कबीर

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संत कबीर
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सन् १८२५ की इस चित्रकारी में कबीर एक शिष्य के साथ दर्शित
जन्म विक्रमी संवत १४५५ (सन १३९८ ई ० )
वाराणसी, (हाल में उत्तर प्रदेश, भारत)
मृत्यु विक्रमी संवत १५५१ (सन १४९४ ई ० )
मगहर, (हाल में उत्तर प्रदेश, भारत)
अन्य नाम कबीरदास

कबीर या कबीर साहेब जी 15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे। वे हिन्दी साहित्य के भक्तिकालीन युग में परमेश्वर की भक्ति के लिए एक महान प्रवर्तक के रूप में उभरे। इनकी रचनाओं ने हिन्दी प्रदेश के भक्ति आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया। उनका लेखन सिक्खों ☬ के आदि ग्रंथ में भी देखने को मिलता है।[1][2] वे हिन्दू धर्मइस्लाम को न मानते हुए धर्म एक सर्वोच्च ईश्वर में विश्वास रखते थे। उन्होंने सामाज में फैली कुरीतियों, कर्मकांड, अंधविश्वास की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की कड़ी आलोचना भी।[1][3] उनके जीवनकाल के दौरान हिन्दू और मुसलमान दोनों ने उन्हें बहुत प्रताड़ित किया।[2] कबीर पंथ नामक धार्मिक सम्प्रदाय इनकी शिक्षाओं के अनुयायी हैं।[4]

जीवन परिचय

लहरतरब प्रगट्या स्थल

कबीर साहेब का (लगभग 14वीं-15वीं शताब्दी) जन्म स्थान काशी, उत्तर है। कबीर साहेब (परमेश्वर) जी का जन्म माता पिता से नहीं हुआ बल्कि वह हर युग में अपने निज धाम सतलोक से चलकर पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। कबीर साहेब जी लीलामय शरीर में बालक रूप में नीरु और नीमा को काशी के लहरतारा तालाब में एक कमल के पुष्प के ऊपर मिले थे। [5][6]

अनंत कोट ब्रह्मांड में, बंदी छोड़ कहाए | सो तो एक कबीर हैं, जो जननी जन्या न माए ||

परमात्मा कबीर जी जनसाधारण में सामान्यतः कलयुग में "कबीर दास" नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा उन्होंने बनारस (काशी, उत्तर प्रदेश) में जुलाहे की भूमिका की। परंतु विडंबना यह है कि सर्व सृष्टि के रचनहार, भगवान स्वयं धरती पर अवतरित हुए और स्वयं को दास शब्द से सम्बोधित किया। कबीर साहेब के वास्तविक रूप से सभी अनजान थे सिवाय उनके जिन्हें कबीर साहेब ने स्वयं दर्शन दिए और अपनी वास्तविक स्थिति से परिचित कराया जिनमें शिख धर्म के परवर्तक नानक देव जी (तलवंडी, पंजाब), आदरणीय धर्मदास जी ( बांधवगढ़, मध्यप्रदेश), दादू साहेब जी (गुजरात) आदि आदि शामिल हैं। वेद भी पूर्ण परमेश्वर जी की इस लीला की गवाही देते हैं (ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 4 मन्त्र 6)। इस मंत्र में परमेश्वर कबीर जी को "तस्कर" अर्थात छिप कर कार्य करने वाला कहा है। नानक जी ने भी परमेश्वर कबीर साहेब की वास्तविक स्थिति से परिचित होने पर उन्हें "ठग" (गुरु ग्रंथ साहेब, राग सिरी, महला पहला, पृष्ठ 24) कहा है।[5]

