अनुवाद

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किसी भाषा में कही या लिखी गयी बात का किसी दूसरी भाषा में सार्थक परिवर्तन अनुवाद (Translation) कहलाता है। अनुवाद का कार्य बहुत पुराने समय से होता आया है।

संस्कृत में 'अनुवाद' शब्द का उपयोग शिष्य द्वारा गुरु की बात के दुहराए जाने, पुनः कथन, समर्थन के लिए प्रयुक्त कथन, आवृत्ति जैसे कई संदर्भों में किया गया है। संस्कृत के ’वद्‘ धातु से ’अनुवाद‘ शब्द का निर्माण हुआ है। ’वद्‘ का अर्थ है बोलना। ’वद्‘ धातु में 'अ' प्रत्यय जोड़ देने पर भाववाचक संज्ञा में इसका परिवर्तित रूप है 'वाद' जिसका अर्थ है- 'कहने की क्रिया' या 'कही हुई बात'। 'वाद' में 'अनु' उपसर्ग उपसर्ग जोड़कर 'अनुवाद' शब्द बना है, जिसका अर्थ है, प्राप्त कथन को पुनः कहना। इसका प्रयोग पहली बार मोनियर विलियम्स ने अँग्रेजी शब्द टांंसलेशन (translation) के पर्याय के रूप में किया। इसके बाद ही 'अनुवाद' शब्द का प्रयोग एक भाषा में किसी के द्वारा प्रस्तुत की गई सामग्री की दूसरी भाषा में पुनः प्रस्तुति के संदर्भ में किया गया।

वास्तव में अनुवाद भाषा के इन्द्रधनुषी रूप की पहचान का समर्थतम मार्ग है। अनुवाद की अनिवार्यता को किसी भाषा की समृद्धि का शोर मचा कर टाला नहीं जा सकता और न अनुवाद की बहुकोणीय उपयोगिता से इन्कार किया जा सकता है। ज्त्।छैस्।ज्प्व्छ के पर्यायस्वरूप ’अनुवाद‘ शब्द का स्वीकृत अर्थ है, एक भाषा की विचार सामग्री को दूसरी भाषा में पहुँचना। अनुवाद के लिए हिंदी में 'उल्था' का प्रचलन भी है।अँग्रेजी में TRANSLATION के साथ ही TRANSCRIPTION का प्रचलन भी है, जिसे हिंदी में 'लिप्यन्तरण' कहा जाता है। अनुवाद और लिप्यंतरण का अंतर इस उदाहरण से स्पष्ट है-

उसके सपने सच हुए।
HIS DREAMS BECAME TRUE - TRANSLATION
USKEY SAPNE SACH HUEY - TRANSCRIPTION

इससे स्पष्ट है कि 'अनुवाद' में हिंदी वाक्य को अँग्रेजी में प्रस्तुत किया गया है जबकि लिप्यंतरण में नागरी लिपि में लिखी गयी बात को मात्र रोमन लिपि में रख दिया गया है।

अनुवाद के लिए 'भाषांतर' और 'रूपांतर' का प्रयोग भी किया जाता रहा है। लेकिन अब इन दोनों ही शब्दों के नए अर्थ और उपयोग प्रचलित हैं। 'भाषांतर' और 'रूपांतर' का प्रयोग अँग्रेजी के INTERPRETATION शब्द के पर्याय-स्वरूप होता है, जिसका अर्थ है दो व्यक्तियों के बीच भाषिक संपर्क स्थापित करना। कन्नडभाषी व्यक्ति और असमियाभाषी व्यक्ति के बीच की भाषिक दूरी को भाषांतरण के द्वारा ही दूर किया जाता है। 'रूपांतर' शब्द इन दिनों प्रायः किसी एक विधा की रचना की अन्य विधा में प्रस्तुति के लिए प्रयुक्त है। जैस, प्रेमचन्द के उपन्यास 'गोदान' का रूपांतरण 'होरी' नाटक के रूप में किया गया है।

किसी भाषा में अभिव्यक्त विचारों को दूसरी भाषा में यथावत् प्रस्तुत करना अनुवाद है। इस विशेष अर्थ में ही 'अनुवाद' शब्द का अभिप्राय सुनिश्चित है। जिस भाषा से अनुवाद किया जाता है, वह मूलभाषा या स्रोतभाषा है। उससे जिस नई भाषा में अनुवाद करना है, वह 'प्रस्तुत भाषा' या 'लक्ष्य भाषा' है। इस तरह, स्रोत भाषा में प्रस्तुत भाव या विचार को बिना किसी परिवर्तन के लक्ष्यभाषा में प्रस्तुत करना ही अनुवाद है।ज

अनुक्रम

अनुवादक[संपादित करें]

एक अच्छा अनुवादक वह है जो-

  1. स्रोत भाषा (जिससे अनुवाद करना है) के लिखित एवं वाचिक दोनों रूपों का अच्छा ज्ञाता हो।
  2. लक्ष्य भाषा ((जिसमें अनुवाद करना है) के लिखित रूप का अच्छा ज्ञाता हो,
  3. पाठ जिस विषय या टॉपिक का है, उसकी जानकारी रखता हो।

इतिहास[संपादित करें]

अनुवाद असाधारण रूप से कठिन और आह्वाहनात्मक कार्य माना जाता है। यह एक जटिल, कृत्रिम, आवश्यकता-जनित, और एक दृष्टि से सर्जनात्मक प्रक्रिया है जिसमें असाधारण और विशिष्ट कोटि की प्रतिभा की आवश्यकता होती है। यह इसकी अपनी प्रकृति है। परन्तु माना जाता है कि मौलिक लेखन न होने के कारण अनुवाद को सम्मान का स्थान नहीं मिलता है। क्योंकि इस बात की अवगणना होती है कि अनुवाद इसीलिए कठिन है कि वह मौलिक लेखन नहीं-पहले कही गई बात को ही दुबारा कहना होता है, जिसमें अनेक नियन्त्रणों और बन्धनों का पालन करना आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार अमौलिक होने के कारण अनुवाद का महत्त्व तो कम हो गया, परन्तु इसी कारण इसके लिए अपेक्षित नियन्त्रणों और बन्धनों को महत्त्वपूर्ण नहीं समझा गया। इस सम्बन्ध में सृजनशील लेखकों के विचारों की प्रायः चर्चा होती रही है। कुछ विचार इस प्रकार हैं : [1]

(क) सम्पूर्ण अनुवाद कार्य केवल एक असमाधेय समस्या का समाधान खोजने के लिए किया गया प्रयास मात्र है। (हुम्बोल्त)

(ख) किसी कृति का अनुवाद उसके दोषों को बढ़ा देता है और उसके गुणों को विद्रूप कर देता है। (वाल्तेयर)

(ग) कला की एक विधा के रूप में अनुवाद कभी सफल नहीं हो सकते। (चक्रवर्ती राजगोपालाचारी)

(घ) अनुवादक वंचक होते हैं। (एक इतालवी कहावत)

ऐसे विचारों के उद्भव के पीछे तत्कालीन परिस्थितियाँ तथा उनसे प्रेरित धारणाएँ मानी जाती हैं। पहले अनुवाद सामग्री का बहुलांश साहित्यिक रचनाएँ होती थीं, जिनका अनुवाद रचनाओं की साहित्यिक प्रकृति की सीमाओं के कारण पाठक की आशा के अनुरूप नहीं हो पाता था। साथ ही यह भी धारणा थी कि रचना की भाषा के प्रत्येक अंश का अनुवाद अपेक्षित है, जिससे मूल संवेदना का कोई अंश छट न पाए, और क्योंकि यह सम्भव नहीं, अतः अनुवाद को प्रवञ्चना की कोटि में रख दिया गया था।

पृष्ठभूमि[संपादित करें]

यह स्थिति स्थूल रूप से उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक रही जिसमें अनुवाद मुख्य रूप से व्यक्तिगत रुचि से प्रेरित अधिक था, सामाजिक आवश्यकता से प्रेरित कम। इसके अतिरिक्त मौलिक लेखन की परिमाणगत प्रचुरता के कारण भी इस प्रकार की राय बनी। दूसरे विश्वयुद्ध के पश्चात् साम्राज्यवाद के खण्डित होने के फलस्वरूप अनेक छोटे-बड़े राष्ट्र स्वतन्त्र हुए तथा उनकी अस्मिता का प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो गया। संघीय गणराज्यों के घटक भी अपनी अस्मिता के विषय में सचेत होने लगे। इस सम्पर्क-स्थापना तथा अस्मिता-विकास की स्थिति में भाषा का केन्द्रीय स्थान है, जो बहुभाषिकता की स्थिति के रूप में दिखाई पड़ता है। इसमें अनुवाद की सत्ता अवश्यम्भावी है। इसके फलस्वरूप अनुवाद प्रधान रूप से एक सामाजिक आवश्यकता बन गया है। विविध प्रकार के लेखनों के अनुवाद होने लगे। अनुवाद कार्य एक व्यवसाय हो गया। अनुवादकों को प्रशिक्षित करने के अभिकरण स्थापित हो गए, जिनमें अल्पकालीन और पूर्णसत्रीय पाठ्यक्रमों और कार्यशालाओं आदि का आयोजन किया जाने लगा। इसका यह भी परिणाम हुआ कि एक और तो अनुवाद के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण बदला तथा दूसरी ओर ज्ञानात्मक दृष्टि से अनुवाद सिद्धान्त के विकास को विशेष बल मिला तथा अनुवाद प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के लिए अनुवाद सिद्धान्त की आवश्यकता को स्वीकार किया गया। फलस्वरूप, अनुवाद सिद्धान्त एक अपेक्षाकृत स्वतन्त्र ज्ञानशाखा बन गया, जिसकी जानकारी अनुवादक, अनुवाद शिक्षक, और अनुवाद समीक्षक, तीनों के लिए उपादेय हुआ।

सामयिक सन्दर्भ[संपादित करें]

अनुवाद के विषय में सैद्धान्तिक चर्चा का सूत्रपात आधुनिक युग में ही हुआ, ऐसा समझना तथ्य और तर्क दोनों के ही विपरीत माना जाने लगा। अनुवाद कार्य की लम्बी परम्परा को देखते हुए यह मानना तर्कसंगत बन गया कि अनुवाद कार्य के विषय में सैद्धान्तिक चर्चा की परम्परा भी पुरानी है। ईसा पूर्व पहली शताब्दी में सिसरो के लेखन में अनुवाद चिन्तन के बीज प्राप्त होते हैं और तत्पश्चात् भी इस विषय पर विद्वान् अपने विचार प्रकट करते रहे हैं। इस चिन्तन की पृष्ठभूमि भी अवश्य रही है, यद्यपि उसे स्पष्ट रूप से पारिभाषित नहीं किया गया। यह अवश्य माना गया कि जिस प्रकार अनुवाद कार्य का संगठित रूप में होना आधुनिक युग की देन है, उसी प्रकार अनुवाद सिद्धान्त की अपेक्षाकृत सुपरिभाषित पृष्ठभूमि का विकसित होना भी आधुनिक युग की देन है।

अनुवाद सिद्धान्त के आधुनिक सन्दर्भ की मूल विशेषता है इसकी बहुपक्षीयता। यह किसी एकान्वित पृष्ठभूमि पर आधारित न होकर अनेक परन्तु परस्पर सम्बद्ध शास्त्रों की समन्वित पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिनके प्रसङ्गोचित अंशों से वह पृष्ठभूमि निर्मित है। मुख्य शास्त्र हैं - पाठ सङ्केत विज्ञान, सम्प्रेषण सिद्धान्त, भाषा प्रयोग सिद्धान्त, और तुलनात्मक अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान। यह स्पष्ट करना भी उचित होगा कि एक ओर मानव अनुवाद तथा यान्त्रिक अनुवाद, तथा दूसरी ओर लिखित अनुवाद और मौखिक अनुवाद के व्यावहारिक महत्त्व के कारण इनके सैद्धान्तिक पक्ष के विषय में भी चिन्तन आरम्भ होने लगा है। तथापि मानवकृत लिखित माध्यम के अनुवाद की ही परिमाणगत तथा गुणात्मक प्रधानता मानी जाती रही है तथा इनसे सम्बन्धित सैद्धान्तिक चिन्तन के मुद्दे विशेष रूप से प्रासङ्गिक हैं।

यद्यपि प्राचीन भारतीय परम्परा में अनुवाद चिन्तन की परम्परा उतने व्यवस्थित तथा लेखबद्ध रूप में प्राप्त नहीं होती, जिस प्रकार पश्चिम में, तथापि अनुवाद चिन्तन के बीज अवश्य उपलब्ध हैं। तदनुसार, अनुवाद पुनरुक्ति है - एक भाषा में व्यंजित सन्देश को दूसरी भाषा में पुनः कहना। अनुवाद के प्रति यह दृष्टि पश्चिमी परम्परा में स्वीकृत धारणा से बाह्य स्तर पर ही भिन्न प्रतीत होती है। परन्तु इस दृष्टि को अपनाने से अनुवाद सम्बन्धी अनेक सैद्धान्तिक बिन्दुओं की अधिक विशद तथा संगत व्याख्या की गई है। इसी सम्बन्ध में दूसरी दृष्टि द्वन्द्वात्मकता की है। जो आधुनिक है तथा मुख्य रूप से संरचनावाद की देन है।

अनुवाद कार्य की परम्परा को देखने से यह स्पष्ट है कि अनवाद सिद्धान्त सम्बन्धी चिन्तन साहित्यिक कृतियों को लेकर ही अधिक हुआ है। यह स्थिति सङ्गत भी है। विगत युग में साहित्यिक कृतियों को ही अनुवाद के लिए चुना जाता था। अब भी साहित्यिक कृतियों के ही अनुवाद अधिक परिमाण में होते हैं। तथापि, परिस्थितियों के अनुरोध से अब साहित्येतर लेखन का अनुवाद भी अधिक मात्रा में होने लगा है। विशेष बात यह है कि दोनों कोटियों के लेखनों में एक मूलभूत अन्तर है। जिसे लेखक की व्यक्तिनिष्ठता तथा निर्वैयक्तिकता की शब्दावली में अधिक स्पष्ट रीति से प्रकट कर सकते हैं। व्यक्तिनिष्ठ लेखन का, अपनी प्रकृति की विशेषता से, कुछ अपना ही सन्दर्भ है। यह कहकर हम दोनों की उभयनिष्ठ पृष्ठभूमि का निषेध नहीं कर रहे, परन्तु प्रस्तुत सन्दर्भ में हम दोनों की दूरी और आपेक्षिक स्वायत्तता को विशेष रूप से उभारना चाहते हैं। यह उचित ही है कि भाषाप्रयोग के पक्ष से निर्वैयक्तिक लेखन के अनुवाद के सैद्धान्तिक सन्दर्भ को भी विशेष रूप से उभारा जाए।

