सिन्धी भाषा

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भाषा कूट
ISO 639-1 None
ISO 639-2
ISO 639-3

सिंधी भारत के पश्चिमी हिस्से और मुख्य रुप से गुजरात और पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में बोली जाने वाली एक प्रमुख भाषा है। इसका संबंध भाषाई परिवार के स्तर पर आर्य भाषा परिवार से है जिसमें संस्कृत समेत हिन्दी, पंजाबी और गुजराती भाषाएँ शामिल हैं। अनेक मान्य विद्वानों के मतानुसार, आधुनिक भारतीय भाषाओं में, सिन्धी, बोली के रूप में संस्क्रित के सर्वाधिक निकट है।

सिंधी भाषा सिंध प्रदेश की आधुनिक भारतीय-आर्य भाषा जिसका संबंध पैशाची नाम की प्राकृत और व्राचड नाम की अपभ्रंश से जोड़ा जाता है। इन दोनों नामों से विदित होता है कि सिंधी के मूल में अनार्य तत्व पहले से विद्यमान थे, भले ही वे आर्य प्रभावों के कारण गौण हो गए हों। सिंधी के पश्चिम में बलोची, उत्तर में लहँदी, पूर्व में मारवाड़ी, और दक्षिण में गुजराती का क्षेत्र है। यह बात उल्लेखनीय है कि इस्लामी शासनकाल में सिंध और मुलतान (लहँदीभाषी) एक प्रांत रहा है, और 1843 से 1936 ई. तक सिंध बंबई प्रांत का एक भाग होने के नाते गुजराती के विशेष संपर्क में रहा है।

सिंधी भाषा नस्तालिक यानि अरबी लिपी में लिखी जाती है। यानि दायें से बायें लिखी जाती है। जबकि भारत में इसके लिये देवनागरी और नस्तालिक दोनो प्रयोग किये जाते हैं।

सिन्धी का भूगोल एवं उपभाषाएँ[संपादित करें]

पुणे में चेटी चंड के मेले का बैनर

सिंध के तीन भौगोलिक भाग माने जाते हैं-

1. सिरो (शिरो भाग),

2. विचोली (बीच का) और

3. लाड़ (संस्कृत : लाट प्रदेश = नीचे का)।

सिरो की बोली सिराइकी कहलाती है जो उत्तरी सिंध में खैरपुर, दादू, लाड़कावा और जेकबाबाद के जिलों में बोली जाती है। यहाँ बलोच और जाट जातियों की अधिकता है, इसलिए इसको बरीचिकी और जतिकी भी कहा जाता है। दक्षिण में हैदराबाद और कराची जिलों की बोली लाड़ी है और इन दोनों के बीच में विचोली का क्षेत्र है जो मीरपुर खास और उसके आसपास फैला हुआ है। विचोली सिंध की सामान्य और साहित्यिक भाषा है। सिंध के बाहर पूर्वी सीमा के आसपास थड़ेली, दक्षिणी सीमा पर कच्छी, और पश्चिमी सीमा पर लासी नाम की सम्मिश्रित बोलियाँ हैं। धड़ेली (धर = थल = मरुभूमि) जिला नवाबशाह और जोधपुर की सीमा तक व्याप्त है जिसमें मारवाड़ी और सिंधी का सम्मिश्रण है। कच्छी (कच्छ, काठियावाड़ में) गुजराती और सिंधी का एवं लासी (लासबेला, बलोचिस्तान के दक्षिण में) बलोची और सिंधी का सम्मिश्रित रूप है। इन तीनों सीमावर्ती बोलियों में प्रधान तत्व सिंधी ही का है। भारत के विभाजन के बाद इन बोलियों के क्षेत्रों में सिंधियों के बस जाने के कारण सिंधी का प्राधान्य और बढ़ गया है। सिंधी भाषा का क्षेत्र 65 हजार वर्ग मील है।

व्याकरण[संपादित करें]

सिन्धी शब्द[संपादित करें]

