शोले (१९७५ फ़िल्म)

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शोले
शोले.jpg
शोले का पोस्टर
निर्देशक रमेश सिप्पी
निर्माता गोपाल दास सिप्पी
लेखक जावेद अख़्तर, सलीम ख़ान
पटकथा जावेद अख़्तर,सलीम ख़ान
अभिनेता धर्मेन्द्र,
संजीव कुमार,
अमिताभ बच्चन,
अमज़द ख़ान,
हेमामालिनी,
जया बच्चन,
ए के हंगल,
असरानी,
जगदीप,
सचिन,
केष्टो मुखर्जी
संगीतकार राहुल देव बर्मन
छायाकार द्वारका दिवेचा
संपादक एम् एस शिंदे
प्रदर्शन तिथि(याँ) 15 अगस्त 1975 (1975-08-15)
समय सीमा 204 मिनट
देश Flag of India.svg भारत
भाषा हिन्दी
लागत भारतीय रुपया 3 करोड़
कुल कारोबार भारतीय रुपया 15 करोड़

शोले भारतीय हिन्दी फिल्म है, जिसका निर्माण गोपाल दास सिप्पी ने और निर्देशन का कार्य, उनके बेटे रमेश सिप्पी ने किया था। इसकी कहानी जय (अमिताभ बच्चन) और वीरू (धर्मेन्द्र) नामक दो अपराधियों पर केन्द्रित है, जिसे डाकू गब्बर सिंह (अमजद खान) से बदला लेने के लिए पूर्व पुलिस अफसर ठाकुर बलदेव सिंह (संजीव कुमार) अपने गाँव लाता है। इसमें जया भादुरी और हेमा मालिनी ने भी मुख्य भूमिका निभाई है। 2005 में पचासवें फिल्मफेयर पुरस्कार समारोह में इसे पचास सालों की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला था।

कहानी[संपादित करें]

रामगढ़ के ठाकुर बलदेव सिंह (संजीव कुमार) एक इंस्पेक्टर है जिसने, एक डाकू सरगना गब्बर सिंह (अमज़द ख़ान) को पकड़कर जेल में डलवा दिया। पर गब्बर जेल से भाग निकलता है और ठाकुर के परिवार को बर्बाद कर देता है। इसका बदला लेने के लिए ठाकुर दो चोरों की मदद लेता है - जय (अमिताभ बच्चन) तथा वीरू (धर्मेन्द्र)।

गब्बर के तीन साथी रामगढ़ के ग्रामीणों से अनाज लेने आते हैं, पर जय और वीरु की वजह से उन्हें खाली हाथ जाना पड़ता है। गब्बर उनके मात्र दो लोगों से हारने पर बहुत क्रोधित होता है और उन तीनो को मार डालता है। गब्बर होली के दिन गाँव पर हमला करता है और काफ़ी लड़ाई के बाद जय और वीरु को बंधक बना लेता है। ठाकुर उनकी मदद करने कि स्थिति में होने पर भी उनकी मदद नहीं करता। किसी तरह जय और वीरु बच जाते है। तब ठाकुर उन्हें बताता है कि किस तरह कुछ समय पहले, उसने गब्बर को गिरफ्तार किया था पर वो जेल से भाग गया और ठाकुर के पूरे परिवार को मार डाला। बाद में उसने ठाकुर को पकड़ कर उसके दोनो हाथ काट दिये।

रामगढ़ में रहते हुये जय को ठाकुर की विधवा बहू राधा (जया बच्चन) और वीरु को बसन्ती (हेमा मालिनी) से प्यार हो जाता है।

बसन्ती और वीरु को गब्बर के आदमी पकड़ कर ले जाते है और जय उनको बचाने जाता है। लड़ाई में जय को गोली लग जाती है। जिसमें जय की जान चली जाती है। वीरु गब्बर के पीछे जाता है और उसे पकड़ लेता है।

कलाकार[संपादित करें]

निर्माण[संपादित करें]

विकास[संपादित करें]