विस्तार[संपादित करें]

अनुवाद सिद्धान्त का एक विकासमान आयाम है अनुसन्धान की प्रवृत्ति। अनुवाद सिद्धान्त की बहुविद्यापरक प्रकृति के कारण विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ-भाषाविज्ञानी, समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी, शिक्षाविद्, नृतत्वविज्ञानी, सूचना सिद्धान्त विशेषज्ञ-परस्पर सहयोग के साथ अनुवाद के सैद्धान्तिक अंशो पर शोधकार्य में रुचि लेने लगे। अनुवाद कार्य का क्षेत्र बढ़ता गया। अलग-अलग संस्कृतियों के लोगों में सम्पर्क बढ़ा - लोग विदेशों में शिक्षा के लिए जाते, व्यापारिक-औद्योगिक संगठन विभिन्न देशों में काम करते, विभिन्न भाषा भाषी लोग सम्मेलनों में एक साथ बैठकर विमर्श करते, राष्ट्रों के मध्य राजनयिक अनुबन्ध होने लगे। इन सभी में अनुवाद की अनिवार्य रूप से आवश्यकता प्रतीत हुई और अनुवाद की विशिष्ट समस्याएँ उभरने लगी। इन समस्याओं का अध्ययन अनुवाद सम्बन्धी अनुसन्धान का उर्वर क्षेत्र बना। एक ओर भाषा और संस्कृति तथा दूसरी ओर भाषा और विचार के मध्य सम्बन्ध पर अनुवाद द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के आधार पर नया चिन्तन सामने आया।

मशीन अनुवाद तथा मौखिक अनुवाद के क्षेत्रों में नई-नई सम्भावनाएँ सामने आने लगी, जिसने इन क्षेत्रों में अनुवाद अनुसन्धान को गति प्रदान की। मानव अनुवाद तथा लिखित अनुवाद के परम्परागत क्षेत्रों पर भी भाषा अध्ययन की नई दृष्टियों ने विशेषज्ञों को नूतन पद्धति से विचार करने के लिए प्रेरित किया। इन सब प्रवृत्तियों से अनवाद सिद्धान्त को प्रतिष्ठा का पद मिलने लगा और इसे सैद्धान्तिक शोध के एक उपयुक्त क्षेत्र के रूप में स्वीकृति प्राप्त होने लगी।[2] [3]

अनुवाद दशा में पहला सार्थक प्रयास एच. एच. विल्सन ने १८५५ में ‘ग्लोरी ऑफ़ ज्यूडिशियल एंड रेवेन्यू टर्म्स' के द्वारा किया। सन् १९६१ में राजभाषा विधायी आयोग की स्थापना हुई। इसका काम अखिल भारतीय मानक विधि शब्दावली तैयार करना था। १९७० में विधि शब्दावली का प्रकाशन हुआ। इसका परिवर्धन होता आ रहा हे। इसका नवीन संस्करण १९८४ में निकला। इस आयोग ने कानून संबंधी अनेक ग्रंथो का अनुवाद किया हे। कई न्यायालयों में न्यायाधीश हिंदी में भी निर्णय देने लगे है।

अनुवाद की परम्परा[संपादित करें]

अनुवाद की परम्परा बहुत पुरानी है। बेबल के मीनार (Tower of Babel) की कथा प्रसिद्ध ही है, जो इस तथ्य की ओर सङ्केत करती है कि, मानव समाज में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। यह तर्कसङ्गत रूप से अनुमान किया जा सकता है कि पारस्परिक सम्पर्क की सामाजिक अनिवार्यता के कारण अनुवाद व्यवहार का जन्म भी बहुत पहले हो गया होगा। परन्तु जहाँ तक लिखित प्रमाणों का सम्बन्ध है,

  • अनुवाद परम्परा के आरम्भिक बिन्दु का प्रमाण ईसा से तीन सहस्र वर्ष पहले प्राचीन मिस्र के राज्य में, द्विभाषिक शिलालेखों के रूप में मिलता है।
  • तत्पश्चात् ईसा से तीन सौ वर्ष पूर्व रोमन लोगों के ग्रीक लोगों के सम्पर्क में आने पर ग्रीक से लैटिन में अनुवाद हुए।
  • बारहवीं शताब्दी में स्पेन में इस्लाम के साथ सम्पर्क होने पर यूरोपीय भाषाओं में अरबी से अनुवाद हुए।

बृहत् स्तर पर अनुवाद तभी होता है, जब दो भिन्न भाषाभाषी समुदायों में दीर्घकाल पर्यन्त सम्पर्क बना रहे तथा उसे सन्तुलित करने के प्रयास के अन्तर्गत अल्प विकसित संस्कृति के लोग सुविकसित संस्कृति के लोगों के साहित्य का अनुवाद कर अपने साहित्य को समृद्ध करें। ग्रीक से लैटिन में और अरबी से यूरोपीय भाषाओं में प्रचर अनुवाद इसी प्रवृत्ति के परिणाम माने जाते हैं। अनुवाद कार्य को इतिहास की प्रवृत्तियों की दृष्टि से दो भागों में विभाजित किजा जाता है - प्राचीन और आधुनिक।

प्राचीन परम्परा[संपादित करें]

प्राचीन युग में मुख्यतः तीन प्रकार की रचनाओँ के अनुवाद प्राप्त होते हैं। क्योंकि इन तीन क्षेत्रों में ही प्रायः ग्रन्थों की रचना होती थी। वें क्षेत्र हैं - साहित्य, दर्शन और धर्म। साहित्यिक रचनाओं में ग्रीक के इलियड और ओडेसी, संस्कृत के रामायण और महाभारत ऐसे ग्रन्थ हैं, जिनका व्यापक स्तर अनुवाद हुआ। दार्शनिक रचनाओं में प्लेटो के संवाद, अनुवाद की दृष्टि से लोकप्रिय हुए। धार्मिक रचनाओं में बाइबिल के सबसे अधिक अनुवाद पाए जाते हैं।

आधुनिक परम्परा[संपादित करें]

आधुनिक युग में अनुवाद के माध्यम से प्राचीन युग के ये महान ग्रन्थ अब विभिन्न भाषा भाषियों को उपलब्ध होने लगे हैं। अनुवाद तकनीक की दृष्टि से इन अनुवादों की विशेषता यह है कि, प्राचीन युग में ये अनुवाद विशेष रूप से एकपक्षीय रूप में होते थे अर्थात् जिस भाषा में अनुवाद किए जाते थे (= लक्ष्यभाषा) उनसे उनकी किसी रचना का मूल ग्रन्थ भाषा (= मूलभाषा या स्रोत भाषा) में अनुवाद नहीं होता था। इसका कारण यह कि मूल ग्रन्थों की तुलना में लक्ष्यभाषा के ग्रन्थ प्रायः उतने उत्कृष्ट नहीं होते थे, दूसरी बात यह कि मूल ग्रथों की भाषा के प्रति अत्यन्त आदर भावना के कारण लक्ष्य भाषा के रूप में प्रयोग में लाना सम्भवतः अनुचित समझा जाता था।

आधुनिक युग में अनुवाद का क्षेत्र विस्तृत हो गया है। उपर्युक्त तीन के अतिरि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्साशास्त्र, प्रशासन, कूटनीति, विधि, जनसम्पर्क (समाचार पत्र इत्यादि) तथा अन्य अनेक क्षेत्रों के ग्रन्थों और रचनाओं का अनवाद भी होने लगा है। प्राचीन युग के अनुवादों की तुलना में आधुनिक युग के अनुवाद द्विपक्षीय (बहुपक्षीय) रूप में होते हैं। आधुनिक युग में अनुवाद का आर्थिक और राजनीतिक महत्त्व भी प्रतिष्ठित हो गया है। विभिन्न राष्ट्रों के मध्य राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अनुबन्धों के प्रपत्र के द्विभाषिक पाठ तैयार किए जाते हैं। बहुराष्ट्रीय संस्थाओं को एक से अधिक भाषाओं का प्रयोग करना पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र में प्रत्येक कार्य पाँच या छः भाषाओं में किया जाता है। इन सब में अनिवार्य रूप से अनुवाद की आवश्यकता होती है।

इस स्थिति का औचित्य भी है। आधुनिक युग में हुई औद्योगिक, प्रौद्योगिक, आर्थिक और राजनीतिक क्रान्ति के फलस्वरूप विश्व के राष्ट्रों में एक-दूसरे के निकट सम्पर्क की आवश्यकता की चेतना का अतीव शीघ्र विकास हुआ, उसके कारण अनुवाद को यह महत्त्व मिलना स्वाभाविक माना जाता है। यही कारण है कि यदि प्राचीन युग की प्रेरक शक्ति अनुवादक की व्यक्तिगत रुचि अधिक थी, तो आधुनिक युग में अनुवाद की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक आवश्यकता एक प्रबल प्रेरक शक्ति बनकर सामने आई है। इस स्थिति के अनेक उदाहरण मिलते हैं। भाषायी अल्पसंख्यक वर्ग के लेखकों की रचनाएँ दूसरी भाषाओं में अनूदित होकर अधिक पढ़ी जाती हैं। अपेक्षाकृत छोटे तथा बहुभाषी राष्ट्रों को अपने देश के भीतर ही विभिन्न भाषाभाषी समुदायों के मध्य सम्पर्क स्थापित करने की समस्या का सामना करना पड़ता है।

सामाजिक आवश्यकता के अनुरूप अनुवाद के इस महत्त्व के कारण अनुवाद कार्य अब संगठित रूप से होता देखा जाता है। राजनीतिक-आर्थिक कारणों से उत्पन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनुवाद अब एक व्यवसाय बन चुका है तथा व्यक्तिगत होने के साथ-साथ उसका संगठनात्मक रूप भी प्रतिष्ठित होता दिखता है। अनुवाद कौशल को सिखाने के लिए शिक्षा संस्थाओं में प्रबन्ध किए जाते हैं तथा स्वतन्त्र रूप से भी प्रशिक्षण संस्थान काम करते हैं।

व्याख्याएँ[संपादित करें]

  • ज्ञातस्य कथनमनुवादः - ज्ञात का (पुनः) कथन अनुवाद है। (जैमिनिन्यायमाला)
  • प्राप्तस्य पुनः कथनेऽनुवादः - पूर्वकथित का पुनः कथन अनुवाद है। (शब्दार्थचिन्तामणिः)
  • आवृत्तिनुवादो वा [4]- पुनरावर्तन ही अनुवाद है। (भर्तृहरि)
  • लेखक होना सरल है, किन्तु अनुवादक होना अत्यन्त कठिन है। - मामा वरेरकर
  • प्रत्येक कृति अनुवाद योग्य है, परन्तु प्रत्येक कृति का अच्छा अनुवाद नहीं किया जा सकता। -खुशवन्त सिंह
  • अनुवाद, प्रकाश के आने के लिए वातायन खोल देता है; वह छिलके को छोड़ देता है जिससे हम गूदे का स्वाद ले सकें। - बाइबिल
  • If one denies the concept of translation, one must give up the concept of a language community. - KARL VOSSLER
  • The peculiar (विलक्षण) genious of a language appears best in the process of translation. - MARGARET MUNSTERBERG
  • Say what one will of the inadequacy of translation, it remains one of the most important and worthiest concerns in the totality of world affaris. - J.W.V. GOETHE

अनुवाद की परिभाषा[संपादित करें]

एक विशिष्ट प्रकार के भाषिक व्यापार के रूप में अनुवाद, भारतीय परम्परा की दृष्टि से, कोई नई बात नहीं। वस्तुतः 'अनुवाद' शब्द और उससे उपलक्षित भाषिक व्यापार भारतीय परम्परा में बहुत पहले से चले आए हैं। अतः 'अनुवाद' शब्द और इसके अंग्रेजी पर्याय ‘ट्रांसलेशन' के व्युत्पत्तिमूलक और प्रवृत्तिमूलक अर्थों की सहायता से अनुवाद की परिभाषा और उसके स्वरूप को श्रेष्ठतर रूप से जाना जा सकता है।

व्यत्पत्तिमूलक अर्थ[संपादित करें]

'अनुवाद' का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ है - पुनः कथन; एक बार कही हुई बात को दोबारा कहना। इसमें 'अर्थ की पुनरावृत्ति होती हैं, शब्द (शब्द रूप) की नहीं। 'ट्रांसलेशन' शब्द का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ है 'पारवहन' अर्थात् एक स्थान-बिन्दु से दूसरे स्थान-बिन्दु पर ले जाना। यह स्थान-बिन्दु भाषिक पाठ है। इसमें भी ले जाई जाने वाली वस्तु अर्थ होता है, शब्द नहीं। उपर्युक्त दोनों शब्दों में अन्तर व्युत्पत्तिमूलक अर्थ की दृष्टि से है, अतः सतही है। वास्तविक व्यवहार में दोनों की समानता स्पष्ट है। अर्थ की पुनरावृत्ति को ही दूसरे शब्दों में और प्रकारान्तर से, अर्थ का भाषान्तरण कहा जाता है, जिसमें कई बार मूल भाषा की रूपात्मक-गठनात्मक विशेषताएँ लक्ष्यभाषा में संक्रान्त हो जाती है।

