महापुरा

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महापुरा
—  गाँव  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य राजस्थान
ज़िला जयपुर
जनसंख्या
घनत्व
2,776 (2011 के अनुसार )
आधिकारिक भाषा(एँ) हिन्दी, ढूंढारी, ब्रजभाषा, अंग्रेज़ी
क्षेत्रफल
ऊँचाई (AMSL)
778 हेक्टेयर कि.मी²
• 217 metres मीटर
आधिकारिक जालस्थल: http://jaipur.nic.in

निर्देशांक: 26°56′10″N 75°45′42″E / 26.9361°N 75.76175°E / 26.9361; 75.76175 महापुरा, [2] राजस्थान की राजधानी से कोई दस किलोमीटर दूर (जयपुर-अजमेर रोड से करीब एक किलोमीटर दक्षिण-दिशा में) जयपुर जिले की सांगानेर तहसील का एक ऐतिहासिक ग्राम है जो शिवानन्द गोस्वामी जैसे उद्भट विद्वान को आमेर नरेश महाराजा बिशन सिंह / महाराजा विष्णुसिंह ने अन्य चार गांवों के साथ उनका शिष्यत्व स्वीकारने के उपलक्ष्य में जागीर के रूप में भेंट दिया था। महापुरा [3] अनेक कारणों से भारत के विलक्षण ग्रामों में से एक है, क्योंकि इस गाँव के साथ इतिहास और संस्कृति के कई अनजाने पहलू सम्बद्ध हैं।

संक्षिप्त परिचय[संपादित करें]

महापुरा का नामकरण :[संपादित करें]

इस गाँव के नाम का मूल मुहूर्त-रत्न और सभेदा-आर्यासप्तशती जैसे प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में जो सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी के हैं, में मिलता है। कुछ शोधकर्ताओं का अभिमत है कि दक्षिण में बहने वाली वेगवती धवलवर्ण पेन्णा नदी की स्मृति में एक 'विशाल'/ प्रसिद्ध / या महिमाशाली गाँव होने के नाते इसे पहले 'महापूरा' कहा गया जो अपभ्रंश उपयोग में आकर बाद में महापुरा कहा जाने लगा।[1]

एक महिमाशाली गाँव[संपादित करें]

एक महिमाशाली गाँव होने की दिशा में सबसे पहली बात तो यह है कि महापुरा अनेक संस्कृत-विद्वानों की कर्मभूमि रहा है| स्वयं शिवानन्द गोस्वामी द्वारा सेवित (चार सौ साल से भी ज्यादा प्राचीन) लक्ष्मीनारायण का तांत्रिक-विग्रह महापुरा में है। अजमेर रोड राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 के नजदीक अराध्य देव का प्राचीन लक्ष्मीनारायण मंदिर आसपास के निवासियों के लिए अटूट आस्था का केंद्र है। इस मंदिर की प्रतिमा को यहां निवास करने वाले शिवानंद गोस्वामी ने स्थापित किया था। वे 1747 के मध्य दक्षिण भारत से यहां आए थे। आमेर के तात्कालिक शासक महाराजा विष्णु सिंह ने अपने राज्याभिषेक के अवसर पर उन्हें आमंत्रित किया था। उन्होंने शिवानंदजी को दक्षिणा के रूप में पांच गांव भेंट किए थे- इस आशय का अभिलेख बीकानेर स्थित राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में देखा जा सकता है। उन्हीं पांच गांवों में से एक महापुरा गांव भी था। गोस्वामीजी ने इस गांव में भगवान लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा स्थापित कर एक सुंदर मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर में भगवान का विग्रह दाक्षिणात्य शैली का है। इसका स्वरूप इस प्रकार है कि भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ हैं व लक्ष्मीजी उनकी गोद में सुशोभित हैं। हरिहर की एकरूपता का लक्ष्य करके इस प्रतिमा में अर्द्धनारीश्वर नटेश्वर के भी दर्शन होते हैं, इसलिए उन्हें कामेश्वरी का युगल स्वरूप भी माना जाता है। यह प्रतिमा शालिग्राम शिला से निर्मित मानी जाती है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि इस मूर्ति को जो भी जिस भावना व जिस रूप में देखता है भगवान उसे उसी रूप में दर्शन देते हैं। मंदिर का द्वार कलात्मक है। [2][3]

