कामड़

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कांबड़ शब्द का निर्माण डॉ सोहन दान चारण द्वारा लिखित पुस्तक राजस्थानी साहित्य का सेद्धांतिक विवेचन के पेज न 279 के अनुसार कामड शब्द कांबड़ का विकृत रूप है इसमें मूलशब्द अंब है इसके पूर्व का उपसर्ग लगा जिससे कांब बना जिसका अर्थ हरे वृक्ष की ताज़ा  छड़ी  स्त्री संज्ञा इसे पुरुष संज्ञा बनाने हेतु ड प्रत्यय लगा है इस प्रकार मूल शब्द अंब यानि माता के छडीदार हुआ  जो दूर दूर जाकर इस मत का प्रचार प्रसार करते है डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी ने तेरहताली नृत्य का वर्णन करते हुए लिखा है कि राजा इक्ष्वांकु तेरहताली देख रहा था तब शत्रु ने आक्रमण करउसे  बंदी बना लिया बादमें राजा बाहुक ने इसमें तेरहताली नाथो का हाथ मान कर दमन किया जिससे हिमालय की तराई के साथ साथ अफ़ग़ानिस्तान ईरान,मिश्र व कंबोडिया तक कांबड फेल गए ,बौद्ध धर्म के हीनयान या महायान शाखा से जुड़कर तंत्र मंत्र में पड़ने से इन्हें कामणिया भी कहा जाने लगा 
त्रेतायुग में कुंभोदर सिद्ध  के कहने से लालू व जसराज नामक छडीदार ने भगवान श्री रामचन्द्र को हिंगलाज पुरसा कर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त किया राजा रामचन्द्र जी ने अपना पीताम्बर ,कुंडल ,स्वर्ण आभूषण दान में दिए जिससे दोनों भाइयों में आपस में बंटवारे पर विवाद हो गया तब दोनों भाई महादेव जी की धूनी पर गए महादेव जी ने इनको परंपरा से नाथ साधुवो में हिंगलाज पूजा ज्योति विधान हेतु ,व अलख शिव जी का पाट पूर कर जम्मा जागरण के कार्य हेतु स्थापित कर दिया आज भी हजारों साल पूर्व के पट्टे नाथ संप्रदाय में मान्यता के हारण के आयस जी,गेहल्पुर के आयस जी,लादवास, डिसा, उज्जैन ,इंदौर आदि के कांब डिया लोगो के पास उपलब्ध है पर अब यह परंपरा व दस्तावेज लगभग लुप्त होने की स्थिति में है

लालू के वंशज कांबड़िया कहलाए व जसराज के वंशज कापड़िया कहलाए दोनों ही शिव व शाक्त उपासक नाथ समाज शंभूदल से संबंधित ही है व परंपरा से भगावा भेष,रुद्राक्ष ,व आदिनाथ सदा शिव व माता हिंगलाज के उपासक रहे है कामड़जाति की उत्पत्ति नाथ सम्प्रदाय के कपिलानि व कमरीपा सिद्ध से मानी गई है ये हिन्ग्लाज माता के पुजारी या छ्डीदार होते है। परम्प्रा से हिन्ग्लाज माता की पूजा के लिये तेरह्ताली नृत्या किया करते है। शिव के तान्ड्व व पार्वती के ताल से ताल शब्द बना है। अतः यह शिव शक्ती की उपासना के लिये निर्त्य व पूजा पद्दती है। राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात में कामड् पाये जाते हैं। कामड़ राजस्थान में बाबा राम देव के पुजारी व उपासक के रूप में भी जाने जाते है व इनको बाबा रामदेव के कांबडिया भी कहा जाता है प्राचीन काल में फिल्म ,मीडिया,अख़बार आदि प्रचार प्रसार का साधन नहीं था तब ये कांबड़ीया लोग ही दूर दूर तक जा कर तंदूरा व मंजीरा के द्वारा बाबा रामदेव जी की लीलाओं का प्रचार व प्रसार किया करते थे इसलिए लोग इन्हें आदर भाव से जम्मा व जागरण के लिए अपने घर