तोमर वंश

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तोमर, तंवर या कुंतल उत्तर पश्चिम भारत का एक गोत्र है।तोमर (जिसे कुंतल भी कहा जाता है/लिखा जाता है) एक वंश है, जिसके कुछ सदस्य अलग-अलग समय में उत्तर भारत के कुछ हिस्सों पर शासन करते थे। तोमर वंश के लोग उत्तरी भारत के जाटों,[1] राजपूतो [2] और गुर्जर [3] लोगों में पाए जाते हैं।

इतिहास[संपादित करें]

उत्पत्ति[संपादित करें]

तोमर वंश चंद्रवंशी वंश से वंश का दावा करता है, माना जाता है कि वह अपने पोते परीक्षित के माध्यम से पांडव अर्जुन के वंशज थे।[4][5][6] तोमर का सबसे पहला प्रारंभिक ऐतिहासिक संदर्भ पेहोवा गुर्जर-प्रतिहार राजा महेंद्रपाल I (r। C। 885-910 CE) के शिलालेख में होता है।[7] इस अछूते शिलालेख से पता चलता है कि तोमर प्रमुख गोगा महेंद्रपाल प्रथम का जागीरदार था।[8] पुराणों से प्रतीत होता है कि आरंभ में तोमरों का निवास हिमालय के निकटस्थ किसी उत्तरी प्रदेश में था। किंतु १०वीं शताब्दी तक ये करनाल तक पहुँच चुके थे। थानेश्वर में भी इनका राज्य था। उस समय उत्तर भारत में चौहान राजवन्श का साम्राज्य था। उन्हीं के सामंत के रूप में तंवरों ने दक्षिण की ओर अग्रसर होना आरम्भ किया।[कृपया उद्धरण जोड़ें] 9 वीं -12 वीं शताब्दी के दौरान, दिल्ली के तोमर राजपूतों ने वर्तमान उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश राजस्थान दिल्ली और हरियाणा के कुछ हिस्सों पर शासन किया।[9]

अर्जुनयन[संपादित करें]

इतिहासकार दशरथ शर्मा तोमर का उल्लेख पुराणों (गुप्त युग के दौरान रचित) के रूप में किया गया है जो पंजाब से सटे कश्मीर के उस हिस्से में उत्तर में कहीं पर रहते हैं। [10] प्राचीन इंद्रप्रस्थ (डेल्ही) के आसपास अर्जुन और उनके भूगोल से पूर्वजों के कारण, उन्हें अर्जुनयान में उत्पन्न होने का अनुमान है.[11]

जितपाल[संपादित करें]

अब-ए-अकबरी द्वारा अबुल फ़ज़ल जितपाल के नाम से तोमर के पूर्वजों के बारे में बताता है। वह मालवा क्षेत्र में एक शक्तिशाली जमींदार था और रईसों के रूप में शासक के रूप में चुना गया था जब उन्होंने परमार राजा को सिंहासन के योग्य नहीं पाया था। [12]

अनंगपाल I[संपादित करें]

बर्डी परंपरा के अनुसार, वंश के संस्थापक अनंगपाल तोमर (जीतपाल तोमर के वंशज) ने 736 ईस्वी में दिल्ली की स्थापना की थी।[7] हालांकि, इस दावे की प्रामाणिकता संदिग्ध है।[13] बाड़ेक किंवदंतियों में यह भी कहा गया है कि अंतिम तोमर राजा (जिसे अनंगपाल भी कहा जाता है) दिल्ली के सिंहासन पर अपने दामाद पृथ्वीराज चौहान के लिए गया था। यह दावा भी गलत है: ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि पृथ्वीराज को दिल्ली अपने पिता से विरासत में मिली थी सोमेश्वरा.[13] सोमेश्वरा के शिलालेख बिजोलिया के अनुसार, उनके भाई विग्रहराज चतुर्थ ने ढिल्लिका (दिल्ली) और आशिका (हांसी) को पकड़ लिया था; उसने संभवतः एक तोमर शासक को हराया था।{{sfn|Dilip Kumar Ganguly|1984|p=117}[14]

कुमारपाल तोमर[संपादित करें]

