अखण्ड भारत

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अखण्द भारत

अखण्ड भारत भारत के प्राचीन समय के अविभाजित स्वरूप को कहा जाता है। प्राचीन काल में भारत बहुत विस्तृत जिसमें वर्तमान के देश भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, मलेशिया, फिलिपिंस, थाइलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, इंडोनेशिय, लाओस, मालदीव, सिंगापुर, ब्रुनेई, नेपाल आदि शामिल थे।[1] कुछ देश जहाँ बहुत पहले के समय में अलग हो चुके थे वहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि अंग्रेजों से स्वतन्त्रता के काल में अलग हुये।

वर्तमान के देश भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, मलेशिया, फिलिपिंस, थाइलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, इंडोनेशिय, लाओस, मालदीव, सिंगापुर, ब्रुनेई, नेपाल आदि।

अखण्ड भारत वाक्यांश भारत की हिन्दू राष्ट्र के रूप में अवधारणा के लिये भी किया जाता है।[2][3][4]

अखण्ड भारत के मानचित्र में पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि को भी दिखाया जाता है।[3] अतः अखंड भारत से उद्देश्य यह की अखंड भारत से अलग हुये इन देशों को दोबारा भारत में मिलाकर अविभाजित अखंड भारत का पुनर्निर्माण करे। अखण्ड भारत का निर्माण सैद्धान्तिक रूप से हिन्दू एकता तथा 'शुद्धि से जुड़ा है।[4]

भाजपा जहाँ इस मुद्दे पर संशय में रहती है वहीं संघ इस विचार का हमेशा मुखर वाहक रहा है।[5][6] संघ के विचारक हो०वे० शेषाद्री की पुस्तक The Tragic Story of Partition में अखण्ड भारत के विचार की महत्ता पर बल दिया गया है।[7] संघ के समाचारपत्र ऑर्गनाइजर में सरसंघचालक मोहन भागवत का वक्तव्य प्रकाशित हुआ जिसमें कहा गया कि केवल अखण्ड भारत तथा सम्पूर्ण समाज ही असली स्वतन्त्रता ला सकते हैं।[8] कुछ परिस्थितियों में अखण्‍ड भारत के सम्‍बन्‍ध में यह कहना उचित होगा कि वर्तमान परिस्थियों में अखण्‍ड भारत की परिकल्‍पना केवल कल्‍पना मात्र है, किन्तु अब ऐसा सम्‍भव प्रतीत होता है की पुनर्निर्माण संभव है।

जयपुर में १७ नवम्बर २०२० को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधिकारीगण 'अखण्ड भारत पञ्चाङ्ग' का विमोचन करते हुए।

अखण्ड भारत में आज के अफगानिस्थान, पाकिस्तान , तिब्बत, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका आते है केवल इतना ही नहीं कालान्तर में भारत का साम्राज्य में आज के मलेशिया, फिलीपीन्स, थाईलैण्ड, दक्षिण वियतनाम, कम्बोडिया, इण्डोनेशिया आदि में सम्मिलित थे। सन् 1875 तक (अफगानिस्थान, पाकिस्तान , तिब्बत, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका) भारत के ही भाग थे लेकिन 1857 की क्रांति के पश्चात ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई थी। उन्हें लगा की इतने बड़े भू-भाग का दोहन एक केन्द्र से करना सम्भव नहीं है एवं फुट डालो एवं शासन करो की नीति अपनायी एवं भारत को अनेकानेक छोटे-छोटे हिस्सो में बाँट दिया केवल इतना ही नहीं यह भी सुनिश्चित किया की कालान्तर में भारतवर्ष पुनः अखण्ड न बन सके।

  1. अफ़गानिस्तान (1876) : विघटन की इस शृंखला का प्रारम्भ अफ़गानिस्तान से हुआ जब सन् 1876 में रूस एवं ब्रिटैन के बीच हुई गण्डामक सन्धि के बाद अफ़गानिस्तान.
  2. भूटान (1906)
  3. श्रीलंका (1935)
  4. पाकिस्तान(1947)
  5. बंग्लादेश (1971)
  6. बर्मा(म्यामार)=(1937)[9]

