चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय

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चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय
इंदिरा गांधी सभाभवन, हिसार
इंदिरा गांधी सभाभवन, हिसार

आदर्श वाक्य:कृषिरेव महालक्ष्मी
स्थापित१९७०
प्रकार:सार्वजनिक
मान्यता/सम्बन्धता:यूजीसी
कुलपति:कृष्ण सिंह खोखर
अवस्थिति:हिसार, हरियाणा, भारत
परिसर:शहरी
उपनाम:हकृवि
जालपृष्ठ:[1]


चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार स्थित एक विश्वविद्यालय है जिसकी स्थापना १९७० में हुई थी। यह विश्वविद्यालय एशिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में से एक है। इसका नाम भारत के सातवें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के नाम पर रखा गया है।

पहले यह संस्थान पंजाब कृषि विश्वविद्यालय का हिसार में 'उपग्रह कैम्पस' था। हरियाणा राज्य के निर्माण के बाद यह स्वायत्त संस्थान घोषित किया गया। ३१ अक्टूबर १९९१ को इसका नामकरण चौधरी चरण सिंह के नाम पर किया गया।

यह विश्वविद्यालय भारत के सभी कृषि विश्वविद्यालयों में सर्वाधिक शोधपत्र प्रकाशित करता है। १९९७ में इसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा सर्वश्रेष्ठ संस्थान का सम्मान दिया गया। भारत के हरित क्रांति तथा श्वेत क्रांति में इस विश्वविद्यालय का महत्वपूर्ण योगदान है।

योगदान[संपादित करें]

भारत में सर्वप्रथम चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा विकसित किसानोपयोगी कृषि-तकनीक[संपादित करें]

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित नई तकनीक की शोध के साथ-साथ उनके विस्तार में सर्वश्रेष्ठ भूमिका निभाई है। यह विश्वविद्यालय किसानों की आवश्यकता के अनुसार कृषि नवोन्मेष के लिये प्रसिद्ध है। यही कारण है कि इसके कुछ ऐसे नवोन्मेषी शोध हैं जो पिछले 3-4 दशकों से किसानों में लोकप्रिय रहे हैं। इसकी कुछ सिफारिशें जो मील का पत्थर साबित हुई हैं तथा इस विश्वविद्यालय ने सबसे पहले रिपोर्ट की हैं वे इस प्रकार हैं -[1]

कृषि महाविद्यालय द्वारा विकसित किस्में एवं तकनीक[संपादित करें]

विकसित किस्मों से उत्पादन वृद्धि के कारण हरियाणा प्रदेश में 2002 तक प्रतिवर्ष 341 से 367 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। (प्रकाशन : सी.सी.एस.एच.ए.यू. इन रीसेपिंग हरियाणा एग्रीकल्चर, 2002) और इसी प्रकार प्रदेश में कुल खाद्य उत्पादन वृद्धि से लगभग 3400 करोड़ रुपए वार्षिक का लाभ प्राप्त हुआ है।

  • डब्ल्यू एच 147 : गेहूँ की इस किस्म की 1975 में सिफारिश की गई थी जो कम उपजाऊ भूमि व कम पानी में समय पर बीजाई करने से अच्छा उत्पादन देती है। यह किस्म विगत 32 सालों से लोकप्रिय है जो लगभग 5 लाख हैक्टेयर प्रतिवर्ष क्षेत्रफल में उगाया जाती है और इसके कारण देश में लगभग 300 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की अतिरिक्त आय हुई है।
  • आर एच 30 : राया की अधिक उपज वाली, मोटे दाने वाली व कम झड़ने वाली इस किस्म की सिफारिश 1983 में की गई थी। यह किस्म विगत 24 सालों से क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रथम रही है। देश में लगभग प्रतिवर्ष 10 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में इसकी बिजाई की जाती है, जिसके कारण औसतन 300 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की अतिरिक्त आमदनी आंकी गई है।
  • एच एच बी 67 : संकर बाजरे की कम समय में पकने वाली, प्रति क्षेत्र इकाई अधिक उपज देने वाली इस किस्म की सिफारिश राष्ट्रीय स्तर पर 1990 में की गई थी। जो अब तक किसानों में लोकप्रिय है।
  • एच जी 365 : ग्वार (ग्वारी) की कम समय में पकने वाली इस किस्म की सिफारिश 1998 में की गई थी।
  • तरावड़ी बासमती : लम्बे कद की अधिक उत्पादन देने वाली बासमती चावल की इंडिका जाति की इस किस्म की सिफारिश की गई।
  • ए ए एच-1 : यह संकर देसी कपास की अगेती बीजाई हेतु अधिक उपज देने वाली प्रथम किस्म है जिसकी 1999 में राष्ट्रीय स्तर पर सिफारिश की गई थी।
  • हरियाणा ढेंचा-1 : हरी खाद हेतु अधिक नत्रजन जमा करने वाली एवं अधिक हरी खाद देने वाली इस किस्म की सिफारिश राष्ट्रीय स्तर पर 2003 में की गई थी।
  • वर्षा उपहार : भिण्डी की यह किस्म 45-50 दिन में अधिक फल देती है व पीलिया रोगरोधी है।
  • हरियाणा मुलहठी-1 : औषधीय फसल मुलहठी की अधिक उपज देने वाली इस किस्म की सिफारिश 1989 में की गई थी। जिसे बहुत ही अच्छी औषधीय किस्म माना गया है।
  • येलो एच.क्यू.पी.एम.-1 : विश्वस्तर की गुणवत्ता वाली मक्का की किस्म पूरे देश के लिये पहली बार इस विश्वविद्यालय ने निकाली है।

