सिख धर्म की आलोचना

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

सिख धर्म
पर एक श्रेणी का भाग

Om
सिख सतगुरु एवं भक्त
सतगुरु नानक देव · सतगुरु अंगद देव
सतगुरु अमर दास  · सतगुरु राम दास ·
सतगुरु अर्जन देव  ·सतगुरु हरि गोबिंद  ·
सतगुरु हरि राय  · सतगुरु हरि कृष्ण
सतगुरु तेग बहादुर  · सतगुरु गोबिंद सिंह
भक्त कबीर जी  · शेख फरीद
भक्त नामदेव
धर्म ग्रंथ
आदि ग्रंथ साहिब · दसम ग्रंथ
सम्बन्धित विषय
गुरमत ·विकार ·गुरू
गुरद्वारा · चंडी ·अमृत
नितनेम · शब्दकोष
लंगर · खंडे बाटे की पाहुल


सिख धर्म की आलोचना अक्सर अन्य धर्मों या सिद्धांतों के मानने वालों के द्वारा की गई है।

धर्मशास्र[संपादित करें]

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपनी किताब सत्यार्थ प्रकाश में सिख धर्म की आलोचना की थी, उन्होंने सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक को एक "दुष्ट" क़रार दिया था और उन्होंने सिख धार्मिक ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहिब को "असत्यता" क़रार दिया था। स्वामी दयानन्द का मानना था कि सिख धर्म साधारण लोगों के साथ छल करने की एक विधि है। पंजाब का दौरा करने के बाद स्वामी दयानन्द ने अपनी किताब से यह आलोचनात्मक पाठ को मिटाने का फ़ैसला लिया था लेकिन उनकी मौत के बाद यह आलोचनात्मक पाठ उनकी किताब में रह गए।[1] उपर्युक्त अनुच्छेद में महर्षि दयानंद सरस्वती पर मिथ्या आरोप लगाया गया है। महर्षि दयानंद द्वारा सत्यार्थ प्रकाश में उल्लिखित प्रकरण यथावत नीचे अंकित है कृपया सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका चार बार पढ़कर इस पर विचार करें कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने यदि स्वयं गुरु नानक जी से यही संवाद कहा होता तो क्या होता:- "(प्रश्न) पंजाब देश में नानक जी ने एक मार्ग चलाया है। क्योंकि वे भी मूर्त्ति का खण्डन करते थे। मुसलमान होने से बचाये। वे साधु भी नहीं हुए किन्तु गृहस्थ बने रहे। देखो! उन्होंने यह मन्त्र उपदेश किया है इसी से विदित होता है कि उन का आशय अच्छा था- ओं सत्यनाम कर्त्ता पुरुष निर्भो निर्वैर अकालमूर्त्त अजोनि सहभं गुरु प्रसाद जप आदिसच जुगादि सच है भी सच नानक होसी भी सच।। (ओ३म्) जिस का सत्य नाम है वह कर्त्ता पुरुष भय और वैररहित अकाल मूर्त्ति जो काल में और जोनि में नहीं आता; प्रकाशमान है उसी का जप गुरु की कृपा से कर। वह परमात्मा आदि में सच था; जुगों की आदि में सच; वर्त्तमान में सच; और होगा भी सच । (उत्तर) नानक जी का आशय तो अच्छा था परन्तु विद्या कुछ भी नहीं थी। हां! भाषा उस देश की जो कि ग्रामों की है