वेद, रामायण, महाभारत, गीता और कृष्ण के समय के संबंध में मेक्समूलर, बेबेर, लुडविग, हो-ज्मान, विंटरनिट्स फॉन श्राडर आदि सभी विदेशी विद्वानों ने भ्रांतियां फैलाईं और उनके द्वारा किए गए भ्रामक प्रचार का हमारे यहां के इतिहासकारों ने भी अनुसरण किया और भगवान बुद्ध के पूर्व के संपूर्ण काल को इतिहास से काटकर रख दिया। भगवान बुद्ध के पूर्व और बौद्ध काल में भी अखंड भारत में 16 जनपदों के आर्य राजाओं का ही राज था। प्राचीन भारत का अधिकतर इतिहास महाभारत में दर्ज है, जिसमें 16 महान राजाओं का जिक्र है।

नि‍म्नलिखित समय सारणी अनुमानित है:-

  1. ब्रह्म काल : (सृष्टि उत्पत्ति से प्रजापति ब्रह्मा की उत्पत्ति तक)
  2. ब्रह्मा काल :(प्रजापति ब्रह्मा, विष्णु और शिव का काल)
  3. स्वायम्भुव मनु काल :  (प्रथम मानव का काल ईसा पूर्व से प्रारंभ)
  4. वैवस्वत मनु काल :  (ईसा पूर्व से) :
  5. राम का काल : (लगभग 900000 वर्ष पूर्व ) :
  6. कृष्ण का काल :  (लगभग 5000 पूर्व ) :
  7. सिंधु घाटी सभ्यता का काल :  (3300-1700 ईस्वी पूर्व के बीच) :
  8. हड़प्पा काल :  (1700-1300 ईस्वी पूर्व के बीच) :
  9. आर्य सभ्यता का काल  : (1500-500 ईस्वी पूर्व के बीच) :
  10. बौद्ध काल :  (563-320 ईस्वी पूर्व के बीच) :
  11. मौर्य काल : (321 से 184 ईस्वी पूर्व के बीच) :
  12. गुप्तकाल : (240 ईस्वी से 800 ईस्वी तक के बीच) :
  13. मध्यकाल :  (600 ईस्वी से 1800 ईस्वी तक) :
  14. अंग्रेजों का औपनिवेशिक काल :  (1760-1947 ईस्वी पश्चात)
  15. आजाद और विभाजित भारत का काल : (1947 से प्रारंभ)

एक समय था जबकि वेद संपूर्ण मानव जाति के ग्रंथ थे, लेकिन आज वे सिर्फ हिन्दुओं के हैं। सवाल किसी धर्मग्रंथ का नहीं, ऐसे बहुत से ग्रंथ और प्रमाण हैं, जो ईसा पूर्व के भारतीय और मानव इतिहास की गौरवगाथा का वर्णन करते हैं।

अखंड भारत का इतिहास लिखने में कई तरह की बातों को शामिल किया जा सकता है। सर्व प्रथम तो उसकी निष्पक्षता के लिए जरूरी है पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर उसके बारे में बगैर किसी भेदभाव के सोचा जाए, जो प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य हो सकता है और जो किसी भी जाति, धर्म और समुदाय से हो सकता है।

भारतीय हो तो यह स्वीकारना जरूरी है कि हम भी भारत के इतिहास के हिस्से हैं। हमारे पूर्वज ब्रह्मा, मनु, ययाति, राम और कृष्ण ही थे। इतिहास में उन लोगों के इतिहास का उल्लेख हो जिन्होंने इस देश को बनाया, कुछ खोजा, अविष्कार किए या जिन्होंने देश और दुनिया को कुछ दिया। जिन्होंने इस देश की एकता और अखंडता को कायम रखा। यहां प्रस्तुत है अखंड भारत के बारे में संक्षिप्त बातें।