इस योजना की शुरुआत तब होती है, जब सलीम-जावेद मिल कर जी॰ पी॰ सिप्पी और रमेश सिप्पी को इसकी चार पंक्ति की कहानी सुनाते हैं; लेकिन इससे पहले दो निर्माता/निर्देशक ने उनके इस कहानी को सिरे से नकार दिया था। रमेश सिप्पी को उनकी अवधारणा अच्छी लगी और उन्होंने उन्हें आगे कार्य करने हेतु चुन लिया। इसकी वास्तविक योजना के अनुसार फिल्म में एक सेना का अधिकारी दो पूर्व सैनिकों को अपने परिवार की हत्या का बदला लेने के लिए चुनता है। बाद में सेना के अधिकारी के जगह पुलिस को ले आया गया, क्योंकि सिप्पी जी को लगा कि इस तरह के दृश्य दिखाने के लिए अनुमति मिलना काफी कठिन रहेगा। सलीम-जावेद ने मिल कर इसकी कहानी को एक महीने में पूरा कर लिया। इसमें उनके नाम से लेकर उन लोगों के तौर तरीके तक शामिल थे।

पात्र चुनाव[संपादित करें]

इसके निर्माताओं ने शुरुआत में गब्बर सिंह की भूमिका हेतु डैनी डेन्जोंगपा को चुना था, लेकिन वे इस किरदार हेतु तैयार नहीं हुए, क्योंकि पहले से फिरोज खान के धर्मात्मा (1975) के लिए मान गए थे, जिसका समय भी समान ही था। निर्माताओं की दूसरी पसंद अमजद खान थे। वे इस किरदार को निभाने के लिए तैयार हो गए और इसकी तैयारी करने लगे। प्राण को ठाकुर बलदेव सिंह के किरदार के लिए चुना गया, लेकिन सिप्पी जी को संजीव कुमार जी इस किरदार हेतु अच्छे लगे। धर्मेन्द्र को भी ठाकुर के किरदार में रुचि थी। लेकिन जब उन्हें सिप्पी जी ने बताया कि वे ठाकुर बनेंगे तो संजीव कुमार जी वीरू का किरदार निभायेंगे और हेमा मालिनी के साथ उनकी जोड़ी बनेगी। सिप्पी जी चाहते थे कि जय का किरदार शत्रुघन सिन्हा निभाएँ, लेकिन वे और अन्य कई बड़े सितारे किसी न किसी अन्य फिल्मों में काम कर रहे थे और अमिताभ बच्चन उस समय इतने प्रसिद्ध नहीं हुए थे, उन्हें इस किरदार को पाने के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ा था।

इस फिल्म के निर्माण के दौरान चार मुख्य किरदारों के कारण इसके निर्माण में काफी समय लग गया। इस फिल्म के शुरू होने से चार महीने पूर्व ही अमिताभ ने जया से शादी कर ली। जया के माँ बनने के कारण इस फिल्म के निर्माण में और देरी हुई और इस फिल्म के प्रदर्शन के दौरान अभिषेक बच्चन का जन्म हुआ था। धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के प्रेम वाले दृश्य के दौरान भी धर्मेन्द्र पूरे मेहनत पर पानी फेर देते थे, और इसके कारण एक ही दृश्य के लिए कई बार मेहनत करना पड़ रहा था। इस फिल्म के प्रदर्शित होने के पाँच वर्षों के बाद इन दोनों की भी शादी हो जाती है।

फिल्माना[संपादित करें]

वैकल्पिक संस्करण[संपादित करें]

संगीत[संपादित करें]

  • गीत "महबूबा मेहबूबा" राहुल देव बर्मन ने गाया, जिसे हेलन और जलाल आगा पर फ़िल्माया गया था। यह गीत बिनाका गीत माला १९७५ वार्षिक सूची पर २४वीं पायदान पर तथा १९७६ वार्षिक सूची पर ५वीं पायदान पर रही। [1]
  • गीत "कोई हसीना जब रूठ जाती है" बिनाका गीत माला की १९७५ वार्षिक सूची पर ३०वीं पायदान पर और १९७६ वार्षिक सूची पर २०वीं पायदान पर रही। [2]
  • गीत "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" बिनाका गीत माला की १९७६ वार्षिक सूची पर ९वीं पायदान पर रही।

