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भारतीय आम

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आम
आम के पक्के फल
आम के पक्के फल
वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत: पादप
(unranked) यूडिकॉट्स
(unranked) रोज़िड्स
गण: सैपिन्डेल्स Sapindales
कुल: एनाकार्डियेसी Anacardiaceae
वंश: मैंगिफ़ेरा
कैरोलस लिन्नैएयस Carolus Linnaeus
प्रजातियाँ

५० से अधिक प्रजातियाँ

भारत भारत के राष्ट्रीय प्रतीक
ध्वज तिरंगा
राष्ट्रीय चिह्न अशोक की लाट
राष्ट्रभाषा कोई नहीं
राष्ट्र-गान जन गण मन
राष्ट्र-गीत वन्दे मातरम्
मुद्रा (भारतीय रुपया)
पशु बाघ
जलीय जीव गंगा डालफिन
पक्षी मोर
पुष्प कमल
वृक्ष बरगद
फल आम
खेल मैदानी हॉकी
पञ्चांग
शक संवत
संदर्भ "भारत के राष्ट्रीय प्रतीक"
भारतीय दूतावास, लन्दन
Retreived ०३-०९-२००७

आम अत्यंत उपयोगी, दीर्घजीवी, सघन,हितकारी तथा विशाल वृक्ष है, जो भारत में दक्षिण में कन्याकुमारी से उत्तर में हिमालय की तराई तक (3,000 फुट की ऊँचाई तक) तथा पश्चिम में पंजाब से पूर्व में आसाम तक, अधिकता से होता है। अनुकूल जलवायु मिलने पर इसका वृक्ष 50-60 फुट की ऊँचाई तक पहुँच जाता है। वनस्पति वैज्ञानिक वर्गीकरण के अनुसार आम ऐनाकार्डियेसी कुल का वृक्ष है। आम के कुछ वृक्ष बहुत ही बड़े होते हैं।

मोजर (फूल) लगा हुआ आम का वृक्ष

आम का वृक्ष एक फूलदार, बड़ा स्थलीय वृक्ष है। इसमें दो बीजपत्र होते हैं। इसके फूल छोटे-छोटे एवं समूह में रहते हैं। इसे मंजरी कहते हैं। इसकी पत्ती सरल, लम्बी एवं भाले के समान होती है। इसका तना लम्बा एवं मजबूत होता है। इसका फल एक गुठलीवाला सरस और गूदेदार होता है। आम का फल विश्वप्रसिद्ध स्वादिष्ट फल है। इसे फलों का राजा कहा गया हैं।

आम का वृक्ष बड़ा और खड़ा अथवा फैला हुआ होता है; ऊँचाई 30 से 90 फुट तक होती है। छाल खुरदरी तथा मटमैली या काली, लकड़ी कठीली और ठस होती है। इसकी पत्तियाँ सादी, एकांतरित, लंबी, प्रासाकार (भाले की तरह) अथवा दीर्घवृत्ताकार, नुकीली, पाँच से 16 इंच तक लंबी, एक से तीन इंच तक चौड़ी, चिकनी और गहरे हरे रंग की होती हैं; पत्तियों के किनारे कभी-कभी लहरदार होते हैं। वृंत (एँठल) एक से चार इंच तक लंबे, जोड़ के पास फूले हुए होते हैं। पुष्पक्रम संयुत एकवर्ध्यक्ष (पैनिकिल), प्रशाखित और लोमश होता है। फूल छोटे, हलके बसंती रंग के या ललछौंह, भीनी गंधमय और प्राय: एँठलरहित होते हैं; नर और उभयलिंगी दोनों प्रकार के फूल एक ही बार (पैनिकिल) पर होते हैं। बाह्मदल (सेपल) लंबे अंडे के रूप के, अवतल (कॉनकेव); पंखुडियाँ बाह्मदल की अपेक्षा दुगुनी बड़ी, अंडाकार, तीन से पाँच तक उभड़ी हुई नारंगी रंग की धारियों सहित; बिंब (डिस्क) मांसल, पाँच भागशील (लोब्ड); एक परागयुक्त (फ़र्टाइल) पुंकेसर, चार छोटे और विविध लंबाइयों के बंध्य पुंकेसर (स्टैमिंनोड); परागकोश कुछ कुछ बैंगनी और अंडाशय चिकना होता है। फल सरस, मांसल, अष्ठिल, तरह तरह की बनावट एवं आकारवाला, चार से 25 सेंटीमीटर तक लंबा तथा एक से 10 सेंटीमीटर तक घेरेवाला होता है। पकने पर इसका रंग हरा, पीला, जोगिया, सिंदुरिया अथवा लाल होता है। फल गूदेदार, फल का गूदा पीला और नारंगी रंग का तथा स्वाद में अत्यंत रुचिकर होता है। इसके फल का छिलका मोटा या कागजी तथा इसकी गुठली एकल, कठली एवं प्राय: रेशेदार तथा एकबीजक होती है। बीज बड़ा, दीर्घवत्, अंडाकार होता है।

