यादव

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यादव (अर्थ- महाराज यदु के वंशज)[1][2]) प्राचीन भारत के वह लोग जो पौराणिक नरेश यदु के वंशज होने का दावा करते रहे है। यादव वंश प्रमुख रूप से आभीर (वर्तमान अहीर), अंधक, व्रष्णि तथा सत्वत नामक समुदायो से मिलकर बना था, जो कि भगवान कृष्ण के उपासक थे। [3][4] यह लोग प्राचीन भारतीय साहित्य मे यदुवंश के एक प्रमुख भाग के रूप मे वर्णित है।[5] प्राचीन, मध्यकालीन व आधुनिक भारत की कई जातियाँ तथा राज वंश स्वयं को यदु का वंशज बताते है और यादव नाम से जाने जाते है।[6][7]

मूल उत्पत्ति[संपादित करें]

प्राचीन संदर्भ[संपादित करें]

जयंत गडकरी के कथनानुसान, " पुराणों के विश्लेषण से यह निश्चित रूप से मान्य है कि अंधक,वृष्णि, सत्वत तथा अभीर जातियो को संयुक्त रूप से यादव कहा जाता था जो कि श्रीक़ृष्ण की उपासक थी। परंतु यह भी सत्य है की पुराणो मे मिथक तथा दंतकथाओं के समावेश को नकारा नहीं जा सकता, फिर भी आवश्यक यह है कि पौराणिक संरचना के तहत एक सुद्र्ण सामाजिक मूल्यो कि प्रणाली प्रतिपादित की गयी।"[8]

लुकिया मिचेलुत्ती के यादवों पर किए गए शोधानुसार -

यादव जाति के मूल मे निहित वंशवाद के विशिष्ट सिद्धांतानुसार, सभी भारतीय गोपालक जातियाँ, उसी यदुवंश से अवतरित है जिसमे श्रीक़ृष्ण (गोपालक व क्षत्रिय) का जन्म हुआ था .....उन लोगों मे यह द्रढ़ विश्वास से माना जाता है कि वे सभी श्रीक़ृष्ण से संबन्धित है तथा वर्तमान की यादव जातीयां उसी मूल वृहद यादव सम समूह से विखंडित होकर बनी हैं।[9]

वर्तमान परिपेक्ष्य[संपादित करें]

क्रिस्टोफ़ जफ़्फ़ेर्लोट के अनुसार

यादव शब्द कई जातियो को आच्छादित करता है जो मूल रूप से अनेकों नामों से जाती रही है, हिन्दी क्षेत्र, पंजाब व गुजरात मे- अहीर, महाराष्ट्र, गोवा,आंध्र व कर्नाटक मे-गावली, जिनका सामान्य पारंपरिक कार्य चरवाहे, गोपालक व दुग्ध-विक्रेता का था।[10]

लुकिया मिचेलुत्ती के विचार से -

यादव लगातार अपने जातिस्वरूप आचरण व कौशल को उनके वंश से जोड़कर देखते आए हैं जिससे उनके वंश की विशिष्टता स्वतः ही व्यक्त होती है। उनके लिए जाति मात्र पदवी नहीं है बाल्कि रक्त की गुणवत्ता है, और ये द्रष्टव्य नया नही है। अहीर (वर्तमान मे यादव) जाति की वंशावली एक सैद्धान्तिक क्रम मोडेल पर आधारित है जो कि उनके पूर्वज व गोपालक योद्धा श्री कृष्ण पर केन्द्रित है, जो कि एक क्षत्रिय थे। [11]

