उमर

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हज़रत उमर की तलवार

हजरत उमर इब्न अल-ख़त्ताब (अरबी में عمر بن الخطّاب), ई. 586–590 – 644) मुहम्मद साहब के प्रमुख चार साथियों में से थे। वह हज़रत अबु बक्र के बाद मुसलमानों के दूसरे खलीफा चुने गये। मुहम्मद साहब ने फारूक नाम की उपाधि दी थी। जिसका अर्थ सत्य और असत्य में फर्क करने वाला। मुहम्मद साहब के अनुयाईयों में इनका रुतबा हज़रत अबू बक्र के बाद आता है। उमर ख़ुलफा-ए-राशीदीन में दूसरे ख़लीफा चुने गए। उमर ख़ुलफा-ए-राशीदीन में सबसे सफल ख़लीफा साबित हुए। मुसलमान इनको फारूक-ए-आज़म तथा अमीरुल मुमिनीन भी कहते हैं। युरोपीय लेखकों ने इनके बारे में कई किताबें लिखी हैं तथा उमर महान (Umar The Great) की उपाधी दी है। प्रसिद्ध लेखक माइकल एच. हार्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक दि हन्ड्रेड The 100: A Ranking of the Most Influential Persons in History, (सौ दुनिया के सबसे प्रभावित करने वाले लोग) में हज़रत उमर को शामिल किया है।

प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

हज़रत उमर का जन्म मक्का में हुआ था। ये कुरैश ख़ानदान से थे। अज्ञानता के दिनों में ही लिखना पढ़ना सीख लिया था, जो कि उस ज़माने में अरब लोग लिखना पढ़ना बेकार का काम समझते थे। इनका क़द बहुत ऊंचा, रौबदार चेहरा और गठीला शरीर था। उमर मक्का के मशहूर पहलवानों में से एक थे, जिनका पूरे मक्का में बड़ा दबदबा था। उमर सालाना पहलवानी के मुकाबलों में हिस्सा लेते थे। आरम्भ में हज़रत उमर इस्लाम के कट्टर शत्रु थे। और मुहम्मद साहब को जान से मारना चाहते थे। उमर शुरू में बुत परस्ती करते थे।

इस्लाम क़बूल करना[संपादित करें]

उमर मक्का में एक समृद्घ परिवार से थे, बहुत बहादुर तथा दिलेर व्यकित थे। उमर मुसिलमों को पसन्द नहीं करते थे, ना ही मुहम्मद साहब के मिशन को। परन्तु पैगम्बर मुहम्म्द साहब एक शाम काबे के पास जाकर अल्लाह से दुआ किया कि अल्लाह उमर को या अम्र (अबू जहल) दोनों में से जो तुझको प्रिय हो हिदायत दे। यह दुआ उमर के हक़ में क़बूल हुई। उमर एक बार पैगम्बर के कत्ल के इरादे से निकले थे, रास्ते में एक शख़्स मिला जिसने उमर को बताया कि उनकी बहन तथा उनके पती इस्लाम ला चुके हैं। उमर गुस्से में आकर बहन के घर चल दिये। वोह दोनों घर पर कुरआन पढ़ रहे थे। उमर उनसे कुरआन मांगने लगे मगर उनहोंने मना कर दिया। उमर क्रोधित होकर उन दोनों को मारने लगे।

मगर उनकी बहन ने कहा हम मर जाएंगे लेकिन इस्लाम नहीं छोड़ेंगे। बहन के चेहरे से खून टपकता देखकर उमर को शर्म आयी तथा ग़लती का अहसास हुआ। कहा कि मैं कुरआन पढ़ना चाहता हूँ, इसको अपमानित नहीं करूंगा वायदा किया। जब उमर ने कुरआन पढ़ा दो बोले यक़ीनन ये ईश्वर की वाणी है किसी मनुष्य की रचना नहीं हो सकती। एक चमत्कार की तरह से उमर कुरआन के सत्य को ग्रहण कर लिया तथा मुहम्मद साहब से मिलने गये। मुहम्मद साहब को बहुत प्रसन्नता हुई जब उमर इस्लाम में दाखिल हो गये। मुसलमानों खुशी की लहर दौड़ गई उमर के इस्लाम लाने पर। उमर ने एलान किया कि अब सब मिलके नमाज़ काबे में पढ़ेंगे जो कि पहले कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। उमर इस्लाम के शत्रू थे परन्तु अब वह इस्लाम के सरंक्षक बन गये। उमर को इस्लाम में देखकर मुहम्मद साहब के शत्रूवों में कोहराम मच गया। अब इस्लाम को उमर नाम की एक तेज़ तलवार मिल गई थी जिससे सारा मक्का थर्राता था।

मदीने की हिजरत (प्रवास)[संपादित करें]

