नवग्रह

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ग्रह (संस्कृत के ग्रह से - पकड़ना, कब्जे में करना[1]) माता भूमिदेवी (पृथ्वी) के प्राणियों पर एक 'ब्रह्मांडीय प्रभावकारी' है. हिन्दू ज्योतिष में नवग्रह (संस्कृत: नवग्रह, नौ ग्रह या नौ प्रभावकारी) इन प्रमुख प्रभावकारियों में से हैं.

राशि चक्र में स्थिर सितारों की पृष्ठभूमि के संबंध में सभी नवग्रह की सापेक्ष गतिविधि होती है. इसमें ग्रह भी शामिल हैं: मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, और शनि, सूर्य, चंद्रमा, और साथ ही साथ आकाश में अवस्थितियां, राहू (उत्तर या आरोही चंद्र आसंधि) और केतु (दक्षिण या अवरोही चंद्र आसंधि).

कुछ लोगों के अनुसार, ग्रह "प्रभावों के चिह्नक हैं" जो प्राणियों के व्यवहार पर लौकिक प्रभाव को इंगित करते हैं. वे खुद प्रेरणा तत्व नहीं हैं[2] लेकिन उनकी तुलना यातायात सिग्नल से की जा सकती है.

ज्योतिष ग्रंथ प्रश्न मार्ग के अनुसार, कई अन्य आध्यात्मिक सत्ता हैं जिन्हें ग्रह या आत्मा कहा जाता है. कहा जाता है कि सभी (नवग्रह को छोड़कर) भगवान शिव या रुद्र के क्रोध से उत्पन्न हुए हैं. अधिकांश ग्रह की प्रकृति आम तौर पर हानिकर है, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो शुभ हैं. [3] 'ग्रह पिंड' शीर्षक के तहत, पुस्तक द पुराणिक इनसाइक्लोपीडिया , ऐसे ग्रहों की (आध्यात्मिक सत्ता की आत्माएं) एक सूची प्रदान करती है, जो माना जाता है कि बच्चों को सताते हैं, आदि. इसी किताब में विभिन्न जगहों पर ग्रहों का नाम दिया गया है, जैसे 'स्खंड ग्रह' जो माना जाता है कि गर्भपात का कारण होता है. [4]

ज्योतिष[संपादित करें]

ज्योतिषियों का दावा है कि पृथ्वी से जुड़े प्राणियों की प्रभा (ऊर्जा पिंडों) और मन को ग्रह प्रभावित करते हैं. प्रत्येक ग्रह में एक विशिष्ट ऊर्जा गुणवत्ता होती है, जिसे उसके लिखित और ज्योतिषीय सन्दर्भों के माध्यम से एक रूपक शैली में वर्णित किया जाता है. ग्रहों की ऊर्जा किसी व्यक्ति के भाग्य के साथ एक विशिष्ट तरीके से उस वक्त जुड़ जाती है जब वे अपने जन्मस्थान पर अपनी पहली सांस लेते हैं. यह ऊर्जा जुड़ाव धरती के निवासियों के साथ तब तक रहता है जब तक उनका वर्तमान शरीर जीवित रहता है. [5] "नौ ग्रह, सार्वभौमिक, आद्यप्ररुपीय ऊर्जा के संचारक हैं. प्रत्येक ग्रह के गुण स्थूल जगत और सूक्ष्म जगत वाले ब्रह्मांड की ध्रुवाभिसारिता के समग्र संतुलन को बनाए रखने में मदद करते हैं, जैसे नीचे वैसे ही ऊपर. [6]

मनुष्य भी, ग्रह या उसके स्वामी देवता के साथ संयम के माध्यम से किसी विशिष्ट ग्रह की चुनिन्दा ऊर्जा के साथ खुद की अनुकूलता बिठाने में सक्षम हैं. विशिष्ट देवताओं की पूजा का प्रभाव उनकी सम्बंधित ऊर्जा के माध्यम से पूजा करने वाले व्यक्ति के लिए तदनुसार फलता है, विशेष रूप से सम्बंधित ग्रह द्वारा धारण किये गए भाव के अनुसार. "ब्रह्मांडीय ऊर्जा जो हम हमेशा प्राप्त करते हैं उसमें अलग-अलग खगोलीय पिंडों से आ रही ऊर्जा शामिल होती हैं." "जब हम बार-बार किसी मंत्र का उच्चारण करते हैं तो हम किसी ख़ास फ्रीक्वेंसी के साथ तालमेल बैठाते हैं और यह फ्रीक्वेंसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ संपर्क स्थापित करती है और उसे हमारे शरीर के भीतर और आसपास खींचती है." [7]

