अल्मोड़ा का इतिहास

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२०१३ में अल्मोड़ा

अल्मोड़ा, भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक नगर है। यह अल्मोड़ा जिले का प्रशासनिक मुख्यालय भी है। इस नगर को राजा कल्याण चंद ने १५६८ में स्थापित किया था। महाभारत (८ वीं और ९वीं शताब्दी ईसा पूर्व) के समय से ही यहां की पहाड़ियों और आसपास के क्षेत्रों में मानव बस्तियों के विवरण मिलते हैं। अल्मोड़ा, कुमाऊँ राज्य पर शासन करने वाले चंदवंशीय राजाओं की राजधानी थी।

पौराणिक सन्दर्भ[संपादित करें]

कूर्म अवतार में भगवान विष्णु
माना जाता है कि अल्मोड़ा नगर के पर्वत पर भगवान विष्णु का निवास था।
कौशिकी शाल्मली मध्ये पुण्यः काषाय पर्वतः।
'तस्य पश्चिम भागे वै क्षेत्र विष्णो प्रतिष्ठितम्‌॥

स्कन्दपुराण के मानसखंड में कहा गया है कि कौशिकी (कोशी) और शाल्मली (सुयाल) नदियों के बीच में एक पावन पर्वत स्थित है। यह पर्वत और कोई पर्वत न होकर अल्मोड़ा नगर का पर्वत है। यह कहा जाता है कि इस पर्वत पर विष्णु का निवास था। कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि विष्णु का कूर्मावतार इसी पर्वत पर हुआ था।

एक कथा के अनुसार यह कहा जाता है कि अल्मोड़ा की कौशिका देवी ने शुंभ और निशुंभ नामक दानवों को इसी क्षेत्र में मारा था। कहानियाँ अनेक हैं, परन्तु एक बात पूर्णत: सत्य है कि प्राचनी युग से ही इस स्थान का धार्मिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक महत्व रहा है।

प्राचीन इतिहास[संपादित करें]

जागेश्वर का मंदिर।
९ वीं से १३ वीं शताब्दी के मध्य निर्मित यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है।

स्थानीय परंपरा के अनुसार, तिवारी अल्मोड़ा के सबसे पहले निवासियों में थे, जो कटारमल के सूर्य मंदिर में बर्तनों की सफाई के लिए रोज़ एक प्रकार की वनस्पति की आपूर्ति करते थे। प्राचीन ग्रंथों, जैसे विष्णु पुराण और स्कन्दपुराण में इस क्षेत्र में मानव बस्तियों के होने का वर्णन है। शक, नाग, किराट, खस और हुन जातियों को इस क्षेत्र की सबसे प्राचीन जनजातियों के रूप में श्रेय दिया जाता है।

हस्तिनापुर शाही परिवार के कौरव और पांडव मैदानी इलाकों के अगले महत्वपूर्ण राजकुमार थे, जिन्होंने इन हिस्सों पर विजय प्राप्त कर इन्हें प्रभावित किया। महाभारत युद्ध के बाद, यहां हस्तिनापुर के राजाओं का शासन कुछ समय तक बना रहा, हालांकि उनका अधिकार नाममात्र से अधिक नहीं था। वास्तविक शासक स्थानीय ही थे, जिनमें से कुनिंदा (या कुलिंडा) प्रमुख थे। खस अन्य प्राचीन लोग थे, जो प्रारंभिक आर्यन लोगों से संबंधित थे और उन दिनों व्यापक रूप से बिखरे हुए थे। उन्होंने ही इस क्षेत्र को खसदेश या खसमंडल का नाम दिया।

प्राचीन अल्मोड़ा कस्बा, अपनी स्थापना से पहले कत्यूरी राजा बैचल्देव के अधीन था। उस राजा ने अपनी धरती का एक बड़ा भाग एक गुजराती ब्राह्मण श्री चांद तिवारी को दान दे दिया। कत्यूरी राजाओं के समय में इसे राजपुर कहा जाता था। 'राजपुर' नाम का बहुत सी प्राचीन ताँबे की प्लेटों पर भी उल्लेख मिला है।