कुमारपाल तोमर अनंगपाल द्वितीय के पिता थे। उन्होंने ग़ज़नविड्स के खिलाफ उत्तरी भारत के 150+ राजाओं और सरदारों के एकजुट संघ का गठन और नेतृत्व किया [15] 1043 में, कुमारपाल तोमर ने मुस्लिम आक्रमणकारी माउदूद के पोते, गजनी के महमूद के खिलाफ अभियान शुरू किया। उन्होंने न केवल हांसी और थानेसर बल्कि कांगड़ा और पूरे पंजाब पर विजय प्राप्त की, जब तक वे लाहौर नहीं पहुंच गए। उन्होंने हर किले में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को स्थापित किया और उनकी देखभाल के लिए अपने एक भाई के साथ एक छोटी सेना रखी। यहां तक ​​कि सेना ने लाहौर और तकिशाह (ताकेश्वर) के किलों को घेर लिया और लाहौर और ग्वालियर के बीच का सारा इलाका तोमर क्षेत्र बन गया।[16]

अनंगपाल II[संपादित करें]

फैशिता के अनुसार, उत्तरी भारत में, लगभग 150 राज्यों का एक समूह मौजूद था, जिनके शासक दिल्ली के तोमर राजाओं को अपना प्रमुख मानते थे। माना जाता है कि राजाओं का यह समूह अनंगपाल II के शासनकाल के दौरान अस्तित्व में था। इन राज्यों के शासकों ने बाद में तोमर राजा चड़पाल तोमर के नेतृत्व में तराइन की पहली और दूसरी लड़ाई में भाग लिया ( गोविंद राय के नाम से बेहतर) जो पृथ्वीराज चौहान के चचेरे भाई और सेनापति थे।[17] Anangpal's grandson Kosal Dev Singh is said to have established Kosli in 1193 A.D.[18]

ग्वालियर के तोमरस ने ग्वालियर के उत्तर में एक क्षेत्र पर शासन किया, जिसे टोंवरघर पथ के नाम से जाना जाता है। इन शासकों में सबसे उल्लेखनीय था मान सिंह तोमर (1486-1517)).[19]


दिल्ली में उनके अधिकार का समय अनिश्चित है। किंतु विक्रम की १०वीं और ११वीं शतियों में हमें साँभर के चौहानों और तोमरों के संघर्ष का उल्लेख मिलता है। तोमरेश रुद्र चौहान राजा चंदन के हाथों मारा गया। तंत्रपाल तोमर चौहान वाक्पति से पराजित हुआ। वाक्पति के पुत्र सिंहराज ने तोमरेश सलवण का वध किया। किंतु चौहान सिंहराज भी कुछ समय के बाद मारा गया। बहुत संभव है कि सिंहराज की मृत्यु में तोमरों का कुछ हाथ रहा हो। ऐसा प्रतीत होता है कि तोमर इस समय दिल्ली के स्वामी बन चुके थे। गज़नवी वंश के आरंभिक आक्रमणों के समय दिल्ली-थानेश्वर का तोमर वंश पर्याप्त समुन्नत अवस्था में था।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

तोमरराज ने थानेश्वर को महमूद से बचाने का प्रयत्न भी किया, यद्यपि उसे सफलता न मिली। सन् १०३८ ईo (संo १०९५) महमूद के पुत्र मसूद ने हांसी पर अधिकार कर लिया। मसूद के पुत्र मजदूद ने थानेश्वर को हस्तगत किया। दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी होने लगी। ऐसा प्रतीत होता था कि मुसलमान दिल्ली राज्य की समाप्ति किए बिना चैन न लेंगे। किंतु तोमरों ने साहस से काम लिया। तोमरराज महीपाल ने केवल हांसी और थानेश्वर के दुर्ग ही हस्तगत न किए; उसकी वीर वाहिनी ने काँगड़े पर भी अपनी विजयध्वजा कुछ समय के लिये फहरा दी। लाहौर भी तँवरों के हाथों से भाग्यवशात् ही बच गया।[कृपया उद्धरण जोड़ें] तोमरों की इस विजय से केवल विद्वेषाग्नि ही भड़की। तोमरों पर इधर उधर से आक्रमण होने लगे। तँवरों ने इनका यथाशक्ति उत्तर दिया। संवत् ११८९ (सन् ११३२) में रचित श्रीधर कवि के पार्श्वनाथचरित् से प्रतीत होता है कि उस समय तोमरों की राजधानी दिल्ली समृद्ध नगरी थी और तँवरराज अनंगपाल अपने शौर्य आदि गुणों के कारण सर्वत्र विख्यात था। द्वितीय अनंगपाल ने मेहरोली के लौह स्तंभ की दिल्ली में स्थापना की। शायद इसी राजा के समय तँवरों ने अपनी नीति बदली। बीसलदेव तृतीय न संवत् १२०८ (सन् ११५१ ईo) में तोमरों को हरा कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इसके बाद तँवर चौहानों के सामंतों के रूप में दिल्ली में राज्य करते रहे।[कृपया उद्धरण जोड़ें] पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद दिल्ली पर मुसलमानों का अधिकार हुआ।