इस धारणा की चर्चा कि ग्रह, तारे और अन्य खगोलीय पिंड, ऊर्जा की ऐसी सजीव सत्ता हैं जो ब्रह्माण्ड के अन्य प्राणियों को प्रभावित करते हैं कई अन्य प्राचीन संस्कृतियों में भी मिलती है और इस मान्यता का उपयोग कई आधुनिक कथा साहित्य की पृष्ठभूमि में किया गया है (जैसे स्टैनिस्ला लर्न द्वारा सोलारिस, इसी शीर्षक की फिल्म भी देखें).

नवग्रह[संपादित करें]

Navagraha, British Museum originally from Konark, Orissa. From left:  Surya, Chandra, Mangala, Budha, Brihaspati, Shukra, Shani, Rahu, Ketu Navagraha, British Museum originally from Konark, Orissa. From left:  Surya, Chandra, Mangala, Budha, Brihaspati, Shukra, Shani, Rahu, Ketu
Navagraha, British Museum originally from Konark, Orissa. From left: Surya, Chandra, Mangala, Budha, Brihaspati, Shukra, Shani, Rahu, Ketu

सूर्य[संपादित करें]

सूर्य (देवनागरी: सूर्य, sūrya ) मुखिया है, सौर देवता, आदित्यों में से एक, कश्यप और उनकी पत्नियों में से एक अदिति के पुत्र[8], इंद्र का, या द्यौस पितर का (संस्करण पर निर्भर करते हुए). उनके बाल और हाथ स्वर्ण के हैं. उनके रथ को सात घोड़े खींचते हैं, जो सात चक्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं. वे "रवि" के रूप में "रवि-वार" या इतवार के स्वामी हैं.

हिंदू धार्मिक साहित्य में, सूर्य को विशेष रूप से भगवान का दृश्य रूप कहा गया है जिसे कोई प्राणी हर दिन देख सकता है. इसके अलावा, शैव और वैष्णव सूर्य को अक्सर क्रमशः, शिव और विष्णु के एक पहलू के रूप में मानते हैं. उदाहरण के लिए, सूर्य को वैष्णव द्वारा सूर्य नारायण कहा जाता है. शैव धर्मशास्त्र में, सूर्य को शिव के आठ रूपों में से एक कहा जाता है, जिसका नाम अष्टमूर्ति है.

उन्हें सत्व गुण का माना जाता है और वे आत्मा, राजा, ऊंचे व्यक्तियों या पिता का प्रतिनिधित्व करते हैं.

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य की अधिक प्रसिद्ध संततियों में हैं शनि (सैटर्न), यम (मृत्यु के देवता) और कर्ण (महाभारत वाले).

माना जाता है कि गायत्री मंत्र या आदित्य हृदय मंत्र (आदित्यहृदयम) का जप भगवान सूर्य को प्रसन्न करता है.सूर्य के साथ जुड़ा अन्न है गेहूं.

चंद्र[संपादित करें]

चन्द्र एक चन्द्र देवता हैं. चंद्र (चांद) को सोम के रूप में भी जाना जाता है और उन्हें वैदिक चंद्र देवता सोम के साथ पहचाना जाता है. उन्हें जवान, सुंदर, गौर, द्विबाहु के रूप में वर्णित किया गया है और उनके हाथों में एक मुगदर और एक कमल रहता है.[9] वे हर रात पूरे आकाश में अपना रथ (चांद) चलाते हैं, जिसे दस सफेद घोड़े या मृग द्वारा खींचा जाता है. वह ओस से जुड़े हुए हैं, और जनन क्षमता के देवताओं में से एक हैं. उन्हें निषादिपति भी कहा जाता है (निशा=रात; आदिपति=देवता) शुपारक (जो रात्रि को आलोकित करे) [10] सोम के रूप में वे, सोमवारम या सोमवार के स्वामी हैं. वे सत्व गुण वाले हैं और मन, माता की रानी का प्रतिनिधित्व करते हैं.

