भारत में कृषि

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कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। भारत में कृषि सिंधु घाटी सभ्यता के दौर से की जाती रही है। १९६० के बाद कृषि के क्षेत्र में हरित क्रांति के साथ नया दौर आया। सन् २००७ में भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि एवं सम्बन्धित कार्यों (जैसे वानिकी) का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में हिस्सा 16.6% था। उस समय सम्पूर्ण कार्य करने वालों का 52% कृषि में लगा हुआ था।

इतिहास[संपादित करें]

भारत में कृषि में 1960 के दशक के मध्य तक पारंपरिक बीजों का प्रयोग किया जाता था जिनकी उपज अपेक्षाकृत कम थी। उन्हें सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती थी। किसान उर्वरकों के रूप में गाय के गोबर आदि का प्रयोग करते थे। १९६० के बाद उच्च उपज बीज ( HYB) का प्रयोग शुरु हुआ। इससे सिंचाई और रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ गया। इस कृषि में सिंचाई की अधिक आवश्यकता पड़ने लगी। इसके साथ ही गेहूँ और चावल के उत्पादन में काफी वृद्धी हुई जिस कारण इसे हरित क्रांति भी कहा गया। पंजाब हरियाणा और उत्तरप्रदेश के किसानों ने कृषि के आधुनिक तरिकों का सबसे पहले प्रयोग किया। आधुनिक कृषि विधियों ने प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन किया है। अब इसके दुष्परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं। उर्वरकों के अधिक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता कम हो गई है। नलकूपों से सिंचाई के कारण भूमि जल के सतत निष्काषन से भूमिगत जलस्तर बहुत नीचे चला गया है।

कृषि-क्षेत्र[संपादित करें]

जोत[संपादित करें]

वर्ष जुताई क्षेत्र

  • १९५०- १२०
  • १९६०- १३०
  • १९७०- १४०
  • १९८०- १४०
  • १९९०- १४०
  • २०००- १४०

सिंचित क्षेत्र[संपादित करें]

उत्पादन[संपादित करें]

भारत में विभिन्न वर्षों में दाल-गेहूँ का उत्पादन (दस करोड़ टन में)-

  • 1970-71 12-24
  • 1980-81 11-36
  • 1990-91 14-55
  • 2000-01 11-70

कृषि औजार[संपादित करें]

भारत में कृषि में परंपरागत औजारों जैसे खुरपी, कुदाल, हँसिया, बल्लम, के साथ ही आधुनिक मशीनों का प्रयोग भी किया जाता है। किसान जुताई के लिए ट्रैक्टर, कटाई के लिए हार्वेस्टर तथा गहाई के लिए थ्रेसर का प्रयोग करते हैं।

अवलोकन[संपादित करें]

२०१० एफएओ विश्व कृषि सांख्यिकी, के अनुसार भारत के कई ताजा फल और सब्जिया, दूध, प्रमुख मसाले आदि को सबसे बड़ा उत्पादक ठहराया गया है । रेशेदार फसले जैसे जूट, कई स्टेपल जैसे बाजरा और अरंडी के तेल के बीज आदि का भी उत्पादक है । भारत गेहूं और चावल की दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत, दुनिया का दूसरा या तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है कई चीजो का जैसे सूखे फल, वस्त्र कृषि-आधारित कच्चे माल, जड़ें और कंद फसले, दाल, मछलीया, अंडे, नारियल, गन्ना और कई सब्जिया । २०१० मे ,भारत को दुनिया का पॉचवा स्थान हासील हुआ जिसके मुताबिक उसने ८०% से अधिक कई नकदी फसलो का उत्पादन् किया जैसे कॉफी और कपास आदि। २०११ के रीपोर्त् के अनुसार , भारत को दुनिया मे पॉचवा स्थान पर रखा गया जिसके मुताबिक व सबसे तेज़ वृद्धि के रूप में पशुधन उत्पादक करता है।

