कुशवाहा

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जयपुर राज्य का पंचरंग ध्वज

कुशवाहा[1] भारतीय समाज की एक वंश/जाति है। यह भारतीय समाज की सबसे प्राचीन जाति भी मानी जाती है। इस जाति का कई स्वतंत्र राज्यों व रियासतों पर शासन रहा हैं । कुशवाहा(कोईरी,काछी ,मुराव ) और कुशवाहा जाति राम के पुत्र कुश का वंशज माने जाते हैं,कुछ लोग यह मानते है कि "कोइरी अर्थात् खेती करने वाला!" नही ऐसा नहीं है। [2]जिनके अंदर ब्रिटिश काल में चार उपजाती कोईरी ,काछी , मुराव ,कछवाहा को सामिल किया गया थे। उसी समय इन चारो उपजाति ने एक उपनाम कुशवाहा पर जोर दिया लेकिन कालांतर में कछवाहा से इनकी दूरी बढ़ गयी और कछवाहा राजपूत कुशवाहा के नाम से उभरने लगे और ज्यादातर कछवाहा राजपूत कुशवाहा(कोइरी) का प्रयोग करने लगे और आगे चलकर राजपूतों का यह शाखा कुशवाहा जाति में बंट गया जबकि कछवाहा राजपूत और कुशवाहा दोनों एक हिं है, और ये प्राचीन कालों कि राजपूतों की शाखा हैं। कछ्वाहा राजपूत,कुशवाहा ठाकुर,शाक्य, मौर्य आदि ये सभी क्षत्रिय वर्ण की उपजातिया है।

शासक गण[संपादित करें]

कछवाहा परिवार ने आमेर (आंबेर) पर शासन किया, जिसे बाद में जयपुर राज्य के नाम से जाना गया, कुशवाहों की इस शाखा को राजपूत माना गया।मौर्य क्षत्रिय राजाओं ने पाटलिपुत्र में मगध पर शासन किया, जो आज पटना के नाम से जाना जाता है। [3][4][5][6]

वर्गीकरण[संपादित करें]

कुशवाहा पारंपरिक रूप से किसान थे और ये क्षत्रिय वर्ण से है। कुशवाहा समुदाय ने क्षत्रिय होने का दावा किया है । [7] पिंच ने इन्हे कुशल कृषक बताया है।[8] ब्रिटिश शासन के उत्तर दशको में कुशवाहा समुदाय व अन्य जतियों ने ब्रिटिश प्रशासको के समक्ष अपने परंपरागत स्तर के विरुद्ध चुनौती प्रस्तुत की व उच्च स्तर की मांग की।[9][10]

काछी व कोईरी दोनों जातियाँ अफीम की खेती में अपने योगदान के कारण काफी समय से ब्रिटिश शासन के करीब रही थी। करीब 1910 से,इन दोनों ही समूहो ने एक संगठन बनाया और स्वयं को को कुशवाहा क्षत्रिय बताने लगे।[11] व कुशवाहा (मुराओ) जाति ने 1928 में क्षत्रिय वर्ण में पहचान हेतु लिखित याचिका दायर की।[12]

अखिल भारतीय कुशवाहा क्षत्रिय महासभा का यह कदम पारंपरिक रूप से शूद्र मानी जाने वाली जातियों द्वारा सामाजिक उत्थान की प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसे एम॰एन॰ श्रीवास ने "संस्कृतिकरण" के रूप में परिभाषित किया है,[13] जो कि उन्नीसवी सदी के उत्तर व बीसवी सदी के पूर्व में जातिगत राजनीति का एक लक्षण था।[12][14]

अखिल भारतीय कुशवाहा क्षत्रिय महासभा का यह अतिस्ठान उस वैष्णव विचारधारा पर आधारित था, जिसके अनुसार वह अपने भगवान राम व कृष्ण की उपासना करने व उनके क्षत्रिय वंश के वंशज होने के दावे को माध्यम देता है, कुशवाहा समुदाय भगवान राम का वंशज होने का वैकल्पिक दावा करते हैं।[15] 1921 मे, कुशवाहा क्रांति के समर्थक गंगा प्रसाद गुप्ता ने कुशवाहा व कछवाहा दोनों एक हि प्रजाति के जातियों के क्षत्रिय होने के साक्ष्यों पर एक पुस्तक प्रकाशित की।[8][16] उनके द्वारा इतिहास की पुनरसंरचना में तर्क दिया गया कि कुशवाहा कुश के वंशज है व बारहवी शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के मुस्लिम सुदृणीकरण के समय राजा जयचन्द को इन्होंने सैन्य सेवाए प्रदान की थी। बाद में विजयी मुस्लिमों के कारण कुशवाहा समुदाय तितर बितर होकर अपनी पहचान भूल गया व जनेऊ आदि परंपराए त्याग कर निम्न स्तर के अलग अलग नामो के स्थानीय समुदायो में विभाजित हो गया।[8] गुप्ता व अन्य की विभिन्न जतियों के क्षत्रिय प्रमाण के इतिहास लिखने की इस आम कोशिश का जातीय संगठनो द्वारा प्रसार किया गया, जिसे दीपान्कर गुप्ता 'शहरी राजनैतिक शिष्ट' व 'अल्पशिक्षित ग्रामीणो' के मध्य संबंध स्थापना के रूप में देखते है। [17] कुछ जतियों ने इस क्षत्रित्व के दावे के समर्थन में मंदिर निर्माण भी करवाए, जैसे कि मुराओ लोगो के अयोध्या में मंदिर।[18]