पहले संपूर्ण हिन्दू धर्म जम्बू द्वीप पर शासन करता था। फिर उसका शासन घटकर भारतवर्ष तक सीमित हो गया। फिर कुरुओं और पुरुओं की लड़ाई के बाद आर्यावर्त नामक एक नए क्षेत्र का जन्म हुआ जिसमें आज के हिन्दुस्थान के कुछ हिस्से, संपूर्ण पाकिस्तान और संपूर्ण अफगानिस्तान का क्षेत्र था। लेकिन मध्यकाल में लगातार आक्रमण, धर्मांतरण और युद्ध के चलते अब घटते-घटते सिर्फ हिन्दुस्तान बचा है।

यह कहना सही नहीं होगा कि पहले हिन्दुस्थान का नाम भारतवर्ष था और उसके भी पूर्व जम्बू द्वीप था। कहना यह चाहिए कि आज जिसका नाम हिन्दुस्तान है वह भारतवर्ष का एक टुकड़ा मात्र है। जिसे आर्यावर्त कहते हैं वह भी भारतवर्ष का एक हिस्साभर है और जिसे भारतवर्ष कहते हैं वह तो जम्बू द्वीप का एक हिस्सा मात्र है। जम्बू द्वीप में पहले देव-असुर और फिर बहुत बाद में कुरुवंश और पुरुवंश की लड़ाई और विचारधाराओं के टकराव के चलते यह जम्बू द्वीप कई भागों में बंटता चला गया।

भारतवर्ष का वर्णन : समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है। इसका विस्तार 9 हजार योजन है। यह स्वर्ग अपवर्ग प्राप्त कराने वाली कर्मभूमि है।

इसमें 7 कुल पर्वत हैं : महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र।

भारतवर्ष के 9 खंड : इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व और वारुण तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नौवां है।

मुख्य नदियां : शतद्रू, चंद्रभागा, वेद, स्मृति, नर्मदा, सुरसा, तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, कृतमाला, ताम्रपर्णी, त्रिसामा, आर्यकुल्या, ऋषिकुल्या, कुमारी आदि नदियां जिनकी सहस्रों शाखाएं और उपनदियां हैं।

तट के निवासी : इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, पुण्ड्र, कलिंग, मगध, दक्षिणात्य, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव, पारियात्र, सौवीर, सन्धव, हूण, शाल्व, कोशल, मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते हैं। इसके पूर्वी भाग में किरात और पश्चिमी भाग में यवन बसे हुए हैं।

जम्बू द्वीप

* जम्बू दीप : सम्पूर्ण एशिया

* भारतवर्ष : अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिन्दुस्थान, नेपाल, तिब्बत, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालद्वीप, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, वियतनाम, लाओस, ब्रुनेई, सिंगापुर, फिलिपिंस, बांग्लादेश तक भारतवर्ष।


विश्व का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय, नालंदा विश्वविद्यालय को जब क्रूर खिलजी द्वारा जलाया गया तो उसका प्रमुख उद्देश्य हिन्दू राष्ट्र का अंत करना था। एक समय बख्तियार खिलजी बहुत ज्यादा बीमार पड़ गया। उसके हकीमों ने इसका काफी उपचार किया पर कोई फायदा नहीं हुआ। तब उसे नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्रजी से उपचार कराने की सलाह दी गई। उसने आचार्य राहुल को बुलवा लिया तथा इलाज से पहले शर्त लगा दी की वह किसी हिंदुस्तानी दवाई का सेवन नहीं करेगा। उसके बाद भी उसने कहा कि अगर वह ठीक नहीं हुआ तो आचार्य की हत्या करवा देगा। अगले दिन आचार्य उसके पास कुरान लेकर गए और कहा कि कुरान की पृष्ठ संख्या इतने से इतने तक पढि़ए ठीक हो जाएंगे। उसने पढ़ा और ठीक हो गया। उसको खुशी नहीं हुई उसको बहुत गुस्सा आया कि उसके हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है। बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले उसने 1199 में नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दी। वहां इतनी पुस्तकेंं थीं कि आग लगी भी तो छ: माह तक पुस्तकेंं जलती रहीं। उसने हजारों धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले। खिलजी के ठीक होने के जो वजह बताई जाती है वह यह है कि वैद्यराज राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था। वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट गया और ठीक हो गया। उसने इस एहसान का बदला नालंदा को जलाकर दिया।