वस्तुतः 'अनुवाद' शब्द का भारतीय परम्परा वाला अर्थ आधुनिक सन्दर्भ में भी मान्य है और इसी को केन्द्र बिन्दु बनाकर अनुवाद की प्रकृति को अंशशः समझा जाता है। तदनुसार, अनुवाद कार्य के तीन सन्दर्भ हैं - समभाषिक, अन्यभाषिक और अन्तरसंकेतपरक।

समभाषिक अनुवाद[संपादित करें]

समभाषिक सन्दर्भ में अर्थ की पुनरावृत्ति एक ही भाषा की सीमा के अन्तर्गत होती है, परन्तु इसके आयाम भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। मुख्य आयाम दो हैं -कालक्रमिक और समकालिक। कालक्रमिक आयाम पर समभाषिक अनुवाद एक ही भाषा के ऐतिहासिक विकास की दो निकटस्थ अवस्थाओं में होता है, जैसे, पुरानी हिन्दी से आधुनिक हिन्दी में अनुवाद। समकालिक आयाम पर समभाषिक अनुवाद मुख्य रूप से तीन स्तरों पर होता है - बोली, शैली और माध्यम

बोली स्तर पर समभाषिक अनुवाद के चार उपस्तर हो सकते हैं :

(क) एक भौगोलिक बोली से दूसरी भौगोलिक बोली में; जैसे ब्रज से अवधी में।

(ख) अमानक बोली से मानक बोली में; जैसे गंजाम ओड़िया से पुरी की ओड़िया में अथवा नागपुर मराठी से पुणे मराठी में।

(ग) बोली रूप से भाषा रूप में, जैसे ब्रज या अवधी से हिन्दी में

(घ) एक सामाजिक बोली से दूसरी सामाजिक बोली में, जैसे अशिक्षितों या अल्पशिक्षितों की भाषा से शिक्षितों की भाषा में या एक धर्म में दीक्षित लोगों की भाषा से अन्य धर्म में दीक्षित लोगों की भाषा में।

शैली स्तर पर समभाषिक अनुवाद को शैली-विकल्पन के रूप में भी देखा जा सकता है। इसका एक अच्छा उदाहरण है औपचारिक शैली से अनौपचारिक शैली में अनुवाद; जैसे ‘धूम्रपान वर्जित है' (औपचारिक शैली) → ‘बीड़ी सिगरेट पीना मना है' (अनौपचारिक शैली)। इसी प्रकार ‘ट्यूबीय वायु आधान में सममिति नहीं रह गई। है' (तकनीकी शैली) -> 'टायर की हवा निकल गई है' (गैरतकनीकी शैली)।

माध्यम की दृष्टि से समभाषिक अनुवाद की स्थिति वहाँ होती है जहाँ मौखिक माध्यम में प्रस्तुत सन्देश की लिखित माध्यम में या इसके विपरीत पुनरावृत्ति की जाए; जैसे, मौखिक माध्यम का का एक वाक्य है : "समय की सीमा के कारण मैं अपने श्रोताओं को अधिक विस्तार से इस विषय में नहीं बता पाऊँगा।" इसी को लिखित माध्यम में इस प्रकार से कहना सम्भवतः उचित माना जाता है : "स्थान की सीमा के कारण मैं अपने पाठकों को अधिक विस्तार से इस विषय का स्पष्टीकरण नहीं कर सकुंगा।" ('समय' → 'स्थान', 'श्रोता' → 'पाठक'; 'विषय में बता पाना' > 'का स्पष्टीकरण कर सकना')।

समभाषिक अनुवाद के उपर्युक्त उदाहरणों से दो बातें स्पष्ट होती हैं।

(क) अर्थान्तरण या अर्थ की पुनरावृत्ति की प्रक्रिया में शब्दचयन तथा वाक्य-विन्यास दोनों प्रभावित होते हैं। माध्यम अनुवाद में स्वनप्रक्रिया की विशेषताएँ (बलाघात, अनुतान आदि) लिखित व्यवस्था की विशेषताओं (विराम-चिह्न आदि) का रूप ले लेती हैं या इसके विपरीत होता है।

(ख) बोली, शैली, और माध्यम के आयामों के मध्य कठोर विभाजन रेखा नहीं, अपि तु इनमें आंशिक अतिव्याप्ति पाई जाती है, जिसकी सम्भावना भाषा प्रयोग की प्रवृत्ति में ही निहित है। जैसे, शैलीगत अनुवाद की आंशिक सत्ता माध्यम अनुवाद में दिखाई देती है, और तदनुसार 'के विषय में बता पाना' जैसा मौखिक माध्यम का, अत एव अनौपचारिक, चयन, लिखित माध्यम में औपचारिकता का स्पर्श लेता हुआ 'का स्पष्टीकरण कर सकना' हो जाता है। इसी प्रकार शैलीगत अनुवाद में समाजिक बोलीगत अनुवाद भी कभी-कभी समाविष्ट हो जाता है। जैसे, शिक्षितों की बोली में, औपचारिक शैली की प्रधानता की प्रवृत्ति हो सकती है और अल्पशिक्षितों या अशिक्षितों की बोली में अनौपचारिक शैली की।

समभाषिक अनुवाद की समस्याएँ न केवल रोचक हैं अपि तु अन्यभाषिक अनुवाद की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भी हैं। अनुवाद को भाषाप्रयोग की एक विधा के रूप में देखने पर समभाषिक अनुवाद का महत्त्व और भी स्पष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त अन्यभाषिक अनुवाद की प्रकृति को समझने की दृष्टि से समभाषिक अनुवाद की प्रकृति को समझना न केवल सहायक है, अपि तु आवश्यक भी है। ये कहा जा सकता है कि अनुवाद व्युत्पन्न भाषाप्रयोग है, जिसके दो सन्दर्भ हैं - समभाषिक और अन्यभाषिक। इस सन्दर्भ भेद से अनुवाद व्यवहार में अन्तर आ जाता है, परन्तु दोनों ही स्थितियों में अनुवाद की प्रकृति वही रहती है।

अन्यभाषिक अनुवाद[संपादित करें]

अन्यभाषिक अनुवाद दो भाषाओं के बीच में होता है। ये दो भाषाएँ ऐतिहासिकता और क्षेत्रीयता के समन्वित मानदण्ड पर स्वतन्त्र भाषाओं के रूप में पहचानी जाती हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से एक ही धारा में आने वाली भाषाओं को सामान्यतः उस स्थिति में स्वतन्त्र भाषा के रूप में देखते हैं यदि वह कालक्रम में एक दूसरे के निकट सन्निहित न हों, जैसे संस्कृत और हिन्दी; इन दोनों के मध्य प्राकृत भाषाएँ आ जाती हैं। इसी प्रकार क्षेत्रीयता की दृष्टि से प्रतिवेशी भाषाओं में अत्यधिक आदन-प्रदान होने पर भी उन्हें भिन्न भाषाएँ ही मानना होगा, जैसे हिन्दी और पंजाबी। अन्यभाषिक अनुवाद के सन्दर्भ में सम्बन्धित भाषाओं का स्वतन्त्र अस्तित्व महत्त्व की बात होती है। समभाषिक अनुवाद की तुलना में अन्यभाषिक अनुवाद सामाजिक और व्यावहारिक दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण है। भाषाप्रयोग की दृष्टि से अन्यभाषिक अनुवाद की समस्याओं में समभाषिक अनुवाद की समस्याओं से गुणात्मक अन्तर दिखाई पड़ता है। इस प्रकार समभाषिक अनुवाद से सम्बन्धित होते हुए भी अन्यभाषिक अनुवाद, अपेक्षाकृत स्वनिष्ठ व्यापार है।

अन्तरसङ्केतभाषिक अनुवाद[संपादित करें]

अनुवाद शब्द के उपर्युक्त दोनों सन्दर्भ अपेक्षाकृत सीमित हैं। इनमें अनुवाद को भाषा-सङ्केतों का व्यापार माना गया है। वस्तुतः भाषा-सङ्केत, सङ्केतों की एक विशिष्ट श्रेणी है, जिनके द्वारा सम्प्रेषण कार्य सम्पन्न होता है। सम्प्रेषण के लिए विभिन्न कोटियों के सङ्केतों को काम में लिया जाता है। इन्हें सामान्य सङ्केत कहा जाता है। इस दृष्टि से भी अनुवाद शब्द की परिभाषा की जाती है। इसके अनुसार एक संकेतों द्वारा कही गई बात को दुसरी कोटि के संकेतों द्वारा पुनः कहना इस प्रकार के अनुवाद को अन्तरसंकेतपरक अनुवाद कहा जाता है। यह सामान्य संकेत विज्ञान के अन्तर्गत है। भाषिक संकेतों को प्रवर्तन बिन्दु मानकर संकेतों को भाषिक और भाषेतर में विभक्त किया जाता है। भाषेतर में दो भाग हैं - बाह्य (बाह्य ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ग्राह्य) और आन्तरिक (अन्तरिन्द्रिय द्वारा ग्राह्य)।

अनुवाद की दृष्टि से संकेत-परिवर्तन के व्यापार की निम्नलिखित कोटियाँ बन सकती हैं :

१. बाह्य संकेत का बाह्य संकेत में अनुवाद - इसके अनुसार किसी देश का मानचित्र उस देश का अनुवाद है; किसी प्राणी का चित्र उस प्राणी का अनुवाद है।

२. बाह्य संकेत का भाषिक संकेत में अनुवाद - इसके अनुसार किसी प्राणी के लिये किसी भाषा में प्रयुक्त कोई शब्द उस प्राणी का अनुवाद है। इस दृष्टि से वस्तुतः यहा भाषा दर्शन की समस्या है जिसकी व्याख्या अर्थ के संकेत सिद्धान्त में की गई है।

३. आन्तरिक संकेत से आन्तरिक संकेत में अनुवाद - इसके अनुसार किसी एक घटना को उसकी समशील संवेदना में परिवर्तित करना इस श्रेणी का अनुवाद है। स्पष्ट है कि इस स्थिति की वास्तविक सत्ता नहीं हो सकती। अतः केवल सैद्धान्तिकता की दष्टि से ही यह कोटि निर्धारित की जाती है।

४. आन्तरिक संकेत से भाषिक संकेत में अनुवाद - इसके अनुसार किसी आन्तरिक संवेदना के लिए किसी शब्द का प्रयोग करना इस कोटि का अनुवाद है। इसको अधिक स्पष्टता से कहा जाता है कि, किसी भौतिक स्थिति के साथ सम्पर्क होने पर - जैसे, किसी दुर्घटना को देखकर, प्रकृति के किसी दृश्य को देखकर, किसी वस्तु को हाथ लगाकर, कुछ सँघकर; दूसरे शब्दों में इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष होने पर - मन में जिस संवेदना का उदय होता है वह एक प्रकार का संकेत है। उसके लिये भाषा के किसी शब्द का प्रयोग करना या भाषिक संकेत द्वारा उसकी पुनरावृत्ति करना इस कोटि का अनुवाद कहलाएगा। उदाहरण के लिए, एक विशिष्ट प्रकार की वेदना का संकेत करने के लिए हिन्दी में ‘शोक' शब्द का प्रयोग किया जाता है और दूसरी के लिए 'प्रेम' का। समझा जाता है कि एक संवेदना का अनुवाद ‘शोक' शब्द द्वारा किया जाता है और दूसरी का 'प्रेम' द्वारा। इस दृष्टि से यह कहा जाता है कि समस्त मौलिक अभिव्यक्ति अनुवाद है।[5] वक्ता या लेखक अपने संवेदना रूपी संकेतों की भाषिक संकेतों में पुनरावृत्ति कर देता है। इस दृष्टि से यह भाषा मनोविज्ञान की समस्या है, जिसकी व्याख्या उद्दीपन-अनुक्रिया सिद्धान्त में की गई है।

इस प्रकार, अनुवाद शब्द की व्यापक परिधि में तीनों सन्दर्भों के अनुवादों का स्थान है -समभाषिक अनुवाद, अन्यभाषिक अनुवाद, और अन्तरसंकेतपरक अनुवाद। तीनों का अपना-अपना सैद्धान्तिक आधार है। इन तीनों के मध्य का भेद जानना महत्त्वपूर्ण है। अनुवादक को यह स्थिर करना है कि इन तीनों में केन्द्रीय स्थिति किसकी है तथा शेष दो का उनके साथ कैसा सम्बन्ध है।

सैद्धान्तिक औचित्य की दृष्टि से अन्यभाषिक अनुवाद की स्थिति केन्द्रीय है। केवल ‘अनुवाद' शब्द (विशेषणरहित पद) से अन्यभाषिक अनुवाद का अर्थ ग्रहण किया जाता है। इसका मूल है द्विभाषाबद्धता। अनुवादक का बोधन तथा अभिव्यक्ति दोनों स्थितियों में ही भाषा से बँधे रहते हैं और ये भाषाएँ भी भेद (काल, स्थान या प्रयोग सन्दर्भ पर आधारित भेद) की दृष्टि से नहीं, अपि तु कोड की दृष्टि से भिन्न-भिन्न होती हैं; जैसे हिन्दी और अंग्रेजी, हिन्दी और सिन्धी आदि।

इस केन्द्रीय स्थिति के दो छोर हैं। प्रथम छोर पर दोनों स्थितियों में भाषाबद्धता रहती है, परन्तु भाषा वही रहती है। स्थितियों को अन्तर उसी भाषा के भेदों के अन्तर पर आधारित होता है। यह समभाषिक अनुवाद है। पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग की स्पष्टता के लिए इसे 'अन्वयान्तर' या 'शब्दान्तरण' कहा जाता है। दूसर छोर पर भाषेतर संकेत का भाषिक संकेत में परिवर्तन होता है। संकेत पद्धति का यह परिवर्तन भाषा प्रयोग की सामान्य स्थिति को जन्म देता है। पारिभाषिक शब्दावली में इसे 'भाषा व्यवहार' कहा जाता है। इन तीनों (समभाषिक अनुवाद, अन्यभाषिक अनुवाद, और अन्तरसंकेतपरक अनुवाद) में सम्बन्ध तथा अन्तर दोनों हैं। यह सम्बन्ध उभयनिष्ठ है।