शिरोमणि भट्ट, जो शिवानन्द गोस्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए, यहाँ सकुटुम्ब कुछ वर्ष रहे थे। यहीं उन्होंने सन १६८० ईस्वी में आमेर में महाराजा बिशन सिंह के लिए वाजपेय यज्ञ करवाने के बाद एक चबूतरा निर्मित करवाया था- जो आज भी विद्यमान है और जिसे हरदौल का चबूतरा कहा जाता है।

हरदौल के चबूतरे का भी अपना इतिहास है।[4] कहा जाता है– आमेर महाराजा के आग्रह पर सन १६८० ईस्वी में शिवानन्द गोस्वामी ओरछा मध्यप्रदेश से अश्वों पर और बैलगाड़ियों में सपरिवार महापुरा आने के लिए चले थे। तब बुंदेलखंड सहित मध्यवर्ती अनेक स्थलों पर लुटेरों का बड़ा आतंक था। वह ओरछा के सम्मानित कुलगुरु थे, इसलिए शिवानन्द जी के परिजनों और उनकी संपत्ति की सुरक्षा के लिए ओरछा नरेश ने हरदौल वंश के दो साहसी सरदारों को भी इस लवाजमे का नेतृत्व करने साथ भेजा। राजसी ठाटबाट और कीमती साजोसामान की भनक पा कर कुछ दुर्दांत रुहेले दस्युओं ने शिवानंदजी के काफिले पर एकाएक हमला बोल दिया. बुंदेले वीरों के बाहुबल और वीरता ने उन लुटेरों का तो सफाया कर दिया, पर दोनों हरदौल-सरदार, जो ओरछा नरेश ने भेजे थे, गहरे घाव लगने से मार्ग ही में इस हिंसक-युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए।

शिवानंदजी ने सकुशल महापुरा पहुँच कर उन दिवंगत वीरों के लिए श्राद्ध/तर्पण समेत विधिवत सभी कर्मकांड पूरे किये और उनकी स्मृति को चिरस्थाई बनाने के लिए, महापुरा और बीकानेर, दोनों जगह जहाँ वह रहे, हरदौल वीरों के चबूतरे स्थापित किये. इन चबूतरों पर चार सौ बरसों तक घी का दीपक प्रत्येक सांझ गोस्वामी-परिवार जलाता रहा था। आज भी गोस्वामी-कुल, विशेष रूप से आत्रेय कुल में, ब्याह-शादी, मुंडन, यज्ञोपवीत, जच्चा-बच्चा आदि हर महत्वपूर्ण मंगल-अवसर पर हरदौल के चबूतरे पर जा कर दंडवत करने की प्रथा है।[4]

यह गाँव महापुरा वही है जहाँ (ब्रह्मराक्षस को शास्त्रार्थ में हराने की घटना के बाद) आमेर के महाराजा बिशन सिंह को गोस्वामीजी ने अश्वमेध यज्ञ करवाने की सलाह दी थी (देखें शिवानन्द गोस्वामी) यहीं बैठ कर भट्ट मथुरानाथ शास्त्री जैसे मनीषी संस्कृत-साहित्यकार ने अपनी कुछ श्रेष्ठ रचनाएं लिखीं थीं। (यह गाँव उनका ससुराल था।) उनके साले और संस्कृत के आशुकवि गोस्वामी हरिकृष्ण शास्त्री ने यहीं रह कर अपना संस्कृत महाकाव्य 'दिव्यालोक' लिखा था। इसी गाँव में शिवानन्द गोस्वामी के अनुज जनार्दन गोस्वामी के वंशज स्व.घनश्याम गोस्वामी थे, जिन्होंने यहाँ संस्कृत-अध्ययन और शोध के लिए 'शिवानन्द-पुस्तकालय' भी खोला था और जिनके बुलावे पर लोकसभा अध्यक्ष [[डॉ॰ एम. ए. अय्यंगर ]] (कार्यकाल 8 मार्च 1956 - 16 अप्रैल 1962), राजस्थान के कई राज्यपाल, कई मुख्यमंत्री, कुछ बड़े विदेशी राजनेता, विद्वान, संत, शोधकर्ता, धर्मगुरु आदि विभिन्न कार्यक्रमों में आ चुके हैं।महापुरा में रीतिकालीन महाकवि पद्माकर के कुछ वंशजों ने भी निवास किया।[5] महापुरा गांव से खटवाड़ा रोड पर प्रतिवर्ष अगस्त-सितम्बर माह में जीण माता की पदयात्रा महापुरा से जीणमाता धाम, रैवासा सीकर के लिये जाती है।