श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है कि यादव के नाम लेने से सभी पाप मिट जाते हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें] यादव प्राय: 'अहीर' शब्द से भी नामांकित होते हैं, जो संभवत: आभीर जाति से संबद्ध रहे होंगे। "अहीर" शब्द संस्कृत के "आभीर " शब्द का बिगड़ा हुआ स्वरुप है जिसका अर्थ है - निर्भीक i यादव वीरों और उनकी अजेयी नारायणी सेना ने महाभारत के युद्ध में अपना बेजोड़ शौर्य प्रदर्शित किया था i प्राचीन समय में तो कई राज्यों में सेनापति का पद सिर्फ अहीरों के लिए ही आरक्षित था i नर्मदा के तट पर सर्वप्रथम समुद्रगुप्त की विजयवाहिनी को रोकने वाले वीर अहीर ही तो थे i फिर दासता का युग आया - तुर्कों का शासनi लेकिन अहीर फिर भी अपनी तलवारों का शौर्य दिखलाते रहे i करनाल के युद्ध में वो शेर का बच्चा शमशेर बहादुर राव बालकिशन , अपने 5000 अहीर रणबांकुरों के साथ उस लूटेरे नादिरशाह से जूझ गया i नादिरशाह ने अहीरवाल की तलवारों की दिल खोल कर प्रशंसा की दिल्ली के बादशाह के समक्ष i इस के बाद फिरंगियों का युग आया i 1803 में एंग्लो - मराठा युद्ध में अहीरवाल राव तेज़ सिंह जी के नेतृत्व में अपने भाई मराठों के साथ खड़ा था लेकिन मराठा पराजय ने अहीर रियासत को अंग्रेजो का बैरी बना दिया i फिर , सन 1857 में समस्त हिन्द में बदलाव की उम्मीद ने अंगडाई ली i अहीरों की तलवारे फिर चमकी रणखेतों में i राव किशन सिंह जी की "मिसरी" चारण - भाटों के वीर रस के स्वरों में समा गयी i वीर अहीर एक बार फिर नसीबपुर में रणभूमि को लाल लहू से रंगने को तैयार थे i नसीबपुर में अहीरवाल की तलवारें विजय हासिल करने ही वाली थी कि एक अनहोनी हो गई i राव किशन सिंह जी फिरंगी सेनापति जेर्राद को काट कर बैरी से जूझते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए i हिन्द के गद्दार फिरंगियों से मिल गए i नसीबपुर की पराजय अहीरों को लील गई i वीर अहीरवाल को खण्डित कर दिया गया और सेना में अहीरों की भर्ती पर विराम लगा दिया गया i अंग्रेजो ने 1857 की क्रांति के बाद जाति आधारित फौज का गठन किया, जिस की वफादारी सिर्फ अंग्रेजो और जाति विशेष के प्रति थी न की मादरे वतन के लिए i अहीरों की जगह कुछ अंग्रेजपरस्त जातियों को फौज में स्थान मिला i अहीरवाल बिखर गया क्योंकि इस अर्ध - मरुस्थल व जल - विहीन भूमि में अहीर अपनी तलवार का खाते थे i पर प्रथम विश्व - युद्ध में जब अंग्रेजो को सैनिको की जरुरत पड़ी तो फिर उन्हें अहीर कौम की याद आयी i प्रथम विश्व - युद्ध ने अहीर सैनिक परम्परा को प्राणवायु प्रदान करी i प्रथम विश्व -युद्ध में अहीरों ने अपने शौर्य का ऐसा जलवा बिखेरा कि दितीय विश्व -युद्ध में करीब 39 हज़ार यदुवंशी मोर्चे पर थे जो कि किसी भी हिन्दू जाति की संख्या व उसके सैनिको के अनुपात में सर्वाधिक थे i बर्मा के मोर्चे पर अहीर कौम के शौर्य का परचम लहरा दिया -उमराव सिंह जी , विक्टोरिया क्रॉस नेi लेकिन , 1940 में सिंगापुर में अहीर सैनिको के विद्रोह ने अंग्रेजो के मन में इस जंगजू कौम का खौफ पैदा कर दिया और इस वजह से पृथक अहीर रेजिमेंट का गठन ना हो सका i 15 अगस्त 1947 में गुलामी की जंजीरे टूटी व नये भारत का उदय हुआअहीर एक जाति है, जो उत्तरी और मध्य भारतीय क्षेत्र में फैली हुई है। इस जाति के साथ बहुत ऐतिहासिक महत्त्व जुड़ा हुआ है, क्योंकि इसके सदस्य संस्कृत साहित्य में उल्लिखित आभीर के समकक्ष माने जाते हैं। हिन्दू पौराणिक ग्रंथ 'महाभारत' में इस जाति का बार-बार उल्लेख आया है। कुछ विद्वानों का मत है कि इन्हीं ने, जो दक्षिणी राजस्थान और सिंध (पाकिस्तान) में बिखरे हुए हैं, कृष्ण को गोपालक या गोपाल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो अब भगवान कृष्ण की कथा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। जाटों का इससे रक्त सम्बन्ध तथा सामाजिक सम्बन्ध मराठों और गूजरों जैसा निकटतम है।खान-पान में जाट और गूजरों में कोई भेद नहीं, वैसे ही अहीर और जाटों में भी कोई भेद नहीं। इतिहास में इनके रहने का भी स्थान निकट-निकट बतलाया गया है। भारत से बाहर भी जहां कहीं जाटों का अस्तित्व पाया जाता है, वहीं अहीरों की बस्तियां भी मिलती हैं। चीन में जहां जाट को 'यूची' नाम से याद किया गया है, वहीं अहीरों को 'शू' नाम से पुकारा गया है। ईरान में जाटाली प्रदेश के निकट ही अहीरों की बस्तियां भी पाई जाती हैं। भारत की मौजूदा आर्य क्षत्रिय जातियों में अहीर सबसे पुराने क्षत्रिय हैं। जब तक जाट, राजपूत, गूजर और मराठा नामों की सृष्टि भी नहीं हुई थी, अहीरों का अभ्युदय हो चुका था।नन्द, जिसके कि यहां श्रीकृष्ण का पालन-पोषण हुआ था अहीर थे । कुछ भी बात हो, लेकिन इससे यह सिद्ध होता है कि जाट और अहीरों के पुरखे किसी एक ही भंडार के हैं।

