भील भाषा

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भील भाषायें पश्चिमी हिन्द-आर्य भाषाओं का एक समूह है जिन्हें मध्य, पश्चिमी और कम संख्या में भारत के पूर्वी भाग के लगभग 6० लाख भील बोलते हैं। अन्य वनवासियों के समान अभिव्यक्ति के लिये भीलों के पास भी बोली तो है परन्तु लिपि नहीं। इसके बावजूद भी भील वनवासियों के कल्पनाशील और मेधा सम्पत्र व्यक्तियों ने साहित्य सृजन की अद्भुत प्रतिभा प्रदर्शित की है। भील वनवासियों का समस्त साहित्य सृजन मौखिक ही हुआ है और हस्तांतरण भी मौखिक ही होता रहा है। इस संदर्भ में महत्वपूर्ण यह है कि लिपि न होने के बावजूद भीलों की साहित्यिक धरोहर सम्पन्न और सशक्त है। साहित्य की समस्त विधाएं जैसे कथा, गल्प, गीत, पहेलियां, मुहावरे आदि सब कुछ इनके पास हैं। इनकी लोककथाएं और लोकगीत जीवन के सभी पक्षों को अभिव्यक्त करते हैं। हास-परिहास, जीवन-दर्शन, स्वयं की उत्पत्ति, दैनंदिन की समस्याएं, जन्म से मृत्यु तक के संस्कार, बाह्य जगत के साथ उनके अनुभव आदि सब विषयों पर इन्होंने साहित्य सृजन किया है।[1]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "विलक्षण है भील आदिवासियों की भाषा". भारतीय पक्ष. http://www.bhartiyapaksha.com/?p=2136. अभिगमन तिथि: मई २९, २०१३.