सिंधी के सब शब्द स्वरांत होते हैं। इसकी ध्वनियों में ग, ज, ड, और ब अतिरिक्त और विशिष्ट ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में सवर्ण ध्वनियों के साथ ही स्वर तंत्र को नीचा करके काकल को बंद कर देना होता है जिससे द्वित्व का सा प्रभाव मिलता है। ये भेदक स्वनग्राम है। संस्कृत के त वर्ग + र के साथ मूर्धन्य ध्वनि आ गई है, जैसे पुट्ट, या पुट्टु (पुत्र), मंड (मंत्र), निंड (निंद्रा), डोह (द्रोह)। संस्कृत का संयुक्त व्यंजन और प्राकृत का द्वित्व रूप सिंधी में समान हो गया है किंतु उससे पहले का ह्रस्व स्वर दीर्घ नहीं होता जैसे धातु (हिं. भात), जिभ (जिह्वा), खट (खट्वा, हिं. खाट), सुठो (सुष्ठु)। प्राय: ऐसी स्थिति में दीर्घ स्वर भी ह्रस्व हो जाता है, जैसे डिघो (दीर्घ), सिसी (शीर्ष), तिको (तीक्ष्ण)। जैसे सं. दत्त: और सुप्त: से दतो, सुतो बनते हैं, ऐसे ही सादृश्य के नियम के अनुसार कृत: से कीतो, पीत: से पीतो आदि रूप बन गए हैं यद्यपि मध्यम-त-का लोप हो चुका था। पश्चिमी भारतीय आर्य भाषाओं की तरह सिंधी में भी महाप्राणत्व को संयत करने की प्रवृत्ति है जैसे साडा (सार्ध, हिं. साढे), कानो (हिं. खाना), कुलण (हिं. खुलना), पुचा (सं. पृच्छा)।

संज्ञा[संपादित करें]

संज्ञाओं का वितरण इस प्रकार से पाया जाता है - अकारांत संज्ञाएँ सदा स्त्रीलिंग होती है, जैसे खट (खाट), तार, जिभ (जीभ), बाँह, सूँह (शोभा); ओकरांत संज्ञाएँ सहा पुल्लिंग होती हैं, जैसे घोड़ों, कुतो, महिनो (महीना), हफ्तो, दूँहों (धूम); -आ-, इ और - ई में अंत होने वाली संज्ञाएँ बहुधा स्त्रीलिंग हैं, जैसे हवा, गरोला (खोज), मखि राति, दिलि (दिल), दरी (खिड़की), (घोड़ो, बिल्ली-अपवाद रूप से सेठी (सेठ), मिसिरि (मिसर), पखी, हाथी, साँइ और संस्कृत के शब्द राजा, दाता पुल्लिंग हैं; -उ-, -ऊ में अंत होने वाले संज्ञाप्रद प्राय: पुल्लिंग हैं, जैसे किताब, धरु, मुँह, माण्ह (मनुष्य), रहाकू (रहने वाला) -अपवाद है विजु (विद्युत), खंड (खांड), आबरू, गऊ। पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के लिए-इ, -ई, -णि और -आणी प्रत्यय लगाते हैं-कुकुरि (मुर्गी), छोकरि; झिर्की (चिड़िया), बकिरी, कुत्ती; घोबिणी, शीहणि, नोकिर्वाणी, हाथ्याणी। लिंग दो ही हैं-स्त्रीलिंग और पुल्लिंग। वचन भी दो ही हैं-एकवचन और बहुवचन। स्त्रीलिंग शब्दों का बहुवचन ऊँकारांत होता है, जैसे जालूँ (स्त्रियाँ), खटूँ (चारपाइयाँ), दवाऊँ (दवाएँ) अख्यूँ (आँखें); पुल्लिंग के बहुरूप में वैविध्य हैं। ओकारांत शब्द आकारांत हो जाते हैं-घोड़ों से घोड़ा, कपड़ों से कपड़ा आदि; उकारांत शब्द अकारांत हो जाते हैं-घरु से घर, वणु (वृक्ष) से वण; इकारांत शब्दों में-ऊँ बढ़ाया जाता है, जैसे सेठ्यूँ। ईकारांत और ऊकारांत शब्द वैसे ही बने रहते हैं।

संज्ञाओं के कारक[संपादित करें]

संज्ञाओं के कारकीय रूप परसर्गों के योग से बनते हैं - कर्ता-; कर्म-के, खे; करण-साँ; संप्रदान-के, खे, लाइ; अपादान-काँ, खाँ, ताँ (पर से), माँ (में से); संबंध-पु. एकव. जो, बहुव. जो, स्त्रीलिंग एकव. जी. बहुव. जूँ, अभिकरण-में, ते (पर)। कुछ पद अपादान और अधिकरण कारक में विभक्त्यंत मिलते हैं-गोठूँ (गाँव से), घरूँ (घर में), पटि (जमीन पर), वेलि (समय पर)। बहुव. में संज्ञा के तिर्यक् रूपृ-उनि प्रत्यय (तुलना कीजिए हिंदी-ओं) से बनता है-छोकर्युनि, दवाउनि, राजाउनि, इत्यादि।

