ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त

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ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त, ब्रह्मगुप्त की प्रमुख रचना है। यह संस्कृत मे है। इसकी रचना सन ६२८ के आसपास हुई।

'ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त' का अर्थ है - 'ब्रह्मगुप्त द्वारा स्फुटित (प्रकाशित) सिद्धान्त'। इसमें अन्य बातों के अलावा शून्य की गणितीय भूमिका की अच्छी समझ है; धनात्मक और ऋणात्मक दोनो प्रकार की संख्याओं के साथ गणितीय संक्रियाएँ करने के नियम दिए गये हैं; वर्गमूल निकालने की एक विधि; रैखिक समीकरणों तथा कुछ वर्ग समीकरणों के हल करने की विधियाँ; का योग निकालने की विधियाँ; ब्रह्मगुप्त सर्वसमिका (Brahmagupta's identity) तथा ब्रह्मगुप्त प्रमेय मौजूद हैं। यह ग्रन्थ पूर्णतः काव्य रूप में लिखी गई है। इसमें कुल चौबीस (२४) अध्याय हैं।

ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में दिए गए संख्या-सम्बन्धी नियम[संपादित करें]

ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त पहला ग्रन्थ है जिसमें धनात्मक संख्याओं, ऋणात्मक संख्याओं एवं शून्य से सम्बन्धित ठोस जानकारी मिलती है। इसमें मौजूद कुछ नियम नीचे दिए गए हैं-

  • दो धनात्मक राशियों का योग धनात्मक होता है।
  • दो ऋणात्मक राशियों का य ऋणात्मक होता है।
  • शून्य तथा किसी ऋणात्मक संख्या का य ऋनात्मक होता है।
  • शून्य तथा किसी धनात्मक संख्या का योग धनात्मक होता है।
  • शून्य में शून्य जोड़ने पर शून्य प्राप्त होता है।
  • एक धनात्मक संख्या तथा दूसरी ऋणात्मक संख्या का योग उनके अन्तर के बराबर होता है। और यदि वे दोनो बराबर हैं तो योग शून्य होगा।
  • घटाने में घोटी संख्या को बड़ी संख्या में से घटाना चाहिए।
  • किन्तु जब कभी छोटी संख्या से बड़ी संख्या को घटाते हैं तो अन्तर उलट जाता है।
  • जब किसी धनात्मक संख्या को ऋणात्मक संख्या से घटाना हो या ऋणात्मक संख्या को धनात्मक संख्या से घटाना हो तो उन दोनों को जोड़ा जाएगा।
  • किसी ऋणात्मक राशि तथा दूसरी धनात्मक राशि का गुणन ऋणात्मक होता है।
  • किसी ऋणात्मक संख्या को दूसरी ऋणात्मक संख्या से गुणा करने पर परिणाम धनात्मक होगा।
  • दो धनात्मक संख्याओं का गुणनफल धनात्मक होता है।
  • धनात्मक को धनात्मक से या ऋणात्म को ऋणात्मक से भाग देने पर परिणाम धनात्मक होगा।
  • धनात्मक को ऋणात्मक से भाग देने ऋनात्मक परिणाम आयेगा। ऋणात्मक को धनात्मक से भाग देने पर भी ऋणात्मक परिणाम आयेगा।
  • धनात्मक या ऋणात्मक संख्या को शून्य से भाग देने पर एक भिन्न प्राप्त होगा जिसका हर शून्य होगा।
  • शून्य को किसी धनात्मक या ऋणात्मक संख्या से भाग देने पर परिणाम शून्य होगा या उस भिन्न के बराबर होगा जिसका अंश शून्य हो और हर एक सीमित संख्या हो।
  • शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य मिलता है।

ध्यान देने योग्य है कि अन्तिम तीन नियम सही नहीं हैं क्योंकि शून्य से भाग देना फिल्ड के लिए पारिभाषित नहीं है। किन्तु यह उससे भी महत्वपूर्ण है कि सबसे पहले शून्य से भाग देने की कोशिश की गई है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]