राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा

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राष्ट्रभाषा एक देश की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा होती है, जिसे सम्पूर्ण राष्ट्र में भाषा कार्यों में (जैसे लिखना, पढ़ना और वार्तालाप) के लिए प्रमुखता से प्रयोग में लाया जाता है। वह भाषा जिसमें राष्ट्र के काम किए जायें। राष्ट्र के काम-धाम या सरकारी कामकाज के लिये स्वीकृत भाषा।

राष्ट्रभाषा के मामले को, जो इस देश में बेहद उलझ गया है और उस पर लिखना या बात करना औसत दर्जे के प्रचारकों का काम समझा जाने लगा है। आज अपनी भाषा में लिखने पर भी लोग भाषा पर बात करना अवांछित समझते हैं। भाषा का प्रश्न मानवीय है, खासकर भारत में, जहाँ साम्राज्यवादी भाषा जनता को जनतंत्र से अलग कर रही है। हिन्दी और अंग्रेजी की स्पर्द्धा देशी भाषाओं और राष्ट्रभाषा के द्वंद्व में बदल गई है, मनों को जोड़ने वाला सूत्र तलवार करार दे दिया गया है, पराधीनता की भाषा स्वाधीनता का गर्व हो गई है। निश्चय ही इसके पीछे दास मन की सक्रियता है। कैसा अजब लगता है, जब कोई इसलिए आंदोलन करे कि हमें दासता दो, बेड़ियाँ पहनाओ !

भाषा के बारे में हमारा सोच और रवैया वही है जो जीवन के बारे में है। कोई भी मूल्य नष्ट होने से बचा है कि भाषा और स्वाभिमान बचे रहें ? मुझे लगता है कि अब राजनीति, नौकरशाही, पूँजीवाद या साम्राज्यवाद को कोसना बेकार है; जब तक जनता खुद ही अपना हित-अनहित न देखेगी, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। इसलिए कोई भी समस्या हो, वह सीधे जनता को निवेदित या संबोधित होनी चाहिए। लोगों को विभाजनकारी षड्यंत्रों के हवाले करके हम भाषा के भीतर कोई संवेदन, कोई हार्दिकता पैदा नहीं कर रहे हैं।

अहिन्दीभाषी अगर गलती से यह समझ रहे हों कि हिन्दी न रहेगी तो उनका भला होगा, तो उन्हीं से बात करनी होगी कि हिन्दी चली जाएगी तो अंग्रेजी आएगी, राजभाषा के रूप में अंग्रेजी का चरित्र देशी भाषा और जनता से नफरत करना सिखाता है। हिन्दी की कोई स्पर्द्धा देशी भाषाओं से नहीं है। वह उन्हें फूलते-फलते देखना चाहती है, उनसे आत्मालाप करना चाहती है।

