शिया इस्लाम

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अरबी लिपि में लिखा शब्द-युग्म "मुहम्मद अली" इस शिया विश्वास को दिखाता है कि मुहम्मद और अली में निष्ठा दिखाना एक समान ही है। इसको उलटा घुमा देने पर यह "अली मुहम्मद" बन जाता है।

शिया एक मुसलमान सम्प्रदाय है। सुन्नी सम्प्रदाय के बाद यह इस्लाम का दूसरा सबसे बड़ा सम्प्रदाय है जो पूरी मुस्लिम आबादी का केवल १५% है। सन् ६३२ में हजरत मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात जिन लोगों ने अपनी भावना से हज़रत अली को अपना इमाम (धर्मगुरु) और ख़लीफा (नेता) चुना वो लोग शियाने अली (अली की टोली वाले) कहलाए जो आज शिया कहलाते हैं।

इस धार्मिक विचारधारा के अनुसार हज़रत अली, जो मुहम्मद साहब के चचेरे भाई और दामाद दोनों थे, ही हजरत मुहम्मद साहब के असली उत्तराधिकारी थे और उन्हें ही पहला ख़लीफ़ा (राजनैतिक प्रमुख) बनना चाहिए था। यद्यपि ऐसा हुआ नहीं और उनको तीन और लोगों के बाद ख़लीफ़ा, यानि प्रधान नेता, बनाया गया। अली और उनके बाद उनके वंशजों को इस्लाम का प्रमुख बनना चाहिए था, ऐसा विशवास रखने वाले शिया हैं। सुन्नी मुसलमान मानते हैं कि हज़रत अली सहित पहले चार खलीफ़ा (अबु बक़र, उमर, उस्मान तथा हज़रत अली) सतपथी (राशिदुन) थे जबकि शिया मुसलमानों का मानना है कि पहले तीन खलीफ़ा इस्लाम के गैर-वाजिब प्रधान थे और वे हज़रत अली से ही इमामों की गिनती आरंभ करते हैं और इस गिनती में ख़लीफ़ा शब्द का प्रयोग नहीं करते। सुन्नी मुस्लिम अली को (चौथा) ख़लीफ़ा भी मानते है और उनके पुत्र हुसैन को मरवाने वाले ख़लीफ़ा याजिद को कई जगहों पर पथभ्रष्ट मुस्लिम कहते हैं।

इस सम्प्रदाय के अनुयायियों का बहुमत मुख्य रूप से इरान,इराक़,बहरीन और अज़रबैजान मे रहते हैं। इसके अलावा सीरिया, कुवैत, तुर्की, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, ओमान, यमन तथा भारत में भी शिया आबादी एक प्रमुख अल्पसंख्यक के रूप में है। शिया इस्लाम के विश्वास के तीन उपखंड हैं - बारहवारी, इस्माइली और ज़ैदी। एक मशहूर हदीस मन्कुनतो मौला फ़ हाजा अली उन मौला, जो मुहम्मद साहब ने गदीर नामक जगह पर अपने आखरी हज पर खुत्बा दिया था, में स्पष्ट कह दिया था कि मुसलमान समुदाय को समुदाय अली के कहे का अनुसरण करना है।

शिया सुन्नी विवाद[संपादित करें]

सन् ६३२ में मुहम्म्द साहब ने अपने आखिरी हज में ख़ुम्म सरोवर के निकट अपने साथियों को संबोधित किया था। शिया विश्वास के अनुसार इस ख़िताब में उन्होंने अपने दामाद अली को अपना वारिस बनाया था। सुन्नी इस घटना को अली (अल्०) की प्रशंसा मात्र मानते है और विश्वास रखते हैं कि उन्होंने हज़रत अली को ख़लीफ़ा नियुक्त नहीं किया। इसी बात को लेकर दोनो पक्षों में मतभेद शुरु होता है।

हज के बाद मुहम्मद साहब (स्०) बीमार रहने लगे। उन्होंने सभी बड़े सहाबियों को बुला कर कहा कि मुझे कलम दावात दे दो कि मे तुमको एसा नविश्ता लिख दूँ कि तुम भटको नही तो उमर ने कहा कि ये हिजयान कह रहे हे और नहीं देने दिया (देखे बुखारी, मुस्लिम)। आपके हुक्म के खिलाफ़ ये लोग लडाई पर नहीं गये रस्ते मे रुके रहे। जब पैग़म्बर साहब की मृत्यु का समाचार मिला तो भी ये वापस न आकर सकिफा में सभा करने लगे कि अब क्या करना चाहिये। जिस समय हज़रत मुहम्मद (स्०) की मृत्यु हुई, अली और उनके कुछ और मित्र मुहम्मद साहब (स्०) को दफ़नाने में लगे थे, अबु बक़र मदीना में जाकर ख़िलाफ़त के लिए विमर्श कर रहे थे। मदीना के कई लोग (मुख्यत: बनी ओमैया,बनी असद इत्यादि कबीले) अबु बकर को खलीफा बनाने प‍र सहमत हो गये। ध्यान रहे कि मोहम्मद साहेब एवम अली के कबीले वाले यानि बनी हाशिम अली को ही खलीफा बनाना चाहते थे। पर इस्लाम के अब तक के सबसे बड़े साम्राज्य (उस समय तक संपूर्ण अरबी प्रायद्वीप में फैला) के वारिस के लिए मुसलमानों में एकजुटता नहीं रही। कई लोगों के अनुसार अली, जो मुहम्मद साहब के चचेरे भाई थे और दामाद भी (क्योंकि उन्होंने मुहम्मद साहब की संतान फ़ातिमा से शादी की थी ) ही मुहम्मद साहब के असली वारिस थे। परन्तु अबु बक़र पहले खलीफा बनाये गये और उनके मरने के बाद उमर को ख़लीफ़ा बनाया गया। इससे अली (अल्०) के समर्थक लोगों में और भी रोष फैला परन्तु अली मुसलमानों की भलाई के लिये चुप रहे।