अल्मोड़ा में चंदों के आगमन से पहले दो राजा नगर के दोनों छोरों पर स्थित दो किलों में रहते थे। नगर के दक्षिण में खागमरा नामक किला था, जिसमें कत्यूरी राजा बैचल्देव उर्फ बैजलदेव का महल था। कत्यूरी राजाओं ने इस किले को नवीं शताब्दी में बनवाया था। राजा बैचल्देव का शासन बारामण्डल के कुछ इलाके तक ही था। वहीं नगर के उत्तर-पश्चिम में, एक पर्वत के अंत में, रेयलाकोट का किला था, जो कि पूर्वकाल में रेयला समुदाय के एक राजा का महल था। कहा जाता है कि इस महल में स्फटिक के खंभे फिट थे। अाज भी इस किले के खंडहर विद्यमान् हैं। रेयलाओं के वंशज अल्मोड़ा में चंदों के आने तक उपस्थित थे।

स्थापना से १७ वीं शताब्दी तक[संपादित करें]

कीर्ति चंद ने बारहमण्डल पर हमला किया और अपने राज्य में शामिल कर लिया। जब राजा भीष्म चंद ने खागमरा के किले के पास नई राजधानी की नींव रखी, तो उन्होंने शुरू में इसे आलमनगर नाम दिया था, हालांकि यह नाम लोकप्रिय नहीं हो सका। उनकी मृत्यु पर उनके पुत्र कल्याण चंद द्वारा १५६८ में अल्मोड़ा कस्बे की स्थापना की गई। अल्मोड़ा नगर के मध्य में मल्लाताल नाम का एक दूसरा किला भी है। इसे राजा रूद्र चंद ने सन् १५६३ ई. में बनवाया था। अदालत और शाही खजाने यहां स्थित थे। कोलमती पर्वत में अल्मोड़ा के उत्तर में चंद राजाओं का शस्त्रागार था।

राजा रूद्र चंद ने अल्मोड़ा में ही संस्कृत के अध्ययन के लिए सुविधाएं प्रदान करवाई थी। उनके पुत्र लक्ष्मी चंद ने अल्मोड़ा में महादेव का मंदिर बनाया और इसका नाम लक्ष्मेश्वर रखा। बाज बहादुर चंद ने पिंडर घाटी में स्थित बन्धन गढ़ और लोहाबा पर हमला किया और जुनेगढ़ पर कब्जा करने में सफल रहे। अपनी जीत मनाने के लिए, उन्होंने वहां के मंदिर से नंददेवी की मूर्ति ली और इसे अल्मोड़ा के पुराने किले में स्थित एक मंदिर में स्थापित किया। १६८८ में, राजा उद्योत चंद ने गढ़वाल और डोटी पर अपनी जीत को चिन्हित करने के लिए अल्मोड़ा में कई मंदिरों की स्थापना की, जिनमें त्रिपुर सुंदरी, उद्योत चंदेश्वर और परबतेश्वर शामिल थे। अल्मोड़ा में गणेश मंदिर के पुनर्निर्माण का श्रेय राजा ज्ञान चंद को दिया जाता है।

१८ वीं शताब्दी[संपादित करें]

लाल मंडी का किला, (फोर्ट मोइरा) अल्मोड़ा, १८१५

१७४४ में, रोहिल्ला नेता अली मोहम्मद खान ने इस इलाके में एक सेना को भेजा और भीमताल के रास्ते से अल्मोड़ा में प्रवेश किया। चन्द सेना उनका विरोध नहीं कर पाई, क्योंकि तत्कालीन शासक कल्याण चंद, कमजोर और अप्रभावी थे। रोहिल्लाओं ने अल्मोड़ा पर कब्जा कर लिया, और सात महीनों तक वहां ही रहे। इस समय में उन्होंने राज्य के बहुत से मंदिरों को नुकसान भी पहुंचाया। हालांकि अंततः क्षेत्र के कठोर मौसम से तंग आकर, और तीन लाख रुपए के हर्जाने के भुगतान पर, रोहिल्ला वापस अपनी राजधानी बरेली लौट गये।

