भोपाल के पर्यटन स्थल

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भोपाल का छोटा तालाब, बडा तालाब, भीम बैठका, अभयारण्य तथा भारत भवन देखने योग्य हैं| भोपाल के पास स्थित सांची का स्तूप भी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। भोपाल से लगभग २८ किलोमीटर दूर स्थित भोजपुर मन्दिर एक एतिहासिक दर्शनिय स्थल है।

लक्ष्मीनारायण मंदिर, भोपाल[संपादित करें]

बिरला मंदिर के नाम से विख्‍यात यह मंदिर अरेरा पहाडियों के निकट बनी झील के दक्षिण में स्थित है। मंदिर के निकट ही एक संग्रहालय बना हुआ है जिसमें मध्‍यप्रदेश के रायसेन, सेहोर, मंदसौर और सहदोल आदि जगहों से लाई गईं मूर्तियां रखी गईं हैं। यहां शिव, विष्‍णु और अन्‍य अवतारों की पत्‍थर की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। मंदिर के निकट बना संग्रहालय सोमवार के अलावा प्रतिदिन सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है।

मोती मस्जिद, भोपाल[संपादित करें]

इस मस्जिद को कदसिया बेगम की बेटी सिकंदर जहां बेगम ने 1860 ई. में बनवाया था। इस मस्जिद की शैली दिल्‍ली में बनी जामा मस्जिद के समान है, लेकिन आकार में यह उससे छोटी है। मस्जिद की गहरे लाल रंग की दो मीनारें हैं, जो ऊपर नुकीली हैं और सोने के समान लगती हैं।

ताज-उल-मस्जिद, भोपाल[संपादित करें]

यह मस्जिद भारत की सबसे विशाल मस्जिदों में एक है। इस मस्जिद का निर्माण कार्य भोपाल के आठवें शासक शाहजहां बेगम के शासन काल में प्रारंभ हुआ था, लेकिन धन की कमी के कारण उनके जीवंतपर्यंत यह बन न सकी। 1971 में भारत सरकार के दखल के बाद यह मस्जिद पूरी तरह से बन तैयार हो सकी। गुलाबी रंग की इस विशाल मस्जिद की दो सफेद गुंबदनुमा मीनारें हैं, जिन्‍हें मदरसे के तौर पर इस्‍तेमाल किया जाता है। तीन दिन तक चलने वाली यहां की वार्षिक इजतिमा प्रार्थना भारत भर से लोगों का ध्‍यान खींचती है।

शौकत महल, भोपाल और सदर मंजिल, भोपाल[संपादित करें]

शौकत महल शहर के बीचोंबीच चौक एरिया के प्रवेश द्वार पर स्थित है। यह महल इस्‍लामिक और यूरोपियन शैली का मिश्रित रूप है। यह महल लोगों की पुरातात्विक जिज्ञासा को जीवंत कर देता है। महल के निकट ही भव्‍य सदर मंजिल भी बनी हुई है। कहा जाता है कि भोपाल के शासक इस मंजिल का इस्‍तेमाल पब्लिक हॉल के रूप में करते थे।

गोहर महल, भोपाल[संपादित करें]

झील के किनारे बना यह महल शौकत महल के पीछे स्थित है। इस महल को 1820 ई. में कुदसिया बेगम ने बनवाया था। कला का यह अनूठा उदाहरण हिन्‍दु और मुगल वास्‍तुशिल्‍प का बेहतरीन नमूना है। फ़िलहाल यहाँ ज्यादातर हस्तशिल्प की वस्तुओं कि प्रदर्शिनी लगाई जाती है।

पुरातात्विक संग्रहालय, भोपाल[संपादित करें]