बुला कर भेट दक्षिणा प्रदान करते थे रामदेव जी का ब्यावला,शिव जी का ब्यावला ,रानी रूपादे की बेल, मेघडी पुराण,सूरा देवड़ा राजा की कथा,व आमारस बड़े चाव से सुनते थे डॉ Dominique sila Khan ने लिखा है कि ने लिखा है कि राजस्थान में बाबा रामदेव ने अन्य संतों की तरह अपना अलग पंत नहीं बनाया जैसे जांभोजी ने विश्नोई संप्रदाय ,व कबीर ने कबीर संप्रदाय, दादू दयाल ने दादू संप्रदाय, नानक ने सिख संप्रदाय बनाया वैसे बाबा रामदेव जी ने अपना अलग संप्रदाय नहीं बनाया वह प्राचीन काल से चले आ रहे कामड़ संप्रदाय को ही मान्यता दी क्योंकि इनके दादा रणसीजी भी परंपरा से हिंगलाज माता व कामड़ संप्रदाय को ही मान्यता प्रदान करते थे व समस ऋषि के शिष्य भी थे कामड़ संप्रदाय में शमशानी धूनी को प्राचीन काल से मान्यता है,अन्य हरचंदानी,मालानी,व रामदेवाणी है इसी लिए बाबा रामदेव जी को भी कामडिया पंथ का संस्थापक माना जाता है इसमें उच्च नीच व भेद भाव की भावना से मुक्त होकर अनेक स्वर्ण जाति के लोग कुंडा पंथ के द्वारा अलख धनी व माई हिंगलाज की उपासना करते है ये हिंगलाज माता के गण माने जाते हैं यह भंगवा वस्त्र धारण करते हैं तथा कर्मकांड करते हैं लोगों को उपदेश देकर सत्य मार्ग बताते हैं, अलखनामी साद , अलखनामी साद अलखजी के मंदिर राजस्थान में कई स्थानों पर बने हुए हे ,सामान्यतया अलखजी के मंदिर में एक चरण की पूजा प्राचीन काल से की जा रही हे ,सबसे अधिक मान्यता प्राप्त अलख जी का मंदिर गाँव जुंजाला जिला नागौर में हे उसके बाद जैतगढ़,कड़ेल ,मझेवला,जिला अजमेर में हे अन्य कई स्थानों पर यथा अलख जी का खेड़ा जिला चित्तोरगढ़ , गांव घट्टा जिला भीलवाड़ा ,साखोंन जिला जयपुर व् कई अन्य स्थानों पर बने हुए हे इनमें से अधिकांश अलख जी के पुजारी कामड़ साद होते हे जिन्हे अलखनामी साद भी कहते हे समस तबरेज़ पीर सन ११४८ से १२८५ के मध्य अपने जीवन काल में मुल्तान से कश्मीर पंजाब होते हुए राजस्थान आये ,इसके पीछे रोचक कहानी यह भी मानी जाती हे कि बग़दाद के बादशाह के मृत बेटे को समझ पीर ने अपने हुकम से ज़िंदा कर दिया तब अन्य मौलवियों ने बादशाह से शिकायत की कि समझ पीर ने शरीयत क़ानून का उल्लंघन किया हे व् खुदा की तोहींन कर खुद के आदेश से बालक को जीवित किया हे यह कोई जादूगर हे जो अपने चमत्कार से लोगो को वशीभूत कर लेगा ,लोगो का खुदा पर से विश्वास ख़त्म जाएगा ,इसको शरीयत के अनुसार जीवित ही खाल निकाल देना चाहिए तब बादशाह के आदेशानुसार उसकी खाल निकाल दी गयी व् बहुत प्रताड़ित किया तब वह मुल्तान शहर में घरो के बाहर जाता लोग उसे देखकर अपने दरवाजे बंद कर लेते इस प्रकार वह कई दिनों तक भूखा प्यासा रहा एक दिन कसाई ने उसे मांस का टुकड़ा दिया तब समस पीर ने सूर्य से प्रार्थना की कि सूर्य अरबी में सूर्य को समस कहा जाता हे समस का समस से काम पड़ा हे इस मांस के टुकड़े को सेक दे ताकि में भूख मिटा सकू तब कहते हे सूर्य की प्रचंड गर्मी से पूरा शहर घबरा गया ,बादशाह को भी अपनी गलती का अहसास हुवा तब क्षमा प्रार्थना की गयी समस पीर