मंगल[संपादित करें]

मंगल, लाल ग्रह मंगल के देवता हैं. मंगल ग्रह को संस्कृत में अंगारक भी कहा जाता है ('जो लाल रंग का है') या भौम ('भूमि का पुत्र'). वह युद्ध के देवता हैं और ब्रह्मचारी हैं. उन्हें पृथ्वी, या भूमि अर्थात पृथ्वी देवी की संतान माना जाता है. वह वृश्चिक और मेष राशि के स्वामी हैं, और मनोगत विज्ञान (रुचका महापुरुष योग) के एक शिक्षक हैं. उनकी प्रकृति तमस गुण वाली है और वे ऊर्जावान कार्रवाई, आत्मविश्वास और अहंकार का प्रतिनिधित्व करते हैं.

उन्हें लाल रंग या लौ के रंग में रंगा जाता है, चतुर्भुज, एक त्रिशूल, मुगदर, कमल और एक भाला लिए हुए चित्रित किया जाता है. उनका वाहन एक भेड़ा है. वे 'मंगल-वार' के स्वामी हैं. [10]

बुध[संपादित करें]

बुध, बुध ग्रह का देवता है और चन्द्र (चांद) और तारा (तारक) का पुत्र है. वे व्यापार के देवता भी हैं और व्यापारियों के रक्षक भी. वे रजो गुण वाले हैं और संवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं.

उन्हें शांत, सुवक्ता और हरे रंग में प्रस्तुत किया जाता है. उनके हाथों में एक कृपाण, एक मुगदर और एक ढाल होती है और वे रामगर मंदिर में एक पंख वाले शेर की सवारी करते हैं. अन्य चित्रों में, उनके हाथों में एक राजदंड और कमल होता है और वे एक कालीन या एक गरुड़ अथवा शेरों वाले रथ की सवारी करते हैं.[11]

बुध बुधवार के मालिक हैं. आधुनिक हिन्दी, तेलुगु, बंगाली, मराठी, कन्नड़ और गुजराती में इसे बुधवार कहा जाता है; मलयालम और तमिल में इसे बुधन कहते हैं.

बृहस्पति[संपादित करें]

बृहस्पति, देवताओं के गुरु हैं, शील और धर्म के अवतार हैं, प्रार्थनाओं और बलिदानों के मुख्य प्रस्तावक हैं, जिन्हें देवताओं के पुरोहित के रूप में प्रदर्शित किया जाता है और वे मनुष्यों के लिए मध्यस्त हैं. वे बृहस्पति ग्रह के स्वामी हैं. वे सत्व गुणी हैं और ज्ञान और शिक्षण का प्रतिनिधित्व करते हैं.अधिकांश लोग बृहस्पति को "गुरु" बुलाते हैं.

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, वे देवताओं के गुरु हैं और दानवों के गुरु शुक्राचार्य के कट्टर विरोधी हैं. उन्हें गुरु के रूप में भी जाना जाता है, ज्ञान और वाग्मिता के देवता, जिनके नाम कई कृतियां हैं, जैसे कि "नास्तिक" बार्हस्पत्य सूत्र.

वे पीले या सुनहरे रंग के हैं और एक छड़ी, एक कमल और अपनी माला धारण करते हैं. वे गुरुवार, बृहस्पतिवार या थर्सडे के स्वामी हैं. [11]

शुक्र[संपादित करें]

शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है.

शुक्र, जो "साफ़, शुद्ध" या "चमक, स्पष्टता" के लिए संस्कृत रूप है, भृगु और उशान के बेटे का नाम है, और वे दैत्यों के शिक्षक और असुरों के गुरु हैं जिन्हें शुक्र ग्रह के साथ पहचाना जाता है, (सम्माननीय शुक्राचार्य के साथ). वे 'शुक्र-वार' के स्वामी हैं. प्रकृति से वे राजसी हैं और धन, खुशी और प्रजनन का प्रतिनिधित्व करते हैं.

वे सफेद रंग, मध्यम आयु वर्ग और भले चेहरे के हैं. उनकी विभिन्न सवारियों का वर्णन मिलता है, ऊंट पर या एक घोड़े पर या एक मगरमच्छ पर. वे एक छड़ी, माला और एक कमल धारण करते हैं और कभी-कभी एक धनुष और तीर. [12]

ज्योतिष में, एक दशा होती है या ग्रह अवधि होती है जिसे शुक्र दशा के रूप में जाना जाता है जो किसी व्यक्ति की कुंडली में 20 वर्षों तक सक्रिय बनी रहती है. यह दशा, माना जाता है कि किसी व्यक्ति के जीवन में अधिक धन, भाग्य और ऐशो-आराम देती है अगर उस व्यक्ति की कुंडली में शुक्र मज़बूत स्थान पर विराजमान हो और साथ ही साथ शुक्र उसकी कुंडली में एक महत्वपूर्ण फलदायक ग्रह के रूप में हो.