१७९१ में, नेपाल के गोरखाओं ने काली नदी के पश्चिम की ओर अपने राज्य का विस्तार करने के लिये अल्मोड़ा पर आक्रमण किया, और उस पर आसानी से कब्जा कर लिया। फलस्वरूप कुमाऊं साम्राज्य का अंत हो गया और राजधानी के तौर पर अल्मोड़ा का महत्तव समाप्त हो गया। गोरखा शासन चौबीस साल तक चला था। गोरखाओं ने काली से अलकनंदा तक सड़क का निर्माण किया था। यह सड़क अल्मोड़ा होते हुए ही काली से श्रीनगर तक पहुंचती थी। गोरखा शासन के समय अल्मोड़ा में लगभग १००० घर थे, और यह कुमाऊं क्षेत्र का सबसे बड़ा नगर था।

१९ वीं शताब्दी[संपादित करें]

अल्मोड़ा बाजार, 1860
१९वीं शताब्दी के अंत में अल्मोड़ा का दृश्य
अल्मोड़ा में स्थित लंदन मिशनरी का भवन।
२० वीं शताब्दी की शुरुआत में अल्मोड़ा लंदन मिशनरी और अमेरिकन मेथडिस्ट बिशप मिशन का मुख्यालय था।
नैनीताल और अल्मोड़ा के बीच झूला पुल

१८०० के बाद से तराई के ब्रिटिश क्षेत्र में उनकी बार-बार घुसपैठ के कारण, भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड मोइरा ने दिसंबर १८१४ में अल्मोड़ा पर हमला करने का फैसला किया जो एंग्लो-गोरखा युद्ध की शुरुआत का प्रतीक था। गोरखा सेना ने सितोली के किले से अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला। २६ अप्रैल को कर्नल निकोलस द्वारा भारी तोपें दागे जाने के बाद, गोरखाओं द्वारा आत्मसमर्पण के लिए निष्कर्ष निकाला गया। २७ अप्रैल १८१५ को अंग्रेज अल्मोड़ा पर कब्जे के कारण, पूरे कुमाऊं को अपने वर्चस्व के अधीन ले आये थे। ३० अप्रैल १८१५ को गोरखाओं ने सामान बांधा और समझौते की शर्तों के अनुसार झूलाघाट के रास्ते से डोटी चले गये। श्री गार्डनर ने ३ मई १८१५ को एक घोषणा जारी की कि कुमाऊं को ब्रिटिश साम्राज्य से जोड़ा जा चुका है। ३ मई १८१५ को ही गवर्नर-जनरल के आदेश से ई गार्डनर को कुमाऊं का आयुक्त और गवर्नर-जनरल का एजेंट नियुक्त किया गया। बाद में १८१६ में गोरखाओं ने सुगौली संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसके अनुसार नेपाल ने उन सभी प्रदेशों को वापस सौंप दिया जो कि गोरखाओं ने कब्जा कर लिया था। युद्ध के बाद, अल्मोड़ा के लाल मंडी किले का नाम 'फोर्ट मोइरा' रखा गया था।

श्री ट्रेल लिखते हैं कि १८२१ में, अल्मोड़ा में ७४२ घर थे, जिनमें ९३६९ पुरुष, ११७८ महिलाएं और ९६८ बच्चे रहते थे, और कुल जनसंख्या ३५०५ थी। अल्मोड़ा पर विजय प्राप्ति के बाद, १८३९ तक अंग्रेजी सेना के सैनिक और अधिकारी हवलबाग में रहते थे। बाद में सेना के कार्यालयों को अल्मोड़ा स्थानांतरित किया गया और सेना को लोहाघाट और पिथौरागढ़ में तैनात कर दिया गया। इस सेना को ही बाद में कुमाऊं बटालियन कहा जाने लगा। १८४६ में इसे वापस लालमांडी के किले में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां यह रानीखेत छावनी बनने तक तैनात रही।

