कालबेलिया

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कालबेलिया

कालबेलिया समाज के संस्थापक जालंधर नाथ के शिष्य मढी पति श्री कानिफनाथ (प्रबुद्ध नारायण)  है !

कालबेलिया दो शब्दों से मिलकर बना है ! काल+बेलिया काल अर्थात स्वयं महाकाल एवं बेलिया अर्थात उनका बैल !

कालबेलिया जोगी नाथ संप्रदाय के अंतर्गत आता है !

कालबेलिया एक हिंदू धार्मिक समाज है !


कालबेलिया समाज के लोग विषैले सांपों से भी नहीं डरते हैं !

उन्हें बीन बजा कर अपने हाथों में पकड़ देते हैं ! और लोगों की साँपों से रक्षा करते हैं !

कालबेलिया एक निडर जाती है इसके अंतर्गत  पंवार बामणिया चौहान सोलंकी सिंघानिया देराण राठौड़ देवड़ा भाटी दैय्या जोया .. आदि प्रमुख गोत्र आते हैं !

यह समाज अपना आराध्य भगवान भोलेनाथ को मानता है  !

इस समाज के लोग व्यक्ति को मरने के बाद समाधि दे देते हैं ! जिसे समाज में मिट्टी के हवाले कहा जाता है !

और उस पर मंदिर बना कर शिवलिंग एवं बैल चढ़ा देते हैं ! फिर उन पूर्वजों की पूजा की जाती है !

पौराणिक काल में कालबेलिया जोगी पूरे संसार का भ्रमण करते थे ! ( इसीलिए कहा जाता है बहता पानी रमता जोगी अच्छा लगता है )

माना जाता है कि इस वंश ने कभी किसी की गुलामी नहीं सहि !

इस वंश के लोग विषैले सांप बिच्छुओं का "झाड़ा" देकर मंत्रोपचार किया करते थे !

इस समाज के रीति रिवाज अद्भुत है !

कालबेलिया नृत्य समाज की शान है !

कालबेलिया नृत्य की प्रस्तुति देते हुए महिलाएं

कालबेलिया नृत्य राजस्थान का एक भावमय लोक नृत्य है। [1] यह जनजाति खास तौर पर इसी नृत्य के लिए जानी जाती है और यह उनकी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। आनंद और उत्सव के सभी अवसरों पर इस जनजाति के सभी स्त्री और पुरुष इसे प्रस्तुत करते हैं।

यह नृत्य नायक नायिका के प्रेम कथा पर आधारित है !

कालबेलिया वंश[संपादित करें]

प्राचीन युग में यह जनजाति एक-जगह से दूसरी जगह घुमंतू जीवन व्यतीत करती थी। इनका पारंपरिक व्यवसाय साँप पकड़ना, साँप के विष का व्यापार और सर्प दंश का उपचार करना है। इसी कारण इस लोक नृत्य का स्वरूप और इसको प्रस्तुत करने वाले कलाकारों के परिधान में साँपों से जुड़ी चीज़ें झलकती हैं।

इन्हें सपेरा, सपेला जोगी या जागी भी कहा जाता है। यह अपनी उत्पत्ति को गुरु गोरखनाथ के १२वीं सदी के शिष्य कंलिप्र से जोड़ कर मानते हैं।

कालबेलिया जाति की सर्वाधिक आबादी राजस्थान के पाली जिले में है और इसके बाद क्रमशः अजमेर, चितौड़गढ़ और उदयपुर जैसलमेर बाड़मेर जोधपुर बीकानेर का स्थान आता है। ये एक खानाबदोश जीवन बिताते हैं और उन्हे अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है। [2][3]

परंपरागत रूप से कालबेलिया पुरुष बेंत से बनी टोकरी में साँप (विशेष रूप से नाग) को बंद कर घर-घर घूमते थे और उनकी महिलाएँ नाच-गा कर भीख मांगती थी। यह नाग साँप का बहुत आदर करते हैं और उसकी हत्या को निषिद्ध मानते और बताते हैं। गांवों में अगर किसी घर में नाग/साँप निकलता है तो कालबेलिया को बुलाया जाता है और वे बिना उसे मारे पकड़ कर ले जाते है।

आम तौर पर कालबेलिया समाज से कटे-कटे रहतें हैं और इनके अस्थाई आवास, जिन्हें डेरा कहा जाता है, अक्सर गावों के बाहरी हिस्सों में बसे होते हैं। कालबेलिया अपने डेरा को एक वृताकर पथ पर बने गावों में बारी-बारी से लगाते रहतें हैं। पीढ़ियों से चले आ रहे इस क्रम के कारण इन्हे स्थानीय वनस्पति और जीव-जंतुओं की ख़ासी जानकारी हो जाती है। इसी ज्ञान के आधार पर वे कई तरह की व्याधियों के आयुर्वेदिक उपचार के भी जानकार हो जातें हैं, जो उनकी आमदनी का एक और वैकल्पिक ज़रिया हो जाता है।

