मुहम्मद
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पैग़म्बर मुहम्मद का जन्म सन 570 इसवी में हुआ था। इन्होंने इस्लाम धर्म का प्रवर्तन किया । ये इस्लाम के सबसे महान नबी और आखिरी सन्देशवाहक (अरबी: नबी या रसूल , फ़ारसी : पैग़म्बर) माने जाते हैं जिनको ईश्वर (अल्लाह) ने फ़रिश्ते जिब्राएल द्वारा क़ुरान का सन्देश' दिया था । मुसलमान इनके लिये परम आदर भाव रखते हैं । ये इस्लाम के प्रथम सन्देशवाहक नहीं बल्कि अन्तिम सन्देशवाहक थे ।
[संपादित करें] ज्ञान की प्राप्ति
मुसलमान मानते हैं कि मक्का की पहाड़ियों में इन्हे परम ज्ञान सन् ६१० के आसपास प्राप्त हुआ । उन्हें जिब्राइल (इसाइयत में गैब्रियल, Gabriel) नाम के फ़रिश्ते से इस सच्चे ज्ञान का संदेश मिला था । इस बात का ज़िक्र पवित्र क़ुरान के 96वें सुरा (क़ुरान के अध्यायों को सुरा कहते हैं) की आरंभिक पाँच पंक्तियों में मिलता है । इस संदेश के अनुसार - ईश्वर (अल्लाह) एक है, जो क़यामत के दिन इस बात का निर्णय करेगा कि किसी व्यक्ति को स्वर्ग मिलेगा या नरक । इन्सान को बस उसी अल्लाह की इबादत (आराधना) करनी चाहिये । उन्होने झूठी प्रशंसा, ग़रीबों को हीन भावना से देखने, समाज के कमज़ोर तबको पर ज़ुल्म (ज़फ़ा) करने का विरोध किया और इबादत पर बल दिया ।
पर सन् 613 के ही आसपास ही मुहम्मद स्० ने अपने ज्ञान प्राप्ति के बारे में लोगों को बताया और ये उपदेश देना आरंभ किया कि अल्लाह की इबादत करनी चाहिए । इबादत की विधियाँ बहुत ही सरल थीं, जैसे कि दैनिक प्रार्थना (सलत) और नैतिक सिद्धांत जैसे खैरात बाँटना और चोरी नहीं करना । पैगम्बर मुहम्मद् स० के संदेशों का असर उन लोगों पर विशेष रूप से पड़ा जो अपने आपको धर्म से दूर पाते थे । मुहम्मद् स० ने स्वर्ग पाने की बात कह कर कई लोगों को सच्चाई के रास्ते पर चलने को कहा । उन्होंने ये कहा कि उन्हें आस्तिकों (उम्मा) के एक ऐसे समाज की स्थापना करनी है जो सामान्य धार्मिक विश्वासों के ज़रिये आपस में जुड़े हों । जो लोग उस मार्ग पर चलते थे उन्हें मुसलमान कहा जाता था । इस्लाम को शुरु में सफलता समाज के ग़रीब लोगों, कमज़ोर कबीलों और संपन्न लोगों के छोटे बेटों से ही मिली । पर उस समय अरब के लोग मूर्तिपूजक थे तथा अलग अलग कबीले के लोग भिन्न-भिन्न देवताओं की पूजा करते थे । इसलिए समाज के समृद्ध वर्ग ने उनके एकेश्वरवाद के सिद्धांत को नहीं माना । उनके सिद्धांतों ने समाज के समृद्ध लोगों के लिए एक सामाजिक हुकूमत का डर-सा खड़ा कर दिया । इससे मक्का में चल रही सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था पर खतरा पैदा हो गया और उनके खिलाफ विरोध होने लगे ।
[संपादित करें] हिजरा
अंत में सन् 622 में उन्हें अपने अनुयायियों के साथ मक्का से मदीना के लिए कूच करना पड़ा । इस यात्रा को हिजरा कहा जाता है और यहीं से इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत होती है । मदीना में उनका स्वागत हुआ और कई संभ्रांत लोगों द्वारा स्वीकार किया गया । मदीना के लोगों की ज़िंदगी आपसी लड़ाईयों से परेशान-सी थी और मुहम्मद स० के संदेशों ने उन्हें वहाँ बहुत लोकप्रिय बना दिया । उस समय मदीना में तीन महत्वपूर्ण यहूदी कबीले थे । आरंभ में मुहम्मद ने जेरुसलम को प्रार्थना की दिशा बनाने को कहा था ।
