कश्मीरी भाषा

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कश्मीरी भाषा भारत और पाकिस्तान की एक प्रमुख भाषा है। क्षेत्रविस्तार 10,000 वर्ग मील; कश्मीर की वितस्ता घाटी के अतिरिक्त उत्तर में ज़ोजीला और बर्ज़ल तक तथा दक्षिण में बानहाल से परे किश्तवाड़ (जम्मू प्रांत) की छोटी उपत्यका तक। कश्मीरी, जम्मू प्रांत के बानहाल, रामबन तथा भद्रवाह में भी बोली जाती है। कुल मिलाकर बोलनेवालों की संख्या 15 लाख से कुछ ऊपर है। प्रधान उपभाषा किश्तवाड़ की "कश्तवाडी" है।

नामकरण[संपादित करें]

कश्मीरी का स्थानीय नाम का शुर है; पर 17वीं शती तक इसके लिए "भाषा" या "देशभाषा" नाम ही प्रचलित रहा। संभवत: अन्य प्रदेशों में इसे कश्मीरी भाषा के नाम से ही सूचित किया जाता रहा। ऐतिहासिक दृष्टि से इस नाम का सबसे पहला निर्देश अमीर खुसरो (13वीं शती) की नुह-सिपिह्न (सि. 3) में सिंधी, लाहौरी, तिलंगी और माबरी आदि के साथ चलता हे। स्पष्टत: यह दिशा वही है जो पंजाबी, सिंधी, गुजराती, मराठी, बँगला, [[हिंदी और उर्दू आदि भारतार्य भाषाओं की रही है।

उद्भव[संपादित करें]

ग्रियर्सन ने जिन तर्कों के आधार पर कश्मीरी के "दारद" होने की परिकल्पना की थी, उन्हें फिर से परखना आवश्यक है; क्योंकि इससे भी कश्मीरी भाषा की गई गुत्थियाँ सुलझ नहीं पातीं। घोष महाप्राण के अभाव में जो दारद प्रभाव देखा गया है वह तो सिंधी, पश्तू, पंजाबी, डोगरी के अतिरिक्त पूर्वी बँगला और राजस्थानी में भी दिखाई पड़ता है; पर क्रियापदों के संश्लेषण में कर्ता के अतिरिक्त कर्म के पुरुष, लिंग और वचन का जो स्पर्श पाया जाता है उसपर दारद भाषाएँ कोई प्रकाश नहीं डालतीं। संभवत: कश्मीरी भाषा "दारद" से प्रभावित तो है, पर उद्भूत नहीं।

लिपि[संपादित करें]

15वीं शती तक कश्मीरी भाषा केवल शारदा लिपि में लिखी जाती थी। बाद में फारसी लिपि का प्रचलन बढ़ता गया और अब इसी का एक अनुकूलित रूप स्थिर हो चुका है। सिरामपुर से बाइबल का सर्वप्रथम कश्मीरी अनुवाद शारदा ही में छपा था, दूसरा फारसी लिपि में और कुछ संस्करण roमन में भी निकले। देवनागरी को अपनाने के प्रयोग भी होते रहे हैं और आजकल यह देवनागरी में भी लिखी जा रही है।

ध्वनिमाला[संपादित करें]

कश्मीरी ध्वनिमाला में कुल 46 ध्वनिम (फ़ोनीम) हैं।

स्वर : अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ, अ", आ", उ", ऊ", ए", ओ";

मात्रा स्वर : इ, -उ्, -ऊ्

अनुस्वार : अं

अंत:स्थ स्वर : य, व

व्यंजन :

क, ख, ग, ङ, च, छ, ज; च, छ़, ज़, ञ;

ट, ठ, ड, त, थ, द, न; प, फ, ब, म;

य, र, ल, व, श, स, ह

इ, ई, उ, ऊ और ए के रूप पदारंभ में यि, यी, -वु, वू और ये" हो जाते हैं। च, छ और ज़ दंततालव्य हैं और छ़ ज़ का महाप्राण हैं। पदांत अ बोला नहीं जाता।

कारक[संपादित करें]

कश्मीरी कारकों में संश्लेषणात्मकता के अवशेष आज भी दिखाई पड़ते हैं; जैसे-

सु ज़ोग्न Ð।सो जनो Ð।स जनो; तिम ज़"न्य Ð।तें जने (ते जना:); त"म्य ज़"न्य Ð।तें3 जनें3 (तेन जनेन); तिमव, जन्यव Ð।तैं जनै: (तै: जनै:); कर्म, संप्रदान, अपादान और अधिकरण में प्राय: संबंध के मूल रूप में ही परसर्ग जोड़कर काम निकाला जाता है; यद्यपि नपुं. के अधिकरण (एफ.) में प्राचीन रूपों की झलक भी मिलती है। संबंध का मूल रूप यों है-तस ज़"निस Ð।तस्स जनस्स Ð तस्य जनस्य; तिमन ज़न्यन Ð। तेंणाँ जनेणां (तेषां जनानाम्)।

नपुं. में-तथ गरस Ð।तद् घरस्स; रु" Ð।तम्हादो घरदो; तमि गरुक Ð।घरको (गृहक:); तमि गरि Ð।घरे (गृहे)।

क्रियापद[संपादित करें]

कश्मीरी क्रियापदों में भारतीय अर्थविशेषताओं के ऊपर बहुत ही विलक्षण प्रभाव पड़ता गया है, जिनसे कुछ विद्वानों को उनके अभारतीय होने का भ्रम भी हुआ है। लिंग, वचन, पुरुष और काल के अनुसार एक-एक धातु के सैंकड़ों रूप बनते हैं; जैसे-

कुछ Ð वीक्षस्व;

वुछान छु Ð वीक्ष (म) मण : अस्ति (वह देखता/देख रहा है);

वुछान छुम (वह मुझे देखता/देख रहा है);

वुछान छम (वह मुझे देखती/देख रही है।)

-छुहम (तू मुझे . . . है);

-छसथ (मैं तुम्हें. . . हूँ);

-छुसन (में उसे . . .हूँ);

वुछन (मैं उसे देखूँगा); वुछथ (मैं तुझे देखूँगा);

वुछुथ (तुमने देखा);

वुछथस (तुमने मुझे देखा)। तुमने उसके लिए देखा);

वुछथन (तुमने उसे देखा);

वुछिथ (तुमने उन्हें देखा);

वुछु"थ (तुमने उस (स्त्री) को देखा);

वुछ्यथ (तुमने उन (स्त्रियों) को देखा);

वुछुथम (तुमने मेरा/मेरे लिए देखा);

वुछ्यथम (तुमने मेरी/मेरे लिए देखीं), आदि-आदि।

क्रियापदों की यह विलक्षण प्रवृत्ति संभवत: मध्य एशियाई प्रभाव है जो खुरासान से होकर कश्मीर पहुँचा है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]