जनसंख्या[संपादित करें]

2011 की जनगणना के आंकड़ों की भाषा में[संपादित करें]

अगर जनगणना आंकड़ों की बात की जाय तो महापुरा का विलेज-प्रोफाइल कुछ इस तरह है: गांव का कुल राजस्व क्षेत्रफल 778 हेक्टेयर है- जिसमें निवास करते परिवारों की संख्या 384 है। इन परिवारों की कुल जनसंख्या - 2,776 है जिनमें पुरुष 1,467 और स्त्रियाँ 1,309 हैं। अनुसूचित जाति की जनसंख्या - 238 है इनमें 120 पुरुष और 118 स्त्रियाँ हैं। अनुसूचित जनजाति जनसंख्या के केवल 4 लोग यहाँ हें जिनमें स्त्री 2 और 2 पुरुष हैं प्राइमरी स्कूलों की संख्या 2, माध्यमिक विद्यालयों की संख्या 3, वरिष्ठ माध्यमिक स्कूलों की संख्या 1, कॉलेजों की संख्या 1, प्रशिक्षण स्कूलों की संख्या 1 और अन्य निजी शैक्षिक स्कूलों की संख्या 1 है। आयुर्वेदिक औषधालय की संख्या 1 और प्राथमिक स्वास्थ्य उप केंद्र की संख्या 1 है। सौभाग्य से पेय जल सुविधाएं उपलब्ध हैं जहाँ नल का पानी ट्यूबवेल और हेंडपंप जल उपलब्ध है। आरम्भ से पोस्ट, टेलीग्राफ और सुविधाएं फ़ोन उपलब्ध हैं- पोस्ट ऑफिस की संख्या 1 और टेलीफोन कनेक्शनों की संख्या 120 है। बस सेवाएँ उपलब्ध हैं, रेल सेवाएँ नहीं; बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध हैं वाणिज्यिक बैंक की संख्या 1 है। कृषि ऋण समितियों की संख्या 1, गैर कृषि ऋण समितियों की संख्या है। विभिन्न स्थानों के लिए पक्की सड़कें उपलब्ध हैं, निकटतम शहर: जयपुर और बगरू हैं जिनकी क्रमशः दूरी 12 और 16 किलोमीटर है। घरेलू उपयोग, कृषि उपयोग और अन्य कार्यों के लिए विद्युत आपूर्ति सुविधाएं उपलब्ध हैं। समाचार पत्र/पत्रिका/ इन्टरनेट सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। यहाँ का कुल असिंचित क्षेत्र 290.02 हेक्टेयर है- खेती योग्य बची भूमि (गोचर भूमि और पेड़ों सहित) 153.91 हेक है।[6]

साहित्य-सन्दर्भ[संपादित करें]

हिन्दी साहित्य में महापुरा[संपादित करें]