शनि[संपादित करें]

शनि (देवनागरी: शनि, Śani ) हिन्दू ज्योतिष (अर्थात, वैदिक ज्योतिष) में नौ मुख्य खगोलीय ग्रहों में से एक है. शनि, शनि ग्रह है सन्निहित है. शनि, शनिवार का स्वामी है. इसकी प्रकृति तमस है और कठिन मार्गीय शिक्षण, कैरिअर और दीर्घायु को दर्शाता है.

शनि शब्द की व्युत्पत्ति निम्नलिखित से हुई है: शनये क्रमति सः अर्थात, वह जो धीरे-धीरे चलता है. शनि को सूर्य की परिक्रमा में 30 वर्ष लगते हैं, इस प्रकार यह अन्य ग्रहों की तुलना में धीमे चलता है, अतः संस्कृत का नाम शनि. शनि वास्तव में एक अर्ध-देवता हैं और सूर्य (हिंदू सूर्य देवता) और उनकी पत्नी छाया के एक पुत्र हैं. कहा जाता है कि जब उन्होंने एक शिशु के रूप में पहली बार अपनी आंखें खोली, तो सूरज ग्रहण में चला गया, जिससे ज्योतिष चार्ट (कुंडली) पर शनि के प्रभाव का साफ़ संकेत मिलता है.

उनका चित्रण काले रंग में, काले लिबास में, एक तलवार, तीर और दो खंजर लिए हुए होता है और वे अक्सर एक काले कौए पर सवार होते हैं. उन्हें कुछ अलग अवसरों पर बदसूरत, बूढ़े, लंगड़े और लंबे बाल, दांत और नाखून के साथ दिखाया जाता है. ये 'शनि-वार' के स्वामी हैं. [12]

राहू[संपादित करें]

राहू, आरोही / उत्तर चंद्र आसंधि के देवता हैं. राहु, राक्षसी सांप का मुखिया है जो हिन्दू शास्त्रों के अनुसार सूर्य या चंद्रमा को निगलते हुए ग्रहण को उत्पन्न करता है. चित्रकला में उन्हें एक ड्रैगन के रूप में दर्शाया गया है जिसका कोई सर नहीं है और जो आठ काले घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले रथ पर सवार हैं. वह तमस असुर है जो अराजकता में किसी व्यक्ति के जीवन के उस हिस्से का पूरा नियंत्रण हासिल करता है. राहू काल को अशुभ माना जाता है.

पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान असुर राहू ने थोड़ा दिव्य अमृत पी लिया था. लेकिन इससे पहले कि अमृत उसके गले से नीचे उतरता, मोहिनी (विष्णु का स्त्री अवतार) ने उसका गला काट दिया. वह सिर, तथापि, अमर बना रहा और उसे राहु कहा जाता है, जबकि बाकी शरीर केतु बन गया. ऐसा माना जाता है कि यह अमर सिर कभी-कभी सूरज या चांद को निगल जाता है जिससे ग्रहण फलित होता है. फिर, सूर्य या चंद्रमा गले से होते हुए निकल जाता है और ग्रहण समाप्त हो जाता है.

केतु[संपादित करें]

केतु अवरोही/दक्षिण चंद्र आसंधि का देवता है. केतु को आम तौर पर एक "छाया" ग्रह के रूप में जाना जाता है. उसे राक्षस सांप की पूंछ के रूप में माना जाता है. माना जाता है कि मानव जीवन पर इसका एक जबरदस्त प्रभाव पड़ता है और पूरी सृष्टि पर भी. कुछ विशेष परिस्थितियों में यह किसी को प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचने में मदद करता है. वह प्रकृति में तमस है और पारलौकिक प्रभावों का प्रतिनिधित्व करता है.