सन् 630 में मुहम्मद स्० ने अपने अनुयायियों के साथ मक्का पर चढ़ाई कर दी । इस युद्ध में उन्हें जीत हासिल हुई और इसके बाद मक्कावासियों ने इस्लाम कबूल कर लिया । मक्का में स्थित काबा को इस्लाम का पवित्र स्थल घोषित कर दिया गया । सन् 632 में मुहम्मद साहब का देहांत हो गया । पर उनकी मृत्यु तक लगभग सम्पूर्ण अरब इस्लाम के सूत्र में बंध चुका था ।
[संपादित करें] यह भी देखें
इस्लाम एक शांतिप्रिय धर्म है । आज मीडिया द्वारा जिस प्रकार आतंकवाद को सीधे इस्लाम से जोड़ा रहा है, वो ग़लत है । इस्लाम शान्ति का संदेश देता है । जिन गैर मुस्लिम भाइयों ने अल्लाह का संदेश पवित्र कुरान पढ़ा है वे जानते हैं इस्लाम में आतंकवाद की कोई भी जगह नही है । इस्लाम में किसी भी धर्म के व्यक्ति को मारने को मना किया गया है और हज़रत मुहम्मद साहब (स्०) ने अन्य धर्मों को बुरा कहने से भी मना किया है । आज जिस प्रकार हर आतंकवादी घटना को इस्लाम से जोड़ दिया जाता है, यह ग़लत है । इस्लाम में आत्मघाती हमलों, आतंकवादी हमलों इत्यादि को मना किया गया है । किसी भी धर्म में आतंकवाद की जगह नही है और आतंकवादी का कोई धर्म नही है । विश्व का इतिहास साक्षी है कि हर धर्म के लोगों ने कभी न कभी आतंकवाद का सहारा लिया है, तो फिर इस्लाम को ही आतंकवाद से क्यों जोड़ा जाता है ? आतंकवाद धर्म की नही अपितु समाज की देन है । यह समाज के असंतुष्ट लोग होते हैं और समाज में ही से होते हैं । जिस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने महान क्रन्तिकारी शहीद भगत सिंह को आतंकवादी कहा, क्योंकि उन्होंने अंग्रेजों तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए संसद में बम फोड़ा था, किंतु आज वे भारत के इतिहास में एक महान क्रन्तिकारी हैं । मीडिया आतंकवादी घटना को इस्लाम से जोड़ती है, किंतु वे इस्राइल द्वारा फलिस्तीन में जो हो रहा है उसे क्या कहेगी ? हिटलर ने कई हजार यहूदियो को जिन्दा जलवा दिया था, क्या वे आतंकवाद नही है ? इस्लाम एक सही समाज, एक सही शासन प्रणाली की अवधारणा देता है । वर्ष 1978 में एक ईसाई लेखक "Michael H. Hart" द्वारा लिखी गई पुस्तक "THE 100" में विश्व के आज तक के 100 सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तियों का विवरण है_जिसमे प्रथम स्थानं हज़रत मुहम्मद साहब को दिया गया है और ऐसे ही कितने और लेखको ने आपको महानतम् व्यक्तियो मे शामिल किया हे।
मोहम्मद अल्लाह के रसूल है,अल्लह "एक", और "इबादत के लायक" है। सिर्फ् अल्लह ही के आगे झुकना,उसी की इबादत इस्लाम का आधार्भूत सिद्धान्त है। अल्लाह हर किस्म की बुराइ और ऐब से पाक है। आदी से है और अन्त्त् तक रहेगा। इस्लाम के सिद्धान्तों मे आच्ररन कि पवित्रता पर बल इबादत से अधिक दिया गया है।लोगो के अधिकारो एवम खुद के कर्तव्यों के लिये जागरुक मानव अल्लाह को किसी भी इबादतगुजार से अधिक पसन्द है। यही इस्लाम का सार है,जैस कि सन्त कबीर ने कहा है:
" कर क मनका डार के मन का मनका फेर।"
परन्तु इस्लाम यहा खतम नही होता बल्कि इबाद्त के लिए भी कुछ तरीके सिखाता है, बिल्कुल अनोखे है।