उस्मान की ख़िलाफ़त[संपादित करें]

उमर के बाद तीसरे खलीफ़ा उस्मान बने। प‍रन्तु इनके समय मे असंतुष्ट लोगों ने मिस्र तथा इराक़ व अन्य स्थानो से आकर मदीना में आकर उस्मान के घर को घेर लिया ४० दिन तक उस्मान के घर को घेराव किया अन्त मे उस्मान को मार डाला।

खलीफा अली और परवर्ती विवाद[संपादित करें]

अब फिर से ख़लीफा का पद खाली था और इस्लामी साम्राज्य बड़ा हो रहा था। मुसलमानो को हज़रत अली के अलावा कोई न दिखा पर अली खलीफ़ा बनने को न माने। कइ दिन शुरा के लोग खलीफा के पद को न भर सके। अन्त मे अली को विवश किया गया तो आप ने कहा कि मेरे खिलाफत मे इलाही निजाम (ईश्वर शासन) चलेगा। उन्हें चौथा खलीफ़ा नियुक्त किया गया। अली अपने इन्साफ़ के लिये मशहूर हैं पर लोगो को ये न रास आया तो उन्होंने उस्मान के कातिलो को सजा दिलवाने के फौज़ इक्क्ठी की। अली ने कहा उस्मान के कतिलो को सजा जरुर मिलेगी, पर इन्का उद्येश्य कुछ और था तो जमल नामक जंग हुई। कुछ समय बाद सीरिया के सूबेदार मुआविया ने भी अली का विरोध किया। मुआविया तीसरे खलीफ़ा उस्मान का रिश्तेदार था। और उसी उस्मान के कतिलो के सजा के बहाने से सिफ्फीन में जंग की जिसमें मुआविया भी हार गया। सन् ६६१ में कुफ़ा में एक मस्जिद में उनको धोके से शहीद कर दिया गया। इसके बाद मुआविया ने अपने को इस्लाम का ख़लीफ़ा घोषित कर दिया।

इमाम हसन और इमाम हुसैन[संपादित करें]

इराक़ के नजफ़ में इमाम अली की मजार

हज़रत अली और सैद्धांतिक रूप से मुहम्मद साहब के रिश्तेदारों के समर्थकों ने उनके पुत्र हसन के प्रति निष्ठा दिखाई, लेकिन कुछ उनका साथ छोड़ गए। आप ने जंग न की बल्कि मवीया को सन्धि करनी पड़ी। असल मे अली के समय में सिफ्फीन की लड़ाई मे माविया ने मुँह की खाई, वो खलीफा बनना चाहता था प‍र न बन सका। वो सीरिया का गवर्नर पिछ्ले खलीफाओं के कारण बना था अब वो अपनी एक बड़ी सेना तैयार कर रहा था अब उसने वही सवाल इमाम हसन के सामने रखा: या तो युद्ध या फिर अधीनता। इमाम हसन ने अधीनता स्वीकार नहीं की परन्तु वो मुसलमानो का खून भी नहीं बहाना चाहते थे इस कारण वो युद्ध से दूर रहे। अब माविया भी किसी भी तरह सत्ता चाहता था तो इमाम हसन से सन्धि करने पर मजबूर हो गया। इमाम हसन ने अपनी शर्तो पर उसको सि‍र्फ सत्ता सौंपी। इन शर्तो मे से कुछ ये हैं: -

  • वो सिर्फ सत्ता के कामों तक सीमित रहेगा यानि धर्म में कोई हस्तक्षेप नही कर सकेगा।
  • वो अपने जीवन तक ही सत्ता मे रहेगा म‍रने से पहले किसी को उत्तराधिकारी न बना सकेगा।
  • उसके मरने के बाद इमाम हसन खलीफ़ा होगे। यदि इमाम हसन की मृत्यु हो जाये तो इमाम हुसैन को खलिफा माना जायगा।
  • वो सिर्फ इस्लाम के कानूनों का पालन करेगा।

इस प्रकार की शर्तो के द्वारा वो सिर्फ नाम मात्र का शासक रह गया। उसके वंश का शासन ७५० इस्वी तक रहा और उन्हें उमय्यद कहा गया।

