कीर्तन

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हिन्दू धर्म में ईश्वर या देवता की भक्ति के लिये उनके नामों को भांति-भांति रूप में उच्चारना कीर्तन कहलाता है। यह भक्ति के अनेक मार्गों में से एक है। अन्य हैं - श्रवण, स्मरण, अर्चन आदि।नारदीय कीर्तन भी कीर्तन का एक प्रकार है जिसमें देवर्षी नारद के चलते -फिरते हरिगुण गान करने की परंपरा है;कीर्तन की इस पुरानी शैली का प्रचलन भारत के अनेकों राज्यों में रहा है;महाराष्ट्र में तो कीर्तन की इस शैली का खूब प्रचार है;अखिल भारतीय स्तर पर नारदीय कीर्तन का आयोजन होता है; किन्तु अन्य राज्यों में भी यथा-राजस्थान,बिहार,झारखण्ड आदि में भी नारदीय कीर्तन का आयोजन धार्मिक अनुष्ठानों में होता रहा है;झारखण्ड राज्य के कई जिले जैसे कोडरमा,गिरिडिह,बोकारो,धनबाद,दुमका में भगवान सत्यनारायण के पूजन के अवसर पर घर-धर में चौपहरा नामक अनुष्ठान होता है जिसमें नारदीय कीर्तन मंडली पूरी रात अपना गायन प्रस्तूत करती हैं जिसमें यसूर,तुलसी,मीरा,कबीर,नामदेव जैसे भक्त कवियों के पद के साथ-साथ स्थानीय लोकभाषा में रचे पारंपरिक व आधनिक भक्तिपदों का गायन होता है;ये पद शास्त्रीय रागों में निबद्ध होते हैं ;अत:समयानुसार पदों को गाने की परंपरा है;नारदीय कीर्तन में तो वैसे वीणा,मृदंग,बाँसुरी,करताल झाल व झांझ जैसे वाद्यों का प्रयोग होने का वर्णन है परन्तु आजकल हारमोनियम,ढोलक,खोल व झाल का प्रयोग होता है;इसमें प्राय:पौराणिक कथाओं का कथाशैली में गायन किया जाता है;

इन्हें भी देखें[संपादित करें]