Outside View of State Museum Bhopal

बनगंगा रोड पर स्थित इस संग्रहालय में मध्‍यप्रदेश के विभिन्‍न हिस्‍सों से एकत्रित की हुई मूर्तियों को रखा गया है। विभिन्‍न स्‍कूलों से एकत्रित की गई पेंटिग्‍स, बाघ गुफाओं की चित्रकारियों की प्रतिलिपियां, अलक्ष्‍मी और बुद्ध की प्रतिमाएं इस संग्रहालय में सहेजकर रखी गई हैं। यहां की दुकानों से पत्‍थरों की मूर्तियों खरीदी जा सकती हैं। सोमवर के अलावा प्रतिदिन सुबह 10 से शाम 5 बजे तक यह संग्रहालय खुला रहता है।

भारत भवन, भोपाल[संपादित करें]

यह भवन भारत के सबसे अनूठे राष्‍ट्रीय संस्‍थानों में एक है। 1982 में स्‍थापित इस भवन में अनेक रचनात्‍मक कलाओं का प्रदर्शन किया जाता है। शामला पहाडियों पर स्थित इस भवन को प्रसिद्ध वास्‍तुकार चार्ल्‍स कोरेया ने डिजाइन किया था। भारत के विभिन्‍न पारंपरिक शास्‍त्रीय कलाओं के संरक्षण का यह प्रमुख केन्‍द्र है। इस भवन में एक म्‍युजियम ऑफ आर्ट, एक आर्ट गैलरी, ललित कलाओं की कार्यशाला, भारतीय काव्‍य की पुस्‍तकालय आदि शामिल हैं। इन्‍हें अनेक नामों जैसे रूपांकर, रंगमंडल, वगर्थ और अन्‍हद जैसे नामों से जाना जाता है। सोमवार के अतिरिक्‍त प्रतिदिन दिन में 2 बजे से रात 8 बजे तक यह भवन खुला रहता है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय[संपादित करें]

यह अनोखा संग्रहालय शामला की पहाडियों पर 200 एकड के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस संग्रहालय में भारत के विभिन्‍न राज्‍यों की जनजातीय संस्‍कृति की झलक देखी जा सकती है। यह संग्रहालय जिस स्‍थान पर बना है, उसे प्रागैतिहासिक काल से संबंधित माना जाता है। सोमवार और राष्‍ट्रीय अवकाश के अलावा यह संग्रहालय प्रतिदिन 10 से शाम 5 बजे तक खुला रहता है।

भीमबेटका गुफाएं[संपादित करें]

दक्षिण भोपाल से 46 किलोमीटर दूर स्थित भीमबेटका की गुफाएं प्रागैतिहासिक काल की चित्रकारियों के लिए लोकप्रिय हैं। यह गुफाएं चारों तरफ से विन्‍ध्‍य पर्वतमालाओं से घिरी हुईं हैं, जिनका संबंध नवपाषाण काल से है। इन गुफाओं के अंदर बने चित्र गुफाओं में रहने वाले प्रागैतिहासिक काल के जीवन का विवरण प्रस्‍तुत करते हैं। यहां की सबसे प्राचीन चित्रकारी को 12 हजार वर्ष पूर्व की मानी जाती है।

भोजपुर[संपादित करें]

यह प्राचीन शहर दक्षिण पूर्व भोपाल से 28 किमी की दूरी पर स्थित है। यह शहर भगवान शिव को समर्पित भोजेश्‍वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर को पूर्व का सोमनाथ भी कहा जाता है। मंदिर की सबसे खास विशेषता यहां के लिंगम का विशाल आकार है। लिंगम की ऊंचाई लगभग 2.3 मीटर की है और इसकी परिधि 5.3 मीटर है। यह मंदिर 11 वीं शताब्‍दी में राजा भोज ने बनवाया था। शिव रात्रि का पर्व यहां बडी धूमधाम से मनाया जाता है। मंदिर के निकट ही एक जैन मंदिर भी है जिसमें एक जैन तीर्थंकर की 6 मीटर ऊंची काले रंग की प्रतिमा स्‍थापित है।