कबीर साहेब जी के गुरु

कबीर साहेब जी को गुरु बनाने की कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि वह अपने आप में स्वयंभू यानि पूर्ण परमात्मा है। परंतु उन्होंने गुरु मर्यादा व परंपरा (गुरु शिष्य के नाते) को निभाए रखने के लिए कलयुग में स्वामी रमानंद जी को अपना गुरु बनाया।[7] कबीर साहेब जी ने ढाई वर्ष के बालक के रूप में पंच गंगा घाट पर लीलामाय रूप में रोने कि लीला कि थी, स्वामी रमानंद जी वहाँ प्रतिदिन सन्नान करने आया करते थे, उस दिन रमानंद जी की खड़ाऊँ कबीर परमात्मा जी के ढाई वर्ष के लीलामय शरीर में लगी, उनके मुख से तत्काल 'राम-राम' शब्द निकला। कबीर जी ने रोने कि लीला की, तब रमानंद जी ने झुककर उनको गोदी में उठाना चाहा, उस दौरान उनकी (रमानंद जी की) कंठी कबीर जी के गले में आ गिरी। तब से ही रमानंद जी कबीर साहेब जी के गुरु कहलाए।[5]

कबीर के ही शब्दों में:

काशी में परगट भये , रामानंद चेताये ||

स्वामी रमानंद जी से ज्ञान चर्चा

एक दिन स्वामी रामानंद जी के शिष्य विवेकानंद जी कहीं प्रवचन दे रहे थे। कबीर साहेब जी भी वहाँ चले गए और उनके प्रवचनों को सुनने लगे। ऋषि विवेकानन्द जी विष्णु पुराण से कथा सुना रहे थे। कह रहे थे, विष्णु भगवान  सर्वेश्वर हैं,अविनाशी हैं। इनके कोई जन्मदाता माता-पिता नहीं है। 5 वर्षीय बालक कबीर देव जी भी उनका सत्संग सुन रहे थे। ऋषि विवेकानन्द जी ने अपने प्रवचनों को विराम दिया तथा उपस्थित श्रोताओं से कहा यदि किसी को कोई शंका है या कोई प्रश्न करना है तो वह निःसंकोच अपनी शंका का समाधान करा सकता है। कबीर परमेश्वर खड़े हुए तथा ऋषि विवेकानन्द जी से करबद्ध होकर प्रार्थना कि हे ऋषि जी! आपने भगवान विष्णु जी के विषय में बताया कि ये अजन्मा हैं, अविनाशी है। इनके कोई माता-पिता नहीं हैं। एक दिन एक ब्राह्मण श्री शिव पुराण के रूद्र संहिता अध्याय 6 एवं 7 को पढ़ कर श्रोताओं को सुना रहे थे, दास भी उस सत्संग में उपस्थित था। उसमें वह महापुरुष बता रहे थे कि विष्णु और ब्रह्मा की उत्पत्ति शिव भगवान से हुई है। जिसका प्रमाण देवी भागवत पुराण अध्याय 5 सकन्द 3 पेज संख्या 123 पर में लिखा है।

कबीर परमेश्वर जी के मुख से उपरोक्त उल्लेख सुनकर ऋषि विवेकानन्द अति क्रोधित हो गये तथा उपस्थित श्रोताओं से बोले यह बालक झूठ बोल रहा है। पुराणों में ऐसा कहीं नहीं लिखा है। उपस्थित श्रोताओं ने भी सहमति व्यक्त की कि हे ऋषि जी आप सत्य कह रहे हो यह बालक क्या जाने पुराणों के गूढ़ रहस्य को? आप इस बच्चे की बातों पर ध्यान न दो। ऋषि विवेकानन्द जी ने पुराणों को उसी समय देखा जिसमें सर्व विवरण विद्यमान था। परन्तु मान हानि के भय से अपने झूठे व्यक्तव्य पर ही दृढ़ रहते हुए कहा हे बालक तेरा क्या नाम है? तू किस जाति का है? तूने तिलक लगाया है। क्या तूने कोई गुरु धारण किया है? शीघ्र बताइए।  