राष्ट्रभाषा हिन्दी के बारे में कुछ कहने में झिझक होती है, क्योंकि सौभाग्य या दुर्भाग्य से हम हिन्दीभाषी हैं, जबकि यह होना हमने नहीं चुना है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का स्वप्न भी हिन्दीभाषियों का नहीं था। राष्ट्रभाषा के रूप में इसकी आवश्यकता सबसे पहले अहिन्दीभाषियों ने ही अनुभव की। हिन्दीभाषियों ने तो उनके स्वर में स्वर मिलाया, ताकि उन्हें नाकारा न मान लिया जाए। फिर भी विडंबना यह है कि उन्हीं पर हिन्दी थोपने या हिन्दी का साम्रज्यवाद स्थापित करने का आरोप लगाया जाता है। यह हिन्दी हम पर किसने थोपी है ? हमारी हिन्दी तो संतों-भक्तों की गोद में पली है, आज तक कभी वह सत्ता की मोहताज नहीं रही। माखनलाल चतुर्वेदी के शब्दों में तो वह सिंहासनों से तिरस्कृत रही है। हिन्दी को कभी संस्कृत, पाली, अरबी, फारसी या अंग्रेजी की तरह राज्याश्रय नहीं मिला। तमगा बनने की उसकी इच्छा रही ही नहीं, अलबत्ता वह देश की बाँसुरी, तलवार और ढाल जरूर बनी है। जब भी देश को एक सूत्र में पिरोने की जरूरत पड़ी, जब भी उसके विद्रोह को वाणी देने की आवश्यकता हुई, हिन्दी ने पहले की है। तभी राजा राममोहन राय के पहले समाचार-पत्र की वह भाषा बनी। गांधी की अखंड भारत की आवाज को उसने जन-जन तक पहुँचाया। अफ्रीका से लौटने पर जब गांधी जी ने पहला भाषण हिन्दी में दिया था और कुछ लोगों ने आपत्ति की थी तो उन्होंने कहा था कि मैं हिन्दी में नहीं, भारत की भाषा में बोल रहा हूँ। हिन्दी में ही सुभाषचंद्र बोस की ललकार दसों दिशाओं में गूँजी थी। संभवतः इन्हीं सेवाओं को याद करके स्वतंत्र भारत के संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा का सम्मान दिया गया। भारतीय जनता के संवाद और एकात्मता के लिए इस रूप में मात्र उसकी अनिवार्यता को रेखांकित किया गया था। क्या देश को आज एकात्मता और संवाद की जरूरत नहीं रह गई है ?


स्वाधीनता निश्चिंतता और पूर्णविराम नहीं, एक सतत तप है। जिस दिन इस तथ्य को कोई देश भूल जाता है, वही उसके विघटन का पहला दिन होता है। ठीक उसी वक्त देश अपनी पहचान खोने लगता है और अपने अस्तित्व से इंकार करने लगता है। आज हम विघटन के उसी चरम दौर से गुजर रहे हैं। राष्ट्रभाषा को खारिज करने के बहाने, अनजाने ही हम समस्त देशी भाषाओं को निरस्त करते चले जा रहे हैं। यह किसी भयावह संकट की पूर्व सूचना है।

पिछले दिनों अर्थात् उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में, भारत में तीन दुर्घटनाएँ एक साथ तेजी से घटित हुईं-उग्र प्रांतीयतावाद, सांप्रदायिक उन्माद और अंग्रेजी की पूर्ण प्रतिष्ठा। ये बातें अकारण एक साथ पैदा नहीं हुईं-इनका एक-दूसरे से नाभि नाल संबंध है-ये सभी राष्ट्र की अस्मिता को खंडित करने और उसे फिर से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष पराधीनता के अंधे कुएँ में धकेलने वाली घटनाएँ हैं। इन तीनों मामलों में विदेशी शक्तियों के साथ विघटनकारी शक्तियों की दिलचस्पी अकारण नहीं है।

सबसे पहले आपसे अपनी भाषा छीनी जा रही है, ताकि आप किसी भी मामले में परस्पर आत्मीय संवाद कायम न कर सकें, जैसे आक्रामण सेनाएँ पुलों को उड़ा देती हैं। गूँगा और संवादहीन देश आपस में सिर्फ अपना माथा ही फोड़ सकता है। आपको अपनी भाषा के बदले जो परदेशी भाषा दी गई है वह जोड़ने वाली नहीं है, क्योंकि वह भारत की जनता को परस्पर जोड़ने के लिए लाई भी नहीं गई थी। गुलामों को अधिक गुलाम बनाने का इससे नायाब तरीका अंग्रेजों के पास दूसरा न था।