अल्मोड़ा में कुष्ठ रोगियों के लिये इलाज की व्यवस्था श्री रामसे द्वारा की गई थी। १८०४ में श्री रामसे ने सरकार की अनुमति के साथ हवलबाग मे कुष्ठ रोगियों को स्थान दिया था। १८३६ के बाद से ही उन्होंने शहर में आए कुष्ठ रोगियों को भोजन और कपड़े वितरित करना शुरू कर दिया था। १८४० में २० लोगों की क्षमता वाला कॉटेज गणेशगैर में बनाया गया था। १८४८ में, वर्तमान अस्पताल के पास, एक इमारत का अधिग्रहण किया गया और १८५१ में इस अस्पताल के प्रभारी फरहर बुडन को रखा गया। तब इसमें ३१ कोढ़ी थे। १८५४ में ए.यू. मिशनरी ने इस अस्पताल की सदस्यता उठाई, और वर्तमान स्थान को अधिग्रहित कर वहां एक लेपर-हाउस की स्थापना की।

१८३७ में स्थापित अल्मोड़ा का पुलिस स्टेशन पहाड़ियों में सबसे पुराना है। यह अनुमान है कि यहां जेल की स्थापना १८२२-२३ में हुई थी। १८४४ में अल्मोड़ा में एक मिशन स्कूल खोला गया था जो १८७१ में रामसे कॉलेज में परिवर्तित हुआ था, लेकिन फिर, उसे वापस एक हाई स्कूल में परिवर्तित किया गया। यह पहला स्कूल है, जिसने अल्मोड़ा में अंग्रेजी शिक्षा शुरू की। वर्ष १८५१ में जिक्र बोर्ड स्थापित किया गया था। १८६४ में अल्मोड़ा नगर पालिका का गठन किया गया। जिक्र बोर्ड में पहले सरकार द्वारा सदस्यों को नियुक्त किया जाता था। चुनाव की व्यवस्था १८९८ में शुरू की गई थी, और पहला चुनाव १८९९ में हुआ था। जिक्र बोर्ड का पहला गैर-सरकारी अध्यक्ष १९११ में चुना गया था।

अल्मोड़ा में सबसे पहले प्रेस खोलने और अख़बार प्रकाशित करने का श्रेय पंडित बुद्बिबल्लभ पंत को दिया जाता है। १८७१ में उन्होंने एक बहस क्लब खोला। बाद में श्री पंत ने यहां एक प्रेस खोला और एक साप्ताहिक पत्रिका अल्मोड़ा अखबार भी प्रकाशित किया। पहले वह खुद इसे संपादित करते थे, लेकिन बाद में यह काम मुन्शी सदनंद सानवाल ने संभाला। अल्मोड़ा अखबार इस प्रांत की सबसे पुरानी हिंदी साप्ताहिक थी। १८९३-९४ में बाबू देवीदस ने 'कुमाऊं प्रिंटिंग प्रेस' खोला, जिसने 'कुर्मांचल समाचार' नामक साप्ताहिक प्रकाशित किया। कुमाऊँ प्रिंटिंग से एक अन्य साप्ताहिक, 'कुर्मांचल मित्र' भी प्रकाशित हुआ करता था, लेकिन कुछ समय बाद इसे रोक दिया गया था।

२० वीं शताब्दी[संपादित करें]