तब से अब तक महापुरा[4] ने न जाने कितने चेहरे बदल लिए हैं। अब वहां ऊंचे-ऊंचे बहुमंजिला फ्लेट्स हैं [5] - एक प्राइवेट इंटरनेशनल स्कूल [6], राष्ट्रीयकृत/निजी क्षेत्र बैंक [7][8][9][10], संस्कृत महाविद्यालय [11] (पुराना) स्नातकोत्तर राजकीय संस्कृत कॉलेज, कुछ निजी स्नातकोत्तर महाविद्यालय [12] बड़ा वाटर-पार्क और रेस्तरां [13] भूमाफियों की बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ, करोड़ों के महंगे फार्म-हाउस, पंचसितारा होटल [14] और न जाने क्या-क्या, पर कमलानाथ जैसे कहानी-लेखक के लिए महापुरा आज भी उनका पुश्तैनी ननिहाल ही है। वह अपनी एक कहानी[7] में पुराने दिनों के महापुरा की याद कुछ इन आत्मीय लफ़्ज़ों में करते हैं:

"..... जयपुर से लगभग 10 मील दूर अजमेर सड़क पर ‘बोंल्याळी पो’ (बबूल वाली प्याऊ) के सामने से बाईं ओर डेढ़ मील अंदर तक एक कच्चा रास्ता गाँव महापुरा को जाता था| महापुरा होकर ही कई अन्य गाँवों का भी रास्ता हुआ करता था| यह गाँव मेरे लिए खास इसलिए था कि यह मेरी नानी का गाँव था| लगभग पचपन वर्ष पहले जयपुर से अजमेर जाने के लिए जो सड़क थी वह बेहद छोटी थी| आसपास दूर दूर तक सिर्फ़ बालू ही बालू या मिट्टी के टीले दिखाई देते थे| या फिर खेत और बैलों की मदद से कुएं से सिंचाई करने के लिए पानी निकालते या हल जोतते किसान| इस पक्की छोटी सड़क पर काफ़ी अंतराल के बाद कोई लंबी नाक वाली पेट्रोल की बस दिखाई दे जाती थी| सड़क के दोनों ओर बैलगाड़ियों के आवागमन से पगडण्डीनुमा कच्चे रास्ते बन गए थे जिन पर किसान अपनी फ़सल या तरबूज़, खरबूज़े, ककड़ी बैलगाड़ियों पर लादे हुए दिखाई दे जाते थे| इन पगडंडियों के परे खेतों से सटी झुरमुट झाड़ियाँ और बबूल के पेड़ आसपास की बकरियों की पसंदीदा जगह हुआ करते थे| बरसात के दिनों में ‘भरभूंट्या’ और ‘गोखरू’ की झाड़ियाँ उग आती थीं और पैदल चलने वालों को ये काँटों वाली झाड़ियाँ काफ़ी परेशान करती थीं| पर साथ में और झाड़ियाँ भी होती थीं जो मुख्यतः लाल बेरों की होती थीं| जयपुर से कुछ दूर पर ही इस रास्ते में पहले एक ‘नहर’ आया करती थी| वास्तव में यह अमानीशाह का नाला था जो अकसर बहता रहता था और जिसे ‘नहर’ के नाम से जाना जाता था| नहर के बाद चढ़ाई पड़ती थी जिसे पार करने में साइकिलों, तांगों और बैलगाड़ियों को बेहद कठिनाई होती थी| सवारियां उतर जाती थीं और साइकिलें पैदल चल कर चढ़ाई के अंत तक लेजाई जाती थीं| पैट्रोल की बसें किसी तरह घूं घूं करके धीरे धीरे चढ़ती थीं| नहर के आसपास चारों ओर सब्ज़ियों के खेत थे|