१९७२ के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के पारित होने के बाद से कालबेलिया साँप पकड़ने के अपने परंपरागत पेशे से वंचित हो गये हैं। वर्तमान में कला प्रदर्शन उनकी आमदनी का प्रमुख साधन हो गया है और उन्हे इसके लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिल रही है। फिर भी इसके प्रदर्शन के अवसर अत्यंत सीमित हैं और समुदाय के सभी सदस्य इसमे शामिल नहीं हो सकते, अतः इनकी आबादी का एक बड़ा भाग खेतों में काम करके और पशुपालन द्वारा आजीविका कमाता है। [4]

कालबेलिया नृत्य[संपादित करें]

कालबेलिया नृत्य

किसी भी आनंदप्रद अवसर पर किया जाने वाला कालबेलिया नृत्य इस जनजाति की संस्कृति का अभिन्न अंग है। यह नृत्य और इस से जुड़े गीत इनकी जनजाति के लिए अत्यंत गौरव की विषय हैं। यह नृत्य संपेरो की एक प्रजाति द्वारा बदलते हुए सामाजिक-आर्थिक परस्थितियों के प्रति रचनात्मक अनुकूलन का एक शानदार उदाहरण है। यह राजस्थान के ग्रामीण परिवेश में इस जनजाति के स्थान की भी व्याख्या करता है। प्रमुख नर्तक आम तौर पर महिलाएँ होती हैं जो काले घाघरे पहन कर साँप के गतिविधियों की नकल करते हुए नाचती और चक्कर मारती है। शरीर के उपरी भाग में पहने जाने वाला वस्त्र अंगरखा कहलाता है, सिर को ऊपर से ओढनी द्वारा ढँका जाता है और निचले भाग में एक लहंगा पहना जाता है।

यह सभी वस्त्र काले और लाल रंग के संयोजन से बने होते हैं और इन पर इस तरह की कशीदाकारी होती है कि जब नर्तक नृत्य की प्रस्तुति करते हैं तो यह दर्शकों के आँखो के साथ-साथ पूरे परिवेश को एक शांतिदायक अनुभव प्रदान करते हैं।

पुरुष सदस्य इस प्रदर्शन के संगीत पक्ष की ज़िम्मेदारी उठाते हैं। वे नर्तकों के नृत्य प्रदर्शन में सहायता के लिए कई तरह के वाद्य यंत्र जैसे कि पुँगी (फूँक कर बजाया जाने वाला काठ से बना वाद्य यंत्र जिसे परंपरागत रूप से साँप को पकड़ने के लिए बजाया जाता है), डफली, खंजरी, मोरचंग, खुरालिओ और ढोलक आदि की सहायता से धुन तैयार करते हैं। नर्तकों के शरीर पर परंपरागत गोदना बना होता है और वे चाँदी के गहने तथा छोटे-छोटे शीशों और चाँदी के धागों की मीनकारी वाले परिधान पहनती हैं। प्रदर्शन जैसे-जैसे आगे बढ़ता है धुन तेज होती जाती है और साथ ही नर्तकों के नृत्य की थाप भी.[5]

कालबेलिया नृत्य के गीत आम तौर पर लोककथा और पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं और होली के अवसर पर विशेष नृत्य किया जाता है। कालबेलिया जनजाति प्रदर्शन के दौरान ही स्वतः स्फूर्त रूप से गीतों की रचना और अपने नृत्यों में इन गीतों के अनुसार बदलाव करने के लिए ख्यात हैं। ये गीत और नृत्य मौखिक प्रथा के अनुसार पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते हैं और इनका ना तो कोई लिखित विधान है ना कोई प्रशिक्षण नियमावली। २०१० में यूनेस्को द्वारा कालबेलिया नृत्य को अमूर्त विरासत सूची में शामिल करने की घोषणा की गयी।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "कालबेलिया फोक डांसेज ऑफ़ राजस्थान". मूल से 8 मई 2012 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 सितंबर 2016.
  2. कुमार सुरेश सिंह; बी. के . लवानिया; डी. के. समानता; एस. के. मंडल; न. न. व्यास; अन्थ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया. "सुथार". पीपल ऑफ़ इंडिया Vol. XXXVIII. पॉपुलर प्रकाशन. पृ॰ 1012.
  3. मिरियम रोबेर्टसन (१९९८). स्नेक चार्मर्स: डी जोगी नाथ कालबेलियास ऑफ़ राजस्तान. इलस्ट्रेटेड बुक पब्लिशर्स. पृ॰ 323. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ ८१-८५६८३-२९-८ |isbn= के मान की जाँच करें: invalid character (मदद).
  4. नॉमिनेशन फाइल नो. ००३४० फॉर इंस्क्रिप्शन न डी रिप्रेजेन्टेटिव लिस्ट ऑफ़ डी इनटंगईबले कल्चरल हेरिटेज इन २०१०. युनेस्को २०१०
  5. "संग्रहीत प्रति". मूल से 4 अक्तूबर 2015 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 1 सितंबर 2016.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]