कबीर परमेश्वर जी के बोलने से पहले ही श्रोता बोले हे ऋषि जी! इसका नाम कबीर है, यह नीरू जुलाहे का पुत्र है। कबीर जी बोले ऋषि जी मेरा यही परिचय है जो श्रोताओं ने आपको बताया। मैंने गुरु धारण कर रखा है। ऋषि विवेकानन्द जी ने पूछा क्या नाम है तेरे गुरुदेव का? परमेश्वर कबीर जी ने कहा मेरे पूज्य गुरुदेव वही हैं जो आपके गुरुदेव हैं। उनका नाम है स्वामी रामानन्द जी। जुलाहे के बालक कबीर परमेश्वर जी के मुख कमल से स्वामी रामानन्द जी को अपना गुरु जी बताने से ऋषि विवेकानन्द जी ने ज्ञान चर्चा का विषय बदल दिया और परमेश्वर कबीर जी को बहुत बुरा-भला कहा तथा श्रोताओं को भड़काने व वास्तविक विषय भूलाने के उद्देश्य से कहा देखो रे भाईयो! यह कितना झूठा बालक है।

यह मेरे पूज्य गुरुदेव श्री 1008 स्वामी रामानन्द जी को अपना गुरु जी कह रहा है। मेरे गुरु जी तो इन अछूतों के दर्शन भी नहीं करते। शुद्रों का अंग भी नहीं छूते। अभी जाता हूँ गुरु जी को बताता हूँ। भाई श्रोताओ! आप सर्व कल स्वामी जी के आश्रम पर आना सुबह-सुबह। इस झूठे की कितनी पिटाई स्वामी रामानन्द जी करेगें? इसने हमारे गुरुदेव का नाम मिट्टी में मिलाया है। ऋषि जी ने जाकर श्री रामानंद जी से कहा, "गुरुदेव, एक नीची जाति का लड़का है। उसने हमें बदनाम किया है। वह कहता हैं कि स्वामी रामानंद जी मेरे गुरुदेव हैं।  "हे भगवान!  हमारे लिए बाहर जाना मुश्किल हो गया है।"  स्वामी रामानन्द जी ने कहा, "कल सुबह उन्हें बुलाओ।  देखो, मैं कल तुम्हारे सामने उसे कितना दण्ड दूँगा।”[8]

अगले दिन सुबह भगवान कबीर जी को स्वामी रामानन्द जी के सामने लाया गया। स्वामी रामानन्द जी ने अपनी झोंपड़ी के सामने यह दिखाने के लिए एक परदा लटका दिया कि उन्हें दीक्षा देने की तो बात ही छोड़िए, मैं उनका चेहरा तक नहीं देखता। स्वामी रामानन्द जी ने बड़े क्रोध में परदे के पार से कबीर परमेश्वर जी से पूछा कि आप कौन हैं? भगवान कबीर जी ने कहा, "हे स्वामी जी, मैं इस सृष्टि का निर्माता हूं। यह सारा संसार मुझ पर आश्रित है। मैं ऊपर सनातन धाम यानि सतलोक में निवास करता हूँ।" स्वामी रामानन्द जी यह सुनकर नाराज़ हो गए। उन्होंने उन्हें फटकार लगाई और उनसे कुछ और प्रश्न पूछे! जिनका उत्तर एक आदर्श शिष्य की तरह व्यवहार करते हुए परमेश्वर कबीर जी ने शांति और विनम्रता से दिया। तब रामानन्द जी ने सोचा कि बालक के साथ चर्चा करने में काफी समय लगेगा, पहले अपनी दैनिक धार्मिक साधना पूरी कर लूँ. स्वामी रामानन्द जी मानसिक पूजा किया करते थे, वे ध्यान की अवस्था में बैठे हुए कल्पना करते थे कि वे स्वयं गंगा से जल लाए हैं, भगवान विष्णु की मूर्ति को स्नान कराया है, वस्त्र बदले हैं, माला पहनाई है और अंत में मूर्ति के मस्तक पर मुकुट यथावत रखा है। उस दिन स्वामी रामानंद जी मूर्ति के गले में माला डालना भूल गए। उन्होंने माला को मुकुट से उतारने की कोशिश की लेकिन माला अटक गई। स्वामी रामानन्द जी हैरान हो उठे, और अपने आप से कहने लगे कि “अपने पूरे जीवन में मैंने आज तक कभी ऐसी गलती नहीं की । पता नहीं मेरे कौनसे जन्म का पाप आगे आ गया आज ?” तभी कबीर परमेश्वर जी ने कहा, "स्वामी जी! माला की गाँठ खोलो। आपको मुकुट उतारना नहीं पड़ेगा।"[8]