मक्का वालों ने कमज़ोर मुसलमानों पर सितम तेज़ कर दिये जिसको देखकर मुहम्मद साहब ने अल्लाह से दुआ की तो अल्लाह ने मदीने जाने का हुक्म दिया। सारे मुसलमान छुपकर मदीने की तरफ हिजरत यानि प्रवास करने लगे। मगर उमर बड़े दिलेर थे अपनी तलवार ली धनुष बाण लिया, काबा के पास पहुँच कर तवाफ किया, दो रकअत नामाज़ पढ़ी फिर कहा "जो अपनी माँ को अपने पर रुलाना चाहता है, अपने बच्चों को अनाथ तथा अपनी पत्नी को विधवा बनाना चाहता है इस जगह मिले।" किसी का साहस नहीं हुआ कि उमर को रोके। उमर ने एैलान करके हिजरत की।

मदीने की ज़िंदगी[संपादित करें]

मदीना इस्लाम का एक नया केन्द्र बन चुका था। सन हिजरी Islamic Calender का निर्माण किया जो इस्लाम का पंचांग कहलाता है। 624 ई0 में मुसलमानों को बद्र की जंग लड़ना पड़ा जिसमें हज़रत उमर ने भी अहम् किरदार निभाया। बद्र की जंग में मुसलमानों की फतह हुई तथा मक्का के मुशरिकों की हार हुई। बद्र की जंग के एक साल बाद मक्का वाले एकजुट हो कर मदीने पे हमला करने आ गए, जंग उहुद नामक पहाड़ी के पास हुई।

जंग के शुरू में मुस्लिम सेना भारी पड़ी लेकिन कुछ कारणों वश मुस्लिमों की हार हुई। कुछ लोगों ने अफवाह उड़ा दी कि मुहम्मद साहब शहीद कर दिये गये तो बहुत से मुस्लिम घबरा गए, उमर ने भी तलवार फेंक दी तथा कहने लगे अब जीना बेकार है। कुछ देरबार पता चला की ये एक अफवाह है तो दुबारा खड़े हुए। इसके बाद खन्दक की जंग में साथ-साथ रहे। उमर ने मुस्लिम सेना का नेत्रत्व किया अंत में मक्का भी फतह हो गया। इसके बाद भी कई जंगों का सामना करना पड़ा, उमर ने उन सभी जंगो में नेत्रतव किया।

मुहम्म्द साहब की वफात (मृत्यु)[संपादित करें]

8 जून, सन् 632 को मुहम्मद साहब दुनिया को अलविदा कह गये। उमर तथा कुछ लोग ये विश्वास ही ना रखते थे कि मुहम्मद साहब की मुत्यु भी हो सकती है। ये ख़बर सुनकर उमर अपने होश खो बैठे, अपनी तलवार निकाल ली तथा ज़ोर-ज़ोर से कहने लगे कि जिसने कहा कि नबी की मौत हो गई है मै उसका सर तन से जुदा कर दूंगा। इस नाज़ुक मौके़ पर तभी हज़रत अबु बक्र ने मुसलमानों को एक खु़तबा अर्थात भाषण दिया जो बहुत मशहूर है:

"जो भी कोई मुहम्म्द की इबादत करता था वो जान ले कि वह हमारे बीच नहीं रहे, तथा जो अल्लाह की इबादत करता है ये जान ले कि अल्लाह ज़िन्दा है कभी मरने वाला नहीं"

फिर क़ुरआन की आयत पढ़ कर सुनाई:

मुहम्मद नहीं है सिवाय एक रसूल के, उनसे पहले भी कई रसूल आये। अगर उनकी मुत्यु हो जाये या शहीद हो जाएं तो तुम एहड़ियों के बल पलट जाओगे?

हज़रत अबु बक्र से सुनकर तमाम लोग गश खाकर गिर गये, उमर भी अपने घुटनों के बल गिर गये तथा इस बहुत बड़ें दु:ख को स्वीकार कर लिया।

एक ख़लीफा के रूप में नियुक्ति[संपादित करें]

जब हज़रत अबु बक्र को लगा कि उनका वक़्त नज़दीक है तो उन्होंने अगले खलीफा के लिए हज़रत उमर को चुना। उमर उनकी असाधारण इच्छा शक्ति, बुद्धि, राजनीतिक चालबाज़ी, निष्पक्षता, न्याय और गरीबों और वंचितों लोगों के लिए देखभाल के लिए अच्छी तरह से जाने जाते थे। हज़रत अबु बक्र को पूरी तरह से उमर की शक्ति और उनको सफल होने की क्षमता के बारे में पता था। उमर का उत्तराधिकार इस प्रकार के रूप में दूसरों के किसी भी रूप में परेशानी नहीं था। हज़रत अबु बक्र ने अपनी मृत्यु के पहले ही हज़रत उसमान को अपनी वसीयत लिखवाई कि उमर उनके उत्तराधिकारी होंगे। अगस्त, सन् 634 ई0 में हज़रत अबु बक्र की मृत्यू हो गई। उमर अब ख़लीफा हो गये तथा एक नये दौर की शुरुवात हुई।