२००८ के एक रिपोर्ट ने दावा किया कि भारत की जनसंख्या , चावल और गेहूं का उत्पादन करने की क्षमता से अधिक तेजी से बढ़ रही है। अन्य सुत्रो से पता चलता है कि ,भारत अपनी बढती जनसंख्या को अराम से खीला सक्ता है और साथ ही साथ चावल और गेहूं को निर्यात भी कर सक्ता है। बस ,भारत को अपनी बुनियादी सुविधाओं को बढाना होगा जिस्से उत्पादक भी बढे जैसे अन्य देश ब्राजील और चीन ने किया। भारत २०११ में लगभग २लाख मीट्रिक टन गेहूँ और २.१ करोड़ मीट्रिक टन चावल का निर्यात अफ्रीका, नेपाल, बांग्लादेश और दुनिया भर के अन्य देशो को किया ।

जलीय कृषि और पकड़ मत्स्यपालन भारत में सबसे तेजी से बढ़ते उद्योगों के बीच है। १९९० से २०१० के बीच भारतीय मछली फसल दोगुनी हुई, जबकि जलीय कृषि फसल तीन गुना बढ़ा । २००८ में, भारत दुनिया का छठा सबसे बड़ा उत्पादक था समुद्री और मीठे पानी की मत्स्य पालन के क्षेत्र मे , और दूसरा सबसे बड़ा जलीय मछली कृषि का निर्माता था। भारत ने दुनिया के सभी देशों को करीब ६,00,000 मीट्रिक टन मछली उत्पादों का निर्यात किया ।

भारत ने पिछ्ले ६० वर्षो मै कृषि विभाग मै कई सफलताए प्राप्त की है। ये लाभ मुख्य रूप से भारत को हरित क्रांति,पावर जनरेशन, बुनियादी सुविधाओं, ज्ञान में सुधार आदि से प्राप्त हुआ । भारत में फसल पैदावार अभी भी सिर्फ ३0% से ६०% ही है। अभी भी भारत में कृषि प्रमुख उत्पादकता और कुल उत्पादन लाभ के लिए क्षमता है । विकासशील देशों के सामने भारत अभी भी पीछे है । इसके अतिरिक्त, गरीब अवसंरचना और असंगठित खुदरा के कारण, भारत ने दुनिया में सबसे ज्यादा खाद्य घाटे से कुछ का अनुभव किया और नुकसान भी भुगत्ना पढ़ा।

भारत मे सिंचाई[संपादित करें]

भारत में सिंचाई का मतलब खेती और कृषि गतिविधियों के प्रयोजन के लिए भारतीय नदियों, तालाबों, कुओं, नहरों और अन्य कृत्रिम परियोजनाओं से पानी की आपूर्ति करना होता है। भारत जैसे देश में, ६४% खेती करने की भूमि, मानसून पर निर्भर होती है । भारत में सिंचाई करने का आर्थिक महत्व है - उत्पादन में अस्थिरता को कम करना, कृषि उत्पादकता की उन्नती करना, मानसून पर निर्भरता को कम करना ,खेती के अंतर्गत अधिक भूमि लाना , काम करने के अवसरों का सृजन करना, बिजली और परिवहन की सुविधा को बढ़ाना ,बाढ़ और सूखे की रोकथाम को नियंत्रण मे करना।

पहल[संपादित करें]

विपणन के विकास के लिए निवेश की आवश्यकता स्तर, भंडारण और कोल्ड स्टोरेज बुनियादी सुविधाओं को भारी होने का अनुमान है । हाल ही में भारत सरकार ने पूरी तरह से कृषि कार्यक्रम का मूल्यांकन करने के लिए किसान आयोग का गठन किया । हालांकि सिफारिशों का केवल एक मिश्रित स्वागत किया गया है। नवम्बर २०११ में, भारत ने संगठित खुदरा के क्षेत्र में प्रमुख सुधारों की घोषणा की । इन सुधारों मे रसद और कृषि उत्पादों की खुदरा शामिल हुई । यह सुधार घोषणा प्रमुख राजनीतिक विवाद का कारण भी बना । यह सुधार योजना ,दिसंबर २०११ में भारत सरकार द्वारा होल्ड पर रख दिया गया था ॥

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]