रामानन्द जी ने सोचा, “मैं तो केवल कल्पना कर रहा था। यहां कोई मूर्ति भी नहीं है। बीच में एक पर्दा भी है। और, यह बच्चा जानता कि मैं मानसिक रूप से क्या कर रहा हूं।" वह क्या गाँठ खोलते। यहां तक ​​कि उन्होंने पर्दा भी फेंक दिया और जुलाहा जाति के बालक रूप में कबीर परमात्मा को गले से लगा लिया। रामानन्द समझ गए कि यह परमेश्वर हैं।  फिर 5 वर्ष के बच्चे के रूप में भगवान कबीर जी ने 104 वर्ष के महात्मा स्वामी रामानंद जी को ज्ञान समझाया। उन्होंने उन्हें सतलोक दिखाया, तथा उनको वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान बताया और रामानंद जी को नाम दीक्षा दी। कबीर परमेश्वर जी ने रामानन्द जी को सांसारिक दृष्टि से अपना गुरु बना रहने को कहा ताकि आने वाली पीढ़ी यह ना कहे कि कबीर साहेब जी ने कौनसा गुरु बनाया था?। स्वामी रामानन्द जी ने उनसे अनुरोध किया कि वह ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि वे जानते थे कि ईश्वर का गुरु बनना पाप है। भगवान कबीर जी ने कहा, "आप मेरी आज्ञा समझकर इसका पालन करें।" तब स्वामी रामानन्द जी ने उनकी आज्ञा का पालन किया और वे कबीर साहेब जी के गुरु कहलाये।

मगहर लीला

जीविकोपार्जन के लिए कबीर जुलाहे का काम करते थे। कबीर की दृढ़ मान्यता थी कि कर्मों के अनुसार ही गति मिलती है स्थान विशेष के कारण नहीं। अपनी इस मान्यता को सिद्ध करने के लिए अंत समय में वह मगहर चले गए। क्योंकि लोगों की मान्यता थी कि काशी में मरने पर स्वर्ग और मगहर में मरने पर नरक मिलता है। मगहर में उन्होंने अंतिम सांस ली। आज भी वहाँ पर मजार व समाधी स्थित है।

भाषा

कबीर की भाषा सधुक्कड़ी एवं पंचमेल खिचड़ी है। इनकी भाषा में हिंदी भाषा की सभी बोलियों के शब्द सम्मिलित हैं। राजस्थानी, हरयाणवी, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी, ब्रजभाषा के शब्दों की बहुलता है।

प्रमुख कृतियां

धर्मदास ने उनकी वाणियों का संग्रह " बीजक " नाम के ग्रंथ में किया जिसके तीन मुख्य भाग हैं : साखी , सबद (पद ), रमैनी।

  • साखी: संस्कृत ' साक्षी ', शब्द का विकृत रूप है और धर्मोपदेश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अधिकांश साखियाँ दोहों में लिखी गयी हैं पर उसमें सोरठे का भी प्रयोग मिलता है। कबीर की शिक्षाओं और सिद्धांतों का निरूपण अधिकतर साखी में हुआ है।
  • सबद गेय पद है जिसमें पूरी तरह संगीतात्मकता विद्यमान है। इनमें उपदेशात्मकता के स्थान पर भावावेश की प्रधानता है ; क्योंकि इनमें कबीर के प्रेम और अंतरंग साधना की अभिव्यक्ति हुई है।
  • रमैनी चौपाई छंद में लिखी गयी है इनमें कबीर के रहस्यवादी और दार्शनिक विचारों को प्रकट किया गया है।
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अन्य कृतियां