आम लक्ष्मीपतियों के भोजन की शोभा तथा गरीबों की उदरपूर्ति का अति उत्तम साधन है। पके फल को तरह तरह से सुरक्षित करके भी रखते हैं। रस का थाली, चकले, कपड़े इत्यादि पर पसार, धूप में सुखा "अमावट" बनाकर रख लेते हैं। यह बड़ी स्वादिष्ट होती है और इसे लोग बड़े प्रेम से खाते हैं। कहीं कहीं फल के रस को अंडे की सफेदी के साथ मिलाकर अतिसार और आँवे के रोग में देते हैं। पेट के कुछ रोगों में छिलका तथा बीज हितकर होता है। कच्चे फल को भूनकर पना बना, नमक, जीरा, हींग, पोदीना इत्यादि मिलाकर पीते हैं, जिससे तरावट आती है और लू लगने का भय कम रहता है। आम के बीज में मैलिक अम्ल अधिक होता है और यह खूनी बवासीर और प्रदर में उपयोगी है। आम की लकड़ी गृहनिर्माण तथा घरेलू सामग्री बनाने के काम आती है। यह ईधन के रूप में भी अधिक बरती जाती है। आम की उपज के लिए कुछ कुछ बालूवाली भूमि, जिसमें आवश्यक खाद हो और पानी का निकास ठीक हो, उत्तम होती है। आम की उत्तम जातियों के नए पौधे प्राय: भेंटकलम द्वारा तैयार किए जाते हैं। कलमों और मुकुलन (बर्डिग) द्वारा भी ऐसी किस्में तैयार की जाती हैं। बीजू आमों की भी अनेक बढ़िया जातियाँ हैं, परतु इनमें विशेष असुविधा यह है कि इस प्रकार उत्पन्न आमों में वांछित पैतृक गुण कभी आते हैं, कभी नहीं ; इसलिए इच्छानुसार उत्तम जातियाँ इस रीति से नहीं मिल सकतीं। आम की विशेष उत्तम जातियों में वाराणसी का लँगड़ा, बंबई का अलफांजो तथा मलीहाबाद और लखनऊ के दशहरी तथा सफेदा उल्लेखनीय हैं।

आम का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। डी कैडल (सन् 1844) के अनुसार आम्र प्रजाति (मैंजीफ़ेरा जीनस) संभवत: बर्मा, स्याम तथा मलाया में उत्पन्न हुई; परंतु भारत का आम, मैंजीफ़ेरा इंडिका, जो यहाँ, बर्मा और पाकिस्तान में जगह जगह स्वयं (जंगली अवस्था में) होता है, बर्मा-आसाम अथवा आसाम में ही पहले पहल उत्पन्न हुआ होगा। भारत के बाहर लोगों का ध्यान आम की ओर सर्वप्रथम संभवत: बुद्धकालीन प्रसिद्ध यात्री, हुयेनत्सांग (632-45,) ने आकर्षित किया।