उसे जानते थे। वेदादि शास्त्र और संस्कृत कुछ भी नहीं जानते थे। जो जानते होते तो ‘निर्भय’ शब्द को ‘निर्भो’ क्यों लिखते? और इस का दृष्टान्त उन का बनाया संस्कृती स्तोत्र है। चाहते थे कि मैं संस्कृत में भी ‘पग अड़ाऊं’ परन्तु विना पढ़े संस्कृत कैसे आ सकता है? हां उन ग्रामीणों के सामने कि जिन्होंने संस्कृत कभी सुना भी नहीं था ‘संस्कृती’ बना कर संस्कृत के भी पण्डित बन गये होंगे। यह बात अपने मान प्रतिष्ठा और अपनी प्रख्याति की इच्छा के बिना कभी न करते। उन को अपनी प्रतिष्ठा की इच्छा अवश्य थी। नहीं तो जैसी भाषा जानते थे कहते रहते और यह भी कह देते कि मैं संस्कृत नहीं पढ़ा। जब कुछ अभिमान था तो मान प्रतिष्ठा के लिये कुछ दम्भ भी किया होगा। इसीलिये उन के ग्रन्थ में जहां तहां वेदों की निन्दा और स्तुति भी है; क्योंकि जो ऐसा न करते तो उन से भी कोई वेद का अर्थ पूछता, जब न आता तब प्रतिष्ठा नष्ट होती। इसीलिये पहले ही अपने शिष्यों के सामने कहीं-कहीं वेदों के विरुद्ध बोलते थे और कहीं-कहीं वेद के लिये अच्छा भी कहा है। क्योंकि जो कहीं अच्छा न कहते तो लोग उन को नास्तिक बनाते। जैसे- वेद पढ़त ब्रह्मा मरे चारों वेद कहानि । सन्त कि महिमा वेद न जानी।। ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर।। क्या वेद पढ़ने वाले मर गये और नानक जी आदि अपने को अमर समझते थे। क्या वे नहीं मर गये? वेद तो सब विद्याओं का भण्डार है परन्तु जो चारों वेदों को कहानी कहे उस की सब बातें कहानी हैं। जो मूर्खों का नाम सन्त होता है वे विचारे वेदों की महिमा कभी नहीं जान सकते। जो नानक जी वेदों ही का मान करते तो उन का सम्प्रदाय न चलता, न वे गुरु बन सकते थे क्योंकि संस्कृत विद्या तो पढ़े ही नहीं थे तो दूसरे को पढ़ा कर शिष्य कैसे बना सकते थे? यह सच है कि जिस समय नानक जी पंजाब में हुए थे उस समय पंजाब संस्कृत विद्या से सर्वथा रहित मुसलमानों से पीड़ित था। उस समय उन्होंने कुछ लोगों को बचाया। नानक जी के सामने कुछ उन का सम्प्रदाय वा बहुत से शिष्य नहीं हुए थे। क्योंकि अविद्वानों में यह चाल है कि मरे पीछे उन को सिद्ध बना लेते हैं, पश्चात् बहुत सा माहात्म्य करके ईश्वर के समान मान लेते हैं। हां! नानक जी बड़े धनाढ्य और रईस भी नहीं थे परन्तु उन के चेलों ने ‘नानकचन्द्रोदय’ और ‘जन्मशाखी’ आदि में बड़े सिद्ध और बड़े-बड़े ऐश्वर्य वाले थे; लिखा है। नानक जी ब्रह्मा आदि से मिले; बड़ी बातचीत की, सब ने इन का मान्य किया। नानक जी के विवाह में बहुत से घोड़े, रथ, हाथी, सोने, चांदी, मोती, पन्ना, आदि रत्नों से सजे हुए और अमूल्य रत्नों का पारावार न था; लिखा है। भला ये गपोड़े