युद्ध कलाएँ

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चीन में लोग आज भी युद्ध कलाओं का अभ्यास करते हैं

युद्ध कलाएँयुद्ध की कूट एवं पारम्परिक पद्धतियाँ हैं जिन्हे विविध कारणों से व्यवहार में लाया जाता रहा है। इन्हें आत्मरक्षा, प्रतिस्पर्धा, शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास आदि के लिये व्यवहार में लाया जाता है। विश्व में विभिन्न प्रकार की युद्ध कलाएँ हैं जैसे भारत में युद्धकला चीन में कुंग फू और जापान में कराते।

जूडो की जड़ केरल में[संपादित करें]

कलारीपयत्तु केरल की युद्धकला के रूप में प्रसिद्ध है। लेकिन इसका प्रभाव और इसके कुछ तत्वों को राज्य की अनेक नृत्य और नाट्य शैलियों में, जिनमें केरल की शास्त्रीय नाट्य शैली कथकली भी शामिल है, देखा जा सकता है। जिन नृत्य शैलियों में कलारीपयत्तु के तत्व देखे जाते हैं, वे हैं कोलॅकली, वेलॅकली तथा यात्राकली। यह बड़ी रोचक बात है कि एक बौद्ध भिक्षु बोधिधर्मा इस कलारीपयत्तु कला को पाँचवीं शताब्दी में चीन ले गया। इस कला को सिखाने के लिए उसने शावोलिन मन्दिर चुना। कालक्रम में कलारीपयत्तु ने जूडो, कराटे तथा कुंग-फु जैसी युद्धकलाओं को जन्म दिया। चीन के लोग इसे ज्यादा सीखते हैं और आत्मरक्षा के लिए इस विधा को अपनाते हैं. लेकिन इससे यह तो साबित नहीं होता है कि कुंगफू चीन की ही खोज हो.

संत बोधिधर्मा को कुंग फू का पिता कहा जाता है. चीन के शाओलिन में उनके नाम पर कई मंदिर बने हैं. तो कयास ये लगाए जाते रहे हैं कि 6वीं सदी के समय संत बोधिधर्मा चीन गए. उस समय चीन का कोई अस्तित्व नहीं था, संत तो हिंदकुश के हिमालय पर्वत के उस पार रह रहें लोगों को बौद्ध धर्म का ज्ञान देने गए थे.

लेकिन वह वहीं बस गए और साथ में अपने नायाब अविष्कार कुंग फू को वहां के लोगों में बांटा. जिससे कुंग फू उस खास इलाके में पूरी तरह से फला-फूला. इन्हीं सब बातों पर टाइगर ने कहा कि 'कुंग फू का अविष्कार भारत में हुआ है.

कुंग फू मार्शल आर्ट की सबसे पुरानी विधा है जिसमें बिना किसी हथियार के लड़ाई लड़नी होती है. यूं कहें तो यह बिना लड़े लड़ने की कला है. इस बात को लेकर दूविधा है कि कुंग फू भारतीय बौद्ध संत बोधिधर्मा की शिक्षाओं पर आधारित है जो कि छठीं सदी में चीन में चले गए थे या नहीं.

लेकिन यह बात निश्चित है कि बोधिधर्मा जहां भी गए अपने साथ मार्शल ऑर्ट का एक नायाब रूप अपने साथ लेकर गए. जैसा कि केरल का कलिरीपयट्टू आप अभी देख सकते हैं. बोधिधर्मा शॉओलिन में बने नए मंदिर में रह गए और अन्य बौद्ध संतों के साथ अपनी पूरी जिंदगी इसी कला को सौंप दी.

समय के साथ-साथ कुंग फू चाइना के साथ पूरे विश्व में फैला और आज इसे सबसे खतरनाक फाइटिंग स्किल माना जाता है.

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