  • साधो, देखो जग बौराना
  • कथनी-करणी का अंग
  • करम गति टारै नाहिं टरी
  • चांणक का अंग
  • नैया पड़ी मंझधार गुरु बिन कैसे लागे पार
  • मोको कहां
  • रहना नहिं देस बिराना है
  • दिवाने मन, भजन बिना दुख पैहौ
  • राम बिनु तन को ताप न जाई
  • हाँ रे! नसरल हटिया उसरी गेलै रे दइवा
  • हंसा चलल ससुररिया रे, नैहरवा डोलम डोल
  • अबिनासी दुलहा कब मिलिहौ, भक्तन के रछपाल
  • सहज मिले अविनासी
  • सोना ऐसन देहिया हो संतो भइया
  • बीत गये दिन भजन बिना रे
  • चेत करु जोगी, बिलैया मारै मटकी
  • अवधूता युगन युगन हम योगी
  • रहली मैं कुबुद्ध संग रहली
  • कबीर की साखियाँ
  • बहुरि नहिं आवना या देस
  • समरथाई का अंग
  • पाँच ही तत्त के लागल हटिया
  • बड़ी रे विपतिया रे हंसा, नहिरा गँवाइल रे
  • अंखियां तो झाईं परी
  • कबीर के पद
  • जीवन-मृतक का अंग
  • नैया पड़ी मंझधार गुरु बिन कैसे लागे पार
  • धोबिया हो बैराग
  • तोर हीरा हिराइल बा किचड़े में
  • घर पिछुआरी लोहरवा भैया हो मितवा
  • सुगवा पिंजरवा छोरि भागा
  • ननदी गे तैं विषम सोहागिनि
  • भेष का अंग
  • सम्रथाई का अंग / कबीर
  • मधि का अंग
  • सतगुर के सँग क्यों न गई री
  • उपदेश का अंग
  • करम गति टारै नाहिं टरी
  • भ्रम-बिधोंसवा का अंग
  • पतिव्रता का अंग
  • मोको कहां ढूँढे रे बन्दे
  • चितावणी का अंग
  • कामी का अंग
  • मन का अंग
  • जर्णा का अंग
  • निरंजन धन तुम्हरो दरबार
  • माया का अंग
  • काहे री नलिनी तू कुमिलानी
  • गुरुदेव का अंग
  • नीति के दोहे
  • बेसास का अंग
  • सुमिरण का अंग / कबीर
  • केहि समुझावौ सब जग अन्धा
  • मन ना रँगाए, रँगाए जोगी कपड़ा
  • भजो रे भैया राम गोविंद हरी
  • का लै जैबौ, ससुर घर ऐबौ / कबीर
  • सुपने में सांइ मिले
  • मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै
  • तूने रात गँवायी सोय के दिवस गँवाया खाय के
  • मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै
  • साध-असाध का अंग
  • दिवाने मन, भजन बिना दुख पैहौ
  • माया महा ठगनी हम जानी
  • कौन ठगवा नगरिया लूटल हो
  • रस का अंग
  • संगति का अंग
  • झीनी झीनी बीनी चदरिया
  • रहना नहिं देस बिराना है
  • साधो ये मुरदों का गांव
  • विरह का अंग
  • रे दिल गाफिल गफलत मत कर
  • सुमिरण का अंग
  • मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में
  • राम बिनु तन को ताप न जाई
  • तेरा मेरा मनुवां
  • भ्रम-बिधोंसवा का अंग / कबीर
  • साध का अंग
  • घूँघट के पट
  • हमन है इश्क मस्ताना
  • सांच का अंग
  • सूरातन का अंग
  • हमन है इश्क मस्ताना / कबीर
  • रहना नहिं देस बिराना है / कबीर
  • मेरी चुनरी में परिगयो दाग पिया
  • कबीर की साखियाँ
  • मुनियाँ पिंजड़ेवाली ना, तेरो सतगुरु है बेपारी
  • अँधियरवा में ठाढ़ गोरी का करलू
  • अंखियां तो छाई परी
  • ऋतु फागुन नियरानी हो
  • घूँघट के पट
  • साधु बाबा हो बिषय बिलरवा, दहिया खैलकै मोर
  • करम गति टारै नाहिं टरी