नालंदा में पोराणिक समस्त अखण्ड भारत के सम्राठ एवं उसके इतिहास का समस्त विवरण उपलब्ध था। उस समय यहाँ पर करीब 10,000 छात्र और 2000 शिक्षक रहा करते थे। नालंदा विश्वविद्यालय में तीन लाख किताबों से भरा एक विशाल पुस्तकालय, तीन सौ से भी ज्यादा कमरें और सात विशाल कक्ष हुआ करतें थे। इसका भवन बहुत ही सुंदर और विशाल हुआ करता था जिसकी वास्तुकला भी अत्याधिक सुंदर थी। इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम (450-470) ने की थी। इस विश्वविद्यालय को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त थी, लेकिन अब यह एक खंडहर बनकर रह चुका है, जहां दुनियाभर से लोग घूमने के लिए आते हैं। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का एक अद्भुत नमूना है। नालंदा को तक्षशिला के बाद दुनिया का दूसरा सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय माना जाता है। वहीं, आवासीय परिसर के तौर पर यह पहला विश्वविद्यालय है, यह 800 साल तक अस्तित्व में रहा। इतिहास के अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय में एक ‘धर्म गूंज’ नाम की एक लाइब्रेरी थी। इसका मतलब ‘सत्य का पर्वत’ से था। लाइब्रेरी के 9 मंजिलों में तीन भाग थे, जिनके नाम ‘रत्नरंजक’, ‘रत्नोदधि’, और ‘रत्नसागर’ थे। खुदाई के दौरान यहां 1.5 लाख वर्ग फीट में नालंदा यूनिवर्सिटी के अवशेष मिले हैं। ऐसा माना जाता है कि ये सिर्फ यूनिवर्सिटी का 10 प्रतिशत हिस्सा ही हैकिन्तु अब पुनः वही स्तिथि उत्पन ना हो इसीलिए अखण्ड भरत का पुनर्निर्माण अति आवश्यक है।


किसने बसाया भारतवर्ष : त्रेतायुग में अर्थात भगवान राम के काल के हजारों वर्ष पूर्व प्रथम मनु स्वायंभुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने इस भारतवर्ष को बसाया था, तब इसका नाम कुछ और था। वायु पुराण के अनुसार महाराज प्रियव्रत का अपना कोई पुत्र नहीं था तो उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद ले लिया था जिसका लड़का नाभि था। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था। इसी ऋषभ के पुत्र भरत थे तथा इन्हीं भरत के नाम पर इस देश का नाम 'भारतवर्ष' पड़ा। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि राम के कुल में पूर्व में जो भरत हुए उनके नाम पर भारतवर्ष नाम पड़ा। यहां बता दें कि पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर भारतवर्ष नहीं पड़ा।

इस भूमि का चयन करने का कारण था कि प्राचीनकाल में जम्बू द्वीप ही एकमात्र ऐसा द्वीप था, जहां रहने के लिए उचित वातारवण था और उसमें भी भारतवर्ष की जलवायु सबसे उत्तम थी। यहीं विवस्ता नदी के पास स्वायंभुव मनु और उनकी पत्नी शतरूपा निवास करते थे। राजा प्रियव्रत ने अपनी पुत्री के 10 पुत्रों में से 7 को संपूर्ण धरती के 7 महाद्वीपों का राजा बनाया दिया था और अग्नीन्ध्र को जम्बू द्वीप का राजा बना दिया था। इस प्रकार राजा भरत ने जो क्षेत्र अपने पुत्र सुमति को दिया वह भारतवर्ष कहलाया। भारतवर्ष अर्थात भरत राजा का क्षे‍त्र।


सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।

अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।

प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।।

ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।

नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)

जब भी मुंडन, विवाह आदि मंगल कार्यों में मंत्र पड़े जाते हैं, तो उसमें संकल्प की शुरुआत में इसका जिक्र आता है:


।।जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते….अमुक...।

* इनमें जम्बू द्वीप आज के यूरेशिया के लिए प्रयुक्त किया गया है। इस जम्बू द्वीप में भारत खण्ड अर्थात भरत का क्षेत्र अर्थात ‘भारतवर्ष’ स्थित है, जो कि आर्यावर्त कहलाता है।


।।हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्। तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:.....।।

* हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है।


बहुत से लोग भारतवर्ष को ही आर्यावर्त मानते हैं जबकि यह भारत का एक हिस्सा मात्र था। वेदों में उत्तरी भारत को आर्यावर्त कहा गया है। आर्यावर्त का अर्थ आर्यों का निवास स्थान। आर्यभूमि का विस्तार काबुल की कुंभा नदी से भारत की गंगा नदी तक था। हालांकि हर काल में आर्यावर्त का क्षेत्रफल अलग-अलग रहा।

ऋग्वेद में आर्यों के निवास स्थान को 'सप्तसिंधु' प्रदेश कहा गया है। ऋग्वेद के नदीसूक्त (10/75) में आर्यनिवास में प्रवाहित होने वाली नदियों का वर्णन मिलता है, जो मुख्‍य हैं:- कुभा (काबुल नदी), क्रुगु (कुर्रम), गोमती (गोमल), सिंधु, परुष्णी (रावी), शुतुद्री (सतलज), वितस्ता (झेलम), सरस्वती, यमुना तथा गंगा। उक्त संपूर्ण नदियों के आसपास और इसके विस्तार क्षेत्र तक आर्य रहते थे।

वेद और महाभारत को छोड़कर अन्य ग्रंथों में जो आर्यावर्त का वर्णन मिलता है वह भ्रम पैदा करने वाला है, क्योंकि आर्यों का निवास स्थान हर काल में फैलता और सिकुड़ता गया था इसलिए उसकी सीमा क्षेत्र का निर्धारण अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग मिलता है। मूलत: जो प्रारंभ में था वही सत्य है।


महाभारत अनुसार:- प्राग्ज्योतिष (असम), किंपुरुष (नेपाल), त्रिविष्टप (तिब्बत), हरिवर्ष (चीन), कश्मीर, अभिसार (राजौरी), दार्द, हूण हुंजा, अम्बिस्ट आम्ब, पख्तू, कैकेय, गंधार, कम्बोज, वाल्हीक बलख, शिवि शिवस्थान-सीस्टान-सारा बलूच क्षेत्र, सिंध, सौवीर सौराष्ट्र समेत सिंध का निचला क्षेत्र दंडक महाराष्ट्र सुरभिपट्टन मैसूर, चोल, आंध्र, कलिंग तथा सिंहल सहित लगभग

200 जनपद महाभारत में वर्णित हैं, जो कि पूर्णतया आर्य थे या आर्य संस्कृति व भाषा से प्रभावित थे। इनमें से आभीर अहीर, तंवर, कंबोज, यवन, शिना, काक, पणि, चुलूक चालुक्य, सरोस्ट सरोटे, कक्कड़, खोखर, चिन्धा चिन्धड़, समेरा, कोकन, जांगल, शक, पुण्ड्र, ओड्र, मालव, क्षुद्रक, योधेय जोहिया, शूर, तक्षक व लोहड़ आदि आर्य खापें विशेष उल्लेखनीय हैं।

बाद में महाभारत के अनुसार भारत को मुख्‍यत: 16 जनपदों में स्थापित किया गया। जैन 'हरिवंश पुराण' में प्राचीन भारत में 18 महाराज्य थे। पालि साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ 'अंगुत्तरनिकाय' में भगवान बुद्ध से पहले 16 महाजनपदों का नामोल्लेख मिलता है। इन 16 जनपदों में से एक जनपद का नाम कंबोज था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार कंबोज जनपद सम्राट अशोक महान का सीमावर्ती प्रांत था। भारतीय जनपदों में राज्याणि, दोरज्जाणि और गणरायाणि शासन था अर्थात राजा का, दो राजाओं का और जनता का शासन था।