दिल्ली के तोमर राजा[संपादित करें]

  1. अनंगपाल प्रथम 736 ई
  2. विशाल 752
  3. गंगेय 772
  4. पथ्वीमल 793
  5. जगदेव 812
  6. नरपाल 833
  7. उदयसंघ 848
  8. जयदास 863
  9. वाछाल 879
  10. पावक 901
  11. विहंगपाल 923
  12. तोलपाल 944
  13. गोपाल 965
  14. सुलाखन 983
  15. जसपाल 1009
  16. कंवरपाल 1025 (मसूद ने हांसी पर कुछ दिन कब्जा किया था 1038 में)
  17. अनंगपाल द्वितीय 1046 (1052 महरौली के लौह स्तंभ पर शिलालेख]])
  18. तेजपाल 1076
  19. महीपाल 1100
  20. दकतपाल (अर्कपाल भी कहा जाता है) 1115 A.D.-1046 (1052 महरौली के लौह स्तंभ पर शिलालेख)

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. Sociological Bulletin. Indian Sociological Society. 2004. पृ॰ 404.
  2. Mayaram, Shail (2003). Against History, Against State: Counterperspectives from the Margins. Columbia University Press. पृ॰ 22. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9780231529518.
  3. Singh, Kumar Suresh, संपा॰ (1998). id=Jw9uAAAAMAAJ India's communities जाँचें |url= मान (मदद). Oxford University Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-563354-2. The Hindu Gujjar have a number of clans (gotra), such as Bainsale, Bhati, Bankar, Korri, Dhame, Godhane, Khari, Nangari, Khatana Pedia, Peelwar, Tanwar, Fagna, Vidhuri, Vasatte and Lomor |url= में पाइप ग़ायब है (मदद)
  4. Tomars of Delhi by Harihar Niwas Dwivedi. Gwalior: Vidya Mandir Publication. 1983. पृ॰ 188.
  5. Singh, David Emmanuel (2012). Islamization in Modern South Asia: Deobandi Reform and the Gujjar Response. Walter de Gruyter. पृ॰ 55. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9781614511854.
  6. Text of the Puranic list of Peoples, Indian Historical Quarterly, 1945, p. 304
  7. Sailendra Nath Sen 1999, पृ॰ 339.
  8. Dilip Kumar Ganguly 1984, पृ॰प॰ 116-117.
  9. Upinder Singh 2008, पृ॰ 571.
  10. Dasratha Sharma, New Light on the Tomaras of Delhi, PIHC,1956, p. 150
  11. Khetāsara, Mahendrasiṃha Taṃvara (2006). Rājasthāna kī sāṃskr̥tika paramparāem̐. Mahārājā Mānasiṃha Pustaka Prakāśa Śodha-Kendra.
  12. Tomars of Delhi by Harihar Niwas Dwivedi. Gwalior: Vidya Mandir Publication. 1983. पृ॰ 188.
  13. D. C. Ganguly 1981, पृ॰ 704.
  14. "Tomara dynasty | Indian dynasty". Encyclopedia Britannica (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 19 August 2020.
  15. Tarikh-i-Firishta, tr. Briggs, Vol.1. पृ॰ 26.
  16. History of Tomars, Part1 - Tomars of Delhi by Harihar niwas Dwivedi. Gwalior: Vidyamandir publications. 1983. पृ॰ 232.
  17. Tomars of Delhi by Harihar Niwas Dwivedi. Gwalior: Vidya Mandir Publications. 1983. पपृ॰ 283–285.
  18. Sarban Singh; Haryana (India). Gazetteers Organisation (2004). Haryana State Gazetteer: Lacks special title. Haryana Gazetteers Organisation, Revenue Dept.
  19. Kolff, Dirk H. A. (2002) [First published 1990]. Naukar, Rajput, and Sepoy: The Ethnohistory of the Military Labour Market of Hindustan, 1450-1850. Cambridge University Press. पृ॰ 89. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-52152-305-9.

ग्रन्थसूची[संपादित करें]