अनुवाद (अन्यभाषिक अनुवाद) की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वास्तविक अनुवाद कार्य में तथा अनूदित पाठ के मूल्यांकन में अनुवादकों को समभाषिक अनुवाद तथा अन्तरसंकेतपरक अनुवाद की संकल्पनाओं से सहायता मिलती है। यह आवश्यकता तभी मुखर रूप से सामने आती है, जब अनुवाद करते-करते अनुवादक कभी अटक जाते हैं -मूल पाठ का सम्यक् बोधन नहीं हो पातें, लक्ष्यभाषा में शुद्ध और उपयुक्त अनुवाद का पर्याप्ततया अन्वेषण करने में कठिनाई होती है, अनुवादक को यह जाँचना होता है कि अनुवाद कितना सफल है, इत्यादि।

प्रवृत्तिमूलक अर्थ[संपादित करें]

प्रवृत्तिमूलक में (व्यवहार में) 'अनुवाद' शब्द से अन्यभाषिक अनुवाद का ही अर्थ लिया जाता है। और इसी कारण शनैः शनैः यह बात सिद्धान्त का भी अङ्ग बन गई है कि अनुवाद दो भाषाओं के मध्य होने वाली प्रक्रिया है। इस स्थिति का स्वीकार किया जाता है। संस्कृत परम्परा का 'छाया' शब्द इसी स्थिति का सङ्केत करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

परिभाषा के दृष्टीकोण[संपादित करें]

अनुवाद के स्वरूप को समझने के लिए अनुवाद की परिभाषा विशेष रूप से सहायक है। अनुवाद की बहुपक्षीयता को देखते हुए अनुवाद की परिभाषा विभिन्न दृष्टिकोणों से प्रस्तुत की गई है। मुख्य दृष्टिकोण तीन प्रकार के हैं - (१) अनुवाद एक प्रक्रिया है। (२) अनुवाद एक प्रक्रिया अथवा/और उसका परिणाम है। (३) अनुवाद एक सम्बन्ध का नाम है।

अनुवाद एक प्रक्रिया है[संपादित करें]

इस दृष्टिकोण के अन्तर्गत निम्नलिखित परिभाषाएँ उद्धृत की जाती हैं :

(क) "मूलभाषा के सन्देश के सममूल्य सन्देश को लक्ष्यभाषा में प्रस्तुत करने की क्रिया को अनुवाद कहते हैं। सन्देशों की यह मूल्यसमता पहले अर्थ और फिर शैली की दृष्टि से, तथा निकटतम एवं स्वाभाविक होती है।" (नाइडा तथा टेबर)[6]

(ख) "अनुवाद वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा सार्थक अनुभव (अर्थपूर्ण सन्देश या देश का अर्थ) एक भाषा-समुदाय से दूसरे भाषा-समुदाय को सम्प्रेषित किया जाता है।" (पट्टनायक)[7]

(ग) "एक भाषा की पाठ्यसामग्री को दूसरी भाषा की समानार्थक पाठ्यसामग्री द्वारा प्रस्थापित करना अनुवाद कहलाता है।" (कैटफोर्ड)[8]

(घ) "अनुवाद एक शिल्प है जिसमें एक भाषा में लिखित सन्देश के स्थान पर दूसरी भाषा के उसी सन्देश को प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जाता है।" (न्यूमार्क)[9]

अनुवाद एक प्रक्रिया या उसका परिणाम है[संपादित करें]

इसके अन्तर्गत निम्न लिखित परिभाषा को उद्धृत किया जाता है :

(क) "एक भाषा या भाषाभेद से दूसरी भाषा या भाषाभेद में प्रतिपाद्य को स्थानान्तरित करने की प्रक्रिया या उसके परिणाम को अनुवाद कहते हैं।" (हार्टमन तथा स्टार्क)[10]

अनुवाद एक सम्बन्ध का नाम है[संपादित करें]

इसके अन्तर्गत निम्नलिखित परिभाषा आती है :

(क) "अनुवाद एक सम्बन्ध है, जो दो या दो से अधिक पाठों के बीच होता है; ये पाठ समान स्थिति में समान प्रकार्य सम्पादित करते हैं (दोनों पाठों का सन्दर्भ समान होता है और उनसे व्यंजित होने वाला सन्देश भी समान होता है)।" (हैलिडे)[11]

अनुवाद की परिभाषाओं का यह वर्गीकरण जहाँ अनुवाद की प्रकृति की बहुपक्षीयता को स्पष्ट करता है, वहाँ इससे यह संकेत भी मिलता है कि, विभिन्न उद्देश्यों के अनुसार अनुवाद की परिभाषाएँ भी भिन्न-भन्न हो सकती हैं। इस प्रकार ये सभी परिभाषाएँ मान्य हैं। इन परिभाषाओं के आधार पर अनुवाद के दो पक्ष माने जाते हैं।

अनुवाद के पक्ष[संपादित करें]

अनुवाद के दो पक्ष हैं - पहला संक्रियात्मक पक्ष अत एव गतिशील और दूसरा सैद्धान्तिक पक्ष अत एव स्थितिशील।

संक्रियात्मक पक्ष[संपादित करें]

संक्रियात्मक दृष्टि से अनुवाद एक प्रक्रिया है। अनुवाद के पक्ष का सम्बन्ध अनुवाद करने के कार्य से है जिसके लिए 'अनुवाद कार्य' शब्द का प्रयोग करना उचित माना जाता है।

सैद्धान्तिक पक्ष[संपादित करें]

सैद्धान्तिक दृष्टि से अनुवाद एक सम्बन्ध है जो दो या दो से अधिक, परन्तु विभिन्न भाषाओं के पाठों के मध्य होता है; परन्तु वे समानार्थक होने चाहिये।

इस सम्बन्ध का उद्घाटन तुलनात्मक पद्धति के अध्ययन से किया जाता है। इन दोनों का समन्वित रूप इस धारणा में मिलता है कि अनुवाद एक निष्पत्ति है - कार्य का परिणाम अनुवाद है - जो अपने मूल पाठ से पर्यायता के सम्बन्ध से जुड़ा है। निष्पत्ति के रूप में अनुवाद को 'अनूदित पाठ' कहा जाता है। इस दृष्टि से एक मूल पाठ के अनेक अनुवाद हो सकते हैं। इस प्रकार संक्रियात्मक दृष्टि से अनुवाद को जहाँ भाषा प्रयोग की एक विधा के रूप में जाना जाता है, वहाँ सैद्धान्तिक दृष्टि से इसका सम्बन्ध भाषा पाठ तुलना तथा व्यतिरेकी विश्लेषण की तकनीकों पर आधारित भाषा सम्बन्धों के प्रश्न से (तुलनात्मक-व्यतिरेकी पाठ भाषाविज्ञान यही है) जोड़ा जाता है।

अनुवाद को अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की शाखा कहा गया है। वस्तुतः, अपने इस रूप में यह अपने प्रक्रिया रूप तथा सम्बन्ध रूप परिभाषाओं की योजक कड़ी है, जिसका संक्रियात्मक आधार अनूदित पाठ है, जिसके मूल में 'अनुवाद एक निष्पत्ति है' की धारणा निहित है। इन परिभाषाओं से अनुवाद के विषय में जो अन्य जानकारी मिलती है, वें बन्दुवार निम्न प्रकार से हैं -

(१) अनुवाद एक भाषा या भाषाभेद से दूसरी भाषा या भाषा भेद में होता है।

(२) यह प्रक्रिया, परिवर्तन, स्थानान्तरण, प्रतिस्थापन, या पुनरावृत्ति की प्रकृति की होती है।

(३) स्थानान्तरित होने वाली वस्तु को विभिन्न नामों से इङ्गित कर सकते हैं, जैसे पाठ्यसामग्री, सार्थक अनुभव, सूचना, सन्देश। ये विभिन्न नाम अनुवाद की सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि के विभिन्न आयोमों तथा अनुवाद कार्य के उद्देश्यों में अन्तर से जुड़े हैं। जैसे, भाषागत 'पाठ्यसामग्री' नाम से व्यक्त होने वाली सुनिश्चितता अनुवाद के भाषावैज्ञानिक आधार की विशेषता है, जिसका विशेष उपयोग मशीन अनुवाद में होता है। 'सूचना' और 'सार्थक अनुभव' अनुवाद के समाजभाषागत आधार का संकेत करते हैं; और ‘सन्देश' से अनुवाद की पाठसंकेतपरक पृष्ठभूमि उपलक्षित होती है।

(४) उपर्युक्त की विशेषता यह होती है कि इसका दोनों भाषाओं में समान अर्थ होता है। यह अर्थ की समानता व्यापक दृष्टि से होती है और भाषिक अर्थ से लेकर सन्दर्भमूलक अर्थ तक व्याप्त रहती है।

संक्षेप में, एक भाषा के विशिष्ट भाषाभेद के विशिष्ट पाठ को दूसरी भाषा में इस प्रकार प्रस्तुत करना अनुवाद है, जिसमें वह मूल के भाषिक अर्थ, प्रयोग के वैशिष्ट्य से निष्पन्न अर्थ, प्रयुक्ति और शैली की विशेषता, विषयवस्तु, तथा सम्बद्ध सांस्कृतिक वैशष्ट्यि को यथासम्भव संरक्षित रखते हुए दूसरी भाषा के पाठक को स्वाभाविक रूप से ग्राह्य प्रतीत हो।

अनुवाद का महत्त्व[संपादित करें]

बीसवीं सदी को अनुवाद का युग कहा गया है। यद्यपि अनुवाद सबसे प्राचीन व्यवसाय या व्यवसायों में से एक कहलाता है तथापि उसके जो महत्त्व बीसवीं सदी में प्राप्त हुआ वह उससे पहले उसे नहीं मिला ऐसा माना जाता है। इसका मुख्य कारण माना गया है कि बीसवीं शताब्दी में ही भाषासम्पर्क अर्थात् भिन्न भाषाभाषी समुदायों में सम्पर्क की स्थिति प्रमुख रूप से आरम्भ हुई। इसके मूल कारण आर्थिक और राजनीतिक माने जाते हैं। फलस्वरूप, विश्व का आर्थिक-राजनीतिक मानचित्र परिवर्तित होने लगा। वर्तमान यग में अधिकतर राष्ट्रों में यदि एक भाषा प्रधान है तो एक या अधिक भाषाएँ गौण पद पर दिखाई देती हैं। दूसरे शब्दों में, एक ही राजनीतिक-प्रशासनिक इकाई की सीमा के अन्तर्गत भाषायी बहुसंख्यक भी रहते हैं और भाषायी अल्पसंख्यक भी। लोकतन्त्र में सब लोगों का प्रशासन में समान रूप से भाग लेने का अधिकार तभी सार्थक माना जाता है, जब उनके साथ उनकी भाषा के माध्यम से सम्पर्क किया जाए। इससे बहुभाषिकता की स्थिति उत्पन्न होती है और उसके संरक्षण की प्रक्रिया में अनुवाद कार्य का आश्रय लेना अनिवार्य हो जाता है। इसके अतिरिक्त अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न राष्ट्रों के बीच राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक, तथा साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर पर बढ़ते हुए आदान-प्रदान के कारण अनुवाद कार्य की अनिवार्यता और महत्ता की नई चेतना प्रबल रूप से विकसित होती हुई दिखती है। अतः अनुवाद एक व्यापक तथा बहुधा अनिवार्य और तर्कसंगत स्थिति मानी जाती है। अनुवाद के महत्त्व को दो भिन्न, परन्तु सम्बन्धित सन्दर्भो में अधिक स्पष्टता से समझया जाता है : (क) सामाजिक एवं व्यावहारिक महत्त्व, (ख) शैक्षणिक एवं ज्ञानात्मक महत्त्व।

सामाजिक एवं व्यावहारिक महत्त्व[संपादित करें]

सामाजिक सन्दर्भ में अनुवाद व्यापार अनौपचारिक परिस्थितियों में होता है। इसका सम्बन्ध द्विभाषिकता की स्थिति से है। द्विभाषिकता का सामान्य अर्थ है एक समय में दो भाषाओं का वैकल्पिक रूप से प्रयोग। वर्तमान युग के समाज का एक बृहद् भाग ऐसा है, जो सामाजिक सन्दर्भ की अनौपचारिक स्थिति में दो भाषाओं का वैकल्पिक प्रयोग करता है। सामान्य रूप से प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति, नगरीय परिवेश का अर्ध शिक्षित व्यक्ति, दो भिन्न भाषाभाषी राज्यों के सीमा प्रदेश में रहने वाली जनता, तथा भाषायी अल्पसङ्ख्यक, इनमें अधिक स्पष्ट रूप से द्विभाषिकता की स्थिी देखी जाती है। यह द्विभाषिकता प्रायः आश्रित/संयुक्त द्विभाषिकता की कोटि की होती है। जिसका सामान्य लक्षण यह है कि, सब एक भाषा में (मातृभाषा में) सोचते हैं, परन्तु अन्य भाषा में अभिव्यक्त करते हैं। इस स्थिति में अनुवाद प्रक्रिया का होना अनिवार्य है। परन्तु यह प्रक्रिया अनौपचारिक रूप में ही होती है। व्यक्ति मन ही मन पहली भाषा से अन्य भाषा में अनुवाद कर अपनी बात कह देते हैं। यह माना गया है कि, अन्य भाषा परिवेश में अन्य भाषा सीखते समय अनुवाद का प्रत्यक्ष रूप से अस्तित्व रहता है। यदि स्व-भाषा के ही परिवेश में अन्य भाषा सीखी जाए तो "कोड" परिवर्तन की स्थिति आती है, जिसमें अनुवाद की स्थिति कुछ परोक्ष हो जाती है। अतः द्विभाषी रूप में सभी अनुवाद अनौपचारिक हैं। इस दृष्टि से अनुवाद एक सामाजिक भाषा व्यवहार में महत्त्वपूर्ण भूमिका में दिखता है।

शैक्षणिक एवं ज्ञानात्मक महत्त्व[संपादित करें]

शैक्षणिक एवं ज्ञानात्मक सन्दर्भ में अनुवाद व्यापार औपचारिक स्थिति में होता है। इसके दो भेद हैं : साधन रूप में अनुवाद और साध्य रूप में अनुवाद।