ज्योतिष के अनुसार, केतु और राहु, आकाशीय परिधि में चलने वाले चंद्रमा और सूर्य के मार्ग के प्रतिच्छेदन बिंदु को निरूपित करते हैं. इसलिए, राहु और केतु को क्रमशः उत्तर और दक्षिण चंद्र आसंधि कहा जाता है. यह तथ्य कि ग्रहण तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा इनमें से एक बिंदु पर होते हैं, चंद्रमा और सूर्य को निगलने वाली कहानी को उत्पन्न करता है.

सम्बंधित चरित्र[संपादित करें]

प्रत्येक ग्रह का सम्बन्ध विभिन्न चीज़ों के साथ है, जैसे रंग, धातु, आदि. निम्न तालिका में सबसे महत्वपूर्ण संबंधों को दिया गया है:

चरित्र सूर्य देव चंद्र मंगल बुध
सहचरी सुवर्णा एवं छाया रोहिणी शक्तिदेवी इला
रंग तांबा सफ़ेद लाल हरा
सम्बंधित लिंग नर नर नर तटस्थ
तत्व अग्नि जल अग्नि पृथ्वी
देवता अग्नि वरुण सुब्रमण्य विष्णु
प्रत्यादी देवता रुद्र गौरी मुरुगन विष्णु
धातु स्वर्ण/पीतल चांदी पीतल पीतल
रत्न लाल मणि मोती/मूनस्टोन लाल मूंग पन्ना
शरीरिक अंग हड्डी रक्त मज्जा त्वचा
स्वाद तीव्र गंध नमक एसिड मिश्रित
भोजन गेहूं चावल अरहर मुंग सेम
मौसम गर्मी सर्दी गर्मी पतझड़
दिशा पूर्व उत्तर पश्चिम दक्षिण उत्तर
दिन रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार
चरित्र गुरु (बृहस्पति) शुक्र शनि राहू (उत्तर आसंधि) केतु (दक्षिण आसंधि)
सहचरी तारा सुकिर्थी और उर्जस्वथी नीलादेवी सिंही चित्रलेखा
रंग स्वर्ण सफेद/पीला काला/नीला धुंए के रंग का धुंए के रंग का
सम्बंधित लिंग नर मादा तटस्थ - -
तत्व ईथर जल वायु वायु पृथ्वी
देवता इंद्र इंद्राणी ब्रह्मा निरृति गणेश
प्रत्यादी देवता ब्रह्मा इंद्र यम मृत्यु चित्रगुप्त
धातु स्वर्ण चांदी लोहा सीसा सीसा
रत्न पीला नीलम हीरा नीला नीलम हेसोनाईट कैट्स आई
शरीरिक अंग मस्तिष्क वीर्य मांसपेशी - -
स्वाद मीठा खट्टा स्तम्मक - -
भोजन काबुली चना राजमा तिल उड़द (सेम) चना
मौसम सर्दी वसंत सभी मौसम - -
दिशा उत्तर पूर्व दक्षिण पूर्व पश्चिम दक्षिण पश्चिम -
दिन बृहस्पतिवार शुक्रवार शनिवार - -

हिन्दू रिवाज में नवग्रह की स्थिति[संपादित करें]

हिन्दू रिवाज के अनुसार, नवग्रह को आम तौर पर एक एकल वर्ग में रखा जाता है जिसमें सूर्य केंद्र में और अन्य देवता सूर्य के आसपास होते हैं; इनमें से किसी भी देवता का मुख एक दूसरे की तरफ नहीं होता. दक्षिण भारत में उनकी छवियां आम तौर पर सभी महत्वपूर्ण शैव मंदिरों में पाई जाती हैं. उन्हें आवश्यक रूप से एक पृथक हिस्से में एक तीन फीट ऊंचे मंच पर रखा जाता है, आमतौर पर गर्भ गृह के उत्तर-पूर्व में.

इस तरह से रखने में ग्रहों की 2 प्रकार की अवस्थिति होती है, अगम प्रदीष्ठ और वैदिक प्रदिष्ठ .

अगम प्रदिष्ट में सूर्य केंद्र में, चंद्र सूर्य के पूर्व, बुध उनके दक्षिण, बृहस्पति उनके पश्चिम, शुक्र उनके उत्तर, मंगल उनके दक्षिण-पूर्व, शनि उनके दक्षिण-पश्चिम, राहू उत्तर-पश्चिम में और केतु उत्तर-पूर्व में स्थित होते हैं. सूर्यनार मंदिर, तिरुवीददाईमरुदुर, तिरुवाईयरू, और तिरुचिरापल्ली मंदिर इस प्रणाली का अनुसरण करते हैं.