२० वीं शताब्दी की शुरुआत तक, अल्मोड़ा अल्मोड़ा जिले का मुख्यालय बन गया था। यह लंदन मिशनरी और अमेरिकन मेथडिस्ट बिशप मिशन का मुख्यालय भी था। १९०१ में एक नया अस्पताल अल्मोड़ा में स्थापित किया गया था। महिला अस्पताल १९२७ में खोला गया। अल्मोड़ा टाउन स्कूल की स्थापना १९०७ में हुई थी। १९३२ में शीतलाखेत में एसएस बॉय स्काउट एसोसिएशन के निर्मलवन ग्रीष्मकालीन शिविर को खोला गया। १९२० में पहली मोटर लॉरी अल्मोड़ा पहुंची थी, तब से ही मोटर परिवहन काफी लोकप्रिय हो गया। १९३७ तक, अल्मोड़ा से टेलीग्राम लोहाघाट, पिथौरागढ़, मुक्तेश्वर और रानीखेत तक भेजा जा सकता था। रानीखेत के जरिए नैनीताल और अन्य क्षेत्रों के लिए टेलीफ़ोनिक कॉल भी किए जा सकते थे। १९४० में अल्मोड़ा में लगभग ३५ निरीक्षण बंगले थे।

१९१३ में श्री बद्री दत्त पाण्डेय ने अल्मोड़ा अखबार का संपादन अपने हाथों में ले किया। उसने ही इसे राष्ट्रीय रंग दिया, जिससे इसने बहुत प्रगति की। अल्मोड़ा अखबार के ग्राहकों की संख्या ५०-६० से बढ़कर १५०० हो गई थी, लेकिन १९१७ में इसे बंद कर दिया गया। १९१८ में ही बद्री दत्त पाण्डेय ने अपने दोस्तों की मदद से देशभक्त नामक प्रेस खोला, और उसमें से एक पत्रिका, शक्ति प्रकाशित की, जो एक राष्ट्रीय पत्रिका थी। शक्ति की नीतियों पर नाखुश होने के कारण कुछ साझेदारों ने अपना शेयर वापस ले लिया और १९१९ में सोमबारी प्रेस खोला, जिसमें से कुछ समय के लिए ज्योति नामक एक पत्रिका प्रकाशित हुई।

अल्मोड़ा के एसएसजे कैम्पस में स्थित भूगोल विभाग १९५५ में स्थापित कुमाऊं विश्वविद्यालय के सबसे पुराने विभागों में से एक है। अल्मोड़ा कॉलेज पहले आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध डिग्री कॉलेज हुआ करता था। १९७३ में नैनीताल में कुमाऊं विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही, यह कुमाऊं विश्वविद्यालय का घटक महाविद्यालय बन गया और १९९४ में इसे विश्वविद्यालय के कैंपस का दर्जा दे दिया गया।

२१ वीं शताब्दी[संपादित करें]

९ नवंबर २००० को उत्तराखंड राज्य की स्थापना पर, अल्मोड़ा नए राज्य का एक हिस्सा बन गया। ६ सितम्बर २०१६ को यहां उत्तराखण्ड आवासीय विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, और फिर अप्रैल २०१७ में अल्मोड़ा में ही स्थित उदय शंकर राष्ट्रीय संगीत नाट्य अकादमी और स्व. जगत सिंह बिष्ट राजकीय होटल मैनेजमेंट संस्थान को आवासीय विवि के अधीन कर दिया गया।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  • वॉल्टन, एच. जी. (1911). Almora: A Gazetteer [अल्मोड़ा: एक गैजेटियर] (अंग्रेज़ी में). इलाहाबाद: सरकारी प्रेस, संयुक्त प्रान्त.
  • एटकिंसन, एडविन टी (1974). Kumaun hills [कुमाऊंनी पहाड़ियां] (अंग्रेज़ी में). दिल्ली: कॉस्मो प्रकाशन.
  • पाण्डेय, बद्री दत्त (1937). कुमाऊं का इतिहास. अल्मोड़ा: श्याम प्रकाशन.