साधन रूप में अनुवाद[संपादित करें]

साधन रूप में अनुवाद का प्रयोग भाषा शिक्षण की एक विधि के रूप में किया जाता है। संज्ञानात्मक कौशल के रूप में अनुवाद के अभ्यास से भाषा अधिगम के दो कौशलों-बोधन और अभिव्यक्ति को पुष्ट किया जाता है। इसी प्रकार साधन रूप में अनुवाद के दो और क्षेत्र हैं : भाषाओं का तुलनात्मक व्यतिरेकी अध्ययन तथा तुलनात्मक साहित्य विवेचन।

भाषाओं का तुलनात्मक व्यतिरेकी अध्ययन[संपादित करें]

वस्तुतः भाषाओं के अध्ययन-विश्लेषण के लिए अनुवाद के द्वारा ही व्यक्ति को यह ज्ञात होता है कि, एक वाक्य में किस शब्द का क्या अर्थ है। उसके पश्चात् ही वह दोनों में समानता तथा असमानता के बिन्दु से अवगत हो पाता है। अतः व्यतिरेकी भाषा विश्लेषण को अनुवादात्मक विश्लेषण (ट्रांसलेटिव एनालसिस) भी कहा गया है।

तुलनात्मक साहित्य विवेचन[संपादित करें]

तुलनात्मक साहित्य विवेचन में साहित्यों के तुलनात्मक अध्ययन के साधन रूप में अनुवाद के प्रयोग के द्वारा सदृश-विसदृश अंशों का अर्थबोध होता है, जिससे अंशों की तुलना की जा सके। इसके अतिरिक्त अन्य भाषा साहित्य की कृतियों के अनुवाद का अभ्यास करना अथवा/और उन्हें अनूदित रूप में पढ़ना तुलनात्मक साहित्य विवेचन में अनुवाद के योगदान का उदाहरण है।

साध्य रूप में अनुवाद[संपादित करें]

साध्य रूप में अनुवाद व्यापार अनेक क्षेत्रों में दिखाई पड़ता है। कोशकार्य भी उक प्रकार का अनुवाद कार्य है। समभाषिक कोश में एक ही भाषा के अन्दर अनुवाद होता है और द्विभाषी कोश में दो भाषाओं के मध्य। यह अनुवाद, पाठ की अपेक्षा भाषा के आयाम पर होता है, जिसमें भाषा विश्लेषण के दो स्तर प्रभावित होते हैं। वे दो स्तर - शब्द और शब्द शृङ्खला हैं।

इसी प्रकार किसी भाषा के विकास के लिए भी अनुवाद-व्यापार का आश्रय लिया जाता है। जब किसी भाषा को ऐसे व्यवहार-क्षेत्रों में काम करने का अवसर मिलता है, जिनमें पहले उसका प्रयोग नहीं होता था, तब उसे विषयवस्तु और अभिव्यक्ति पद्धति दोनों ही दृष्टियों से विकसित करने की आवश्यकता होती है। इसके लिए अन्य भाषाओं से विभिन्न प्रकार के साहित्य का उसमें अनुवाद किया जाता है। फलस्वरूप, विषयवस्तु की परिधि के विस्तार के साथ-साथ भाषा के अभिव्यक्ति-कोश का क्षेत्र भी विस्तृत होता है। अनेक नये शब्द बन जाते हैं, कई बार प्रचलित शब्दों को नया अर्थ मिल जाता है, नये सहप्रयोग विकसित होने लगते हैं, संकर-शब्दावली प्रयोग में आने लगती है, और भाषा प्रयोग के सन्दर्भ की विशेषता के कारण कुल मिलाकर भाषा का एक नवीन भेद विकसित हो जाता है। आधुनिक प्रशासनिक हिन्दी तथा पत्रकारिता हिन्दी इसके अच्छे उदाहरण हैं। इस प्रक्रिया को भाषा नियोजन और भाषा विकास कहते हैं, जो अपने व्यापकतर सन्दर्भ में राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक विकास का अंग है। इस प्रकार अनुवाद के माध्यम से विकासशील भाषा में आवश्यक और महत्त्वपूर्ण साहित्य का प्रवेश होता है। तब कह सकते हैं कि इस रूप में अनुवाद राष्ट्रीय विकास में भी योगदान करता है।

अपने व्यापकतम रूप में अनुवाद भाषा की शक्ति में संवर्धन करता है, पाठों की व्याख्या एवं निर्वचन में सहायक है, भाषा तथा विचार के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट करता है, ज्ञान का प्रसार करता है, संस्कृति का संवाहक है, तथा राष्ट्रों के मध्ये परस्पर अवगमन और सद्भाव की वृद्धि में योगदान करता है। गेटे के शब्दों में, अनुवाद (अपनी प्रकृति से) असम्भव होते हुए भी (सामाजिक दृष्टि से) आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण है।

स्वरूप[संपादित करें]

अनुवाद के स्वरूप के दो उल्लेखनीय पक्ष हैं - समन्वय और सन्तुलन। अनुवाद सिद्धान्त का बहुविद्यापरक आयाम इसका समन्वयशील पक्ष है। तदनुसार, यद्यपि अनुवाद सिद्धान्त का मूल उद्गम है अनुप्रयुक्त तुलनात्मक पाठसङ्केतविज्ञान, तथापि उसे कुछ अन्य शास्त्र भी स्पर्श करते हैं। 'तुलनात्मक' से अनुवाद का दो भाषाओं से सम्बन्धित होना स्पष्ट ही है, जिसमें भाषाओं की समानता-असमानता के प्रश्न उपस्थित होते हैं। पाठसंकेतविज्ञान के तीनों पक्ष - अर्थविचार, वाक्यविचार तथा सन्दर्भमीमांसा - अनुवाद सिद्धान्त के लिए प्रासंगिक हैं। अर्थविचार में भाषिक संकेत तथा भाषाबाह्य यथार्थ के बीच में सम्बन्ध का अध्ययन होता है। सन्दर्भमीमांसा के अन्तर्गत भाषाप्रयोग की स्थिति के सन्दर्भ के विभिन्न आयामों - वक्ता एवं श्रोता की सामाजिक पहचान, भाषाप्रयोग का उद्देश्य तथा सन्देश के प्रति वक्ता - श्रोता की अभिवृत्ति, भाषाप्रयोग की भौतिक परिस्थितियों की तथा अभिव्यक्ति, माध्यम आदि - की मीमांसा होती है। स्पष्ट है कि संकेतविज्ञान की परिधि भाषाविज्ञान की अपेक्षा व्यापकतर है तथा अनुवाद कार्य जैसे व्यापक सम्प्रेषण व्यापार के अध्ययन के उपयुक्त है।

समन्वय पक्ष[संपादित करें]

अनुवाद सिद्धान्त को स्पर्श करने वाले शास्त्रों में है सम्प्रेषण सिद्धान्त जिसकी मान्यताओं के अनुसार अनुवाद कार्य एक सम्प्रेषण व्यापार है, तथा तदनुसार उस पर वे सभी बातें लागू होती हैं, जो सम्प्रेषण व्यापार की प्रकृति में हैं, जैसे सम्प्रेषण का शत्प्रतिशत् यथातथ न होना, अपूर्णता, उद्रिक्तता (व्यतिरिक्तता), आंशिक कृत्रिमता आदि। इसी से अनुवाद कार्य में शब्द-प्रति-शब्द तथा अर्थ-प्रति-अर्थ समानता के स्थान पर सन्देशस्तरीय समानता का औचित्य भी साधा जा सकता है। संक्रियात्मक दृष्टि से एक पाठ या प्रोक्ति अनुवाद कार्य का प्रवर्तन बिन्दु होता है। एक पाठ की अपनी संरचना होती है, भाषिक संसक्ति तथा सन्देशगत सुबद्धता की सङ्कल्पनाओं द्वारा उसके सुगठित अथवा शिथिल होने की जाँच कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त एक पाठ को भाषाप्रकायों की एकीभूत समष्टि के रूप में देखते हुए, उसमें भाषा-प्रयोग शैलीओँ के भाषाप्रकार्यमूलक वितरण के विषय में अधिक निश्चित जानकारी प्राप्त होती हैं। इसी से सम्बन्धित शास्त्र है, समाजभाषाशास्त्र तथा शैलीविज्ञान, जिसमें सामाजिक बोलियों तथा प्रयुक्तियों के अध्ययन के साथ सन्दर्भानुकूल भाषाप्रयोग की शैलीओँ के वितरण की जानकारी अनुवाद सिद्धान्त के लिए वाञ्छनीय है।

भाषा से समन्धित होने के कारण तर्कशास्त्र तथा भाषादर्शन भी अनुवाद सिद्धान्त को पुष्ट करते हैं। तर्कशास्त्र के अनुसार अनूदित पाठ के सत्यमूल्य की परीक्षा अनुवाद की विशुद्धता को शुद्ध करने का आधार है। भाषादर्शन में होने वाले अर्थ सम्बन्धी चिन्तन से अनुवाद कार्य में अर्थ के अन्तरण या उसकी पुनरावृत्ति से सम्बन्धित समस्याओं को जानने में सहायता मिलती है। विटजेन्स्टीन की मान्यता 'भाषा में शब्द का 'प्रयोग' ही उसका अर्थ है'। अनुवाद सिद्धान्त के लिए इस कारण से विशेष प्रासंगिक है कि पाठ ही अनुवाद कार्य की इकाई है, जिसका सफल अर्थबोध अनुवाद की पहली आवश्यकता है। इस प्रकार वक्ता की विवक्षा में अर्थ का मूल खोजना, भाषिक अर्थ तथा भाषाबाह्य स्थिति (सन्दर्भ) अनुवाद सिद्धान्त के आवश्यक अंग हैं। अर्थ के अन्तरण में जहाँ उपर्युक्त मान्यताओं की एक भूमिका है, वहाँ अर्थगत द्विभाषिक समानता के निर्धारण में घटकीय विश्लेषण की पद्धति की विशेष उपयोगिता स्वीकार की गई है। यह बात विशेष रूप से ध्यान में ली जाती है कि जहाँ विविध शास्त्रों की प्रासङ्गिक मान्यताओं से अनुवाद सिद्धान्त का स्वरूप निर्मित है, वहाँ स्वयं अनुवाद सिद्धान्त उन शास्त्रों का एक विशिष्ट अंग है।

सन्तुलन पक्ष[संपादित करें]

अनुवाद सिद्धान्त का 'सामान्य' पक्ष भी है और विशिष्ट पक्ष भी, और यह इसका सन्तुलनशील स्वरूप है - सामान्य और विशिष्ट का सन्तुलन। अनुवाद की परिभाषा के अनुसार कहा जाता है कि अनुवाद व्यवहारतः विशिष्ट भाषाभेद के स्तर पर तथा इसीलिए सिद्धान्ततः सामान्य भाषा के स्तर पर होता है - अंग्रेजी भाषा के एक भेद पत्रकारिता की अंग्रेजी से हिन्दी भाषा के सममूल्य भेद पत्रकारिता की हिन्दी में। तदनुसार, युगपद् रूप से अनुवाद सिद्धान्त का एक सामान्य पक्ष भी है और विशिष्ट पक्ष भी। हम जो बात सामान्य के स्तर पर कहते हैं, उसे व्यावहारिक रूप में भाषाभेद के विशिष्ट स्तर पर उदाहृत करते हैं।

क्षेत्र[संपादित करें]

'यथासम्भव अधिकतम पाठ प्रकारों के लिए एक उपयुक्त तथा सामान्य अनुवाद प्रणाली का निर्धारण' ये अनुवाद के क्षेत्र सम्बन्धित एक विचारणीय प्रश्न माना जाता है। प्रणाली के निर्धारण के सम्बन्ध में अनुवाद प्रक्रिया की प्रकृति, अनुवाद (वस्तुतः अनुवाद कार्य) के विभिन्न प्रकार, अनुवाद के सूत्र तथा विभिन्न कोटि के पाठों के अनुवाद के निर्देश निश्चित करने के प्रारूप का निर्धारण, आदि पर विचार करना होता है। अनुवाद का मुख्य उद्देश्य, अनुवाद की इकाई, अनुवाद का कला-कौशल-विज्ञान का स्वरूप, अनुवाद कार्य की सीमाएँ, आदि कुछ अन्य विषय हैं, जिन पर विचार अपेक्षित होता है।

मूलभाषा का ज्ञान[संपादित करें]

अनुवाद कार्य का मेरुदण्ड है मूलभाषा पाठ। इसकी संरचना, इसका प्रकार, भाषाप्रकार्य प्रारूप के अनुसार मूलपाठ का स्वरूप निर्धारण, आदि के साथ शब्दार्थ-व्यवस्था एवं व्याकरणिक संरचना के विश्लेषणात्मक बोधन के विभिन्न प्रारूप, उनकी शक्तियों और सीमाओं का आकलन, आदि के सम्बन्ध में सैद्धान्तिक चर्चा तथा इनके संक्रियात्मक ढाँचे का निर्धारण, इसके अन्तर्गत आने वाले मुख्य बिन्दु हैं। अनुवाद सिद्धान्त के ही अन्तर्गत कुछ गौण बिन्दुओं की चर्चा भी होती है - रूपक, व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ, पारिभाषिक शब्द, आद्याक्षर (परिवर्णी) शब्द, भौगोलिक नाम, व्यापारिक नाम, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के नाम, सांस्कृतिक शब्द, आदि के अनुवाद के लिए कौन-सी प्रणाली अपनाई जाए; साहित्यिक रचनाओं, वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय लेखन, प्रचार साहित्य आदि के लिए अनुवाद प्रणाली का रूप क्या हो, इत्यादि।

विविध शास्त्रों का ज्ञान[संपादित करें]