फ़्रायर (सन् 1673) ने आम को आडू और खूबानी से भी रुचिकर कहा है और हैमिल्टन (सन् 1727) ने गोवा के आमों को बड़े, स्वादिष्ट तथा संसार के फलों में सबसे उत्तम और उपयोगी बताया है। भारत के निवासियों में अति प्राचीन काल से आम के उपवन लगाने का प्रेम है। यहाँ की उद्यानी कृषि में काम आनेवाली भूमि का 70 प्रतिशत भाग आम के उपवन लगाने के काम आता है। स्पष्ट है कि भारतवासियों के जीवन और अर्थव्यवस्था का आम से घनिष्ठ संबंध है। इसके अनेक नाम जैसे सौरभ, रसाल, चुवत, टपका, सहकार, आम, पिकवल्लभ आदि भी इसकी लोकप्रियता के प्रमाण हैं। इसे "कल्पवृक्ष" अर्थात् मनोवाछिंत फल देनेवाला भी कहते हैं शतपथ ब्राह्मण में आम की चर्चा इसकी वैदिक कालीन तथा अमरकोश में इसकी प्रशंसा इसकी बुद्धकालीन महत्ता के प्रमाण हैं। मुगल सम्राट् अकबर ने "लालबाग" नामक एक लाख पेड़ोंवाला उद्यान दरभंगा के समीप लगवाया था, जिससे आम की उस समय की लोकप्रियता स्पष्ट हैं। भारतवर्ष में आम से संबंधित अनेक लोकगीत, आख्यायिकाएँ आदि प्रचलित हैं और हमारी रीति, व्यवहार, हवन, यज्ञ, पूजा, कथा, त्योहार तथा सभी मंगलकायाँ में आम की लकड़ी, पत्ती, फूल अथवा एक न एक भाग प्राय: काम आता है। आम के बौर की उपमा वसंतद्तसे तथा मंजरी की मन्मथतीर से कवियों ने दी है। उपयोगिता की दृष्टि से आम भारत का ही नहीं वरन् समस्त उष्ण कटिबंध के फलों का राजा है और बहुत तरह से उपयोग होता है। कच्चे फल से चटनी, खटाई, अचार, मुरब्बा आदि बनाते हैं। पके फल अत्यंत स्वादिष्ट होते हैं और इन्हें लोग बड़े चाव से खाते हैं। ये पाचक, रेचक और बलप्रद होते हैं।

कालिदास ने इसका गुणगान किया है, सिकंदर ने इसे सराहा और मुग़ल सम्राट अकबर ने दरभंगा में इसके एक लाख पौधे लगाए। उस बाग़ को आज भी लाखी बाग़ के नाम से जाना जाता है। वेदों में आम को विलास का प्रतीक कहा गया है। कविताओं में इसका ज़िक्र हुआ और कलाकारों ने इसे अपने कैनवास पर उतारा। भारत में गर्मियों के आरंभ से ही आम पकने का इंतज़ार होने लगता है। आँकड़ों के मुताबिक इस समय भारत में प्रतिवर्ष एक करोड़ टन आम पैदा होता है जो दुनिया के कुल उत्पादन का ५२ प्रतिशत है। आम भारत का राष्ट्रीय फल भी है।[1] अन्तर्राष्ट्रीय आम महोत्सव, दिल्ली में इसकी अनेक प्रजातियों को देखा जा सकता है।[2] भारतीय प्रायद्वीप में आम की कृषि हजारों वर्षों से हो रही है।[3] यह ४-५ ईसा पूर्व पूर्वी एशिया में पहुँचा। १० वीं शताब्दी तक यह पूर्वी अफ्रीका पहुँच चुका था।[3] उसके बाद आम ब्राजील, वेस्ट इंडीज और मैक्सिको पहुँचा क्योंकि वहाँ की जलवायु में यह अच्छी तरह उग सकता था।[3] १४वीं शताब्दी में मुस्लिम यात्री इब्नबतूता ने इसकी सोमालिया में मिलने की पुष्टि की है।[4] तमिलनाडु के कृष्णगिरि के आम बहुत ही स्वादिष्ट होते हैं और दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं।

प्रजातियाँ

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मुख्य लेख:आम की किस्में
उद्यान में लगाए जानेवाले आम की लगभग 1,400 जातियों से हम परिचित हैं। इनके अतिरिक्त कितनी ही जंगली और बीजू किस्में भी हैं। गंगोली आदि (सन् 1955) ने 210 बढ़िया कलमी जातियों का सचित्र विवरण दिया है। विभिन्न प्रकार के आमों के आकार और स्वाद में बड़ा अंतर होता है। कुछ बेर से भी छोटे तथा कुछ, जैसे सहारनपुर का हाथीझूल, भार में दो ढाई सेर तक होते हैं। कुछ अत्यंत खट्टे अथवा स्वादहीन या चेप से भरे होते हैं, परंतु कुछ अत्यंत स्वादिष्ट और मधुर होते हैं।