धर्म के प्रति

साधु संतों का तो घर में जमावड़ा रहता ही था। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- 'मसि कागद छुयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ। 'उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुंह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। आप के समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। "अवतार, मूर्तिपूजा, रोज़ा, ईद, मस्जिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे।

वे कभी कहते हैं-

'हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया' तो कभी कहते हैं, 'हरि जननी मैं बालक तोरा'।

और कभी "बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे"

उस समय हिंदू जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुंच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे। कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका समादर हो रहा है।

उसी हालत में उन्होंने बनारस छोड़ा और आत्मनिरीक्षण तथा आत्मपरीक्षण करने के लिये देश के विभिन्न भागों की यात्राएं कीं। इसी क्रम में वे कालिंजर जिले के पिथौराबाद शहर में पहुंचे। वहां रामकृष्ण का छोटा सा मन्दिर था। वहां के संत भगवान गोस्वामी के जिज्ञासु साधक थे किंतु उनके तर्कों का अभी तक पूरी तरह समाधान नहीं हुआ था। संत कबीर से उनका विचार-विनिमय हुआ। कबीर की एक साखी ने उन के मन पर गहरा असर किया-

'बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान।

करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।'

वन से भाग कर बहेलिये के द्वारा खोये हुए गड्ढे में गिरा हुआ हाथी अपनी व्यथा किस से कहे?

सारांश यह है कि धर्म की जिज्ञासा में प्रेरित हो कर भगवान गोसाई अपना घर छोड़ कर बाहर तो निकल आये और हरिव्यासी सम्प्रदाय के गड्ढे में गिर कर अकेले निर्वासित हो कर असंवाद्य स्थिति में पड़ चुके हैं।

मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए उन्होंने एक साखी हाजिर कर दी-

'पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार।

वा ते तो चाकी भली, पीसी खाय संसार।।'


कबीर माया पापणी, फंध ले बैठी हटी ।

सब जग तौं फंधै पड्या, गया कबीरा काटी ||

अर्थ - कबीर दास जी कहते है की यह पापिन माया फंदा लेकर बाज़ार में आ बैठी है । इसने  बहुत लोगों पर फंदा डाल दिया है , पर कबीर ने उसे काटकर साफ़ बाहर निकल आयें है । हरि भक्त पर फंदा डालने वाला खुद ही फंस जाता है ।

कबीर के राम

कबीर के राम तो अगम हैं और वे संसार के कण-कण में विराजते हैं। कबीर के राम इस्लाम के एकेश्वरवादी, एकसत्तावादी खुदा भी नहीं हैं। इस्लाम में खुदा या अल्लाह को समस्त जगत एवं जीवों से भिन्न एवं परम समर्थ माना जाता है। पर कबीर के राम परम समर्थ भले हों, लेकिन समस्त जीवों और जगत से भिन्न तो कदापि नहीं हैं। बल्कि इसके विपरीत वे तो सबमें व्याप्त रहने वाले रमता राम हैं। वह कहते हैं
व्यापक ब्रह्म सबनिमैं एकै, को पंडित को जोगी। रावण-राव कवनसूं कवन वेद को रोगी।