वैदिक प्रदिष्ट में, सूर्य केंद्र में ही होता है, लेकिन शुक्र पूर्व में, मंगल दक्षिण में, शनि पश्चिम में, बृहस्पति उत्तर में, चंद्र दक्षिण-पूर्व में, राहू दक्षिण-पश्चिम में, केतु पूर्व-पश्चिम में, और बुध उत्तर-पूर्व में स्थित होता है.

अन्य मंदिर अन्य व्यवस्था में नवग्रह को स्थापित करते हैं.

रामनाथपुरम जिले में, नवपाषण नामक जगह में, पत्थर की नौ पाटिया को नवग्रह के रूप में पूजा जाता है. तिरुकुवलाई और तिरुवरुर जैसे मंदिरों में नौ ग्रह एक सीधी रेखा में खड़े होते हैं. तिरुप्पायनीली मंदिर में, वे एक पत्थर में नौ छेद द्वारा प्रदर्शित किये जाते हैं.

गंगईकोंड चोलपुरम मंदिर में एक अनूठी संरचना है जिसमें नौ ग्रहों को एक एकल पत्थर पर स्थापित किया जाता है. सूर्य को इस संरचना में प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया है जहां दो पहिये और एक सारथी वाले एक रथ में सात घोड़े लगे होते हैं. अन्य आठ ग्रहों को केंद्र में सूर्य के साथ आठ दिशाओं में रखा जाता है.

अगस्तियार मंदिर चेन्नई पोंडी बाजार में ग्रहों की स्थिति बिल्कुल भिन्न होती है जहां सूर्य बीच के एक ऊंचे स्थान पर स्थित होते हैं और शेष ग्रह एक अष्टकोण संरचना पर होते हैं. इसे अगस्तियार कट्टु कहा जाता है (ऋषि अगस्त्य द्वारा शुरू की गई व्यवस्था).

नवग्रह मंदिर[संपादित करें]

भारतीय ज्योतिष के अनुसार नवग्रह की गतिविधि को किसी भी व्यक्ति के भाग्य को प्रभावित करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाला माना जाता है. एक ग्रह, जो जन्म कुंडली में दुर्बल है उसके नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए या फिर उस ग्रह को और अधिक शक्ति प्रदान करना जो उच्च स्थिति में है, विश्वास रखने वाले लोग सिद्ध नवग्रह मंदिरों की तीर्थयात्रा करते हैं.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

ज्योतिष में ग्रह

टिप्पणियां[संपादित करें]

  1. संस्कृत, अंग्रेजी शब्दकोष द्वारा विलियम्स-मोनिअर, (c) 1899
  2. श्यामसुन्दर दासा, द फेलेसी ऑफ़ द ट्रांस-सैटर्नियन प्लैनेट्स. 1997. http://www.shyamasundaradasa.com/jyotish/resources/articles/fallacy_trans_saturnians/fallacy_trans-saturnians_1.html
  3. प्रश्न मार्ग द्वारा डॉ. बी.वी. रमन, मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड दिल्ली, भारत द्वारा प्रकाशित.
  4. पौराणिक इनसाइक्लोपीडिया द्वारा वेतम मनी, मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड दिल्ली, भारत द्वारा प्रकाशित.
  5. http://www.info2india.com/astrology/9-grahas-effects.html 9 Grahas effects
  6. वैदिक एस्ट्रोलोजी विथ वॉन पौल मैनली. द एसेन्शिअल मीनिंग ऑफ़ द प्लैनेट्स (ग्रह) http://astrologyforthesoul.com/vp/vedicastrologylesson5planetsgrahas.html
  7. द मिस्ट्री ऑफ़ मंत्राज़ http://www.askastrologer.com/mantras.html
  8. किसारी मोहन गांगुली द्वारा व्यास के महाभारत का अनुवाद
  9. माइथोलोजी ऑफ़ द हिन्दुज, चार्ल्स कोलमैन द्वारा p.131
  10. माइथोलोजी ऑफ़ द हिन्दुज, चार्ल्स कोलमैन द्वारा p.132
  11. माइथोलोजी ऑफ़ द हिन्दुज, चार्ल्स कोलमैन द्वारा p.133
  12. माइथोलोजी ऑफ़ द हिन्दुज, चार्ल्स कोलमैन द्वारा p.134

बाह्य लिंक[संपादित करें]