सर्वनाम[संपादित करें]

सर्वनामों की सूची मात्र से इनकी प्रकृति को जाना जा सकेगा-1. माँ, आऊँ (मैं); अर्सी (हम); तिर्यक क्रमश: मूँ तथा असाँ; 2. तूँ; तव्हीं, अब्हीं (तुम); तिर्यक रूप तो, तब्हाँ; 3. पुँ. हू अथवा ऊ (वह, वे), तिर्यक् रूप हुन, हुननि; स्त्री. हूअ, हू, तिर्यक रूप उहो, उहे; पुँ. ही अथवा हीउ (यह, ये) तिर्यक् रूप हि, हिननि; स्त्री. इहो, इहे, तिर्यक् रूप इन्हें। इझी (यही), उझो (वही), बहुव. इझे, उझे; जो, जे (हिं. जो); छा, कुजाड़ी (क्या); केरु, कहिड़ी (कौन); को (कोई); की, कुझु (कुछ); पाण (आप, खुद)। विशेषणों में ओकारांत शब्द विशेष्य के लिंग, कारक के तिर्यक् रूप, और वचन के अनुरूप बदलते हैं, जैसे सुठो छोकरो, सुठा छोकरा, सुठी छोकरी, सुठ्यनि छोकर्युनि खे। शेष विशेषण अविकारी रहते हैं। संख्यावाची विशेषणों में अधिकतर को हिंदीभाषी सहज में पहचान सकते हैं। ब (दो), टे (तीन), दाह (दस), अरिदह (18), वीह (20), टीह, (30), पंजाह, (50), साढा दाह (10।।), वीणो (दूना), टीणो (तिगुना), सजो (सारा), समूरो (समूचा) आदि कुछ शब्द निराले जान पड़ते हैं।

संज्ञार्थक क्रिया[संपादित करें]

णुकारांत होती है-हलणु (चलना), बधणु (बाँधना), टपणु (फाँदना) घुमणु, खाइणु, करणु, अचणु (आना) वअणु (जानवा, विहणु (बैठना) इत्यादि। कर्मवाच्य प्राय: धातु में-इज-या-ईज (प्राकृत अज्ज) जोड़कर बनता है, जैसे मारिजे (मारा जाता है), पिटिजनु (पीटा जाना); अथवा हिंदी की तरह वञणु (जाना) के साथ संयुक्त क्रिया बनाकर प्रयुक्त होता है, जैसे माओ वर्ञ थो (मारा जाता है)। प्रेरणार्थक क्रिया की दो स्थितियाँ हैं-लिखाइणु (लिखना), लिखराइणु (लिखवाना); कमाइणु (कमाना), कमाराइणु (कमवाना), कृदंतों में वर्तमानकालिक-हलंदों (हिलता), भजदो (टूटता) -और भूतकालिक-बच्यलु (बचा), मार्यलु (मारा)-लिंग और वचन के अनुसार विकारी होते हैं। वर्तमानकालिक कृदंत भविष्यत् काल के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। हिंदी की तरह कृदंतों में सहायक क्रिया (वर्तमान आहे, था; भूत हो, भविष्यत् हूँदो आदि) के योग से अनेक क्रिया रूप सिद्ध होते हैं। पूर्वकालिक कृदंत धातु में-इ-या -ई लगाकर बनाया जाता है, जैसे खाई (खाकर), लिखी (लिखकर), विधिलिंग और आज्ञार्थक क्रिया के रूप में संस्कृत प्राकृत से विकसित हुए हैं-माँ हलाँ (मैं चलूँ), असीं हलूँ (हम चलें), तूँ हलीं (तू चले), तूँ हल (तू चल), तब्हीं हलो (तुम चलो); हू हले, हू हलीन। इनमें भी सहायक क्रिया जोड़कर रूप बनते हैं। हिंदी की तरह सिंधी में भी संयुक्त क्रियाएँ पवणु (पड़ना), रहणु (रहना), वठणु (लेना), विझणु (डालना), छदणु (छोड़ना), सघणु (सकना) आदि के योग से बनती हैं।

विविध[संपादित करें]