इस सत्य को न समझते हुए आज भी कुछ लोग तर्क देते हैं कि अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए कुछ लोगों ने ही स्वाधीनता और सामाजिक सुधारों के लिए संघर्ष किया था। यानी अंग्रेजी शिक्षा ने ही उनमें स्वाधीनता की आकांक्षा पैदा की थी; उन्हें स्वाधीनता के लिए एकजुट किया था। यह सुनकर लगता है कि ये लोग इतिहास की क्रूरता को चुनौती देने वाले इतिहास से अपरिचित हैं। विकल्पहीन अवस्था में हमेशा विद्रोही शक्तियाँ प्राप्त साधनों को ही हथियार बना लेती हैं, जैसे आसन्न उपस्थित शत्रु से निपटने के लिए पत्थर, डंडा या नाखून तक बंदूक बन जाते हैं। जापानियों, चीनियों यहूदियों यहाँ तक कि खुद अंग्रेजों ने भी अपने-अपने पराधीन काल में विजेताओं की भाषाएँ शस्त्रों की तरह इस्तेमाल की थीं, जिन्हें स्वाधीनता के बाद सबने फेंक दिया। आज भी अफ्रीकी नीग्रो, गोरों के विरुद्ध अंग्रेजी में ही साहित्य लिख रहे हैं, परंतु इसकी तीव्र वेदना उनके साहित्य में झलकती है। इसीलिए वे अपनी बोलियों के जरिए स्वयं अपनी भाषा गढ़ने में व्यस्त हैं। इस दृष्टि से किसी अनिवार्य ऐतिहासिक तदर्थता को प्रमाण के रूप में लेना चीजों का सरलीकरण करना और सच्चाई को भुलाना है।

स्वाधीनता के बाद से हमारे देश में, हिन्दी के बारे में कुतर्कों के ऐसे जाल लगातार फैलाए जाते रहे हैं। उन्हीं का परिणाम है कि हिन्दी आज तक अपना अनिवार्य ऐतिहासिक स्थान नहीं पा सकी है। मेरी जानकारी में किसी महत्त्वपूर्ण स्वाधीन राष्ट्र में उसकी राष्ट्रभाषा इतने समय तक अपदस्थ नहीं रही। यहाँ तो स्थिति यह है कि यह सिलसिला लगातार तेज होता जा रहा है।

यह स्थिति क्यों पैदा हुई, इसके क्या कारण रहे हैं, इस पर हम अगले पृष्ठों में विचार करेंगे, परंतु आज तो देश के आम पढ़े लिखे लोगों की मानसिकता को इतना प्रदूषित किया जा चुका है कि कभी-कभी लगता है कि राष्ट्रभाषा के बारे में बात करना और सांप्रदायिक दंगे कराना एक ही बात है। ऐसी क्रूर और गुलाम मानसिकता पैदाकरने वाले लोग ही आज बड़ी हसरत से अंग्रेज और अंग्रेजी राज को याद करते हैं-इससे क्या यह साबित नहीं होता कि भारत में अंग्रेजों और अंग्रेजी राज की भूमिका को अलग करना सरासर नासमझी दिखाना है।

कथित उदारता दिखाते हुए, स्वाधीनता के प्रारंभिक नाजुक और भावनापूर्ण काल में हम भयानक चूक कर बैठे थे। तब क्या पता था (जबकि होना चाहिए था) कि हिन्दी के साथ 15 वर्षो तक अंग्रेजी जारी करने का निर्णय हिन्दी को अपदस्थ करने की भूमिका साबित होगा। इस अंतराल में अंग्रेजों के उच्छिष्ट नौकरशाहों, स्वार्थी राजनीतिज्ञों, विदेशी शक्तियों, मतलबी पूँजीपतियों वगैरह ने अपनी रणनीति तैयार कर ली थी और भारतीय भाषाओं तथा प्रांतवाद को आगे करके राष्ट्रभाषा पर चौतरफा आक्रमण कर दिया था। इतिहास में भी हम देख चुके हैं कि मामूली छूट के सहारे ही ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपना जाल फैलाया था और बाद में समस्त देशी राज्यों को एक-एक कर हड़पते हुए संपूर्ण संप्रभुता हासिल कर ली थी। वही चरित्र तो अंग्रेजी का है-एक राजभाषा के रूप में।