नहीं तो क्या हैं? इस में इनके चेलों का दोष है, नानक जी का नहीं। दूसरा जो उन के पीछे उनके लड़के से उदासी चले। और रामदास आदि से निर्मले। कितने ही गद्दीवालों ने भाषा बनाकर ग्रन्थ में रक्खी है। अर्थात् इन का गुरु गोविन्दसिह जी दशमा हुआ। उन के पीछे उस ग्रन्थ में किसी की भाषा नहीं मिलाई गई किन्तु वहां तक के जितने छोटे-छोटे पुस्तक थे उन सब को इकट्ठे करके जिल्द बंधवा दी। इन लोगों ने भी नानक जी के पीछे बहुत सी भाषा बनाई। कितनों ही ने नाना प्रकार की पुराणों की मिथ्या कथा के तुल्य बना दिये। परन्तु ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर बन के उस पर कर्म उपासना छोड़कर इन के शिष्य झुकते आये इस ने बहुत बिगाड़ कर दिया। नहीं, जो नानक जी ने कुछ भक्ति विशेष ईश्वर की लिखी थी उसे करते आते तो अच्छा था। अब उदासी कहते हैं हम बड़े, निर्मले कहते हैं हम बड़े, अकाली तथा सूतरहसाई कहते हैं कि सर्वोपरि हम हैं। इन में गोविन्दसिह जी शूरवीर हुए। जो मुसलमानों ने उनके पुरुषाओं को बहुत सा दुःख दिया था। उन से वैर लेना चाहते थे परन्तु इन के पास कुछ सामग्री न थी और इधर मुसलमानों की बादशाही प्रज्वलित हो रही थी। इन्होंने एक पुरश्चरण करवाया। प्रसिद्धि की कि मुझ को देवी ने वर और खड्ग दिया है कि तुम मुसलमानों से लड़ो; तुम्हारा विजय होगा। बहुत से लोग उन के साथी हो गये और उन्होंने; जैसे वाममार्गियों ने ‘पञ्च मकार’ चक्रांकितों ने ‘पञ्च संस्कार’ चलाये थे वैसे ‘पञ्च ककार’ चलाये। अर्थात् इनके पञ्च ककार युद्ध में उपयोगी थे। एक ‘केश’ अर्थात् जिस के रखने से लड़ाई में लकड़ी और तलवार से कुछ बचावट हो। दूसरा ‘कंगण’ जो शिर के ऊपर पगड़ी में अकाली लोग रखते हैं और हाथ में ‘कड़ा’ जिस से हाथ और शिर बच सकें। तीसरा ‘काछ’ अर्थात् जानु के ऊपर एक जांघिया कि जो दौड़ने और कूदने में अच्छा होता है बहुत करके अखाड़मल्ल और नट भी इस को धारण इसीलिये करते हैं कि जिस से शरीर का मर्मस्थान बचा रहै और अटकाव न हो। चौथा ‘कंगा’ कि जिस से केश सुधरते हैं। पांचवां ‘काचू’ कि जिस से शत्रु से भेंट भड़क्का होने से लड़ाई में काम आवे। इसीलिये यह रीति गोविन्दसिह जी ने अपनी बुद्धिमत्ता से उस समय के लिये की थी। अब इस समय में उन का रखना कुछ उपयोगी नहीं है। परन्तु अब जो युद्ध के प्रयोजन के लिये बातें कर्त्तव्य थीं उन को धर्म के साथ मान ली हैं। मूर्त्तिपूजा तो नहीं करते किन्तु उस से विशेष ग्रन्थ की पूजा करते हैं, क्या यह मूर्त्तिपूजा नहीं है? किसी जड़ पदार्थ के सामने शिर झुकाना वा उस की पूजा करनी सब मूर्त्तिपूजा है। जैसे मूर्त्तिवालों ने अपनी दुकान जमाकर जीविका ठाड़ी