सिंधी की एक बहुत बड़ी विशेषता है उसके सार्वनामिक अंत्यय जो संज्ञा और क्रिया के साथ संयुक्त किए जाते हैं, जैसे पुट्रऊँ (हमारा लड़का), भासि (उसका भाई), भाउरनि (उनके भाई); चयुमि (मैंने कहा), हुजेई (तुझे हो), मारियाई (उसने उसको मारा), मारियाईमि (उसने मुझको मारा)। सिंधी अव्यय संख्या में बहुत अधिक हैं। सिंधी के शब्द भंडार में अरबी-फारसी-तत्व अन्य भारतीय भाषाओं की अपेक्षा अधिक हैं। सिंधी और हिंदी की वाक्य रचना, पदक्रम और अन्वय में कोई विशेष अंतर नहीं है।

सिन्धी के लिये प्रयुक्त लिपियाँ[संपादित करें]

एक शताब्दी से कुछ पहले तक सिंधी लेखन के लिए चार लिपियाँ प्रचलित थीं। हिंदु पुरुष देवनागरी का, हिंदु स्त्रियाँ प्राय: गुरुमुखी का, व्यापारी लोग (हिंदू मुसलमान दोनों) "हटवाणिको" का (जिसे 'सिंधी लिपि' भी कहते हैं), और मुसलमान तथा सरकारी कर्मचारी अरबी-फारसी लिपि का प्रयोग करते थे। सन 1853 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी के निर्णयानुसार लिपि के स्थिरीकरण हेतु सिंध के कमिश्नर मिनिस्टर एलिस की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की गई। इस समिति ने अरबी-फारसी-उर्दू लिपियों के आधार पर "अरबी सिंधी" लिपि की सर्जना की। सिंधी ध्वनियों के लिए सवर्ण अक्षरों में अतिरिक्त बिंदु लगाकर नए अक्षर जोड़ लिए गए। अब यह लिपि सभी वर्गों द्वारा व्यवहृत होती है। इधर भारत के सिंधी लोग नागरी लिपि को सफलतापूर्वक अपना रहे हैं।

इतिहास[संपादित करें]

सिंधी एक मात्र ऐसी भाषा है, जिसकी दो लिपियों को भारतीय संविधान की मान्यता है। सिंधी भाषा की लिपि को लेकर लंबा विवाद चला है और आज भी इसको लेकर विवाद होता रहता है। सिंधी किस लिपि में लिखी जाए, इसको लेकर सिंधी लेखकों व साहित्यकारों में दो धड़े हो चुके हैं। ये दोनों ही धड़े सिंधी भाषा को संविधान में मान्यता दिए जाने के दौरान आमने-सामने आ गए। दोनों एक दूसरे का विरोध करने लगे तथा केन्द्रीय सरकार के ऊपर अपनी-अपनी लिपि सिंधी लिपि तथा देवनागरी लिपि को मान्यता देने के लिए दबाव डालते रहे। आखिरकार भारत सरकार ने 10 अप्रैल 1967 में सिंधी भाषा को संविधान में मान्यता प्रदान की, साथ-साथ सिंधी भाषा के लिए दोनों लिपियों अरबी-फारसी तथा देवनागरी लिपि को मंजूर किया। सिंधी भाषा भारतीय संविधान की एक मात्र ऐसी भाषा है, जिसके उपयोग के लिए दो लिपियों को मान्यता प्रदान की गई है। इसे हम सिंधी भाषा का दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य, आकलन मुश्किल है।

ऐसा नहीं है कि लिपि को लेकर आजादी के बाद ही विवाद हुआ। संयुक्त हिंदुस्तान के वक्त भी देवनागरी लिपि अस्तित्व में आ चुकी थी। सिंधियों के जन्माक्षर देवनागरी लिपि में लिखे जाते थे। सन् 1923 में कराची सरकार ने पाठ्यक्रमों की पुस्तकें देवनागरी में प्रकाशित की थीं। गद्य की प्रारंभिक पुस्तकें, जो अंग्रेजों ने रची एवं प्रकाशित कीं, उन में कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें देवनागरी लिपि में थीं, जो इस प्रकार हैं:- मती अजील बाइबल से सेन्ट मौथियूस का अनुवाद, 1825, ग्रामर ऑफ सिंधी लैंग्वेज, मी. प्रनेसप 1855, ए ग्रामर वोक्यूबलरी ऑफ सिंधी लैंग्वेज-मी. वाथन 1836, वाक्यूबलरी ऑफ सिंधी लैंग्वेज- ईस्टविक 1849, ए ग्रामर वोक्यूबलरी ऑफ सिंधी लैंग्वेज- कैप्टन स्टैक 1849, ए डिक्शनरी-अंग्रेजी-सिंधी-कैप्टन स्टैक 1849.

