अवन्ति

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अवन्ति प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदों में से एक था।[1] आधुनिक मालवा ही प्राचीन काल की अवन्ति था, जिसके दो भाग थे। उत्तरी अवन्ति जिसकी राजधानी उज्जयिनी थी तथा दक्षिणी अवन्ति जिसकी राजधानी महिष्मती थी। इन दोनों क्षेत्रो के बीच नेत्रावती नदी बहती थी। उज्जयिनी की पहचान मध्यप्रदेश के वर्तमान उज्जैन नगर से की जा सकती हैं।[2] प्राचीन काल में यहाँ हैहय राजवंश का शासन था। महावीर स्वामी तथा गौतम बुद्ध के समकालीन यहा के शासक प्रद्योत या चंड प्रद्योत था। इसके प्रमुख नगर कुरारगढ, मक्करगढ एव सुदर्शनपुर थे।

अवन्ति राज्य, मध्य भारत में स्थित

इतिहास[संपादित करें]

प्राचीन इतिहास[संपादित करें]

प्राचीन संस्कृत साहित्य तथा पाली साहित्य में अवन्ति या उज्जयिनी का सैंकड़ों बार उल्लेख हुआ है। महाभारत में सहदेव द्वारा अवन्ति को विजित करने का वर्णन है। बौद्ध काल में अवन्ति उत्तरभारत के शोडश महाजनपदों में से थी जिनकी सूची अंगुत्तरनिकाय में हैं। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में इसी जनपद को "मालव" कहा गया है। इस जनपद में स्थूल रूप से वर्तमान मालवा, निमाड़ और मध्य प्रदेश का बीच का भाग सम्मिलित था। पुराणों के अनुसार अवन्ति की स्थापना यदुवंशी क्षत्रियों द्वारा की गई थी।

बुद्ध के समय अवन्ति का राजा प्रद्योत वंश का चंडप्रद्योत था। इसकी पुत्री वासवदत्ता से वत्स नरेश उदयन ने विवाह किया था जिसका उल्लेख भास रचित 'स्वप्नवासवदत्ता' नामक नाटक में है। वासवदत्ता को अवन्ती से सम्बंधित मानते हुए एक स्थान पर इस नाटक में कहा गया है-

हम! अतिसद्दशी खल्वियमार्याय अवंतिकाया:

चतुर्थ शती ई.पू. में अवन्ती जनपद मौर्य साम्राज्य में सम्मिलित था और उज्जयिनी मगध साम्राज्य के पश्चिम प्रांत की राजधानी थी। इससे पूर्व मगध और अवन्ती का संघर्ष पर्याप्त समय तक चलता रहा था जिसकी सूचना हमें परिशिष्टपर्वन से मिलती है। 'कथासरित्सागर' से यह ज्ञात होता है कि अवन्तीराज चंडप्रद्योत के पुत्र पालक ने कौशाम्बी को अपने राज्य में मिला लिया था।

विष्णु पुराण से विदित होता है कि संभवत: गुप्त काल से पूर्व अवन्ती पर आभीर आधिपत्य था-

सौराष्ट्रावन्ति…विषयांश्च--आभीर शूद्राद्या भोक्ष्यन्ते

ऐतिहासिक साहित्य हमें यह भी विदित होता है कि प्रथम शती ई. पू. में 57 ई. पू. में विक्रम संवत के संस्थापक उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को हराकर उज्जयिनी को अपनी राजधानी बनाया था।

अवन्ति गुप्त काल में[संपादित करें]

चौथी शती ईस्वी में गुप्त काल के सम्राट समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने अवन्ति को पुन: विजय किया और वहाँ से विदेशी सत्ता को उखाड़ फैंका।

गुप्तकालीन कालिदास ने उज्जयिनी का यह वर्णन किया है-

वक्र: पंथा यदपि भवत: प्रस्थिस्योत्तराशां, सौधोत्संगप्रणयविमुखोमास्म भूरुज्जयिन्या:

इसके साथ ही कालिदास ने अवन्ती का भी उल्लेख किया है-

प्राप्यावन्तीमुदयनकथाकोविदग्रामवृद्धान्

इससे संभवत: यह जान पड़ता है कि कालिदास के समय में अवन्ती उस जनपद का नाम था, जिसकी मुख्य नगरी उज्जयिनी थी।

युवानच्वांग का अवन्ति राज्य वर्णन[संपादित करें]

चीनी यात्री युवानच्वांग के यात्रावृत से ज्ञात होता है कि अवन्ति या उज्जयिनी का राज्य उस समय (615–630 ई.) मालव राज्य से अलग था और वहाँ एक स्वतन्त्र राजा का शासन था।

शंकराचार्य का अवन्ति राज्य वर्णन[संपादित करें]

शंकराचार्य के समकालीन और शिष्य अवन्ती-नरेश चक्रवर्ती सम्राट सुधन्वा थे, जिन्होंने उज्जयिनी को राजधानी बना कर शासन किया था।

मध्यकालिन अवन्ति[संपादित करें]

9 वीं व 14 वीं शतियों में उज्जयिनी में परमार वंशका शासन रहा। तत्पश्चात् उन्होंने धारा नगरी में अपनी राजधानी बनाई। मध्यकाल में इस नगरी को मुख्यत: उज्जैन ही कहा जाता था और इसका मालवा के सूबे के एक मुख्य स्थान के रूप में वर्णन मिलता है।

दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने उज्जैन को बुरी तरह से लूटा और यहाँ के महाकाल के अति प्राचीन मन्दिर को नष्ट कर दिया। अगले प्राय: पाँच सौ वर्षों तक उज्जैन पर मुसलमानों का आधिपत्य रहा।

18वीं शताब्दी में मराठाओं ने बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में मालवा को अपने साम्राज्य में मिला लिया। मालवा में मुस्लिम शासन हमेशा के लिए समाप्त हो गया और मराठा सिंधिया नरेशों के तहत फिर से हिंदू शासन यहाँ स्थापित हुआ और 1810 ई. तक उज्जैन उनकी राजधानी रही। इस वर्ष सिंधिया ने उज्जैन से हटा कर राजधानी ग्वालियर में बनाई। मराठों के राज्यकाल में उज्जैन के कुछ प्राचीन मन्दिरों का जीर्णोद्धार किया गया था। इनमें महाकाल का मन्दिर भी है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "महाजनपदों का उदय". मूल से 11 अगस्त 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 11 अगस्त 2019.
  2. Law, B.C. (1973). Tribes in Ancient India, Bhandarkar Oriental Series No.4, Poona: Bhandarkar Oriental Research Institute, p.63