के क्षमा करने पर तापक्रम कम हुवा तब बादशाह का लड़का भी उसके साथ हो लिया दिल्ली पर आक्रमण होने से राजा रणसींघ जी अपने आठ पुत्रो के साथ नरेणा जिला जयपुर के क्षेत्र में जंगलो में रहते थे इन्होने समस पीर को व्यापारी समझ कर लूट लिया तब समस पीर ने राजा रणसिंघ को श्राप दिया जिससे उनको चर्म हो गया उस समय काल में रिख खीवण जी भक्ति भाव करते व् संत वृति से रहते जो की समस ऋषि के शिष्य भी थे ,एक दिन खीवण जी की घर वाली पानी लेने कुवे पर गयी वहां रणसींघ जी पानी पीने के लिए आये पानी पीने व् कुछ छींटे लगने से उनके चर्म रोग में फायदा हुवा तब वो पनिहारी के साथ खिंवण जी के घर गए व् अपनी व्यथा कही तब रात को गुरु समस की कुटिया पर खीवणजी रणसिंघ जी को ले गए समस पीर दूध पीकर कटोरा खीवण जी को दिया खीवण जी ने कटोरा रणसिंघ जी को दे दिया जिसे पीने से उनका चर्म रोग दूर हो गया लेकिन ज्योही समस पीर को पता लगा वो नाराज हो कर वहा से चल दिए उधर रनसिंघजी व् खीवण जी रोजाना जम्मा जागरण करते इसकी खबर दिल्ली बादशाह को मिली तब दोनों को दिल्ली बुलाया गया उन दोनों संतो ने कहा हमारा बादशाह से कोई काम नहीं बादशाह को काम हो तो खुद आ कर मिल ले तब बादशाह के मंत्रियो ने कहा कि उन दोनों को जागरण का निमंत्रण दे कर बुलावोगे तो आ जाएंगे ,दोनों को दिल्ली बुलाया गया वहा बादशाह की जेल में 1440 साधू पहले से बंद थे जो चक्की पिसते थे ,बादशाह ने उनको दिल्ली बुलाकर करवत से कटवा दिया कहते हे उनकी देह से फूल व् दूध निकला जिससे बादशाह घबरा गया जिसकी लाल किले में दूध पीर फूल पीर के नाम से दरगाह बताते हे उनका लाश का आधा आधा हिस्सा नरेना व् बिचून में दफ़न किया गया ,जहा बादशाह के द्वारा निकाली गयी जमीन दरगाह मेला छड़ी आदि आज भी मौजूद हे बाद में जयपुर महाराजा ने भी उस पट्टे का नया पट्टा बना कर प्रमाणित किया उधर मुल्तान में समस पीर ने समाधि ले ली यह खबर ले कर शंकर नामक चेला मुल्तान से वापस बिचून आया जिनकी वंश परम्परा आज भी कायम हे मेघवंश इतिहास पुस्तक में महात्मा श्री गोकुल दास जी ने दोनों पट्टे का फोटो दिया हे व् अन्य 13 पिराणा व् 12 पीर स्थानों का वर्णन किया हे जिन पर शोध कर आगे के पेज में जानकारी दी जाएगी जम्मा जागरण करना ही पहले देने संतो की पहचान थी, जन साधारण के घर बहुत कम खर्च में एक रात का जागरण पूर्व निर्धारित हो या न हो ,वर्ष में एक बार अपने घर मे बाबा का जम्मा या हिंगलाज माई की जोत जगाना यजमान या गृहस्थी अपना धर्म व परम कृतव्य समझता था इससे आम आदमी लाभान्वित होकर अपने कस्टो से मुक्ति ,जीवन का कल्याण ,सद्गुरु व ईस्ट परमात्मा का आशिर्वाद प्राप्त कर अपने आप को धन्य समझता था ,परिवार में खुसहाली ,समाज मे मान सम्मान होता था ,संयुक्त परिवार में बड़े बुजर्गो का मान सम्मान होता था ,सभी को दीर्घायु व स्वस्थ होने का आशिर्वाद व लाभ मिलता था ,लेकिन समय परिवर्तन के साथ प्राचीन भारतीय सभ्यता व संस्कृति में आमूल चूल परिवर्तन हुए ,परंपरागत कामड़ संतो की जगह आम आदमी साधु बनने में अपना भला