अन्य मुख्य तकनीक[संपादित करें]

  • खरपतवार-प्रतिरोधिकता : विश्व में पहली बार गेहूँ में कनकी की प्रतिरोधिकता का खुलासा 1992-93 में इसी विश्वविद्यालय द्वारा किया गया। यह खोज किसी भी शाकनाशी के विरुद्ध पहली रिपोर्ट है। इस तकनीक को किसानों तक पहुँचाने में चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने अग्रणी भूमिका निभाई है। सैन्टर ऑफ इकोनोमिक्स, आस्ट्रेलिया (2002) के अनुसार इस तकनीक के अपनाने से विगत 10 सालों में लगभग 360 करोड़ रुपए की बचत आंकी गई है।
  • जीरो टिलेज तकनीक : समय बचाने वाली व कम उत्पादन-लागत वाली इस तकनीक का विकास सबसे पहले इस विश्वविद्यालय द्वारा किया गया। यह तकनीक हरियाणा में ही नहीं अपितु पूरे देश में राष्ट्रीय स्तर पर विस्तृत क्षेत्र में किसानों द्वारा अपनाई जा चुकी है। सैन्टर ऑफ इकोनोमिक्स, आस्ट्रेलिया (2002) के अनुसार आगामी 30 वर्षों में 10 लाख हैक्टेयर में जीरो टिलेज विधि अपनाने से 5000 से 6000 करोड़ रुपए का लाभ होगा। आई. सी. ए. आर. 2007 के प्रकाशन के अनुसार 20 लाख हैक्टेयर क्षेत्रफल में जीरो टिलेज अपनाने से प्रतिवर्ष 500 करोड़ रुपए का अतिरिक्त लाभ हुआ।
  • गेहूं में मोल्या सूत्रकृमि का इलाज : गेहूँ में मोल्या के उपचार हेतु एजोटोबेक्टर करुकोकम (एच टी 54) का विकास किया गया। इस जीवाणु खाद के टीके से गेहूं के बीज को बिजाई से पूर्व उपचारित करने से मोल्या का नियन्त्रण हो जाता है।
  • जड़गलन सूत्रकृमि का नियन्त्रण : जड़गलन सूत्रकृमि के जैविक नियन्त्रण हेतु पास्चूरिया पनाटरान्स परजीवी जीवाणु अधिक मात्रा में विकसित करने की अनोखी विधि विकसित की गई है।
  • सफेद बटन खुम्ब में सूत्रकृमि का प्रबन्धन : कम्पोस्टीकोला नामक सूत्रकृमि नियन्त्रण-तकनीक का विकास किया गया है, जिसे किसान भाई अपनाकर लाभ उठा रहे हैं।

मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय द्वारा विकसित मुख्य तकनीक[संपादित करें]

  • अंगूर के रस से शराब बनाने की विधि भारत में पहली बार इस विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई थी।
  • गन्ने के मोलासिस से सिटरिक एसिड (तेजाब) बनाने की विधि विकसित की गई है।
  • कच्चे फास्फेट एवं जैविक पदार्थों के प्रयोग से कम्पोस्ट खाद की गुणवत्ता बढ़ाने की विधि विकसित की गई। इस विधि से कम्पोस्ट में फास्फोरस की मात्रा में वृद्धि होती है जिससे कृषि में उत्पादन-लागत में कमी की जा सकती है।

पशु-चिकित्सा महाविद्यालय द्वारा विकसित मुख्य तकनीक[संपादित करें]

  • दूध में कम लागत में आसानी से यूरिया का पता लगाने की फील्ड स्पॉट टेस्ट विधि विकसित की गई है।
  • भैंसों में डायाफरेगऐटिक हर्निया के रोग की आपरेशन द्वारा निदान की तकनीक विकसित की गई।
  • पशुओं व भैंसों में गलघोंटू बीमारी की पहचान के लिए देश में पहली ‘‘डायग्नोस्टिक किट’’ तैयार की गई जिसके द्वारा यह पता लग जाएगा कि पशुओं को लगाया गया टीका ठीक काम कर रहा है या नहीं व टीके का प्रभाव कितने समय तक रहेगा। यह किट सस्ती होने के साथ-साथ शीघ्र परिणाम देती है। पशु के खून की जांच में मात्र 15 रुपये का खर्च आता है और जांचे गए खून के नमूने का परिणाम भी मात्र तीन घंटे की अवधि में मिल जाता है।
  • पशुओं हेतु एन्टी-थिलिरियोसिस टीका विकसित किया गया है।

