प्रवेशद्वार:धर्म और आस्था

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प्रवेशद्वार:धर्म और आस्था

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धार्मिकता निर्दिष्ट व्यवहारों और प्रथाओं, नैतिकता, विश्व साक्षात्कार, ग्रंथों, पवित्र स्थानों, भविष्यवाणियों, नैतिकता या संगठनों का एक सामाजिक-सांस्कृतिक तंत्र है, जो मानवता को अलौकिक, पारलौकिक और आध्यात्मिक तत्वों से संबंधित करता है। हालाँकि, इस बात पर कोई विद्वता सर्वसम्मति नहीं है कि वास्तव में एक धर्म क्या है विभिन्न धर्मों में दैवीय, पवित्र चीजें, विश्वास, एक अलौकिक प्राणी या अलौकिक प्राणी या "कुछ प्रकार की अल्टिमेसी और पारगमन से लेकर विभिन्न तत्व हो सकते हैं या हो सकते हैं जो जीवन के बाकी हिस्सों के लिए आदर्श और शक्ति प्रदान करेंगे"। धार्मिक प्रथाओं में अनुष्ठान, उपदेश, स्मरण या वंदना (देवताओं और / या संतों का), बलिदान, पर्व, त्यौहार, दीक्षा, अंतिम संस्कार सेवाएं, वैवाहिक सेवा, ध्यान, प्रार्थना, संगीत, कला, नृत्य, सार्वजनिक सेवा, या शामिल हो सकते हैं। मानव संस्कृति के अन्य पहलू।

विश्व भर में अनुमानित 10,000 अलग-अलग धर्म हैं। दुनिया की आबादी का लगभग 84% ईसाई धर्म, इस्लाम, हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म या लोक धर्म के किसी न किसी रूप से जुड़ा हुआ है। धार्मिक रूप से अप्रभावित जनसांख्यिकी में वे लोग शामिल हैं जो किसी विशेष धर्म, नास्तिक और अज्ञेयवाद की पहचान नहीं करते हैं। जबकि धार्मिक रूप से असंबद्ध विश्व स्तर पर विकसित हुए हैं, धार्मिक रूप से असंबद्ध कई अब भी विभिन्न धार्मिक विश्वास हैं।

चयनित लेख
विभिन्न देशों व क्षेत्रों के संरक्षक संत; संत बेनेडिक्ट:यूरोप के संरक्षक संत, संत जॉर्ज:मध्य पूर्व के संरक्षक संत, मूसा अल-हबाशी:अफ्रीका के संरक्षक संत, संत फ्रांसिस जेवियर: भारतएशिया के संरक्षक संत, संत गुआदोपूप: अमेरिका के संरक्षक संत, पीटर चैनल: ओशिनिया के संरक्षक संत

संरक्षक संत, पितृनामी संत या स्वर्गीय रक्षक, ईसाई समुदाय के रोमन कैथोलिक धर्म, आंग्लवाद या पूर्वी प्राच्यवाद संप्रदायों में, एक संत होते हैं जिन्हें किसी राष्ट्र, स्थान, शिल्प, गतिविधि, वर्ग, कबीले, परिवार या व्यक्ति का स्वर्गीय अधिवक्ता या रक्षक माना जाता है। यूरोपीय सभ्यता में आध्यात्मिक तौरपर, मध्यकाल के दौरान संरक्षक संत परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रत्येक संत को समर्पित एक विशेष दिन होता है, जिसमें उन्हें विशेष प्रार्थना प्रेषित की जाती है, तथा उस दिन को उनके नाम से मनाया जाता है। इस्लाम में जहाँ संतों की ओर से संरक्षण का कोई संहिताबद्ध सिद्धांत नहीं है, फिर भी सुन्नी तथा शिया दोनों परंपराओं में संरक्षक संतों और वलीयों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अधिक पढ़ें…

चयनित धर्म
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पारसी पंथ फारस का राजपंथ हुआ करता था। यह ज़न्द अवेस्ता नाम के गन्थं पर आधारित है। इसके संस्थापक महात्मा ज़रथुष्ट्र हैं, इसलिये इसे ज़रथुष्ट्री पंथ भी कहते हैं। ऐतिहासिक रूप से पारसी पंथ की शुरुआत 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में हुई। पारसी पंथ की शिक्षा हैः हुमत, हुख्त, हुवर्श्त अथवा सुबुद्धि, सुभाष, सुव्यवहार हुआ। प्राचीन फारस (आज का ईरान) जब पूर्वी यूरोप से मध्य एशिया तक फैला एक विशाल साम्राज्य था, तब पैगंबर जरथुस्त्र ने एक ईश्वरवाद का संदेश देते हुए पारसी पंथ की नींव रखी। ज़रथुष्ट्र व उनके अनुयायीयों के बारे में विस्तृत इतिहास ज्ञात नहीं है। कारण यह कि पहले सिकंदर की फौजों ने तथा बाद में अरब के जिहादी आक्रमणकारियों ने प्राचीन फारस का लगभग सारा मज़हबी एवं सांस्कृतिक साहित्य नष्ट कर डाला था। आज हम इस इतिहास के बारे में जो कुछ भी जानते हैं, वह ईरान के पहाड़ों में उत्कीर्ण शिला लेखों तथा वाचिक परंपरा की बदौलत है। सातवीं सदी ईस्वी तक आते-आते फारसी साम्राज्य अपना पुरातन वैभव तथा शक्ति गँवा चुका था। जब अरबों ने इस पर निर्णायक विजय प्राप्त कर ली तो अपने पंथ की रक्षा हेतु अनेक जरथोस्ती धर्मावलंबी समुद्र के रास्ते भाग निकले और उन्होंने भारत के पश्चिमी तट पर शरण ली। यहाँ वे 'पारसी' (फारसी का अपभ्रंश) कहलाए। आज विश्वभर में मात्र सवा से डेढ़ लाख के बीच जरथोस्ती हैं। इनमें से आधे से अधिक भारत में हैं। अधिक पढ़ें…

चयनित चित्र

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कंबोडिया में कुछ युवा बौद्ध भिख्खु

चयनित सूक्ति
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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं,
अतः कर्म को फल के लिए मत करो और न ही काम करने में तुम्हारी आसक्ति हो।
भगवद्गीता (२;४७) में, श्रीकृष्ण द्वारा कथित वचन (यह कर्मयोग दर्शन का मूल आधार है।)
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