कबीर राम की किसी खास रूपाकृति की कल्पना नहीं करते, क्योंकि रूपाकृति की कल्पना करते ही राम किसी खास ढांचे (फ्रेम) में बंध जाते, जो कबीर को किसी भी हालत में मंजूर नहीं। कबीर राम की अवधारणा को एक भिन्न और व्यापक स्वरूप देना चाहते थे। इसके कुछ विशेष कारण थे, जिनकी चर्चा हम इस लेख में आगे करेंगे। किन्तु इसके बावजूद कबीर राम के साथ एक व्यक्तिगत पारिवारिक किस्म का संबंध जरूर स्थापित करते हैं। राम के साथ उनका प्रेम उनकी अलौकिक और महिमाशाली सत्ता को एक क्षण भी भुलाए बगैर सहज प्रेमपरक मानवीय संबंधों के धरातल पर प्रतिष्ठित है।
कबीर नाम में विश्वास रखते हैं, रूप में नहीं। हालांकि भक्ति-संवेदना के सिद्धांतों में यह बात सामान्य रूप से प्रतिष्ठित है कि ‘नाम रूप से बढ़कर है’, लेकिन कबीर ने इस सामान्य सिद्धांत का क्रांतिधर्मी उपयोग किया। कबीर ने राम-नाम के साथ लोकमानस में शताब्दियों से रचे-बसे संश्लिष्ट भावों को उदात्त एवं व्यापक स्वरूप देकर उसे पुराण-प्रतिपादित ब्राह्मणवादी विचारधारा के खांचे में बांधे जाने से रोकने का प्रयास किया।
कबीर के राम निर्गुण-सगुण के भेद से परे हैं। वास्तव में उन्होंने अपने राम को शास्त्र-प्रतिपादित अवतारी, सगुण, वर्चस्वशील वर्णाश्रम व्यवस्था के संरक्षक राम से अलग करने के लिए ही ‘निर्गुण राम’ शब्द का प्रयोग किया–‘निर्गुण राम जपहु रे भाई।’ इस ‘निर्गुण’ शब्द को लेकर भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है । कबीर का आशय इस शब्द से सिर्फ इतना है कि ईश्वर को किसी नाम, रूप, गुण, काल आदि की सीमाओं में बांधा नहीं जा सकता। जो सारी सीमाओं से परे हैं और फिर भी सर्वत्र हैं, वही कबीर के निर्गुण राम हैं। इसे उन्होंने ‘रमता राम’ नाम दिया है। अपने राम को निर्गुण विशेषण देने के बावजूद कबीर उनके साथ मानवीय प्रेम संबंधों की तरह के रिश्ते की बात करते हैं। कभी वह राम को माधुर्य भाव से अपना प्रेमी या पति मान लेते हैं तो कभी दास्य भाव से स्वामी। कभी-कभी वह राम को वात्सल्य मूर्ति के रूप में मां मान लेते हैं और खुद को उनका पुत्र। निर्गुण-निराकार ब्रह्म के साथ भी इस तरह का सरस, सहज, मानवीय प्रेम कबीर की भक्ति की विलक्षणता है। यह दुविधा और समस्या दूसरों को भले हो सकती है कि जिस राम के साथ कबीर इतने अनन्य, मानवीय संबंधपरक प्रेम करते हों, वह भला निर्गुण कैसे हो सकते हैं, पर खुद कबीर के लिए यह समस्या नहीं है।
वह कहते भी हैं
“संतौ, धोखा कासूं कहिये। गुनमैं निरगुन, निरगुनमैं गुन, बाट छांड़ि क्यूं बहिसे!” नहीं है।

प्रोफेसर महावीर सरन जैन ने कबीर के राम एवं कबीर की साधना के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है : " कबीर का सारा जीवन सत्‍य की खोज तथा असत्‍य के खंडन में व्‍यतीत हुआ। कबीर की साधना ‘‘मानने से नहीं, ‘‘जानने से आरम्‍भ होती है। वे किसी के शिष्‍य नहीं, रामानन्‍द द्वारा चेताये हुए चेला हैं। उनके लिए राम रूप नहीं है, दशरथी राम नहीं है, उनके राम तो नाम साधना के प्रतीक हैं। उनके राम किसी सम्‍प्रदाय, जाति या देश की सीमाओं में कैद नहीं है। प्रकृति के कण-कण में, अंग-अंग में रमण करने पर भी जिसे अनंग स्‍पर्श नहीं कर सकता, वे अलख, अविनाशी, परम तत्‍व ही राम हैं। उनके राम मनुष्‍य और मनुष्‍य के बीच किसी भेद-भाव के कारक नहीं हैं। वे तो प्रेम तत्‍व के प्रतीक हैं। भाव से ऊपर उठकर महाभाव या प्रेम के आराध्‍य हैं ः-