*राम के काल 5114 ईसा पूर्व में नौ प्रमुख महाजनपद थे जिसके अंतर्गत उप जनपद होते थे। ये नौ इस प्रकार हैं- 1.मगध, 2.अंग (बिहार), 3.अवन्ति (उज्जैन), 4.अनूप (नर्मदा तट पर महिष्मती), 5.सूरसेन (मथुरा), 6.धनीप (राजस्थान), 7.पांडय (तमिल), 8. विन्ध्य (मध्यप्रदेश) और 9.मलय (मलावार)।


महाभारत अनुसार 16 महाजनपदों के नाम :

1. कुरु, 2. पंचाल, 3. शूरसेन, 4. वत्स, 5. कोशल, 6. मल्ल, 7. काशी, 8. अंग, 9. मगध, 10. वृज्जि, 11. चे‍दि, 12. मत्स्य, 13. अश्मक, 14. अवंति, 15. गांधार और 16. कंबोज। उक्त 16 महाजनपदों के अंतर्गत छोटे जनपद भी होते थे।


प्राचीनकाल में यह अखंड भारतवर्ष हिन्दूकुश पर्वत माला से अरुणाचल और अरुणाचल से बर्मा, इंडोनेशिया तक फैला था। दूसरी ओर यह कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी-श्रीलंका तक और हिन्दूकुश से नीचे सिंधु के अरब सागर में मिलने तक फैला था। यहां की प्रमुख नदियां सिंधु, सरस्वती, गंगा, यमुना, कुम्भा, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, महानदी, शिप्रा आदि हैं। 16 जनपदों में बंटे इस क्षेत्र को भारतवर्ष कहते हैं।

भारत में कई छोटे और बड़े युद्ध होते रहे। जैसे, देवासुर संग्राम, इंद्र और वृत्तासुर युद्ध, दाशराज्ञ का युद्ध, हैहय-परशुराम युद्ध, राम-रावण का युद्ध, चंद्रगुप्त मौर्य-धननंद का युद्ध, सम्राट अशोक-कलिंग का युद्ध। लेकिन उक्त सभी युद्ध के दौरान भारत को अंखंड किए जाने का कार्य ही किया जाता रहा। हालांकि सिकंदर और पोरस युद्ध के बाद भारत में स्थितियां बदलती गई।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Swarup, Devendra (2016). Akhand Bharat; Swapan Aur Yatharth [Akhand Bharat; Dream or Reality]. Delhi: Prabhat Prakashan. पृ॰ 192. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-9351866367.
  2. Yale H. Ferguson and R. J. Barry Jones, Political space: frontiers of change and governance in a globalizing world, page 155, SUNY Press, 2002, ISBN 978-0-7914-5460-2
  3. Sucheta Majumder, "Right Wing Mobilization in India", Feminist Review, issue 49, page 17, Routledge, 1995, ISBN 978-0-415-12375-4
  4. Ulrika Mårtensson and Jennifer Bailey, Fundamentalism in the Modern World (Volume 1), page 97, I.B.Tauris, 2011, ISBN 978-1-84885-330-0
  5. Jyotirmaya Sharma, "Ideological heresy? Archived 2013-10-05 at the Wayback Machine, द हिन्दू, 2005-06-19
  6. Radhika Ramaseshan, "Advani fires Atal weapon Archived 2013-07-28 at the Wayback Machine", The Telegraph, 2005-06-16
  7. Ashish Vashi, "Anti-Sardar Patel book sold from RSS HQ in Gujarat Archived 2013-11-06 at the Wayback Machine", The Times of India, 2009-08-27
  8. Manini Chatterjee, "Only by Akhand Bharat", The Indian Express, 2007-02-01
  9. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; :0 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]