इतिहास और संस्कृति के मर्मज्ञ डॉ॰ राममनोहर लोहिया ने बहुत सही आंदोलन चलाया था-अंग्रेजी हटाओ। इस बारे में उन्होंने उस बुजुर्गी सलाह को नजर अंदाज कर दिया था कि हिन्दी को समर्थ बनाइए, नाहक अंग्रेजी का विरोध क्यों करते हैं ?’ लोहिया जानते थे कि इस दिखावटी अहिंसक सलाह के निहितार्थ क्या हैं ? वास्तव में किसी भी विदेशी भाषा को राष्ट्रभाषा का विकल्प बनाए रखना पराधीनता को स्वाधीनता का विकल्प बनाए रखने की तरह है। वे यह भी जानते थे कि अंग्रेजी की उपस्थिति में कोई भी देशी भाषा पनप नहीं सकती, क्योंकि अपने ऐतिहासिक चरित्र के अनुरूप वह एक से दूसरी को पिटवाने का काम करती रहेगी।

(२). वह भाषा जिसे राष्ट्र के समग्र नागरिक अन्य भाषा-भाषी होते हुए भी जानते समझते हों और उसका व्यवहार करते हों। राष्ट्र द्वारा मान्यताप्राप्त भाषा।


भारत की सभी भाषाएँ राष्ट्रभाषा है। खड़ी बोली संज्ञा स्त्री० [हिं० खड़ी (या खरी?) + बोली (भाषा)] वर्तमान हिंदी का एक रूप जिसमें संस्कृत के शब्दों की बहुलता करके वर्तमान हिंदी भाषा की और फारसी तथा अरबी के शब्दों की अधिकता करके वर्तमान उर्दू भाषा की सृष्टि की गई है। वह बोली जिसपर ब्रज या अवधी आदि की छाप न हो। ठेंठ हिंदीं। आज की राष्ट्रभाषा हिंदी का पूर्व रूप। इसका इतिहास शताब्दियों से चला आ रहा है। परिनिष्ठित पश्चिमी हिंदी का एक रूप। वि० दे० 'हिंदी'। विशेष—जिस समय मुसलमान इस देश में आकर बस गए, उस समय उनेहें यहाँ की कोई एक भाषा ग्रहण करने की आव— श्यकता हुई। वे प्राय? दिल्ली और उसके पूरबी प्रांतों में ही अधिकता से बसे थे और ब्रजभाष तथा अवधी भाषाएँ, क्लिष्ट होने के कारण अपना नहीं सकते थे, इसलिये उन्होंने मेरठ और उसके आसपास की बोली ग्रहण की और उसका नाम खड़ी (खरी?) बोली रखा। इसी खड़ी बोली में वे धीरे धीरे फारसी और अरबी शब्द मिलाते गए जिससे अंत में वर्तमान उर्दू भाषा की सृष्टि हुई। विक्रमी १४वीं शताब्दी मे पहले पहल अमीर खुसरो ने इस प्रांतीय बोली का प्रयोग करना आरंभ किया और उसमें बहुत कुछ कविता की, जो सरल तता सरस होने के कारण शीघ्र ही प्रचलित हो गई। बहुत दिनों तक मुसलमान ही इस बोली का बोलचाल और साहित्य में व्यवहार करते रहे, पर पीछे हिंदुओं में भी इसका प्रचार होने लगा। १५वीं और १६ वीं शताब्दी में कोई कोई हिंदी के कवि भी अपनी कविता में कहीं कहीं इसका प्रयोग करने लगे थे, पर उनकी संख्या प्राय? नहीं के समान थी। अधिकांश कविता बराबर अवधी और व्रजभाषा में ही होती रही। १८वीं शताव्धी में हिंदू भी साहित्य में इसका व्यवहार करने लगे, पर पद्य में नहीं, केवल गद्य में; और तभी से मानों वर्तमान हिंदी गद्य का जन्म हुआ, जिसके आचार्य मु० सदासुख, लल्लू जी लाल और सदल मिश्र माने जाते हैं। जिस प्रकार मुसलमानों ने इसमें फारसी तथा अरबी आदि के शब्द भरकर वर्तमान उर्दू भाषा बनाई, उसी प्रकार हिंदुओं ने भी उसमें संस्कुत के शब्दों की अधिकता करके वर्तमान हिंदी प्रस्तुत की। इधर थोड़े दिनों से कुछ लोग संस्कृतप्रचुर वर्तमान हिंदी में भी कविता करने लग गए हैं और कविता के काम के लिये उसी को खड़ी बोली कहतो हैं।