सन् 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ और सिंध के हिन्दू सिंधी भारत में आए और अनेक राज्यों में बस गए। भारत में फिर से लिपि के प्रश्न को उठाया गया। दिसम्बर 1942 में मुंबई में एक सिंधी साहित्य सम्मेलन हुआ था, जिसमें यह निर्णय भी हुआ था कि सिंधी भाषा को देवनागरी लिपि में लिखा जाए। यह प्रस्ताव सिंधी के सुप्रसिद्ध ग्रंथकार लालचंद अमरडिऩो मल ने रखा था। साथ में स्वतंत्रता सेनानी, राज्य सभा के सदस्य और पूर्व केन्द्रीय मंत्री दादा जैरामदास दौलतराम तथा अन्य कांग्रेसी सिंधी स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत की वस्तुस्थिति तथा हिन्दी देवनागरी लिपि की मांग को आगे बढ़ाया। इसका अरबी लिपि का उपयोग करने वाले सिंधी विद्वानों ने विरोध किया। अलवर में अखिल भारत सिंधी सम्मेलन में, अखिल भारत सिंधी बोली साहित्य सभा, जो सिंधी विद्वानों, शिक्षा शास्त्रियों, पत्रकारों तथा कलाकारों की प्रतिनिधि सभा थी, ने अरबी लिपि का प्रस्ताव किया, जिसमें गोविंद माल्ही, कीरत बाबाणी, पोपटी हीरानंदाणी, प्रो. मंघाराम मलकाणी तथा अन्य भाषा विज्ञानी व शिक्षाशास्त्री थे। वैसे वस्तुस्थिति ये है कि प्राचीन-अर्वाचीन सिंधी साहित्य, लोक-साहित्य, धार्मिक सिंधी अरबी लिपि में ही प्रकाशित है। अरबी लिपि में ही अध्ययन एवं अध्यापन की ज्यादातर सुविधाएं हैं। लिपि के संबंध में स्वाधीनता के पश्चात आज तक संघर्ष चला आ रहा है। कोई एक स्पष्ट निर्णय नहीं हो पाया है। चूंकि राष्ट्रभाशा की लिपि देवनागरी है और अन्य भाषाओं की अधिकतर लिपियां देवनागरी के नजदीक हैं, इसलिए हिन्दी प्रदेशों में सिंधी भाषा के लिए देवनागरी का प्रचलन कुछ ज्यादा है।

हिन्दी भाषा के लेखन के लिए एक ही लिपि देवनागरी लिपि का प्रयोग होता है, परन्तु सिंधी भाषा के लेखन में अरबी-फारसी और देवनागरी दोनों लिपियों का प्रयोग होता है। इसलिए सिंधी भाषा की विशिष्ट ध्वनियों के लिए देवनागरी लेखन में विशेष चिन्ह लगाते हैं। उदाहरण के लिए देखें तो हिंदी में अन्त: स्फुरित ध्वनियां नहीं हैं, जब कि सिंधी की ग, ज, ब, ड ध्वनियों के अन्त:स्फुटिक रूप सिंधी में मिलते हैं। देवनागरी लिपि में उक्त लिपि-चिन्हों के नीचे पड़ी रेखा लगा कर अन्त:स्फुटिक ध्वनियों के लिए लिपि-चिन्ह लगाने की परम्परा है।

वर्तमान में भारत के अधिकतर राज्यों में सिंधी माध्यम के स्कूल बंद होते जा रहे हैं। स्कूलों-कॉलेजों में सिंधी एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। इसी कारण नई सिंधी युवा पीढ़ी सिंधी भाषा से विमुख हो रही है। अरबी-फारसी लिपि सीखना उनके लिए दुश्वार सा हो गया है। इसलिए युवा पीढ़ी में देवनागरी लिपि का प्रचलन हो रहा है। सभी राज्यों के युवा सिंधी लेखक देवनागरी लिपि में लेखन कार्य तथा प्रकाशन कार्य कर रहे हैं। सिंधी लिपि का बड़ी तेजी से व्यवहार में उपयोग कम होता जा रहा है। अधिकतर राज्य साहित्य अकादमियां भी अपना साहित्य देवनागरी लिपि में प्रकाशित कर रही हैं।