शिया सम्प्रदाय के विभाग[संपादित करें]

शिया मुसलमानों की सभी तहरीक हजरत मुहम्मद साहब के बाद अली व उनकी ११ पुत्रों को सिलसिलेवार सन्तानों को इस्लाम का उत्तराधिकारी मानते हैं। इनमे सबसे पहले इमाम हसन अल्य्हिस्सलाम का नाम आता है, आप इमाम अली (इब्ने अबुतलिब) के ज्येष्ठ पुत्र थे और आप ने इमाम अली के बाद ४७ साल की आयु मे खिलाफत सम्भाली। आप केवल ६ माह तक ही खलीफा रहे जिसके पाश्चात आपने मविया से सन्धि के पश्चात राजनैतिक शासन से त्याग पत्र दे दिया मगर आप अपने अनुनाइयओ का मार्ग दर्शन इमाम के सम्मानित पद के अन्तर्गत करते रहे जो आपके पास इमाम अलि के पश्चात आया था। आपको मविया ने साजिश करके शहीद कर दिया। आपके वसीयत के अनुसार आपके पश्चात इमाम हुसैन ने आपके पश्चात इमाम के पद को सम्भला। आपसे ही कर्बला की महान कथा सम्बन्धित है। आपने जब मविया के दुराचारी पुत्र याजिद का समर्थन करने से जब स्पष्ट रुप से मना कर दिया तब आपको अपने परिवार एवम मित्रों सहित, जो कुल ७२ की सन्ख्या में थे, ३०,००० या अधिक की फौज द्वारा घेर कर शहीद कर दिया गया। आप पर और आपके परिवार पर पानी ३ दिन पहले से ही बन्द था। इसी की याद मे हर साल आपके अनुयायी मुहर्रम का विश्व प्रसिद्ध एवम् पवित्र त्योहार मनाते है। इस त्यहार मे धर्म सभायें एवम शोक सभाओं इत्यदि का अयोजन होता है!

शिया सम्प्रदाय के इमामो के नाम क्रमवार् निम्न लिखित है।-

  1. इमाम - हजरत अली इब्ने अबी तालिब
  2. इमाम - हजरत हसन इब्ने अली
  3. इमाम - हजरत हुसैन इब्ने अली
  4. इमाम - हजरत अली इब्ने हुसैन (अल जैनुल आबेदीन्, अल्- सज्जाद )
  5. इमाम - हजरत मोहम्मद इब्ने अली (अल्- बाकिर्)
  6. इमाम - हजरत जाफर इब्ने मोहम्मद (अल्-सादिक)
  7. इमाम - हजरत मूसा इब्ने जाफर (अल्-काजिम)
  8. इमाम - हजरत अली इब्ने मुसा (अल्-रजा, अल्-जामिन ओ सामिन्)
  9. इमाम - हजरत् मोहम्मद इब्ने अली (अल्-तकी )
  10. इमाम - हजरत अली इब्ने मोहम्मद (अल्-नकी)
  11. इमाम - हजरत हसन इब्ने अली (अल्-अस्करी)
  12. इमाम - हजरत मोहम्मद इब्ने हसन (अल्-महदी,अल्-कायम, इमाम ए वक्त्,अल्-हुज्जत्) (अन्तिम एवम जीवित इमाम )


  • बारहवारी-इस उपसम्प्रदाय के अनुयायी १२वे इमाम को जीवित एवम वर्तमान समय के इमाम मानते हैं ! इस विश्वास के अनुसार ये अल्लाह की आज्ञा से अन्तर्धयान है और एक निश्चित समय पर प्रकट् होगे, ऐसा विश्वास है!
  • ज़ैदी -
  • इस्माइली

शिया जनसंख्या का वितरण[संपादित करें]

शिया जनसंख्या का मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में वितरण
देश कुल मुस्लिम जनसंख्या शिया जनसंख्या शिया जनसंख्या का प्रतिशत संदर्भ
इरान 68,700,000 66,800,000 96.98
पाकिस्तान 165,800,800 33,200,000 20.02
ईराक 26,000,000 17,400,000 66.92
तुर्की 71,517,100 15,000,000 20.97 [1],[2]
भारत 1,09,000,000 11,000,000 10.09
अज़रबैजान 9,000,000 7,600,000 85.00
अफ़ग़ानिस्तान 31,000,000 5,900,000 19.03
सउदी अरब 27,000,000 4,000,000 14.81
लेबनान 3,900,000 1,700,000 43.59
कुवैत 2,400,000 730,000 30.42
बहरीन 700,000 520,000 74.29
सीरिया 20,178,485 3,228,557 16.0 [3]
सं.अ.अमी. 2,600,000 160,000 6.15
क़तर 890,000 140,000 15.73
ओमान 3,100,000 31,000 1.00
स्रोत: कई विद्वतापूर्ण संदर्भ और मध्य पूर्व और पश्चिम के सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के आँकड़ों के आधार पर


संदर्भ[संपादित करें]

यह भी देखें[संपादित करें]