‘प्रेम जगावै विरह को, विरह जगावै पीउ, पीउ जगावै जीव को, जोइ पीउ सोई जीउ' - जो पीउ है, वही जीव है। इसी कारण उनकी पूरी साधना ‘‘हंस उबारन आए की साधना है। इस हंस का उबारना पोथियों के पढ़ने से नहीं हो सकता, ढाई आखर प्रेम के आचरण से ही हो सकता है। धर्म ओढ़ने की चीज नहीं है, जीवन में आचरण करने की सतत सत्‍य साधना है। उनकी साधना प्रेम से आरम्‍भ होती है। इतना गहरा प्रेम करो कि वही तुम्‍हारे लिए परमात्‍मा हो जाए। उसको पाने की इतनी उत्‍कण्‍ठा हो जाए कि सबसे वैराग्‍य हो जाए, विरह भाव हो जाए तभी उस ध्‍यान समाधि में पीउ जाग्रत हो सकता है। वही पीउ तुम्‍हारे अर्न्‍तमन में बैठे जीव को जगा सकता है। जोई पीउ है सोई जीउ है। तब तुम पूरे संसार से प्रेम करोगे, तब संसार का प्रत्‍येक जीव तुम्‍हारे प्रेम का पात्र बन जाएगा। सारा अहंकार, सारा द्वेष दूर हो जाएगा। फिर महाभाव जगेगा। इसी महाभाव से पूरा संसार पिउ का घर हो जाता है।

सूरज चन्‍द्र का एक ही उजियारा, सब यहि पसरा ब्रह्म पसारा।

जल में कुम्‍भ, कुम्‍भ में जल है, बाहर भीतर पानी

फूटा कुम्‍भ जल जलहीं समाना, यह तथ कथौ गियानी।"

सन्दर्भ

  1. Kabir Archived 2015-04-26 at the Wayback Machine Encyclopædia Britannica (2015)Accessed: July 27, 2015
  2. Hugh Tinker (1990). South Asia: A Short History. University of Hawaii Press. पपृ॰ 75–77. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-8248-1287-4. मूल से 31 दिसंबर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 12 July 2012.
  3. Carol Henderson Garcia; Carol E. Henderson (2002). Culture and Customs of India. Greenwood Publishing Group. पपृ॰ 70–71. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-313-30513-9. मूल से 31 दिसंबर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 12 July 2012.
  4. David Lorenzen (Editors: Karine Schomer and W. H. McLeod, 1987), The Sants: Studies in a Devotional Tradition of India, Motilal Banarsidass Publishers, ISBN 978-81-208-0277-3, pages 281–302
  5. "पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी: सभी आत्माओं के जनक - Jagat Guru Rampal Ji". www.jagatgururampalji.org. अभिगमन तिथि 2021-06-10.
  6. Kabir Das
  7. नवभारतटाइम्स.कॉम (2018-06-28). "यकीन मानिए, आपने कभी ऐसा गुरु और शिष्य नहीं देखा होगा". नवभारत टाइम्स. अभिगमन तिथि 2021-06-11.
  8. "कबीर प्रकट दिवस 2021: तिथि, उत्सव, घटनाएँ, इतिहास - Jagat Guru Rampal Ji". www.jagatgururampalji.org. अभिगमन तिथि 2021-06-14.

इन्हें भी देखें

कबीर पंथ
भक्ति काल
भक्त कवियों की सूची
हिंदी साहित्य

बाहरी कड़ियां