यादव (अहीर) राजा[संपादित करें]

  • पुरनमल अहीर, अहीर देश, मालवा, एम॰पी.[12][13]
  • ठकुराइन लराई डुलाया, नाइगाव रिबाई,एम॰पी.[14]
  • ठाकुर लछमन सिंह,नाइगाव रिबाई,एम॰पी.[14]
  • कुँवर जगत सिंह, नाइगाव रिबाई,एम॰पी.[14]
  • लाल जी पटेल, देवगुरडिया,मालवा, एम॰पी.[15]
  • चूरामन अहीर , मंडला,एम॰पी. [16]
  • राव गूजरमल, रेवाड़ी [17]
  • राव तेज़ सिंह, रेवाड़ी [18]
  • राव गोपाल देव, रेवाड़ी [19]
  • महाक्षत्रप ईश्वर दत्त, प्राचीन पश्चिम भारत [20]
  • रुद्रामूर्ति अहीर, अहिरवाड़ा, झाँसी,यू॰पी॰[21]
  • राजा बुध,बदयू [22][23]
  • आदि राजा , अहिछत्र,यू॰पी॰ [24]
  • राजा दिग्पाल, महाबन, यू॰पी॰ [25]
  • राणा कतीरा,चित्तौड़, राजस्थान [25][26][27]
  • वीरसेन अहीर, जलगाव, महाराष्ट्र [28]
  • राव रुदा सिंह, रेवाड़ी [29]
  • राव राम सिंह, रेवाड़ी[29]
  • राव साहबाज सिंह, रेवाड़ी[29]
  • राव नंदराम, रेवाड़ी[29]
  • राव बलकिशन,रेवाड़ी [29]
  • भकतमन अहीर, नेपाल [30]
  • भुवन सिंह , नेपाल [31][30]
  • बारा सिंहा , नेपाल [32]
  • राव छिददु सिंह, भरौल, मैनपुरी,यू॰पी॰[33]
  • राजमाता, जिजाऊ.बुलढाणा,महाराष्ट्र [34]
  • राजा खरक सिंह व राजा हरी सिंह, तिरहुत बरेली यू॰पी॰ [35]

सन्दर्भ[संपादित करें]

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  4. While discussing about the Puranic accounts, Hem Chandra Raychaudhuri used the term, Yadava clans for the Andhakas, the Vrishnis and the Kukuras (Raychaudhuri, Hemchandra (1972). Political History of Ancient India, Calcutta: University of Calcutta, p.447fn3). But Ramakrishna Gopal Bhandarkar used the term Yadava tribes for the Satvatas, the Andhakas and the Vrishnis (Bhandarkar, R. G. (1995). Vaisnavism, Saivism and Minor Religious Systems, Delhi: Asian Educational Service, ISBN 978-81-206-0122-2, p.11).
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