इसी से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु है, अनुवाद की विभिन्न युक्तियाँ - लिप्यन्तरण, शब्द-प्रति-शब्द अनुवाद, शब्दानुगामी अनुवाद, आगत अनुवाद, व्याख्या, विस्तरण, सङ्क्षेपण, सांस्कृतिक पर्याय, स्वभाषीकरण आदि। अनुवाद का काम अन्ततोगत्वा एक ही व्यक्ति करता है। एकाकी अनुवाद में तो अनुवादक अकेला होता ही है, सहयोगात्मक अनुवाद में भी, अन्तिम अवधि में, सम्पादन का कार्य अनुवादक को अकेले करना होता है। अतः अनुवादक के साथ अनेक दायित्व जुड़ जाते हैं और कार्य के सफल निष्पादन में उससे अनेक अपेक्षाएं रहती हैं। भाषा ज्ञान, विषय ज्ञान, अभिव्यक्ति कौशल, व्यक्तिगत गुण आदि की दृष्टि से अनुवादक से होने वाली अपेक्षाओं पर विचार करना होता है। अनुवाद शिक्षा और अनुवाद समीक्षा, दो अन्य महत्त्वपूर्ण बिन्दु हैं।

शिक्षा[संपादित करें]

अनुवाद की शिक्षा भाषा-अधिगम के, विशेष रूप से अन्य भाषा अधिगम के, साधन के रूप में दी जा सकती है (भाषाशिक्षण की द्विभाषिक पद्धति भी इसी के अन्तर्गत है)। इसमें अनुवाद शिक्षण, भाषा-शिक्षण के अधीन है तथा एक मध्यवर्ती अल्पकालिक अभ्यासक्रम में इसकी योजना की जाती है, जिसमें शिक्षण के सोपान तथा लक्ष्य बिन्दु स्पष्ट तथा निश्चित होते हैं। इसमें शिक्षार्थी का लक्ष्य भाषा सीखना है, अनुवाद करना नहीं। शिक्षा के दूसरे चरण में अनुवाद का अभ्यास, अनुवाद को एक शिल्प या कौशल के रूप में सीखने के लिए किया जाता है, जिसकी प्रगत अवस्था 'अनुवाद कला है' की शब्दावली में निर्दिष्ट की जाती है। इस स्थिति में जो भाषा (मूलभाषा या लक्ष्यभाषा) अनुवादक की अपनी नहीं, उसके अधिगम को भी आनुषङ्गिक रूप में पुष्ट करता जाता है। अभ्यास सामग्री के रूप में पाठ प्रकारों की विविधता तथा कठिनाई की मात्रा के अनुसार पाठों का अनुस्तरण करना होता है। यदि एक सजातीय/विजातीय, स्वेदशी या विदेशी भाषा को सीखने की योजना में उससे या उसमें अनुवाद करने की क्षमता को विकसित करना एक उद्देश्य हो तो अनुवाद-शिक्षण के दोनों सोपानों - साधनपरक तथा साध्यपरक – को अनुस्तरित रूप में देखा जा सकता है।

समीक्षा[संपादित करें]

अनुवाद समीक्षा, अनुवाद सिद्धान्त का ऐसा अङ्ग है, जिसका शिथिल रूप में व्यवहार, अनूदित कृति का एक सामान्य पाठक भी करता है, परन्तु जिसकी एक पर्याप्त स्पष्ट सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि है। सिद्धान्तपुष्ट अनुवाद समीक्षा एक ज्ञानात्मक व्यापार है। इसमें एक मूलपाठ के एक या एक से अधिक अनुवादों की समीक्षा की जाती है, तथा मूल की तुलना में अनुवाद का या मूल के विभिन्न अनुवादों का पारस्परिक तुलना द्वारा मूल्यांकन किया जाता है। इसके तीन सोपान हैं - मूलभाषा पाठ तथा लक्ष्यभाषा पाठ का विश्लेषण, दोनों की तुलना (प्रत्यक्ष तथा परोक्ष समानताओं की तालिका, और अभिव्यक्ति विच्छेदों का परिचयन), और अन्त में लक्ष्यभाषागत विशुद्धता, उपयुक्तता और स्वाभाविकता की दृष्टि से अनुवाद का मूल्यांकन। मूल्याङ्कन के सोपान पर अनुवाद की सफलता की जाँच के लिए विभिन्न परीक्षण तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।

प्रकार[संपादित करें]

अनुवाद को कला और विज्ञान दोनों ही रूपों में स्वीकारने की मानसिकता इसी कारण पल्लवित हुई है कि संसारभर की भाषाओं के पारस्परिक अनुवाद की कोशिश अनुवाद की अनेक शैलियों और प्रविधियों की ओर इशारा करती हैं। अनुवाद की एक भंगिमा तो यही है कि किसी रचना का साहित्यिक-विधा के आधार पर अनुवाद उपस्थित किया जाए। यदि किसी नाटक का नाटक के रूप में ही अनुवाद किया जाए तो ऐसे अनुवादों में अनुवादक की अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा का वैशिष्ट्य भी अपेक्षित होता है। अनुवाद का एक आधार अनुवाद के गद्यात्मक अथवा पद्यात्मक होने पर भी आश्रित है। ऐसा पाया जाता है कि अधिकांशतः गद्य का अनुवाद गद्य में अथवा पद्य में ही उपस्थित हो, लेकिन कभी-कभी यह क्रम बदला हुआ नजर आता है। कई गद्य कृतियों के पद्यानुवाद मिलते हैं, तो कई काव्यकृतियों के गद्यानुवाद भी उपलब्ध हैं। अनुवादों को विषय के आधार पर भी वर्गीकृत किया जाता है और कई स्तरों पर अनुवाद की प्रकृति के अनुरूप उसे मूल-केंद्रित और मूलमुक्त दो वर्गों में भी बाँटा गया है। अनुवाद के जिन सार्थक और प्रचलित प्रभेदों का उल्लेख अनुवाद विज्ञानियों ने किया है, उनमें शब्दानुवाद, भावानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद, व्याख्यानुवाद, आशुअनुवाद और रूपांतरण को सर्वाधिक स्वीकृति मिली है।

शब्दानुवाद[संपादित करें]

स्रोतभाषा के प्रत्येक शब्द का लक्ष्यभाषा के प्रत्येक शब्द में यथावत् अनुवादन को शब्दानुवाद कहते हैं। 'मक्षिका स्थाने मक्षिका' पर आधारित शब्दानुवाद वास्तव में अनुवाद की सबसे निकृष्ट कोटि का परिचायक होता है। प्रत्येक भाषा की प्रकृति अन्य भाषा से भिन्न होती है और हर भाषा में शब्द के अनेकानेक अर्थ विद्यमान रहते हैं। इसीलिए मूल भाषा की हर शब्दाभिव्यक्ति को यथावत् लक्ष्यभाषा में नहीं अनुवादित किया जा सकता। कई बार ऐसे शब्दानुवादों के कारण बड़ी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो जाती है। संस्कृत से हिंदी में किये गये अनुवाद को कई बार प्रकृति की साम्यता के कारण सह्य होते हैं, लेकिन यूरोपीय परिवार की भाषाओं से किये गए अनुवाद में अर्थ और पदक्रम के दोष सामान्यतः नजर आते हैं। वास्तव में यदि स्रोत और लक्ष्यभाषा में अर्थ, प्रयोग, वाक्य-विन्यास और शैली की समानता हो, तभी शब्दानुवाद सही होता है, अन्यथा यंत्रावत् किये गए शब्दानुवाद अबोधगम्य, हास्यास्पद एवं कृत्रिम हो जाते हैं।

भावानुवाद[संपादित करें]

ऐसे अनुवादकों में स्रोत-भाषा के शब्द, पदक्रम और वाक्य-विन्यास पर ध्यान न देकर अनुवाद मूलभाषा की विचार-सामग्री या भावधारा पर अपने आपको केंद्रित करता है। ऐसे अनुवादों में स्रोतभाषा की भाव-सामग्री को उपस्थित करना ही अनुवादक का लक्ष्य होता है। भावानुवाद की प्रक्रिया में कभी-कभी मूल रचना जैसा मौलिक वैभव आ जाता है, लेकिन कई बार पाठकों को यह शिकायत होती है कि अनुवादक ने मूलभाषा की भावधारा को समझे बिना, लक्ष्य-भाषा की प्रकृति के अनुरूप भाव सामग्री प्रस्तुत कर दी है। जब पाठक किसी रचना को रचनाकार के अभिव्यक्ति-कौशल की दष्ष्टि से पढ़ना चाहता है, तो भावानुवाद उसकी लक्ष्यसिद्धि में सहायक नहीं होता।

छायानुवाद[संपादित करें]

संस्कृत नाटकों में लगातार ऐसे प्रयोग मिलते हैं कि उनकी स्त्रा-पात्रा तथा सेवक, दासी आदि जिस प्राकृत भाषा का प्रयोग करते हैं , उसकी संस्कृत छाया भी नाटक में विद्यमान रहती है। ऐसे ही प्रयोगों से छायानुवाद का उद्भव हुआ है। अनुवाद की प्रविधि के अंतर्गत अनुवादक न शब्दानुवाद की तरह केवल मूल शब्दों का अनुसरण करता है और न सिर्फ भावों का ही परिपालन करता है, बल्कि मूलभाषा से पूरी तरह बंधा हुआ उसकी छाया में लक्ष्यभाषा में वर्ण्य-विषय की प्रस्तुति करता है।

सारानुवाद[संपादित करें]

इस अनुवाद में मूलभाषा की सामग्री का संक्षिप्त और अतिसंक्षिप्त अनुवाद लक्ष्यभाषा में किया जाता है। लंबे भाषणों और वाद-विवादों के अनुवाद प्रस्तुत करने में यह विधि सहायक होती है।

व्याख्यानुवाद[संपादित करें]

ऐसे अनुवादों में मूलभाषा की सामग्री का लक्ष्यभाषा में व्याख्या सहित अनुवाद उपस्थित किया जाता है। इसमें अनुवादक अपने अध्ययन और दष्ष्टिकोण के अनुरूप मूल भाषा की सामग्री की व्याख्या अपेक्षित प्रमाणों और उदाहरणों आदि के साथ करता है। लोकमान्य तिलक ने ’गीता‘ का अनुवाद इस शैली में किया है। संस्कृत के बहुत सारे भाष्यकारों और हिन्दी के टीकाकारों ने व्याख्यानुवाद की शैली का ही अनुगमन किया है। स्वभावतः व्याख्यानुवाद अथवा भाष्यानुवाद मूल से बहुत बड़ा हो जाता है और कई स्तरों पर तो एकदम मौलिक बन जाता है।

आशु अनुवाद[संपादित करें]

जहाँ अनुवाद दुभाषिये की भूमिका में काम करता है, वहाँ वह केवल आशुअनुवाद कर पाता है। दो दूरस्थ देशों के भिन्न भाषा-भाषी जब आपस में बातें करते हैं, तो उनके बीच दुभाषिया संवाद का माध्यम बनता है। ऐसे अवसरों पर वे अनुवाद शब्द और भाव की सीमाओं को तोड़कर अनुवादक की सत्वर अनुवाद क्षमता पर आधारित हो जाता है। उसके पास इतना समय नहीं होता है कि शब्द के सही भाषायी पर्याय के बारे में सोचे अथवा कोशों की सहायता ले सके। कई बार ऐसे दुभाषिये के आशुअनुवाद के कारण दो देशों में तनाव की स्थिति भी बन जाती है। आशुअनुवाद ही अब भाषांतरण के रूप में चर्चित है।

रूपांतरण[संपादित करें]

अनुवाद के इस प्रभेद में अनुवादक मूलभाषा से लक्ष्यभाषा में केवल शब्द और भाव का अनुवादन नहीं करता, अपितु अपनी प्रतिभा और सुविधा के अनुसार मूल रचना का पूरी तरह रूपांतरण कर डालता है। विलियम शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक 'मर्चेन्ट ऑफ वेनिस' का अनुवाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'दुर्लभ बन्धु' अर्थात् 'वंशपुर का महाजन' नाम से किया है जो रूपांतरण के अनुवाद का अन्यतम उदाहरण है। मूल नाटक के एंटोनियो, बैसोलियो, पोर्शिया, शाइलॉक जैसे नामों को भारतेंदु ने क्रमशः अनंत, बसंत, पुरश्री, शैलाक्ष जैसे रूपांतर प्रदान किये हैं। ऐसे रूपांतरण में अनुवाद की मौलिकता सबसे अधिक उभरकर सामने आती है।

अनुवादक के इन प्रभेदों से ज्ञापित होता है कि संसार भर की भाषाओं में अनुवाद की कई शैलियाँ और प्रविधियाँ अपनाई गई हैं, लेकिन यदि अनुवादक सावधानीपूर्वक शब्द और भाव की आत्मा का स्पर्श करते हुए मूलभाषा की प्रकृति के अनुरूप लक्ष्यभाषा में अनुवाद उपस्थित करे तो यही आदर्श अनुवाद होगा। इसीलिए श्रेष्ठ अनुवादक को ऐसा कुशल चिकित्सक कहा जाता है, जो बोतल में रखी दवा को अपनी सिरिंज के द्वारा रोगी के शरीर में यथावत पहुँचा देता है।

अनुवाद के सिद्धान्त[संपादित करें]

अनुवाद सिद्धान्त कोई अपने में स्वतन्त्र, स्वनिष्ठ, सिद्धान्त नहीं है और न ही यह उस अर्थ में कोई ‘विज्ञान' ही है, जिस अर्थ में गणितशास्त्र, भाषाशास्त्र, समाजशास्त्र आदि हैं। इसकी ऐसी कोई विशिष्ट अध्ययन सामग्री तथा अध्ययन प्रणाली भी नहीं, जो अन्य शास्त्रों की अध्ययन सामग्री तथा प्रणाली से इस रूप में भिन्न हो कि, इसका मूलतः स्वतन्त्र व्यक्तित्व बन सके। वस्तुतः, यह अनुवाद के विभिन्न मुद्दों से सम्बन्धित ज्ञानात्मक सूचनाओं का एक निकाय है, जिससे अनुवाद को एक प्रक्रिया (अनुवाद कार्य), एक निष्पत्ति (अनुदित पाठ), तथा एक सम्बन्ध (सममूल्यता) के रूप में समझने में सहायता मिलती है। इसके लिए सद्यः 'अनुवाद विद्या (ट्रांसलेशन स्टडीज), 'अनुवाद विज्ञान' (साइंस ऑफ ट्रांसलेशन), और 'अनुवादिकी' (ट्रांसलेटालजी) शब्द भी प्रचलित हैं।

