राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, भोपाल

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राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्-भोपाल
राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान चिह्न
राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, भोपाल।

स्थापित ६ जुलाई २००२
प्रकार: लोक सेवा
अवस्थिति: भोपाल, भारत
परिसर: नगरीय
कुलपति: परमेश्वर नारायण शास्त्री
सम्बन्धन: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग
जालपृष्ठ: अधिकृत जालस्थान

राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्, भोपाल एक शैक्षणिक संस्थान है।[1] यह भारत सरकार द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित मानित विश्वविद्यालय है। भारत सरकार ने संस्कृत आयोग (1956-1957) की अनुशंसा के आधार पर संस्कृत के विकास तथा प्रचार-प्रसार हेतु संस्कृत सम्बद्ध केन्द्र सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के उद्देश्य से 15 अक्टूबर, 1970 को एक स्वायत्त संगठन के रूप में राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान की स्थापना की थी। वर्तमान में इस मानित विश्वविद्यालय के तेरह परिसर देश के विभिन्न प्रदेशों में कार्यरत हैं। उनमें मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल नगर में शिक्षासत्र 2002-2003 से भोपाल परिसर सञ्चालित है।[2][3]

उद्देश्य[संपादित करें]

राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के संस्था के बहिर्नियम (Memorandum of Association) में घोषित उद्देश्य इस प्रकार है-

संस्थान की स्थापना के उद्देश्य पारम्परिक संस्कृत विद्या व शोध का प्रचार, विकास व प्रोत्साहन है और उनका पालन करते हुएः-

  1. संस्कृत विद्या की सभी विधाओं में शोध का आरम्भ, अनुदान, प्रोत्साहन तथा संयोजन करना है, साथ-साथ शिक्षक-प्रशिक्षण तथा पाण्डुलिपि विज्ञान आदि को भी संरक्षण देना जिससे पाठमूलक प्रासंगिक विषयों में आधुनिक शोध के निष्कर्ष के साथ सम्बन्ध स्पष्ट किया जा सके तथा इनका प्रकाशन हो सके।
  2. केन्द्रीय प्रशासनिक संकाय के रूप में इसके द्वारा स्थापित अथवा अधिगृहीत समस्त संस्कृत महाविद्यालयों का प्रंबन्धन तथा उनकी शैक्षणिक गतिविधियों में अधिकाधिक प्रभावी सहयोग करना जिससे विशिष्ट क्षेत्रों में विद्यापीठों के बीच कर्मचारियों, छात्रों व शोध और राष्ट्रिय कार्य-विभाजन के अन्तर्बदल और स्थानान्तरण को सुसाध्य एवं तर्कसंगत बनाया जा सके।
  3. संस्कृत के संवर्धनार्थ भारत सरकार के केन्द्रीय अभिकरण (Nodal Agency) के रूप में उनकी नीतियों एवं योजनाओं को लागू करना।
  4. उन शैक्षणिक क्षेत्रों में अनुदेश एवं प्रशिक्षण का प्रबन्ध करना जो निर्धारित मानदण्डों को पूरा करते हों और संस्थान जिन्हें उचित समझता हो।
  5. शोध एवं ज्ञान के प्रसार एवं विकास के लिए समुचित मार्गदर्शन एवं व्यवस्था करना।
  6. प्राचीर-बाह्य (Extra-mural) अध्ययन, विस्तारित योजनाएँ एवं दूरस्थ क्रिया-कलाप जो समाज के विकास में योगदान देते हों, उनका उत्तरदायित्व लेना।
  7. इसके अतिरिक्त उन सभी उत्तरदायित्वों एवं कार्यो का निष्पादन करना जो संस्थान के उद्देश्यों को आगे बढाने के लिए आवश्यक या वांछित हो।

इतिहास[संपादित करें]

भारत में सर्वप्रथम दिल्ली से राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान की प्रवृत्ति का प्रारंभ संस्कृत के विकास और प्रचार-प्रसार हेतु तथा संस्कृत से सम्बद्ध केन्द्र सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के उद्देश्य से 15 अक्टूबर, 1970 को एक स्वायत्त संगठन के रूप में हुआ। भोपालपरिसर को स्थापित करने के लिए तात्कालीन केन्द्रीय मन्त्री डा. मुरली मनोहर जोशी, मानव संसाधन विकास मन्त्रालय भारत सरकार ने पत्र क्रमाङ्क संस्कृत-1- सैक्सन दिनाङ्क 31 मार्च 2002 के द्वारा स्थापना आदेशपत्र निर्गत किया था। उक्त शासनादेश को क्रियान्वित करने के लिए रा. सं. सं. नई दिल्ली ने पत्र क्रमाङ्क-37021/2002-admin/1108 कार्यालय आदेश संख्या 107 / दिनाङ्क 05.06.2002 के द्वारा एतदर्थ प्राचार्य आदि विभाग उपलब्ध कराकर 1 जुलाई 2002 से भोपाल परिसर को क्रियाशील किया था। इस तिथि से प्रायः दस वर्ष पूर्व ही 1991-92 में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मन्त्री अर्जुन सिंह की घोषणा से भोपाल परिसर के स्थापना की योजना प्रकल्पित हुई थी और उसी समय मध्यप्रदेश शासन ने पत्र क्रमाङ्क -एफ 6730/शास. /सा.-2बी/93 दिनाङ्क 27.05.1993/20.07.1993 के शासनादेश के द्वारा इस परिसर के विकास के लिए 10 एकड़ भूमि निःशुल्क आवंटित की थी। इस प्रकार भोपाल में 6 जुलाई 2002 से बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के अतिथि गृह के कक्ष में भोपाल परिसर की गतिविधि प्रारम्भ होने पर 02 अगस्त 2002 को अरेरा कॉलोनी में भाटक भवन प्राप्त करके उसमें छात्रों के प्रवेश एवं शिक्षण की गतिविधि प्रारम्भ हुई। दिनाङ्क 16 सितम्बर 2002 को भोपाल परिसर में औपचारिक उद्घाटन किया गया। दिनाङ्क 27.02.2003 को आवंटित भूखण्ड पर परिसराधार शिलान्यास मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री दिग्विजय सिंह के हाथों हुआ था। दिनाङ्क 19 सितम्बर 2005 को शैक्षिक एवं प्रशासनिक मुख्य भवन का शिलान्यास तत्कालीन मानव संसाधन विकास मन्त्री अर्जुन सिंह के हाथों सम्पन्न हुआ था। [4]