पशु-विज्ञान महाविद्यालय द्वारा विकसित मुख्य तकनीक[संपादित करें]

  • संकर जाति के ब्रायलर का विकास किया गया, जिसकी अण्डा उत्पादन क्षमता 280 अण्डे प्रतिवर्ष है।
  • पशुओं व जानवरों को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक पोषक तत्त्वों की चाकलेट बनाई गई है

जिससे खनिज, शक्ति एवं प्रोटीन प्राप्त होते हैं और इसके प्रयोग से पशुओं एवं भैंसों में 25 प्रतिशत तक दाने की बचत की जा सकती है।

कृषि अभियंत्रण एवं तकनीकी महाविद्यालय द्वारा विकसित तकनीक[संपादित करें]

  • पानी के ठहराव व लवणीय क्षेत्रों के लिए पानी निकासी की भूमि के नीचे समतलीय टायल विधि विकसित की गई। इस तकनीक का गोहाना तथा कलायत में 2200 हैक्टर (5500 एकड़) क्षेत्र पर प्रदर्शन किया जा चुका है।
  • शुष्क क्षेत्रों में फसलों की बिजाई की उन्नत तकनीक विकसित की गई है जिससे वर्षा पर आधारित शुष्क क्षेत्रों में बाजरे की डोलियों पर रीजर-सीडर द्वारा बिजाई करने से उपज में 40 प्रतिशत की वृद्धि होती है।
  • हस्तचालित मशीन जिससे तेजाब के प्रयोग द्वारा कपास के बीज के रोएं उतारने की विधि विकसित की गई, जो कम खर्चीली है और इसके प्रयोग से उत्पाद की गुणवत्ता भी बढ़ती है।
  • तीन खूडों वाली विभिन्न फसलों की बीज एवं उर्वरक ड्रिल (सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल) विकसित की गई, जिससे समय व लागत की बचत होती है।
  • कम लागत व समय बचाने वाली आंवला गोदने की मशीन विकसित की गई है।

गृह-विज्ञान महाविद्यालय द्वारा विकसित तकनीक[संपादित करें]

  • बाजरे के पौष्टिक लड्डू व सेंविया बनाने की विधि विकसित की गई।
  • पापड़ व बड़ियां बनाने की मशीन को बनाया गया।
  • गेहूं, बाजरा, फल, सब्जियाँ आदि को परिष्कृत व परिपोषित करने की विशेष विधियों को ईजाद किया गया।
  • दालों व बिना दाल वाले अनाजों के छिलकों को परिपोषित करने के बाद प्रयोग करने की विधि विकसित की गई।
  • छोटे बच्चों हेतु घर में उपलब्ध खाद्य-पदार्थों से कम खर्च में पौष्टिक मिश्रण से सूखा पाउडर बनाने की तकनीक विकसित की गई। इस तकनीक का उपयोग कृषक महिलाओं तथा बाल एवं कल्याण विभाग, हरियाणा द्वारा आंगनवाड़ी के बच्चों हेतु किया जाता है।
  • कम लागत में आंवले की चीनी के घोल से सूखा पाउडर बनाकर इसकी पौष्टिकता बढ़ाने की तकनीक विकसित की गई।
  • गेहूं के चोकर (छानस) से कम वसा व कम चीनी वाले बिस्कुट बनाने की तकनीक विकसित की गई जो मधुमेह व हृदय रोगियों के लिए लाभप्रद एवं उपयोगी है।

विश्वविद्यालय द्वारा नये आयाम[संपादित करें]

विगत एक साल में विश्वविद्यालय ने कई संस्थाओं जैसे मिचिगन स्टेट यूनिवर्सिटी व मैरी लेण्ड यूनिवर्सिटी से अनुसंधान एवं विकास में महत्त्वपूर्ण करार किये हैं। इसी क्रम में विश्वविद्यालय ने बौद्धिक सम्पदा संरक्षण नीति व नियमावली बनायी है। चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय नीति बनाने वाला पहला विश्वविद्यालय है। विश्वविद्यालय ने संसाधन जुटाने में उल्लेखनीय वृद्धि की है। इस वर्ष भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् सहायक कार्यक्रम में 11 करोड़ व मेगा बीज परियोजना के अन्तर्गत 5.8 करोड़ रुपये का अनुदान विश्वविद्यालय को मिला है। जैव-प्रोद्योगिकी विभाग, नई दिल्ली द्वारा ग्रामीण सयुंक्त जैव-संसाधन (आर. बी. सी.) परियोजना, हिसार व सोनीपत जिले के गांवों के लिये मिली है। ग्रामीण आस्ट्रेलियन अन्तर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र व संसाधन संरक्षण तकनीक परियोजनाओं तथा दूसरी संस्थाओं से भी करार किये हैं। इस विश्वविद्यालय ने मानव संसाधन विकास के अन्तर्गत बायो-इनफोरमेटिक्स, पशु बायोतकनीक व खाद्य विज्ञान प्रौद्योगिकी नामक नये पाठ्यक्रम शुरू किया जा रहा है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]