की है वैसे इन लोगों ने भी कर ली है। जैसे पूजारी लोग मूर्त्ति का दर्शन कराते; भेंट चढ़वाते हैं वैसे नानकपन्थी लोग ग्रन्थ की पूजा करते; कराते; भेंट भी चढ़वाते हैं। अर्थात् मूर्त्तिपूजा वाले जितना वेद का मान्य करते हैं उतना ये लोग ग्रन्थसाहब वाले नहीं करते। हां! यह कहा जा सकता है कि इन्होंने वेदों को न सुना न देखा; क्या करें? जो सुनने और देखने में आवें तो बुद्धिमान् लोग जो कि हठी दुराग्रही नहीं हैं वे सब सम्प्रदाय वाले वेदमत में आ जाते हैं। परन्तु इन सब ने भोजन का बखेड़ा बहुत सा हटा दिया है। जैसे इस को हटाया वैसे विषयासक्ति दुरभिमान को भी हटाकर वेदमत की उन्नति करें तो बहुत अच्छी बात है।"

यहां एक और विनती है कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपना कोई संप्रदाय नहीं चलाया और स्पष्ट लिखा है कि आर्य समाज की स्थापना से मेरा उद्देश्य कोई मत संप्रदाय चलाना नहीं किंतु ब्रह्मा से लेकर जैमिनी मुनि पर्यंत जो परंपरा भारत में मानी जाती रही और जो बाद में दूषित हो गई उस अदूषित शुद्ध परंपरा की पुनर्स्थापना महर्षि का उद्देश्य था और हिंदुओं, भारत और विश्व के कल्याण के लिए महर्षि के इस उद्देश्य को जो समझ सकता है वही महर्षि की भाषा को समझ सकता है ।

अपनी अपनी ढपली अपना-अपना राग लेकर चलोगे तो एकता असंभव है ।

अंत में तो उस ओंकार को मानना ही पड़ेगा, उस अकाल को मानना ही पड़ेगा, जिसकी शिक्षा गुरु साहिबानों ने दी, जिसकी शिक्षा महर्षि दयानंद ने दी और जो वेदों में उल्लिखित है ।

आप एक ही पुस्तक में दो और दो बराबर 4 तथा 2 और 2 बराबर 5 एक साथ नहीं रख सकते ।

इस बात को समझ लोगे तो दयानंद को समझ लोगे।




जर्मन भाषाविद और मिशनरी अर्नेस्ट ट्रम्प ने संपूर्ण गुरु ग्रन्थ साहिब को अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद करने के लायक़ नहीं समझा[2] क्योंकि उनके ख़्याल से गुरु ग्रन्थ साहिब बहुत ही असंबद्ध और दोहरावदार है।[3]

सिख धर्मशास्र के अनुसार एकेश्वरवाद की विचारधारा सर्वप्रथम सिख गुरुओं के द्वारा स्थापित हुई थी, जबकि असल में एकेश्वरवाद का उल्लेख वेद, भगवद गीता, तोरा, क़ुरआन आदि धर्मग्रन्थ में मिला जा सकता है, जो सिख गुरुओं से अधिक प्राचीन है।[4][5][6][7][8]

सिख धर्मशास्र की मौलिकता पर संदेह उत्पन्न हुई है क्योंकि यह हिन्दू धर्म (ख़ासकर भक्ति आंदोलन) और इस्लाम (ख़ासकर सूफ़ीवाद) का एक मिश्रण या संयोजन के नज़र से देखा जा सकता है।[9][10][11]

व्यवहार[संपादित करें]

केश काटना[संपादित करें]

सिख धर्म में केश (पंजाबी में केस, पाँच 'क' में से एक) यानि बाल काटना मना है, यह अक्सर आलोचना तथा पूछताछ का बहुत अहम बिन्दु है।[12][13]

हिंसा[संपादित करें]

आरोप है कि सिख धर्म हिंसा को बढ़ावा देता है क्योंकि सिख इतिहास में कई बार हिंसक कार्रवायों का प्रचार हुआ है| सिख धर्म के अनुयायियों ने ही कई बार आतंकी बन के इस देश दंश दिए हैं और हिन्दू धर्म के लोगों को मारा है जिसमे भिंडरावाला आतंकी प्रमुख है| आज भी बहुत सारे सिखों के मन मे खालिस्तानी सोच है जो वो बाहर नही निकालते हैं, लेकिन यह सच्चाई है| दिल्ली में हाल ही में हुए एक सिख और पुलिस के बच झड़प में सिख ने तलवार निकाल के वार करना चाहा है और उसके पक्ष में काफी सिख उतरे जबकि उस सिख की ही गलती थी यह सिर्फ हिंसा को बढ़ावा देना ही है| [14] जैसे कि ख़ालसा पंथ में सैन्यीकरण और खंडे (एक सिख धार्मिक चिन्ह) पर शस्त्रों का चित्रण।[15][16]

सिखों का मानना है कि हिंसा एक अंतिम उपाय के रूप में स्वीकार्य है। सिख धर्म में शस्त्रों को पवित्र माना गया है क्योंकि यह तथाकथित बुरी ताक़तों से लड़ने में सहायक है।[17]

जातीय-धार्मिक समूह[संपादित करें]

सिख धर्म के अनुयायी आम तौर पर पंजाब क्षेत्र (हाल में पंजाब, भारत) के जाट तथा खत्री लोग होते हैं।[18][19][20]

महिला अधिकार[संपादित करें]