सुविधाएँ[संपादित करें]

संस्थान में मध्यप्रदेश एवम अन्य राज्यों से आनेवाले छात्रों के लिए ३३३ छात्रों का पुरुष छात्रावास, १०८ छात्राओं का महिला छात्रावास, अतिथि निवास, प्राचार्य एवं कर्मचारी आवासों की सुविधा हैं। यहाँ भारत और नेपाल से भी छात्र संस्कृत सिखने हेतु आते हैं। भवन में अत्याधिनिक संगणक प्रयोगशाला भी है।

गतिविधियाँ[संपादित करें]

राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान निम्नलिखित कार्यक्रमों के क्रियान्वयन हेतु कृतसंकल्प है।

  • प्राथमिक स्तर से स्नातकोत्तर स्तर तक परम्परागत पद्धति से संस्कृत के अध्ययन, अध्यापन को संचालित करना एवं विद्यावारिधि उपाधि प्राप्ति हेतु शोधकार्य का प्रबन्ध करना।
  • स्नातक एवं स्नातकोत्तर छात्रों के लिए सेवापूर्ण शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम।
  • स्वैच्छिक एवं संयुक्त परियोजनाओं को लागू करने में अन्य महत्वपूर्ण संस्थाओं के साथ सहयोग स्थापित करना।
  • पाण्डुलिपि संग्रहालय की स्थापना के साथ-साथ अप्राप्य एवं दुर्लभ पाण्डुलिपियों एवं महत्वपूर्ण ग्रन्थों का सम्पादन और प्रकाशन आदि की व्यवस्था करना।
  • संस्कृत के मौलिक ग्रन्थों के प्रकाशन हेतु अनुदान देना।
  • संस्कृत में प्रकाशित पत्र पत्रिकाओं को अनुदान देकर प्रोत्साहित करना।
  • अंगीभूत परिसरों एवं देश के विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को संस्कृत पढने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करना।
  • संस्कृत के प्रकाशित उपयोगी ग्रन्थों को खरीदकर विभिन्न संस्थाओं में निःशुल्क वितरण करना।
  • पारम्परिक पद्धति से प्राथमिक (प्रथम) स्तर से स्नातकोतर (आचार्य) स्तर पर्यन्त परीक्षाओं का आयोजन करना।
  • संस्कृत शिक्षण के संवर्धन हेतु देश के विभिन्न भागों में पारम्परिक पद्धति से संस्कृत शिक्षणरत संस्थाओं को संबद्धता प्रदान करना।
  • देश की संस्कृत सेवी संस्थाओं को लाभ पहुंचाने के लिए अवकाश प्राप्त अनुभवी संस्कृत विद्वानों की शास्त्रचूडामणि योजना के अन्तर्गत नियुक्त कर, विभिन्न संस्थाओं में पदस्थापित करना।
  • कार्यरत संस्कृत प्राध्यापकों के ज्ञानवर्धन हेतु पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का आयोजन करना।
  • समय समय पर देश एवं विदेश स्तर पर विश्व संस्कृत सम्मेलन जैसे बृहत् कार्यक्रमों की।


पाठ्यक्रम[संपादित करें]

यहां उपलब्ध पाठ्यक्रमों में निम्न हैं:-

  • प्राक-शास्त्रि
  • शास्त्रि
  • विद्या-वारिधि
  • शिक्षा-शास्त्रि
  • आचार्य

परिसर में वर्तमान में साहित्य, व्याकरण, ज्योतिष, शिक्षा, जैन दर्शन तथा आधुनिक विभाग सञ्चालित हैं। साथ ही वेद, पुराण इतिहास, सांख्य योग इत्यादि विभागों की स्वीकृति परिसर के समीप उपलब्ध है। प्राकशास्त्री, शास्त्री, आचार्य, शिक्षाशास्त्री (B.Ed.), शिक्षाचार्य (M.Ed.) तथा विद्यावारिधि पाठ्यक्रम परिसर में गुणवत्तापूर्ण पद्धति से सञ्चालित किए जा रहे हैं। साथ ही अनौपचारिक संस्कृत शिक्षण, वास्तु, ज्योतिष के प्रमाणपतरीय एवं पत्रोपधि पाठ्यक्रमों के साथ मुक्त स्वाध्याय पीठ में दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से भी पाठ्यक्रम सञ्चालित हो रहे हैं।

चित्रदीर्घा[संपादित करें]

राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानम का प्रवेश द्वार। 
सुदामा अतिथिगृह। 
कविभास्कर छात्रावास। 

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]