विदेशिया

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विदेशिया बिहार का परिद्ध लोक नृत्य है।

यह भिखारी ठाकुर का प्रसिद्ध कीर्ति है.इस पर फिल्म भी बना है.

@M K Pandey : अच्छा व्याख्यान ! आपका यह व्याख्यान बहुत उपयोगी है; हमारे जैसे और वैसे तमाम लोगों के लिए जो भिखारी ठाकुर के प्रति जिज्ञासु हैं तथा उन लोगों के लिए भी जो भिखारी ठाकुर और उनकी नाट्य शैली को 'जानने' का दावा करते हैं। भिखारी ठाकुर के नाटकों की अगर कोई विशिष्ट शैली है, तो वह लोक-नाट्य 'नाच' ही है। 'बिदेसिया' नाटक भी 'नाच' शैली में लिखा, भिखारी ठाकुर का आधुनिक लोक-नाटक ही है। तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में; संस्कृत रंगमंच के अवसान के बाद, उत्तर-बिहार, विशेषकर मिथिलांचल में एक नयी अर्द्ध-शास्त्रीय नाट्य शैली का उदय हुआ, जिसे कीर्तनिया नाच कहा गया। यह तत्कालीन वैष्णव-भक्ति आन्दोलन का अन्तरंग हिस्सा था। उस दौर में उमापति उपाध्याय, ज्योतीरेश्वर ठाकुर, विद्यापति ने कई कीर्तनिया नाटक लिखे - रुक्मिणी हरण, पारिजात हरण, गोरक्ष विजय, धूर्त समागम इत्यादि। कीर्तनिया के प्रारूप पर ही असम के शंकर देव ने 'अंकिया भाओना' का आविष्कार किया, जो दरअसल 'कीर्तनिया' से अत्यधिक प्रभावित और प्रेरित था। बंगाल में विकसित जात्रा भी कीर्तनिया से प्रभावित लोकनाट्य है, यह मानने के भी पर्याप्त कारण हैं। कीर्तनिया नाट (नाट्य) या नाच के सम्वाद संस्कृत में और गीत मैथिली में लिखे जाते थे। उत्तम पात्र, जहाँ संस्कृत सम्वाद उच्चारित करते, वहीं अधम और स्त्री पात्र प्राकृत/मैथिली में सम्वाद बोलते थे। मोटे तौर पर यह अर्द्ध-शास्त्रीय शैली संस्कृत रंगमंच के व्याकरण का अनुकरण करती थी। कीर्तनिया के साथ ही, एक लोक-नाट्यधारा का विकास हुआ -- बिदापत-नाच। 'बिदापत-नाच' में सम्वाद और गीत दोनों ही मैथिली में होते थे। यह उत्तर भारत में लोक-नाटक 'नाच' की शुरूआत थी या यों कहें - बिदापत-नाच, कीर्तनिया की शास्त्रीयता से मुक्त, एक लोक-नाट्य परम्परा का श्रीगणेश था। उत्तर बिहार में कालांतर में, जितने लोक नाटक हुए, वे इसी नाच-परम्परा (नाट्य-परम्परा) से विकसित हुए और वैष्णव-संकीर्तन से प्रभावित होकर 'नाच' ही कहलाए। वह दौर (तेरहवीं-चौदहवीं सदी) सांगीतक का दौर था और बिहार, असम, बंगाल, मध्य-देश सहित, सुदूर कर्णाटक में प्राक-संस्कृत सांगीतक की रचना हो रही थी। 'नाचा' भी उसी दौर में विकसित हुआ। कालान्तर में; उत्तर बिहार में 'कीर्तनिया' के बाद, 'बिदापत' की परम्परा विकसित हुई, जिसको 'नाच' कहा गया। इस प्रकार भिखारी ठाकुर; ज्योतिरेश्वर ठाकुर, उमा पति उपाध्याय, रमापति उपाध्याय की परम्परा के रचनाकार थे। भिखारी ठाकुर ने 'नाच' की इसी शैली का आधुनिक संस्कार किया (जिस तरह हबीब तनवीर ने 'नाचा' और शांति गोपाल ने 'जात्रा' का समकालीन विकास किया)। भिखारी ठाकुर ने अपनी अप्रतिम प्रतिभा से इस लोक-नाट्य परम्परा को समकालीन-कथ्य से जोड़ा। 'बिदेसिया' कोई शैली नहीं है। भिखारी ठाकुर के नाटकों की अगर कोई विशिष्ट शैली है, तो वह लोक-नाट्य 'नाच' ही है। 'बिदेसिया' नाटक भी 'नाच' शैली में लिखा, भिखारी ठाकुर का आधुनिक लोक-नाटक ही है। न सिर्फ़ 'बिदेसिया' में पुरुष, स्त्री पात्र की भूमिका करते थे; बल्कि भारतीय लोक रंगमंच में प्रायः सभी लोक नाट्य प्रस्तुतियों में पुरुष, स्त्री की भूमिका अभिनीत करते रहे हैं। बिहार-पूर्वी उत्तर प्रदेश के 'सेक्स परवर्टेड' सामन्ती समाज द्वारा पुरुष-नर्तकों को 'गे' (पूर्वांचल में लौंडा) समझा गया और उस बीमार मानसिकता के प्रभाव में इस नाट्य रूप को 'लौंडा-नाच' का नाम दिया गया।

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