भारत के संविधान भाग 17 के अध्याय 4 के अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास के लिए दिया गया विशेष निर्देश इस प्रकार है :- "संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों के का माध्यम बन सकें तथा उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी के और आठवी अनुसूची में विनिर्दिष्‍ट भारत की अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयुक्‍त रूप, शैली और पदो को आत्मसात् करते हुए तथा जहाँ आवश्यक या वाँछनीय हो वहाँ उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यत: संस्कृत से तथा गौणत: अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी करे।

संविधान की इसी भावना के अनुपालन की दिशा में 1 मार्च, 1960 को शिक्षा मंत्रालय (अब उच्‍चतर शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय) के अधीन केंद्रीय हिंदी निदेशालय की स्थापना हुई। इसके चार क्षेत्रीय कार्यालय हैं जो चेन्‍नै, हैदराबाद, गुवाहाटी और कोलकाता में स्थित हैं। हिंदी को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने, हिंदी भाषा के माध्यम से जन-जन को जोड़ने और हिंदी को वैश्‍विक धरातल पर करने के लिए निरंतर प्रयास रत हिंदी की यह शीर्षस्थ सरकारी संस्था निम्‍नलिखित महत्वपूर्ण योजनाओं को कार्यान्वित कर रही है -


निदेशालय का मुख्यालय नई दिल्ली में है। इसके चार क्षेत्रीय कार्यालय हैं, जिनके पते इस प्रकार है -


1. उपनिदेशक (दक्षिण) केंद्रीय हिंदी निदेशालय (मानव संसाधन विकास मंत्रालय) शास्त्री भवन, प्रथम तल, खंड – 5, 26, हेडोज रोड, चेन्‍नै – 600006, (तमिलनाडु) 2. उपनिदेशक केंद्रीय हिंदी निदेशालय (मानव संसाधन विकास मंत्रालय) केंद्रीय सदन, ब्लॉक – ए, सुल्तान बाजार, हैदराबाद – 500009 (आंध्र प्रदेश)


3. उपनिदेशक (उत्‍तर-पूर्व) केंद्रीय हिंदी निदेशालय (मानव संसाधन विकास मंत्रालय)

दास एंटरप्राइज, जय नगर, 

पो. खानापारा, गुवाहाटी – 781019 (असम) 4. उपनिदेशक (पूर्व) केंद्रीय हिंदी निदेशालय (मानव संसाधन विकास मंत्रालय) 1–कौंसिल हाउस स्ट्रीट, प्रथम तल, कोलकाता – 700001 (प. बंगाल)

:
     केंद्रीय हिंदी निदेशालय में पत्राचार पाठ्यक्रम विभाग की स्थापना भारत के हिंदीतर-भाषी राज्यों के लोगों, विदेशों में बसे भारतीयों तथा हिंदी सीखने के इच्छुक विदेशियों को पत्राचार  हिंदी सिखाने के  से सन् 1968 में की गई थी। 