अनुवाद, भाषाप्रयोग सम्बन्धी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसकी एक सुनिश्चित परिणति होती है तथा जिसके फलस्वरूप मूल एवं निष्पत्ति में 'मूल्य' की दृष्टि से समानता का सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इस प्रकार प्रक्रिया, निष्पत्ति, और सम्बन्ध की सङ्घटित इकाई के रूप में अनुवाद सम्बन्धी सामान्य प्रकृति की जानकारी ही अनुवाद सिद्धान्त है, जो मूलतः एकान्वित न होते हुए भी सङ्ग्रहणीय, रोचक, ज्ञानवर्धक, तथा एक सीमा तक वास्तविक अनुवाद कार्य के लिए उपादेय है। अपने विकास की वर्तमान अवस्था में यह बहु-विद्यापरक अनुशासन बन गया है। जिसका ज्ञान प्राप्त करना स्वयमेव एक लक्ष्य है तथा जो जिज्ञासु पाठक के लिए बौद्धिक सन्तोष का स्रोत है।

अनुवाद सिद्धान्त की अनुवाद कार्य में उपयोगिता का आकलन के समय इस सामयिक तथ्य को ध्यान में रखा जाता है कि वर्तमान काल में अनुवाद एक सङ्गठित व्यवसाय हो गया है, जिसमें व्यक्तिगत रुचि की अपेक्षा व्यावसायिक-सामाजिक आवश्यकता से प्रेरित प्रशिक्षणार्थियों की सङ्ख्या अधिक होती है । विशेष रूप से ऐसे लोगों के लिए तथा सामान्य रूप से रुचिशील अनुवादकों के लिए अनुवाद कार्य में दक्षता विकसित करने में अनुवाद सिद्धान्त के योगदान को निरूपित किया जाता है । इस योगदान का सैद्धान्तिक औचित्य इस दृष्टि से भी है कि अनुवाद कार्य सर्जनात्मक होने के कारण ही गौण रूप से समीक्षात्मक भी होता है । इसे 'सर्जनात्मक-समीक्षात्मक' भी कहा जाता है ।

सर्जनात्मकता को विशुद्ध तथा पुष्ट करने के लिए जो समीक्षात्मक स्फुरणाएँ अनुवादक में होती हैं, वे अनुवाद सिद्धान्त के ज्ञान से प्ररित होती हैं । अनुवाद की विशुद्धता की निष्पत्ति में सिद्धान्त ज्ञान का योगदान रहता है । साथ ही, अनुवाद प्रक्रिया की जानकारी उसे पर्याय-चयन में अधिक सावधानी से काम करने में सहायता कर सकती है । इससे अधिक महत्त्वपर्ण बात मानी जाती है कि वह मूर्खतापूर्ण त्रुटियाँ करने से बच सकता है । मूलपाठ का भाषिक, विषयवस्तुगत, तथा सांस्कृतिक महत्त्व का कोई अंश अनूदित होने से न रह जाए, इसके लिए अपेक्षित सतर्क दृष्टि को विकसित करने में भी अनुवाद सिद्धान्त का ज्ञान अनुवादक की सहायता करता है । इसी प्रश्न को दूसरे छोर से भी देखा जाता है । कहा जाता है कि जो लोग मौलिक लिख सकते हैं, वे लिखते हैं, जो लिख नहीं पाते वे अनुवाद करते हैं, और जो लोग अनुवाद नहीं कर सकते, वे अनुवाद के बारे में चर्चा किया करते हैं । वस्तुतः इन तीनों में परिपूरकता है - ये तीनों कुछ भिन्न-भिन्न हैं – तथापि यह माना जाता है कि अनुवाद विषयक चर्चा को अधिक प्रामाणिक तथा विशद बनाने में अनुवाद सिद्धान्त के विद्यार्थी को अनुवाद कार्य सम्बन्धी अनुभव सहायक होता है । यह बात कुछ ऐसा ही है कि सर्जनात्मकता से अनुभव के स्तर पर परिचित साहित्य समीक्षक अपनी समीक्षात्मक प्रतिक्रियाओं को अधिक विश्वासोत्पादक रीति से प्रस्तुत कर सकता है।

अनुवाद सिद्धान्त का विकास[संपादित करें]

अनुवाद सिद्धान्त के वर्तमान स्वरूप को देखते हुए इसके विकास कों विहङ्ग-दृश्य से दो चरणों में विभक्त करके देखा जाता है :

(१) आधुनिक भाषाविज्ञान, विशेष रूप से अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, के विकास से पूर्व का युग-बीसवीं सदी पूर्वार्ध;

(२) इसके पश्चात् का युग-बीसवीं सदी उत्तरार्ध ।

सामान्य रूप से कहा जाता है कि, सिद्धान्त विकास के विभिन्न युगों में और उसी विभिन्न धाराओं में विवाद का विषय यह रहा कि, अनुवाद शब्दानुगामी हो या अर्थानुगामी, यद्यपि विवाद की 'भाषा' बदलती रही । ईसापूर्व प्रथम शताब्दी में रोमन युग से आरम्भ होता है, जब होरेंस तथा सिसरो ने शब्दानुगामी तथा अर्थानुगामी अनुवाद में अन्तर स्पष्ट किया तथा साहित्यिक रचनाओं के लिए अर्थानुगामी अनुवाद को प्रधानता दी । सिसरो ने अच्छे अनुवादक को व्याख्याकार तथा अलङ्कार प्रयोग में दक्ष बताया । रोमन युग के पश्चात्, जिसमें साहित्यिक अनुवादों की प्रधानता थी, दूसरी शक्तिशाली धारा बाइबिल अनुवाद की है । सन्त जेरोम (४०० ईस्वी) ने भी बाइबिल के अनुवाद में अर्थानुगामिता को प्रधानता दी तथा अनुवाद में दैनन्दिन के व्यवहार की भाषा के प्रयोग का समर्थन किया। इसमें विचार यह था कि, बाइबिल का सन्देश जनसाधारण पर्यन्त पहुँच जाए और इसके निमित्त जनसाधारण के लिए बोधगम्य भाषा का प्रयोग किया जाए, जिसमें स्वभावतः अर्थानुगामी दृष्टिकोण को प्रधानता मिली ।

जान वाइक्लिफ (१३३०-८४) तथा विलियम टिंड्ल (१४९४-१९३६) ने इस प्रवृत्ति का समर्थन किया। बोधगम्य तथा सुन्दर भाषा में, तथा शैली एवं अर्थ के मध्य सामञ्जस्य की रक्षा करते हुए, बाइबिल के अनुवाद की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला, जिसमें मार्टिन लूथर (१५३०) का योगदान उल्लेखनीय रहा। तृतीय धारा शिक्षाक्रम में अनुवाद के योगदान से सम्बन्धित रही है। क्विटिलियन (प्रथम शताब्दी) ने अनुवाद तथा समभाषी व्याख्यात्मक शब्दान्तरण की उपयोगिता को लेखन अभ्यास तथा भाषण-दक्षता विकसित करने के सन्दर्भ में देखा। जिसका मध्यकालीन यूरोप में अधिक प्रसार हुआ । इससे स्थानीय भाषाओं का स्तर ऊपर उठा तथा उनकी अभिव्यक्ति सामर्थ्य में वृद्धि भी हुई । समृद्ध और विकसित भाषाओं से विकासशील भाषाओं में अनुवाद की प्रवृत्ति मध्यकालीन यूरोप के साहित्यिक जगत् की एक प्रमुख प्रवृत्ति है, जिसे ऊर्ध्वस्तरी आयाम की प्रवृत्ति कहा गया और इसी समय प्रचलित समान रूप से विकसित या अविकसित भाषाओं के मध्य अनुवाद की प्रवृत्ति को समस्तरी आयाम की प्रवृत्ति के रूप में देखा गया।

मध्यकालीन यूरोप के आरम्भिक सिद्धान्तकारों में फ्रेंच विद्वान ई० दोलेत (१५०९-४६) ने १५४० में प्रकाशित निबन्ध में अनुवाद के पाँच विधि-निषेध प्रस्तावित किए :

(क) अनुवादक को मूल लेखक की भाषा की पूरा ज्ञान हो, परन्तु वह चाहे तो मूलभाषा की दुर्बोधता और अस्पष्टता को दूर कर सकता है।

(ख) अनुवादक का मूलभाषा और लक्ष्यभाषा का पूर्ण ज्ञान हो;

(ग) अनुवादक शब्द-प्रति-शब्द अनुवाद से बचे;

(घ) अनुवादक दैनन्दिन के व्यवहार की भाषा का प्रयोग करे;

(ङ) अनुवादक ऐसा शब्दचयन तथा शब्दविन्यास करे कि उचित प्रभाव की निष्पत्ति हो।

जार्ज चैपमन (१५५९-१६३४) ने भी इसी प्रकार 'इलियड' के सन्दर्भ में अनुवाद के तीन सूत्र प्रस्तावित किए :

(क) शब्द-प्रति-शब्द अनुवाद से बचा जाए;

(ख) मूल की भावना पर्यन्त पहुँचने का प्रयास किया जाए;

(ग) अनुवाद, विद्वत्ता के स्पर्श के कारण अति शिथिल न हो ।

यूरोप के पुनर्जागरण युग में अनुवाद की धारा एक गौण प्रवृत्ति रही । इस युग के अनुवादकों में अर्थ की प्रधानता के साथ पाठक के हितों की रक्षा की प्रवृत्ति दिखाई देती है । हालैण्ड (१५५२-१६३७) के अनुवाद में मूलपाठ के अर्थ में परिवर्तन-परिवर्धन द्वारा अनूदित पाठ के संस्कार की झलक दीखती है । सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में सर जान डेनहम (१६१५-६९) ने कविता के अनुवाद में शब्दानुगामी होने की प्रवृत्ति का विरोध किया और मूल पाठ के केन्द्रीय तत्त्व को ग्रहण कर लक्ष्यभाषा में उसके पुनस्सर्जन की बात कही; उसे 'अनुसर्जन' (ट्रांसक्रिएशन) कहा जाने लगा।

इस अविध में जान ड्राइडन (१६३१-१७००) ने महत्त्वपर्ण विचार प्रकट किए। उन्होंने अनुवाद कार्य की तीन कोटियाँ निर्धारित की :

(क) शब्द-प्रति-शब्द अनुवाद (मेटाफ्रेझ);

(ख) अर्थानुगामी अनुवाद (पैराफ्रेझ),

(ग) अनुकरण (इमिटेशन) ।

ड्राइडन के अनुसार (क) और (ख) के मध्य का मार्ग अवलम्बन योग्य है । उनके अनुसार कविता के अनुवाद में अनुवादक को दोनों भाषाओं पर अधिकार हो, उसे मूल लेखक के साहित्यिक गुणों और उसकी 'भावना' का ज्ञान हो, तथा वह अपने समय के साहित्यिक आदर्शों का पालन करे। अलेग्जेंडर पोप (१६८८-१७४४) ने भी डाइडन के समान ही विचार प्रकट किए ।

अठारहवीं शताब्दी में अनुवाद की अतिमूलनिष्ठता तथा अतिस्वतन्त्रता के विवाद से एक सोपान आगे बढ़कर एक समस्या थी कि अपने समकालीन पाठक के प्रति अनुवादक का कर्तव्य । पाठक की ओर अत्यधिक झुकाव के कारण अनूदित पाठ का स्वरूप मूल पाठ से काफी दूर पड़ जाता था। इस पर डॉ. सैम्युएल जानसन (१७०९-८४) ने कहा कि, अनुवाद में मूलपाठ की अपेक्षा परिवर्धन के कारण उत्पन्न परिष्कृति का स्वागत किया जा सकता है, परन्तु मूलपाठ की हानि न हो ये ध्यान देना चाहिये। उन्होंने यह भी कहा कि जिस प्रकार लेखक अपने समकालीन पाठक के लिए लिखता है, उसी प्रकार अनुवादक भी अपने समकालीन पाठक के लिए अनुवाद करता है । डॉ. जानसन की सम्मति में अनुवाद की मूलनिष्ठता तथा पाठकधर्मिता में सन्तुलन मिलता है । उन्होंने अनुवादक को ऐसा चित्रकार या अनुकर्ता कहा जो मूल के प्रति निष्ठावान होते हुए भी उद्दिष्ट दर्शक के हितों का ध्यान रखता है ।

एलेग्जेंडर फ्रेजर टिटलर जिनकी पुस्तक प्रिंसिपल्स आफ ट्रांसलेशन (१७९१) अनुवाद सिद्धान्त पर पहली व्यवस्थित पुस्तक मानी जाती है । टिटलर ने तीन अनुवाद सूत्र प्रस्तावित किए :

(क) अनुवाद में मूल रचना के भाव का पूरा अनुरक्षण हो;

(ख) अनुवाद की शैली मूल के अनुरूप हो;

(ग) अनुवाद में मूल वाली सुबोधता हो।

टिटलर ने ही यह कहा कि, अनुवाद में मूल की भावना इस प्रकार पूर्णतया सङ्क्रान्त हो जाए कि उसे पढकर पाठकों को उतनी ही तीव्र अनुभूति हो, जितनी मूल के पाठकों को हुई थी; प्रभावसमता का सिद्धान्त यही है ।

उन्नीसवीं शताब्दी में रोमांटिक तथा उत्तर-रोमांटिक युगों में अनुवाद चिन्तन पर तत्कालीन काव्यचिन्तन का प्रभाव दिखाई देता है । ए० डब्ल्यू० श्लेगल ने सब प्रकार के मौखिक एवं लिखित भाषा व्यवहार को अनुवाद की संज्ञा दी (तुलना करें, आधुनिक चिन्तन में 'अन्तर संकेतपरक अनुवाद' से), तथा मूल के गठन को संरक्षित रखने पर बल दिया । इस युग में एक ओर तो अनुवादक को सर्जनात्मक लेखक के तुल्य समझने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, तो दूसरी ओर अनुवाद को शब्दानुगामी बनाने पर बल देने की बात कही गई । कुछ विद्वानों ने अनुवाद की भिन्न उपभाषा होने का चर्चा की जो उपर्युक्त मान्यताओं से मेल खाती है।

