अंधकासुर

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अंधकासुर या अंधक पुराणों में वर्णित एक असुर पात्र है। विभिन्न पुराणों में कई मत दिए गए हैं। अंधक बड़ा ही शक्तिशाली व शरीर से कुरूप था।

लिंग पुराण[संपादित करें]

लिंग पुराण अनुसार दैत्य हिरण्याक्ष ने कालाग्नि रुद्र के रूप मे परमेश्वर शिव की घोर तपस्या करके उनसे शिवशंकर जैसे एक पुत्र का वरदान मांगा। भगवान शंकर ने वरदान देकर हिरण्याक्ष को अंधकासुर के रूप मे पुत्र दिया। अंधकासुर बचपन से ही शिव के परम भक्त थे। अंधकासुर ने भगवान शिव की तपस्या कर उनसे से 2000 हाथ, 2000 पांव, 2000 आंखें, 1000 सिरों वाला विकराल स्वरुप प्राप्त किया। अपने पिता हिरण्याक्ष के भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा वध पश्चात आहात अंधकासुर भगवान शंकर और विष्णु को अपना परम शत्रु मानने लगा। अंधकासुर ने ब्रह्मादेव की तपस्या कर उनसे देवताओं द्वारा न मारे जाने का वर प्राप्त कर लिया।

पद्मपुराण[संपादित करें]

अंधकासुर ने त्रिलोकी का उपभोग करते हुए इन्द्रलोक को जीत लिया और वह इन्द्र को पीड़ित करने लगा। पद्मपुराण अनुसार राहू-केतु को छोडकर अंधकासुर एकमात्र ऐसा दैत्य था जिसने अमृतपान कर लिया था। अपनी शक्ति और विकराल स्वरुप के कारण यह दैत्य इतना अंधा हो चुका था कि इसे अपने समक्ष कोई दिखाई ही नही देता था। इसी अहं की अन्धता के कारण अंधकासुर माता पार्वती पर भी मोहित हो गया तथा पार्वती को प्राप्त करने का यत्न भी करने लगा तथा इसी प्रयास मे अंधकासुर ने पार्वती रूप धारण करके भगवान शंकर से छल कर उनका वध करने का भी प्रयास किया और उसने भगवान शंकर के सिर पर अपनी गदा से प्रहार कर दिया था।

ना चाहकर भी भगवान शंकर को अंधकासुर से धर्म रक्षार्थ घोर युद्ध करना पड़ा। शास्त्रानुसार अंधकासुर ने देवासुर संग्राम मे भगवान विष्णु को बाहु युद्ध मे परास्त कर दिया। इस पर भगवान शंकर ने युद्ध कर अंधकासुर को परास्त कर उसे अपने त्रिशूल पर लटका दिया। अंधकासुर के हजारों हाथपांव आंखें और अंग आकाश से पृथ्वी पर गिर रहे थे। भयंकर युद्ध मे भगवान शंकर के ललाट से गिरे पसीने से एक विकराल रूपधारी का जन्म हुआ जिसने पृथ्वी पर गिरे अंधकासुर के गिरे रक्त व अंगों को खाना शुरू कर दिया अंधकासुर का रक्त व अंग खाकर ही वो स्वयं अंधकासुर जैसा बन गया परंतु जब वध उपरांत भी अंधकासुर के विकराल रूप की भूख शांत नही हुई तब वह भगवान शंकर के सम्मुख अत्यन्त घोर तपस्या में संलग्न हो गया। तब भोले भंडारी ने उसकी तपस्या से संतुष्ट होकर उसे वरदान देने की इच्छा प्रकट की। तब उस विकराल प्राणी ने शिवशंकर से तीनों लोकों को ग्रस लेने का वरदान प्राप्त किया। वरदान स्वरूप अंधकासुर का विकराल विशाल शरीर अब एक वस्तु का आकार ले चुका था। वह विकराल वस्तु आकाश को अवरुद्ध करती हुई पृथ्वी पर आ गिरि।

तब भयभीत हुए देवता और ब्रह्मा शिव दैत्यों और राक्षसों द्वारा वह स्तंभित कर दी गई। उसे वहीं पर औंधे मुंह गिराकर सभी देवता उस पर विराजमान हो गए। इस प्रकार सभी देवताओं द्वारा उस पर निवास करने के कारण वह वस्तु रूप विकराल पुरुष वास्तुपुरुष नाम से विख्यात हुआ। तब उस दबे हुए वस्तु रूप विकराल पुरुष ने देवताओं से निवेदन कर वरदान प्राप्त किया। ब्रह्मा आदि देवताओं ने उसे वास्तु पुरुष की संज्ञा देकर वरदान दिया। वरदान अनुसार यज्ञ मे विश्वदेव के लिए अंत मे दी गयी आहुति ही वास्तुपुरुष का आहार होगा। तथा वास्तु शांति व यज्ञोत्सव मे भी दी गई आहुति पर वास्तुपुरुष का अधिकार होगा तथा वास्तुपुरुष हर वस्तु मे विधमान रहेगा। निर्माण से जुड़े यज्ञ मे वास्तुपुरुष ही विधमान होंगे तथा तभी से जीवन में शांति के लिए वास्तु पूजा का आरंभ हुआ। इसी प्रकार भगवान शिवशंकर ने पने ही अंशावतार अंधकासुर के वध से वास्तु विज्ञान को जन्म दिया।

शिवपुराण[संपादित करें]

शिवपुराण के अनुसार मंदराचल पर्वत पर जब शिव पार्वती विहार कर रहे थे तब पार्वती ने खेल खेल में ही अपने हाथों से शिवजी के नेत्र बन्द कर लिए। ऐसा करने पर चारों ओर भयंकर अंधेरा छा गया। शिवजी के शरीर से पसीने की बूंदे नीचे गिरी और गिरते ही एक बालक प्रकट हुआ,जो बड़ा भयानक रूप का था। अंधकार में पैदा हुआ था व अंधा था अतः उसका नाम अंधक पड़ा। वही आगे चलकर अंधकासुर कहलाया।

संदर्भ[संपादित करें]

1 संक्षिप्त शिवपुराण गीताप्रेस गोरखपुर