देवनागरी[संपादित करें]

भारत में अरबी के अलावा देवनागरी लिपि का उपयोग भी किया जाता है। देवनागरी लिपि जो हिन्दी कि तरह बायें से दायें लिखी जाती है। यह 1948 में भारत सरकार द्वारा लायी गयी भाषा है।

ə a ɪ i ʊ e ɛ o ɔ
ख़ ग॒ ग़
k x ɡ ɠ ɣ ɡʱ ŋ
ज॒ ज़
c ɟ ʄ z ɟʱ ɲ
ड॒ ड़ ढ़
ʈ ʈʰ ɖ ɗ ɽ ɖʱ ɽʱ ɳ
t d n
फ़ ब॒
p f b ɓ m
j r l ʋ
ʃ ʂ s h

अरबी-फारसी लिपि[संपादित करें]

चित्र:Sindhialpha.jpg
सिंधी के लिये प्रयुक्त अरबी वर्णमाला

सिंधी लिखने के लिये प्रयुक्त अरबी-फारसी लिपि में 52 अक्षर होते है। इसमें से अधिकांश अरबी वर्णमाला के हैं, कुछ फारसी वर्णमाला के हैं और कुछ नये वर्ण जोड़े गये हैं। 18 नये अक्षर, ڄ ,ٺ ,ٽ ,ٿ ,ڀ ,ٻ ,ڙ ,ڍ ,ڊ ,ڏ ,ڌ ,ڇ ,ڃ ,ڦ ,ڻ ,ڱ ,ڳ ,ڪ है। इनमें अधिकतर का रूप आदि, मध्य और अंत में भिन्न-भिन्न होता है। स्वरों की मात्राएँ अनिवार्य न होने के कारण एक ही शब्द के कई उच्चारण हो जाते हैं।

جھ ڄ ج پ ث ٺ ٽ ٿ ت ڀ ٻ ب ا
ɟʱ ʄ ɟ p s ʈʰ ʈ t ɓ b *
ڙ ر ذ ڍ ڊ ڏ ڌ د خ ح ڇ چ ڃ
ɽ r z ɖʱ ɖ ɗ d x h c ɲ
ق ڦ ف غ ع ظ ط ض ص ش س ز ڙھ
k f ɣ z t z s ʃ s z ɽʱ
ي ه و ڻ ن م ل ڱ گھ ڳ گ ک ڪ
* h * ɳ n m l ŋ ɡʱ ɠ ɡ k

सिंधी अंक[संपादित करें]

हिन्दी मध्य-पूर्व पूर्वी/भारतीय-सिंधी
٠ ۰
١ ۱
٢ ۲
٣ ۳
٤ ۴
٥ ۵
٦ ۶
٧ ۷
٨ ۸
٩ ۹

लिप्यन्तरण[संपादित करें]

व्यंजनों का लिप्यंतरण[संपादित करें]

देवनागरी अरबी-फारसी
آ
ا
ب
ڀ
ٿ
ٽ
ٺ
پ
ج
جھ
ڃ
چ
ڇ
ख़ خ
د
ڌ
ڊ
ڍ
ر
ड़ ڙ
ش
ग़ غ
फ़ ف
ڦ
क़ ق
ڪ
ک
گ
گھ
ڱ
ل
م
ن
ن
ڻ
و
ي
ब॒ ٻ
ज॒ ڄ
ड॒ ڏ
ग॒ ڳ
ت
ط
ح
ه
ज़ ذ
ज़ ز
ज़ ض
ज़ ظ
س
ص
ث

आम बोलचाल (वाक्य)[संपादित करें]

  • कीयं आहियो / कीयं आहीं? - "आप कैसे हैं/तुम कैसे हो?"
  • आउं / मां ठीक आहियां - "मैं ठीक हूँ।"
  • तवाहिन्जी महेरबानी - "धन्यवाद"
  • हा - "हां"
  • - "नहीं"
  • तवाहिन्जो / तुहिन्जो नालो छा आहे? - "आपका/तुमारा नाम क्या है?"
  • मुहिन्जो नालो _____ आहे। - "मेरा नाम _____ है।"
  • हिक्क - "एक"
  • ब॒ - "दो"
  • ट्रे - "तीन"
  • चारु - "चार"
  • पंज - "पांच"
  • छः - "छे"
  • सत्त - "सात"
  • अट्ठ - "आठ"
  • नवं - "नौ"
  • ड॒ह - "दस"

यह भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]