गाँव के रास्ते में अगला जो सबसे बड़ा और प्रमुख पड़ाव आता था वह था भांकरोटा, जहाँ साईकिल सवार, बसें, बैलगाड़ियां आदि सभी विश्राम के लिए रुकती थीं| यहीं एक दो दुकानें चाय वालों की थीं। अगला पड़ाव ‘जखीरा’ळी पो’ हुआ करता था। यहाँ जानवरों के लिए एक बड़ी सी ‘खेळी’ थी जो हमेशा पानी से लबरेज़ रहती थी और जहाँ अक्सर ऊँट, बैल और बकरियां पानी पीते दिखाई देते थे| यात्रियों के लिए तो प्याऊ थी ही जिस पर एक लकड़ी की लंबी सी नाली रहती थी| ‘नीची’ जाति के लोग इसी से पानी पी सकते थे| उससे क़रीब 2 मील आगे ही ‘बोंल्याळी पो’ थी जिसे बड़ या शायद पीपल के एक बड़े पेड़ के नीचे बनाया गया था। पेड़ की छाया की वजह से कुछ लोग गर्मी के दिनों में यहाँ कभी पलक भी झपक लेते थे|

इस प्याऊ के ठीक सामने से यानी अजमेर सड़क की बाँई ओर से एक कच्ची चौड़ी सी पगडण्डी दिखाई देती थी जो हमारे गाँव महापुरा को जाती थी| पक्की सड़क बस इसी मोड़ तक थी और गाँव तक का रास्ता साइकिल वालों को पैदल चल कर ही पार करना होता था। कुछ देर विश्राम करके और ठंडा पानी पीकर गाँव के बाशिंदे और बैलगाड़ियां कच्चे-रास्ते पर चल पड़ते थे| इस रास्ते पर आते ही ऐसा लगता था जैसे हम गांव लगभग पहुँच ही गए| बीच बीच में कोई न कोई परिचित साइकिल हाथ में पकड़े या बैलगाड़ी में आता जाता मिल जाता था, जो बड़े स्नेह से ‘राम राम’ अवश्य बोलता| वैसे सच पूछ जाय तो जो भी वहाँ से गुज़र रहा होता था, एक दूसरे से ‘राम राम’ कहता ही था, चाहे जानपहचान हो या न हो| बैलगाड़ियों से बनी लकीरों के अलावा दोनों तरफ़ हर जगह जंगली झाड़ियाँ और घास थी, जहाँ बकरियां और भेड़ें चरती हुई दिखती थीं और बिना या हलकी सी छाँव वाले बबूल के किसी पेड़ के नीचे सुस्ताते गडरिये-बच्चे| गाँव पहुँचते ही चिर-परिचित से मिट्टी के ऊँचे ऊँचे टीले, मामाजी के खेत, बड़ का घना बड़ा पेड़, मीठा कुआँ, आसपास पानी पीते जानवर, बालू रेत, चहलपहल, परिचित व्यक्ति या रिश्तेदार वगैरह दिखाई देने लगते थे| ....."[8]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. संस्कृत-कल्पतरु:संपादक कलानाथ शास्त्री एवं घनश्याम गोस्वामी:'मंजुनाथ शोध संस्थान', सी-8, पृथ्वीराज रोड, सी-स्कीम, जयपुर-302001
  2. chetan goswami: Editor Mahapuralive.com
  3. Research Papers : Prof. Vasudhakar Goswami: Deptt. of Sociology: 1972
  4. संक्षिप्त मोनोग्राफ : 'साक्षीनाट्यशिरोमणि गोस्वामी शिवानंद' प्रकाश परिमल : स्मृति-प्रकाशन, डी-39, देवनगर, जयपुर-302018
  5. 'आओ गाँव चलें': राजस्थान पत्रिका में स्व. बिशन सिंह शेखावत का स्तम्भ-लेख 'महापुरा'
  6. [1]
  7. साहित्यिक पत्रिका 'जलसा'-अंक 4:संपादक :असद जैदी : कमलानाथ :कहानी 'भोंर्या मो
  8. साहित्यिक पत्रिका 'जलसा'-अंक 4:संपादक :असद जैदी : कमलानाथ :कहानी 'भोंर्या मो'

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

http://www.censusindia.gov.in/default.aspx http://www.mapsofindia.com/pincode/india/rajasthan/jaipur/mahapura.html http://www.onefivenine.com/india/villages/Jaipur/Sanganer/Mahapura http://www.distancesfrom.com/map-from-Jaipur-to-Mahapura-Jaipur/MapHistory/231128.aspx