सिख धर्मशास्र मुख्य रूप से महिलाओं के अधिकार का समर्थन करता है अर्थात लैंगिक समानता का समर्थन करता है,[21] किंतु पंजाबी संस्कृति की कुछ परंपराओं के कारण से आधुनिक सिख समाज में सिख महिलाओं की मौजूदा स्थिति सिख पुरुषों के समान नहीं है।[22][23]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Reduced to Ashes: The Insurgency and Human Rights in Punjab ..., Volume 1", p.16
  2. Guru Granth Sahib. pp. esp. Kabir, Ravidas and most of Nanak's Shlokas.
  3. Tony Ballantyne (26 Jul 2006). Between Colonialism and Diaspora: Sikh Cultural Formations in an Imperial World. Duke University Press. pp. 52–3. ISBN 9780822388111.
  4. Sikhs in Europe: Migration, Identities and Representations. p. 101. Archived from the original on 6 अक्तूबर 2016. Retrieved 9 दिसंबर 2016. Check date values in: |access-date=, |archive-date= (help)
  5. "Divine Message Of God To Mankind Vedas" by J.M. Mehta, Chapter '12. Worship of God'.
  6. Zaehner, Robert Charles. The Bhagavad-Gita. p. 141. Archived from the original on 3 दिसंबर 2013. Retrieved 9 दिसंबर 2016. Check date values in: |access-date=, |archive-date= (help)
  7. "Modern Scholarship in the Study of Torah", p.165, by Shalom Carmy
  8. "One God in One Man" By C. T. Benedict, page.179
  9. "Propositional Religions 5 - Sikhism". Archived from the original on 3 सितंबर 2014. Retrieved 1 September 2014. Check date values in: |archive-date= (help)
  10. "Flawed Definitions of Sikhism". THE SIKH COALITION. Archived from the original on 6 अक्तूबर 2014. Retrieved 1 September 2014. Check date values in: |archive-date= (help)
  11. Singh, Khushwant. A History of the Sikhs.
  12. Dr. Birendra Kaur (1998). "Hail Hair!" (PDF). p. 5. Archived (PDF) from the original on 24 सितंबर 2015. Retrieved 1 September 2014. Check date values in: |archive-date= (help)
  13. "Q: Why do Sikhs keep hair?". RealSikhism. Archived from the original on 3 सितंबर 2014. Retrieved 1 September 2014. Check date values in: |archive-date= (help)
  14. Michael S. Roth; Charles G. Salas (2001). Disturbing Remains: Memory, History, and Crisis in the Twentieth Century. Getty Publications. p. 54. ISBN 9780892365388.
  15. Pashaura Singh; Louis E. Fenech (2014). The Oxford Handbook of Sikh Studies. Oxford University Press. p. 31. ISBN 9780199699308.
  16. Mark Juergensmeyer (2003). Terror in the Mind of God: The Global Rise of Religious Violence. University of California Press. p. 163. ISBN 9780520240117.
  17. Renard, John (2012). Fighting Words: Religion, Violence, and the Interpretation of Sacred Texts. University of California Press. p. 211. ISBN 9780520274198.
  18. J. S. Grewal (8 Oct 1998). The Sikhs of the Punjab. Cambridge University Press. pp. 138–9. ISBN 9780521637640.
  19. Sewa Singh Kalsi (1 Jan 2009). Sikhism. Infobase Publishing. p. 86. ISBN 9781438106472.
  20. Pritam Singh (19 Feb 2008). Federalism, Nationalism and Development: India and the Punjab Economy. Routledge. p. 21. ISBN 9781134049462.
  21. Singh, Nikky-Guninder Kaur. Sikhism: An Introduction. p. 101. Archived from the original on 18 मार्च 2017. Retrieved 9 दिसंबर 2016. Check date values in: |access-date=, |archive-date= (help)
  22. Kaur, Shiha (13 April 2010). "Sikhism - A Feminist Religion?". The F Word. Archived from the original on 23 मई 2015. Retrieved 9 दिसंबर 2016. Check date values in: |access-date=, |archive-date= (help)
  23. Singh, Nikky-Guninder Kaur. The Feminine Principle in the Sikh Vision of the Transcendent. p. 1.