कुछ कुशवाह सुधारकों ने कुर्मी सुधारक देवी प्रसाद सिन्हा चौधरी के तर्ज पर यह तर्क दिया कि राजपूत, भूमिहार व ब्राह्मण भी खेतो में श्रम करते है, अतः श्रम कार्य में लग्न होने का शूद्र वर्ण से कोई संबंध नहीं जोड़ा जा सकता है।[19]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Toggle sidebar Jagran कुशवाहा समाज का रहा है गौरवशाली इतिहास". Jagran. http://m.jagran.com/lite/uttar-pradesh/ghazipur-9626330.html. अभिगमन तिथि: 12 सितम्बर 2012. 
  2. George S. Cuhaj; Thomas Michael (29 November 2012). Standard Catalog of World Coins - 1801-1900. Krause Publications. पृ॰ 688–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 1-4402-3085-4. https://books.google.com/books?id=K37CNejEk70C&pg=PA688. 
  3. Raj Kumar (2003). Essays on Medieval India. Discovery Publishing House. पृ॰ 294–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7141-683-7. https://books.google.com/books?id=JB-B7Hk_35AC&pg=PA294. अभिगमन तिथि: 9 July 2017. 
  4. Sailendra Nath Sen (2007). Textbook of Indian History and Culture. Macmillan India Limited. पृ॰ 167–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-4039-3200-6. https://books.google.com/books?id=fpJ7ry7B5TYC&pg=PA167. 
  5. Wadley, Susan Snow (2004). Raja Nal and the Goddess: The North Indian Epic Dhola in Performance. Indiana University Press. पृ॰ 110-111. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780253217240. https://books.google.com/books?id=UbsgVL4AGkoC&pg=PA110. 
  6. Sadasivan, Balaji (2011). The Dancing Girl: A History of Early India. Institute of Southeast Asian Studies. पृ॰ 233-234. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9789814311670. https://books.google.com/books?id=980SAvbmpUkC&pg=PT255. 
  7. Pinch, William R. (1996). Peasants and monks in British India. University of California Press. प॰ 81. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-520-20061-6. http://books.google.co.uk/books?id=uEP-ceGYsnYC. अभिगमन तिथि: 2012-02-22. 
  8. Pinch, William R. (1996). Peasants and monks in British India. University of California Press. प॰ 92. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-520-20061-6. http://books.google.co.uk/books?id=uEP-ceGYsnYC. अभिगमन तिथि: 2012-02-22. 
  9. Pinch, William R. (1996). Peasants and monks in British India. University of California Press. प॰ 88. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-520-20061-6. http://books.google.co.uk/books?id=uEP-ceGYsnYC. अभिगमन तिथि: 2012-02-22. 
  10. Pinch, William R. (1996). Peasants and monks in British India. University of California Press. पृ॰ 83–84. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-520-20061-6. http://books.google.co.uk/books?id=uEP-ceGYsnYC. अभिगमन तिथि: 2012-02-22. 
  11. Pinch, William R. (1996). Peasants and monks in British India. University of California Press. प॰ 90. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-520-20061-6. http://books.google.co.uk/books?id=uEP-ceGYsnYC. अभिगमन तिथि: 2012-02-22. 
  12. Jaffrelot, Christophe (2003). India's silent revolution: the rise of the lower castes in North India (Reprinted सं॰). C. Hurst & Co.. प॰ 199. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-85065-670-8. http://books.google.co.uk/books?id=OAkW94DtUMAC. अभिगमन तिथि: 2012-02-06. 
  13. Charsley, S. (1998). "Sanskritization: The Career of an Anthropological Theory". Contributions to Indian Sociology 32 (2): 527. doi:10.1177/006996679803200216.  (सब्सक्रिप्शन आवश्यक)
  14. Upadhyay, Vijay S.; Pandey, Gaya (1993). History of anthropological thought. Concept Publishing Company. प॰ 436. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7022-492-1. http://books.google.co.uk/books?id=SNw5zVN1V0oC. अभिगमन तिथि: 2012-02-06. 
  15. Jassal, Smita Tewari (2001). Daughters of the earth: women and land in Uttar Pradesh. Technical Publications. पृ॰ 51–53. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7304-375-8. http://books.google.co.uk/books?id=T6gnJmoLRZQC. अभिगमन तिथि: 2012-02-06. 
  16. Narayan, Badri (2009). Fascinating Hindutva: saffron politics and Dalit mobilisation. SAGE. प॰ 25. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7829-906-8. http://books.google.co.uk/books?id=8bJ_rhfu6yUC. अभिगमन तिथि: 2012-02-06. 
  17. Gupta, Dipankar (2004). Caste in question: identity or hierarchy?. SAGE. प॰ 199. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-7619-3324-3. http://books.google.co.uk/books?id=bgpEIb4tNjgC. अभिगमन तिथि: 2012-02-22. 
  18. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; Pinch1996p98 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  19. Pinch, William R. (1996). Peasants and monks in British India. University of California Press. प॰ 110. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-520-20061-6. http://books.google.co.uk/books?id=uEP-ceGYsnYC. अभिगमन तिथि: 2012-02-22. 

विस्तृत अध्ययन[संपादित करें]

  • Bayley C. (1894) Chiefs and Leading Families In Rajputana
  • David Henige|Henige, David (2004). Princely states of India;A guide to chronology and rulers
  • Jyoti J. (2001) Royal Jaipur
  • Krishnadatta Kavi, Gopalnarayan Bahura (editor) (1983) Pratapa Prakasa, a contemporary account of life in the court at Jaipur in the late 18th century
  • Khangarot, R.S., and P.S. Nathawat (1990). Jaigarh- The invincible Fort of Amber
  • Topsfield, A. (1994). Indian paintings from Oxford collections
  • Tillotson, G. (2006). Jaipur Nama, Penguin books