गीतकार आनन्द बक्शी, सभी गानों के संगीतकार राहुल देव बर्मन हैं।

गाने
क्र. शीर्षक गायन अवधि
1. "कोई हसीना जब रूठ जाती है"   किशोर कुमार, हेमा मालिनी ४:००
2. "महबूबा महबूबा"   राहुल देव बर्मन ३:५४
3. "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे"   किशोर कुमार, मन्ना डे ५:२१
4. "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" (दुखद) किशोर कुमार १:४९
5. "हाँ जब तक है जाँ"   लता मंगेशकर ५:२६
6. "होली के दिन दिल खिल जाते है"   किशोर कुमार, लता मंगेशकर, समूह ५:४२

रोचक तथ्य[संपादित करें]

  • इसी वर्ष (१९७५) धर्मेन्द्र तथा अमिताभ बच्चन द्वारा अभिनीत फिल्म चुपके चुपके भी रिलीज़ हुई थी जो आगे चलकर कई भावी फिल्मों के लिए मील का पत्थर साबित हुई।
  • इस फिल्म का एक और अन्त रखा गया था जिसमें गब्बर सिंह मर जाता है। इस सीन को फिल्म में नहीं दिखाया गया था। काफी सालों बाद इस सीन को कुछ एक टीवी चनलों पर दिखाया गया था।
  • फिल्म के लिए एक कव्वाली भी रिकॉर्ड की गयी थी जो फिल्म की अवधि बढ़ने के कारण शामिल

नहीं की गयी। फिल्म के एल पी रिकॉर्ड पर ये उपलब्ध है।

परिणाम[संपादित करें]

कमाई[संपादित करें]

शोले फ़िल्म १५ अगस्त १९७५ को रिलीज़ हुयी। शुरु के दो सप्ताह ये कुछ खास नहीं चली, पर तीसरे सप्ताह से ये रातो रात सनसनी बन गयी। अंततः यह फ़िल्म १९७५ की सर्वाधिक कमाई करने वाली फ़िल्म बनी। इस फ़िल्म ने भारत में लगातार में लगातार ५० सप्ताह तक प्रदर्शन का कीर्तीमान भी बनाया। साथ ही यह फ़िल्म भारतीय फ़िल्मो के इतिहास में ऐसी पहली फ़िल्म बनी, जिसने सौ से भी ज्यादा सिनेमा घरो में रजत जयंती (२५ सप्ताह) मनाई। मुम्बई के मिनर्वा सिनेमाघर में इसे लगातार ५ वर्षों तक प्रदर्शित किय गया।

अपने प्रथम प्रदर्शन के दौरान इसने १५ करोड रुपयों की कमाई की, जो कि इसकी २ करोड की लागत से कई गुना था। अनुमान के मुताबिक, मंहगाई दर के आधार पर समायोजित करने पर यह फ़िल्म, भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म है।

समीक्षा[संपादित करें]

पुरस्कार[संपादित करें]

नामांकरण और पुरस्कार[संपादित करें]

वर्ष नामित कार्य पुरस्कार परिणाम
1975 एम एस शिंदे फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ संपादक पुरस्कार जीत
जी पी सिप्पी[3] फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार नामित
रमेश सिप्पी फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार नामित
संजीव कुमार फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार नामित
अमज़द खान फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार नामित
असरानी फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता पुरस्कार नामित
जावेद अख्तर, सलीम ख़ान फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ कथा पुरस्कार नामित
राहुल देव बर्मन फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार नामित
आनंद बख्शी (गीत "महबूबा महबूबा" के लिए) फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार नामित
राहुल देव बर्मन ("महबूबा महबूबा" गाने के लिए) फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक पुरस्कार नामित
- अमज़द खान सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता - बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट असोसिएशन पुरस्कार (हिंदी विभाग) जीत
द्वारका दिवेचा सर्वश्रेष्ठ छायांकन (रंगीन) - बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट असोसिएशन पुरस्कार (हिंदी विभाग) जीत
राम येडेकर सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशक - बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट असोसिएशन पुरस्कार (हिंदी विभाग) जीत

उल्लेख[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]