समझने लगा लेकिन जो मर्यादा साध समाज की परंपरागत कामड़ संत निभा रहे थे वे सब खत्म हो गयी ,साधु के वेश में कई असाधु पैदा हो गए जिन्होंने जोगी के जीवन की युक्तियां तो नही सीखी स्वयंभू भगवान बन गए व जेल जाने से जन मानस में साधुवो के प्रति नफरत व घृणा का वातावरण पैदा हो गया ,इसके विपरीत ब्यावर निवासी कामड़ संत पंडित रामलाल जी की बनाई हुई आरोधी ,सायले, व ऋषि दयानंद से शास्त्रार्थ ,धेन दास जी कामड़ नीमेड़ा जिला जयपुर राजा सवाई जयसिंह जी जयपुर को पर्चा ,व स्वयं के पुत्र को जीवित करने की कथा ,लालू जसराज कापड़ी कामड़ द्वारा श्री रामचंद्र जी को हिंगलाज पुरसाना ,13वी शताब्दी में सांकरडा के कामड़ संतों को उदयपुर महाराजा द्वारा भूमि भेट,अलख जी का अडाना विक्रम संवत 1881 में उदयपुर महाराजा को पर्चा ,चंदेरिया चित्तोड़ में मोकल राणा को पुत्र रत्न का आशिर्वाद व कुम्भा राणा का जन्म ताम्रपत्र व जमीन भेट ,सगरेव, सर्वडिया की खेड़ी,केलवा ,पालना,उदाराम जी रेबारी का कामड़ भेख लेना,प्लासनी,सिरोंजप्लासनी,सिरोंज गेहलपुर नाथो के मठो की प्राचीन पट्टे, जुंजाला रामदेवरा, जोधपुर स्वामी बीजल दास जी का आश्रम व अनेक स्थानों के ज्ञात अज्ञात कामड़ संतो के ऐतिहासिक प्रमाण समाज के गौरव व मान सम्मान के लिए पर्याप्त है इन संतों ने सदैव इस संत समाज का मान सम्मान बढ़ाया, गायन कला में भी श्री चिमन दास जी,चंगोई,बीजल दास जी,जोधपुर ,बडली नि राजदास जी ,चंद्रदास जी बड़गांव ,व रलावता,गिरधारी दास जी सिकलिया ,मिद्यान ,सज्जन दास जी बाबरा व अनेक संगीत सम्राट कामड़ संत समाज मे हुए कामड़ समाज की मुख्य पहचान तंदुरा से हे ,यह तंदुरा आदिनाथ शिवजी,गोरखनाथजी से सरस्वतीजी,नारदजी ,तंदुरू ऋषि ,नामदेव ,कबीर,अखजी,लिख्माजी माली,शोभा सोनी ,भाटी हरजी ,रणसी जी,राजा मालदेवजी,बाबा रामदेव ,राजा माधोसिंह,जयपुर,राणा मोकल,राणा कुम्भा ,चिमन दास कामड़ व् कई अनन्त कामड़ संतो ने तंदुरा बजा कर अपने समय को सकूंन से बिताया व् इनके बनाये भक्ति भजन आज भी जन मानस को आध्यात्मिक भावना से विभोर कर देते हैें उसी परंपरा को राजस्थान में कामड़ जाति ने जीवित रसखा है वर्तमान में परंपरागत तांदूरा वादक बहुत कम होकर लुप्त परंपरा ही रह गई है जिसके संरक्षण की महती आवश्यकता है कामड़ जाति पर लिखित शोधग्रंथ,पुस्तक आदि के लेखक निम्नानुसार है श्री गणेशदास भावानीदास नि उग्रास जिला जयपुर,श्री गोकुल दास जी नि डूमाडा ,श्री प्रताप दास जी नि लस्सानी दोयम,श्री मूल दास जी नि बर व ओम प्रकाश कामड नि केकड़ी(कामड़ जाति का इतिहास )जिला पाली,श्री बंशी दास जी नि सावता जिला चित्तौड़ ,श्री तोलूदास जी,श्री पूर्णानंद जी जोधपुर,श्री रामचन्द्र गुसाईं रामदेवरा ,श्री चंपा दासजी नी फतहनगर जिला उदयपुर ने पीएचडी भी कामड संत समुदाय में कर दो बड़े शोध ग्रंथ लिखे है अंग्रेज़ लेखक rv Russel,Dr Dominique silakhan ,karnal Tod भारतीय लेखक

,Dr as gehlot,Dr D B khirsagar,Dr शकुन्तला बाफना, डॉ महेंद्र भानावत, डॉ चंपादास आदि ने ऐतिहासिक लेख व पुस्तके लिखी है