भारत में उगायी जाने वाली आम की किस्मों में दशहरी, लंगड़ा, चौसा, फज़ली, बम्बई ग्रीन, बम्बई, अलफ़ॉन्ज़ो, बैंगन पल्ली, हिम सागर, केशर, किशन भोग, मलगोवा, नीलम, सुर्वन रेखा, वनराज, जरदालू हैं। नई किस्मों में, मल्लिका, आम्रपाली, रत्ना, अर्का अरुण, अर्मा पुनीत, अर्का अनमोल तथा दशहरी-५१ प्रमुख प्रजातियाँ हैं। उत्तर भारत में मुख्यत: गौरजीत, बाम्बेग्रीन, दशहरी, लंगड़ा, चौसा एवं लखनऊ सफेदा प्रजातियाँ उगायी जाती हैं।[5]

आम्रपाली आम
आम, विभिन्न अवस्थाएँ, चौकोर कटा, सामने, तिरछा और कटा।

आर्युर्वैदिक मतानुसार आम के पंचांग (पाँच अंग) काम आते हैं। इस वृक्ष की अंतर्छाल का क्वाथ प्रदर, खूनी बवासीर तथा फेफड़ों या आँत से रक्तस्राव होने पर दिया जाता है। छाल, जड़ तथा पत्ते कसैले, मलरोधक, वात, पित्त तथा कफ का नाश करनेवाले होते हैं। पत्ते बिच्छू के काटने में तथा इनका धुआँ गले की कुछ व्याधियों तथा हिचकी में लाभदायक है। फूलों का चूर्ण या क्वाथ आतिसार तथा संग्रहणी में उपयोगी कहा गया है। आम का बौर शीतल, वातकारक, मलरोधक, अग्निदीपक, रुचिवर्धक तथा कफ, पित्त, प्रमेह, प्रदर और अतिसार को नष्ट करनेवाला है। कच्चा फल कसैला, खट्टा, वात पित्त को उत्पन्न करनेवाला, आँतों को सिकोड़नेवाला, गले की व्याधियों को दूर करनेवाला तथा अतिसार, मूत्रव्याधि और योनिरोग में लाभदायक बताया गया है। पका फल मधुर, स्निग्ध, वीर्यवर्धक, वातनाशक, शीतल, प्रमेहनाशक तथा व्रण श्लेष्म और रुधिर के रोगों को दूर करनेवाला होता है। यह श्वास, अम्लपित्त, यकृतवृद्धि तथा क्षय में भी लाभदायक है।

आधुनिक अनुसंधानों के अनुसार आम के फल में विटामिन ए और सी पाए जाते हैं। अनेक वैद्यों ने केवल आम के रस और दूध पर रोगी को रखकर क्षय, संग्रहणी, श्वास, रक्तविकार, दुर्बलता इत्यादि रोगों में सफलता प्राप्त की है। फल का छिलका गर्भाशय के रक्तस्राव, रक्तमय काले दस्तों में तथा मुँह से बलगम के साथ रक्त जाने में उपयोगी है। गुठली की गरी का चूर्ण (मात्रा 2 माश) श्वास, अतिसार तथा प्रदर में लाभदायक होने के सिवाय कृमिनाशक भी है।

पका आम बहुत स्वास्थ्यवर्धक, पोषक, शक्तिवर्धक और चरबी बढ़ाने वाला होता है। आम का मुख्य घटक शर्करा है, जो विभिन्न फलों में ११ से २० प्रतिशत तक विद्यमान रहती है। शर्करा में मुख्यतया इक्षु शर्करा होती है, जो कि आम के खाने योग्य हिस्से का ६.७८ से १६.९९ प्रतिशत है। ग्लूकोज़ व अन्य शर्करा १.५३ से ६.१४ प्रतिशत तक रहती है। अम्लों में टार्टरिक अम्ल व मेलिक अम्ल पाया जाता है, इसके साथ ही साथ साइट्रिक अम्ल भी अल्प मात्रा में पाया जाता है। इन अम्लों का शरीर द्वारा उपयोग किया जाता है और ये शरीर में क्षारीय संचय बनाए रखने में सहायक होते हैं। आम के अन्य घटक इस प्रकार हैं- प्रोटीन ९.६, वसा ०.१, खनिज पदार्थ ०.३ रेशा, १.१ फॉसफोरस ०.०२ और लौह पदार्थ ०.३ प्रतिशत। नमी की मात्रा ८६ प्रतिशत है। आम का औसत ऊर्जा मूल्य प्रति १०० ग्राम में लगभग ५० कैलोरी है। मुंबई की एक किस्म का औसत ऊर्जा मूल्य प्रति १०० ग्राम ९० कैलोरी है। यह विटामिन ‘सी’ के महत्त्वपूर्ण स्रोतों में से एक है और इसमें विटामिन ‘ए’ भी प्रचुर मात्रा में है।[6]