विक्टोरियन धारा के अनुवादक इस बात के लिए प्रयत्नशील रहे कि देश और काल की दूरी को अनुवाद में सुरक्षित रखा जाए – विदेशी भाषाओं की प्राचीन रचनाओं के अनुवाद में विदेशीयता और प्राचीनता की हानि न हो - जिसके फलस्वरूप शब्दानुगामी अनुवाद की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला । लौंगफेलो (१८०७-८१) इसके समर्थक थे । परन्तु उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवादक फिटजेरल्ड (1809-63) के विचार इसके विपरीत थे । वे इस मान्यता के समर्थक थे कि, अनुवाद के पाठक को मूल भाषा पाठ के निकट लाने के स्थान पर मूलभाषा पाठ की सांस्कृतिक विशेषताओं को लक्ष्यभाषा में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए कि, वह लक्ष्यभाषा का अपनी सजीव सम्पत्ति प्रतीत हो, तथा इस प्रक्रिया में मूलभाषा से अनुवाद की बढी हुई दूरी की उपेक्षा कर दी जाए ।

बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में दो-तीन अनुवाद चिन्तक उल्लेखनीय हैं । क्रोचे तथा वेलरी ने अनुवाद की सफलता, विशेष रूप से कविता के अनुवाद की सफलता, में सन्देह व्यक्त किये हैं। मैथ्यू आर्नल्ड ने होमर की कृतियों के अनुवाद में सरल, प्रत्यक्ष और उदात्त शैली को अपनाने पर बल दिया।

इस प्रकार आधुनिक भाषाविज्ञान के उदय से पूर्व की अवधि में अनुवाद चिन्तन प्रायः दो विरोधात्मक मान्यताओं के चारों ओर घूमता रहा। वो दो मान्यताएँ इस प्रकार हैं -

(१) अनुवाद शब्दानुगामी हो या स्वतन्त्र हो,

(२) अनुवाद अपनी आन्तरिक प्रकृति की दृष्टि से असम्भव है, परन्तु सामाजिक दृष्टि से नितान्त आवश्यक ।

इस अवधि के अनुवाद चिन्तन में कुल मिलाकर सङ्घटनात्मक तथा विभेदात्मक दृष्टियों का सन्तुलन देखा जाता रहा - संघटनात्मक दृष्टि से अनुवाद सिद्धान्त का ऐसा स्वरूप अभिप्रेत है जो सामान्य कोटि का हो, तथा विभेदात्मक दृष्टि में पाठों की प्रकृतिगत विभिन्नता के आधार पर अनुवाद की प्रणाली में आवश्यक परिवर्तन की चर्चा का अन्तर्भाव है । विद्वानों ने इस अवधि में अमूर्त चिन्तन तो किया परन्तु वे अनुवाद प्रणाली का सोदाहरण पल्लवन नहीं कर पाए । मूलपाठ के अन्तर्ज्ञानमूलक बोधन से वे विश्लेषणात्मक बोधन के लक्ष्य की ओर तो बढे परन्तु उसके पीछे सुनिश्चित सिद्धान्त की भूमिका नहीं रही। ऐसे चिन्तकों में अनुवादकों के अतिरिक्त साहित्यकार तथा साहित्य-समीक्षक ही अधिक थे, भाषाविज्ञानी नहीं । इसके अतिरिक्त वे एक-दूसरे के चिन्तन से परिचित हों, ऐसा भी प्रतीत नहीं होता था।

आधुनिक भाषाविज्ञान का उदय यद्यपि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में हुआ, परन्तु अनुवाद सिद्धान्त की प्रासंगिकता की दृष्टि से उत्तरार्ध की अवधि का महत्त्व है । इस अवधि में भाषाविज्ञान से परिचित अनुवादकों तथा भाषाविज्ञनियों का ध्यान अनुवाद सिद्धान्त की ओर आकृष्ट हुआ । संरचनात्मक भाषाविज्ञान का विकास, अर्थविज्ञान की प्रगति, सम्प्रेषण सिद्धान्त तथा भाषाविज्ञान का समन्वय, तथा अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की विभिन्न शाखाओं - समाजभाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान, प्रोक्ति विश्लेषण - का विकास, तथा सङ्केतविज्ञान, विशेषतः पाठ संकेतविज्ञान, का उदय ऐसी घटनाएँ मानी जाती हैं, जो अनुवाद सिद्धान्त को पुष्ट तथा विकसित करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानी जाती रही।

आङ्ग्ल-अमरीकी धारा में एक विद्वान् यूजेन नाइडा भी माने जाते हैं। उन्होंने बाइबिल-अनुवाद के अनुभव के आधार पर अनुवाद सिद्धान्त और व्यवहार पर अपने विचार ग्रन्थों के रूप में प्रकट किए (१९६४-१९६९) । इनमें अनुवाद सिद्धान्त का विस्तृत, विशद तथा तर्कसङ्गत रूप देखने को मिलता है। नाइडा ने अनुवाद प्रक्रिया का विवरण देते हुए मूलभाषा पाठ के विश्लेषण के लिए एक सुनिश्चित भाषासिद्धान्त प्रस्तुत किया तथा लक्ष्यभाषा में सङ्क्रान्त सन्देश के पुनर्गठन के विभिन्न आयाम निर्धारित किए। उन्होंने अनुवाद की स्थिति से सम्बद्ध दोनों भाषाओं के बीच विविधस्तरीय समायोजनों का विवरण प्रस्तुत किया ।

अन्य विद्वान् कैटफोर्ड (१९६५) हैं, जिनके अनुवाद सिद्धान्त में संरचनात्मक भाषाविज्ञान के अनुप्रयोग का उदाहरण मिलता है । उन्होंने शुद्ध भाषावैज्ञानिक आधार पर अनुवाद के प्रारूपो का निर्धारण किया, अनुवाद-परिवृत्ति का भाषावैज्ञानिक विवरण दिया, तथा अनुवाद की सीमाओं पर विचार किया । तीसरे प्रभावशाली विद्वान् पीटर न्युमार्क (1981) हैं जिन्होंने सुगठित और घनिष्ठ शैली में अनुवाद सिद्धान्त का तर्कसङ्गत तथा गहन विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयास किया । वे अपने विचारों को उपयुक्त उदाहरणों से स्पष्ट करते चलते हैं। उन्होंने नाइडा के विपरीत, पाठ प्ररूपभेद के अनुसार विशिष्ट अनुवाद प्रणाली की मान्यता प्रस्तुत की । उनका अनुवाद सिद्धान्त को योगदान है कि, अनुवाद की अर्थकेन्द्रित (मूलभाषापाठ केन्द्रित) तथा सम्प्रेषण केन्द्रित (अनुवाद के पाठक पर केन्द्रित) प्रणाली की सङ्कल्पना । उन्होंने पाठ विश्लेषण, सन्देशान्तरण तथा लक्ष्यभाषा में अभिव्यक्ति की स्थितियों में सम्बन्धित अनेक अनुवाद सूत्र प्रस्तुत किए; यह भी इनका एक उल्लेखनीय वैशिष्ट्य माना जाता है।

यूरोपीय परम्परा में जर्मन भाषा का लीपझिग स्कूल प्रभावशाली माना जाता है । इसकी मान्यता है कि, सब प्रकार के अनुभवों का अनुवाद सम्भव है । यह स्कूल पाठ के संज्ञानात्मक (विकल्पनरहित) तथा सन्दर्भपरक (विकल्पनशील) अङ्गों में अन्तर मानता है तथा रूपान्तरण व्याकरण और पाठसंकेतविज्ञान का भी उपयोग करता है । इस शाला ने साहित्येतर पाठों के अनुवाद पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया । वस्तुतः अनवाद सिद्धान्त पर सबसे अधिक साहित्य जर्मन भाषा में मिलता है ऐसा माना जाता है । रूसी परम्परा में फेदोरोव अनुवाद सिद्धान्त को स्वतन्त्र भाषिक अनुशासन मानते हैं । कोमिसारोव ने अनुवाद सम्बन्धी समस्याओं की चर्चा निम्नलिखित शीर्षकों से की :

(क) अनुवाद सिद्धान्त का प्रतिपाद्य, उद्देश्य तथा अनुवाद प्रणाली,

(ख) अनुवाद का सामान्य सिद्धान्त,

(ग) अनुवादगत मूल्यसमता,

(घ) अनुवाद प्रक्रिया,

(ङ) अनुवादक की दृष्टि से भाषाओं का व्यतिरेकी विश्लेषण।

यान्त्रिक अनुवाद, आधुनिक युग की एक मुख्य गतिविधि है । यन्त्र की आवश्यकताओं के अनुसार भाषा के भाषावैज्ञानिक विश्लेषण के प्रारूप तैयार किए गए हैं, तथा विशेषतया प्रौद्योगिकीय पाठों के अनुवाद में सङ्गणक से सहायता ली गई है। भोलानाथ तिवारी के अनुसार द्विभाषिक शब्द-संग्रह में तो संगणक बहुत सहायक है ही; अब अनुवाद के क्षेत्र में इसकी सम्भावनाएँ निरन्तर बढ़ती जा रही हैं।[12]

अनुवाद प्रक्रिया[संपादित करें]

1. चयन 2. पठन 3. विश्लेषण 4. भाषांतरण 5. पुनिरीक्षण 6. मिलान 7. संशोधित भाषांतरण

अनुवादक एवं इंटरप्रेटर[संपादित करें]

अनुवाद एक लिखित विधा है, जिसे करने के लिए कई साधनों की जरूरत पड़ती है। शब्दकोश, संदर्भ ग्रंथ, विषय विशेषज्ञ या मार्गदर्शक की मदद से अनुवाद कार्य को पूरा किया जाता है। इसकी कोई समय सीमा नहीं होती। अपनी इच्छानुसार अनुवादक इसे कई बार शुद्धीकरण के बाद पूरा कर सकता है। इंटरप्रेटशन यानी भाषांतरण एक भाषा का दूसरी भाषा में मौखिक रूपांतरण है। इसे करने वाला इंटरप्रेटर कहलाता है। इंटरप्रेटर का काम तात्कालिक है। वह किसी भाषा को सुन कर, समझ कर दूसरी भाषा में तुरंत उसका मौखिक तौर पर रूपांतरण करता है। इसे मूल भाषा के साथ मौखिक तौर पर आधा मिनट पीछे रहते हुए किया जाता है। बहुत कुछ यांत्रिक ढंग का भी होता है।

अनुवाद के प्रकार[संपादित करें]

  • साहित्यिक अनुवाद
  • तकनीकी अनुवाद
  • चिकित्सकीय अनुवाद

अनुवाद की तकनीकें[संपादित करें]

मशीनी अनुवाद[संपादित करें]

कम्प्यूटर और साफ्टवेयर की क्षमताओं में अत्यधिक विकास के कारण आजकल अनेक भाषाओं का दूसरी भाषाओं में मशीनी अनुवाद सम्भव हो गया है। यद्यपि इन अनुवादों की गुणवता अभी भी संतोषप्रद नहीं कही जा सकती, तथापि अपने इस रूप में भी यह मशीनी अनुवाद कई अर्थों में और अनेक दृष्टियों से बहुत उपयोगी सिद्ध हो रहा है। जहाँ कोई चारा न हो, वहाँ मशीनी अनुवाद से कुछ न कुछ अर्थ तो समझ में आ ही जाता है।

मशीनी अनुवाद की दिशा में आने वाले दिनों में काफी प्रगति होने वाली है। मशीनी अनुवाद के कारण दुनिया में एक नयी क्रान्ति आयेगी।

कम्यूटर सहाय्यित अनुवाद[संपादित करें]

२० भाषाएँ जिनसे/जिनमें सर्वाधिक अनुवाद होते हैं[संपादित करें]

किससे किसको
अंग्रेज़ी जर्मन
फ़्रांसिसी स्पैनिश
जर्मन फ़्रांसिसी
रूसी जापानी
इतालवी अंग्रेज़ी
स्पैनिश डच
स्वीडिश पुर्तगाली
लातिन पोलिश
डैनिश रूसी
डच डैनिश
चेक इतालवी
प्राचीन यूनानी चेक
जापानी हंगेरियन
पोलिश फिनिश
हंगेरियन नार्वेजियन
अरबी स्वीडिश
नार्वेजियन यूनानी
पुर्तगाली बुल्गारियाई
हिब्रू कोरियाई
चीनी स्लोवाक

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. अनुवाद : कला और समस्याएँ', १९६१
  2. अनुवाद व्यवहार में शोध के लिए देखें, डफ १९८१
  3. अनुवाद सिद्धान्त में शोध के लिए ब्रिसलिन १९७६
  4. "वाक्यप्रदीपीयम्, द्वितीयः खण्डः, श्लो. ११५". https://sa.wikisource.org/wiki/वाक्यपदीयम्/द्वितीयः_खण्डः. 
  5. स० ही वात्स्यायन कहते हैं, "समस्त अभिव्यक्ति अनुवाद है क्योंकि वह अव्यक्त (या अदृश्य आदि) को भाषा (या रेखा या रंग) में प्रस्तुत करती है।" ('अनुवाद : कला और समस्याएँ' 1961, पृ० 4)। यह भी द्रष्टव्य है कि संस्कृत परम्परा में 'अनुवाद' शब्द का एक अर्थ है वाणी का प्रयोग = वाचारंभनमात्रम् (शब्दकल्पद्रुम), जो मौलिक अभिव्यक्ति का पर्याय है ।
  6. नाइडा तथा टेबर १९६९ : १२
  7. पट्टनायक १९६८ : ५७
  8. कैटफोर्ड १९६५ : २०
  9. न्यूमार्क १९७६ : ९
  10. हार्टमन तथा स्टार्क १९७२: २४२
  11. हैलिडे १९६४ : १२४
  12. अनुवाद सिद्धान्त और प्रयोग, भोलानाथ तिवारी १९७२ : २०२-१४