उपलब्ध पाठ्यक्रम :
     केंद्रीय हिंदी निदेशालय के पत्राचार पाठ्यक्रम विभाग ने सन् 1968 में एक प्रारंभिक पाठ्यक्रम 'प्रवेश' केवल 1008 छात्रों के नामांकन से आरंभ किया था। यह योजना बहुत लोकप्रिय हुई और छात्रों की माँग पर सन् 1973 से 'प्रवेश' से उच्‍च स्तर का एक पाठ्यक्रम 'परिचय' आरंभ किया गया। इन भाषा-शिक्षण पाठ्यक्रमों के अतिरिक्‍त केंद्र सरकार के कर्मचारी, सार्वजनिक उपक्रमों तथा स्‍वायत्‍त संस्थाओं आदि में कार्यरत कर्मचारियों को भी पत्राचार  हिंदी सिखाने के  से कार्यालयी हिंदी से संबंधित तीन अन्य पाठ्यक्रम 'प्रबोध, प्रवीण तथा प्राज्ञ' क्रमश: सन् 1969, 1970 तथा 1972 में आरंभ किए गए। दो-दो वर्षों की अवधि के 'प्रवेश' और 'परिचय' पाठ्यक्रमों के स्थान पर अब एक-एक वर्ष के क्रमश: 'सर्टिफिकेट' और 'डिप्लोमा' पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं। 
     देश के उत्‍तर-पूर्वी राज्यों के वे परीक्षार्थी जो स्‍नातक परीक्षा उत्‍तीर्ण कर चुके हैं और जो सिविल सेवा परीक्षा में अनिवार्य भारतीय भाषा प्रश्‍नपत्र के रूप में हिंदी भाषा लेना चाहते हैं तथा जिनकी मातृभाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित नहीं है, उन्हें हिंदी सिखाने के लिए एक अन्य पाठ्यक्रम "सिविल सेवा हिंदी पाठ्यक्रम" आरंभ किया गया। वर्ष 2003-04 से सर्टिफिकेट, डिप्लोमा पाठ्यक्रम के अतिरिक्‍त दो और नए पाठ्यक्रम : एडवांस हिंदी डिप्लोमा और बेसिक हिंदी पाठ्यक्रम आरंभ किए गए। एडवांस हिंदी डिप्लोमा पाठ्यक्रम  को हिंदी भाषा एवं साहित्य की समुचित जानकारी उपलब्ध कराता है तथा बेसिक हिंदी पाठ्यक्रम अनिवासी भारतीयों को तथा भारत में रहने वाले विदेशियों को अल्पावधि में हिंदी सिखाने के  से प्रारंभ किया गया है। 
     निदेशालय के पाठ्यक्रमों में छात्रों की संख्या कई गुणा बढ़ गई है। पत्राचार पाठ्यक्रम योजना के तहत संचालित पाठ्यक्रमों में प्रतिवर्ष लगभग 10,000 छात्रों को दाखिला दिया जाता है। इन पाठ्यक्रमों से अब तक लाभान्वित छात्रों की संख्या 4.18 लाख से भी अधिक है। 


माध्यम :
     हिंदी सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम और हिंदी डिप्लोमा पाठ्यक्रम अंग्रेजी, तमिल, मलयालम तथा बंगला माध्यम से चलाए जाते हैं। प्रबोध, प्रवीण, प्राज्ञ, बेसिक कोर्स इन हिंदी तथा सिविल सेवा हिंदी पाठ्यक्रम केवल अंग्रेजी माध्यम के हैं। एडवांस हिंदी डिप्लोमा पाठ्यक्रम हिंदी माध्यम से संचालित किया जाता है। 
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सत्र :

क हिंदी सर्टिफिकेट, हिंदी डिप्लोमा, एडवांस हिंदी डिप्लोमा पाठ्यक्रम एक-एक वर्ष की अवधि के हैं और सत्र प्रतिवर्ष जुलाई से आरंभ होता है । ख प्रबोध, प्रवीण और प्राज्ञ पाठ्यक्रमों का शिक्षा-सत्र एक-एक वर्ष का है जो प्रतिवर्ष जनवरी से आरंभ होता हैं। ग सिविल सेवा हिंदी पाठ्यक्रम भी एक वर्ष की अवधि का है जो प्रतिवर्ष दिसंबर से आरंभ होता है । घ बेसिक हिंदी पाठ्यक्रम की अवधि 60 घंटे है। कक्षाएँ सप्‍ताह में तीन दिन सायं 6.00 से 8.00 बजे तक निदेशालय परिसर में चलाई जाती हैं।



दाखिले के लिए पात्रता :

क हिंदी सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम

1 भारत या विदेशों में रहने वाले ऐसे भारतीय तथा विदेशी, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है और जिनकी उम्र 15 वर्ष से अधिक है । 2 विदेश में रहने वाले ऐसे भारतीय नागरिकों के बच्चे जिनकी उम्र कम से कम 10 वर्ष है। मातृभाषा का कोई बंधन नहीं है । ख हिंदी डिप्लोमा पाठ्यक्रम