आम पर लगने वाले रोग

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आम के अनेक शत्रु हैं। इनमें ऐनथ्रै कनोस, जो कवकजनित रोग है और आर्द्रताप्रधान प्रदेशों में अधिक होता है, पाउडरी मिल्डिउ, जो एक अन्य कवक से उत्पन्न होनेवाला रोग है तथा ब्लैक टिप, जो बहुधा ईट चूने के भट्ठों के धुएँ के संसर्ग से होता है, प्रधान हैं। अनेक कीड़े मकोड़े भी इसके शत्रु हैं। इनमें मैंगोहॉपर, मैंगो बोरर, फ्रूट फ़्लाई और दीमक मुख्य हैं। जल-चूना-गंधक-मिश्रण, सुर्ती का पानी तथा संखिया का पानी इन रोगों में लाभकारी होता है।

जिस प्रकार आम हमें खाने में स्वादिष्ट लगते हैं उसी प्रकार कीड़ों मकोड़ों को भी बहुत ज्यादा पसंद आते हैं। ऐसे में इन कीड़ों मकोड़ों की वजह से कई सारी बीमारियां आम के पेड़ों को लग जाती हैं और पूरी फसल नष्ट हो जाती है। आम के पेड़ों में सबसे ज्यादा लगने वाला रोग दहिया रोग होता है इससे बचाव के लिए आप घुलनशील गंधक को 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव अवश्य करें।

इससे आम के पेड़ों में लगने वाला दहिया रोग मात्र 1 से 2 सप्ताह में पूर्ण रूप से नष्ट हो जाता है। इस घोल का छिड़काव आप प्रति सप्ताह दो से तीन बार अवश्य करें। छिड़कावकरते समय यह ध्यान अवसय रखे की ज्यादा मात्रा में घोल को आम के पेड़ों को ना दिया जाए वरना वो मुरझाकर नष्टभी हो सकते है।.

इसके अलावा दूसरा जो रोग आम के पेड़ में लगता है वह होता है कोयलिया रोग। से बचाव के लिए आप el-200 पीपी और 900 मिलीलीटर की मात्रा में घोल बनाकर सप्ताह में तीन से चार बार छिड़काव करें। इसका छिड़काव आप 20 20 दिन के अंतराल में जरूर करें और इसका ज्यादा छिड़काव करने से बचें।

उपरोक्त उपायों से आप आम के फूल व फलन को गिरने से रोकने में काफी हद तक कामयाब हो सकते हैं ।[7]

चित्रदीर्घा

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इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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  1. "अपने देश को जानो". हिन्दी नेस्ट. मूल से (एचटीएम) से 24 जून 2009 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: ४ अप्रैल २००९. {{cite web}}: Check date values in: |access-date= (help)
  2. "आम फलों का राजा" (एसएचटीएमएल). बीबीसी. 3 जुलाई 2013 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: ४ अप्रैल २००९. {{cite web}}: Check date values in: |access-date= (help)
  3. 1 2 3 Ensminger 1994: 1373
  4. Watson, Andrew J. (1983). Agricultural innovation in the early Islamic world: the diffusion of crops and farming techniques, 700-1100. Cambridge, UK: Cambridge University Press. pp. 72–3. ISBN 0-521-24711-X.
  5. "उद्यान विज्ञान" (एचटीएमएल). विज्ञान केन्द्र धुरा, उन्नाव. अभिगमन तिथि: ४ अप्रैल २००९. {{cite web}}: Check date values in: |access-date= (help)[मृत कड़ियाँ]
  6. "फलों और सब्जियों से चिकित्सा". भारतीय साहित्य संग्रह. मूल से (पीएचपी) से 13 जून 2010 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: ४ अप्रैल २००९. {{cite web}}: Check date values in: |access-date= (help)
  7. kheti, Meri (17/3/2022). "आम के फूल व फलन को मार्च में गिरने से ऐसे रोकें: आम के पेड़ के रोगों के उपचार". https://www.merikheti.com/. मूल से से 22 मई 2022 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 26/11/2023. {{cite web}}: Check date values in: |access-date= and |date= (help); External link in |website= (help)

बाहरी कड़ियाँ

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