना ) इरावती माता के पुत्र तथा चित्रचारू (निगम ) और अतीन्द्रिय (कुलश्रेष्ठ) नंदिनी माता के पुत्र हैं। इसका एक मात्र प्रमाण कुछ घरो में विराजित श्री चित्रगुप्त जी महाराज का चित्र है। आजकल सिन्हा, वर्मा,प्रसाद...आदि जातिनाम रखने का प्रचलन दूसरी जातियों में भी देखा जाता है

इन्हें भी देखें[संपादित करें]