उपर्युक्‍त हिंदी सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम में उल्लिखित पात्रता के अतिरिक्‍त छात्र ने केंद्रीय हिंदी निदेशालय की हिंदी सर्टिफिकेट परीक्षा या गृह मंत्रालय की प्रवीण परीक्षा उत्‍तीर्ण की हो या उसे अपेक्षित भाषा-कौशलों का ज्ञान हो। ग प्रबोध, प्रवीण तथा प्राज्ञ पाठ्यक्रम

   ये पाठ्यक्रम केवल केंद्र सरकार के कर्मचारी, सार्वजनिक उपक्रमों तथा स्वायत्‍त निकायों आदि के कर्मचारियों के लिए है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय इन पाठ्यक्रमों के लिए केवल शिक्षण अभिकरण के रूप में कार्य करता है। इन पाठ्यक्रमों के लिए परीक्षा राजभाषा विभाग (गृह मंत्रालय)  ली जाती है। 

घ सिविल सेवा हिंदी पाठ्यक्रम

1 यह पाठ्यक्रम उत्‍तर-पूर्वी राज्यों के स्‍नातक या स्‍नातक पाठ्यक्रम के अंतिम वर्ष में पढ़ रहे उन छात्रों के लिए है जिनकी मातृभाषा भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में सम्मिलित नहीं है तथा जो सिविल सेवा परीक्षा में “अनिवार्य भारतीय भाषा प्रश्‍नपत्र” के रूप में हिंदी भाषा लेना चाहते हैं। 2 छात्र अनिवार्य रूप से निम्‍नलिखित राज्यों में से किसी राज्य का निवासी हो - अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड तथा सिक्किम ।

ङ एड्वांस हिंदी डिप्लोमा पाठ्यक्रम

1 यह पाठ्यक्रम भारत और विदेशों में रहने वाले ऐसे भारतीयों तथा विदेशियों के लिए है जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है और जिनकी उम्र 17 वर्ष से अधिक है । 2 छात्र ने केंद्रीय हिंदी निदेशालय की हिंदी डिप्लोमा परीक्षा अथवा हाईस्कूल हिंदी विषय के साथ उत्‍तीर्ण की हो।

च बेसिक हिंदी पाठ्यक्रम

वैध वीज़ा प्राप्‍त कर भारत में रहने वाले विदेशी तथा अनिवासी भारतीय इस पाठ्यक्रम में दाखिला ले सकते हैं।


शुल्क :
        पाठ्यक्रम       भारतीय छात्रों के लिए   विदेशी छात्रों के लिए

क हिंदी सर्टिफिकेट तथा हिंदी डिप्लोमा पाठ्यक्रम रु. 50.00 प्रति छात्र प्रति सत्र US $ 50.00 अथवा £ 30.00 प्रति छात्र प्रति सत्र अथवा विदेशी विनिमय प्रतिबंध की स्थिति में US $ के बराबर स्थानीय मुद्रा की राशि

एडवांस हिंदी डिप्लोमा पाठ्यक्रम रु. 200.00 प्रति छात्र प्रति सत्र US $ 200.00 अथवा £ 120.00 प्रति छात्र प्रति सत्र अथवा विदेशी विनिमय प्रतिबंध की स्थिति में US $ के बराबर स्थानीय मुद्रा की राशि ग सिविल सेवा हिंदी पाठ्यक्रम नि:शुल्क


घ प्रबोध, प्रवीण और प्राज्ञ 1 दाखिले के समय रुपए 50.00 प्रति छात्र प्रति सत्र 2 परीक्षा फार्म के साथ शुल्क

प्रबोध रुपए 40.00

प्रवीण रुपए 40.00

प्रज्ञा रुपए 50.00 - ङ बेसिक हिंदी पाठ्यक्रम अनिवासी भारतीयों तथा विदेशियों के लिए

रुपए 6000.00 प्रति छात्र प्रति सत्र


भुगतान की :
     शुल्क का भुगतान निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, रामकृष्ण पुरम, नई दिल्ली-110066 के पक्ष में रेखांकित इंडियन पोस्टल आर्डर या बैंक ड्राफ्ट  करें जिनका भुगतान नई दिल्ली स्थित डाकघर/ बैंक में देय हो। बेसिक हिंदी पाठ्यक्रम के अलावा अन्य पाठ्यक्रमों के विदेशी छात्र अपना शुल्क ब्रिटिश पोस्टल आर्डर से भेज सकते हैं। जिन देशों में डॉलर या पौंड की मुद्रा का चलन नहीं है या जहाँ पर स्थानीय रूप से विदेशी विनिमय का प्रतिबंध है वहाँ छात्र शुल्क के बराबर की राशि स्थानीय मुद्रा में उस देश में स्थित भारतीय मिशन/ दूतावास में जमा करा सकते हैं। ऐसी स्थिति में आवेदन फार्म के साथ मूल रसीद इस निदेशालय को रजिस्टर्ड डाक  भेजी जानी अनिवार्य है । 


शिक्षण :
     सभी पाठ्यक्रमों की शिक्षण सामग्री, जिसमें पाठ और उत्‍तर-पत्र होते हैं, पूर्व निर्धारित अनुसूची के अनुसार भेजी जाती है। छात्रों को सलाह दी जाती है कि वे जल्दी से जल्दी उत्‍तर-पत्र भरकर मूल्यांकन के लिए भेज दें। उत्‍तर-पत्र मूल्यांकन के बाद आवश्यक व्याकरणिक निर्देशों के साथ उन्हें लौटा दिए जाते हैं। सर्टिफिकेट, डिप्लोमा एवं एड्वांस डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के उत्‍तर-पत्र जमा करने की अंतिम तिथि प्रतिवर्ष 31 मई तथा प्रबोध, प्रवीण एवं प्राज्ञ पाठ्यक्रमों के उत्‍तर-पत्रों के लिए अंतिम तिथि 15 नवंबर है। 



संपर्क कार्यक्रम :
     कक्षा-शिक्षण की कमी को पूरा करने तथा छात्रों से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करने के लिए छात्रों के संकेंद्रण के आधार पर विभिन्‍न स्थानों पर लगभग पाँच से आठ दिन की अवधि के संपर्क कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों में कक्षा व्याख्यान की व्यवस्था की जाती है और छात्रों को दृश्य-श्रव्य सामग्री की सहायता से संभाषण, उच्‍चारण और वार्तालाप का प्रशिक्षण दिया जाता है। 



मूल्यांकन/ परीक्षा :
     प्रत्येक पाठ्यक्रम की  पर देश तथा विदेश में विभिन्‍न केंद्रों पर परीक्षाएँ आयोजित की जाती हैं। छात्रों को उनके उत्‍तर-पत्रों में किए गए प्रयासों के आधार पर आंतरिक मूल्यांकन के अंक दिए जाते हैं और उन अंकों को छात्र  दी गई वार्षिक परीक्षा में प्राप्‍त अंकों में सम्मिलित किया जाता है। 

सिविल सेवा हिंदी पाठ्यक्रम एवं बेसिक हिंदी पाठ्यक्रम के छात्रों की कोई परीक्षा नहीं ली जाती। TOP


पुरस्कार प्रोत्साहन आदि :
     परीक्षा परिणाम के आधार पर सर्टिफिकेट, डिप्लोमा तथा एड्वांस हिंदी डिप्लोमा पाठ्यक्रम के प्रतिभाशाली छात्रों को नकद एवं पुस्तक पुरस्कार दिए जाते हैं। प्रबोध, प्रवीण तथा प्राज्ञ के छात्र भी अपने संबंधित विभाग/ मंत्रालय से प्रोत्साहन स्वरूप वेतन- एवं नकद राशि पाने के पात्र हैं। इसके अतिरिक्‍त सभी छात्रों को पाठ्यक्रम की अवधि में नि:शुल्क मुद्रित प्रतिपूरक अध्ययन सामग्री भी भेजी जाती है। 

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