भारतीय संगीत का इतिहास
प्रगैतिहासिक काल से ही भारत में संगीत की समृद्ध परम्परा रही है। गिने-चुने देशों में ही संगीत की इतनी पुरानी एवं इतनी समृद्ध परम्परा पायी जाती है। माना जाता है कि संगीत का प्रारम्भ सिंधु घाटी की सभ्यता के काल में हुआ हालांकि इस दावे के एकमात्र साक्ष्य हैं उस समय की एक नृत्य बाला की मुद्रा में कांस्य मूर्ति और नृत्य, नाटक और संगीत के देवता रूद्र अथवा शिव की पूजा का प्रचलन। सिंधु घाटी की सभ्यता के पतन के पश्चात् वैदिक संगीत की अवस्था का प्रारम्भ हुआ जिसमें संगीत की शैली में भजनों और मंत्रों के उच्चारण से ईश्वर की पूजा और अर्चना की जाती थी। इसके अतिरिक्त दो भारतीय महाकाव्यों - रामायण और महाभारत की रचना में संगीत का मुख्य प्रभाव रहा। भारत में सांस्कृतिक काल से लेकर आधुनिक युग तक आते-आते संगीत की शैली और पध्दति में जबरदस्त परिवर्तन हुआ है। भारतीय संगीत के इतिहास के महान संगीतकारों जैसे कि कालीदास, तानसेन, अमीर खुसरो आदि ने भारतीय संगीत की उन्नति में बहुत योगदान किया है जिसकी कीर्ति को पंडित रवि शंकर, भीमसेन गुरूराज जोशी, पंडित जसराज, प्रभा अत्रे, सुल्तान खान आदि जैसे संगीत प्रेमियों ने आज के युग में भी कायम रखा हुआ है।
भारतीय संगीत में यह माना गया है कि संगीत के आदि प्रेरक शिव और सरस्वती है। इसका तात्पर्य यही जान पड़ता है कि मानव इतनी उच्च कला को बिना किसी दैवी प्रेरणा के, केवल अपने बल पर, विकसित नहीं कर सकता।
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[संपादित करें] सक्षिप्त परिचय
वैदिक युग में ‘संगीत’ समाज में स्थान बना चुका था। सबसे प्राचीन ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में आर्यो के आमोद-प्रमोद का मुख्य साधन संगीत को बताया गया है। अनेक वाद्यों का आविष्कार भी ऋग्वेद के समय में बताया जाता है। ‘यजुर्वेद’ में संगीत को अनेक लोगों की आजीविका का साधन बताया गया, फिर गान प्रधान वेद ‘सामवेद’ आया, जिसे संगीत का मूल ग्रन्थ माना गया। ‘सामवेद’ में उच्चारण की दृष्टि से तीन और संगीत की दृष्टि से सात प्राकार के स्वरों का उल्लेख है। ‘सामवेद’ का गान (सामगान) मेसोपोटामिया, फैल्डिया, अक्कड़, सुमेर, बवेरु, असुर, सुर, यरुशलम, ईरान, अरब, फिनिशिया व मिस्त्र के धार्मिक संगीत से पर्याप्त मात्रा में मिलता-जुलता था।
उत्तर वैदिक काल के ‘रामायण’ ग्रन्थ में भेरी, दुंदभि, वीणा, मृदंग व घड़ा आदि वाद्य यंत्रों व भँवरों के गान का वर्णन मिलता है, तो ‘महाभारत’ में कृष्ण की बाँसुरी के जादुई प्रभाव से सभी प्रभावित होते हैं। अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने उत्तरा को संगीत-नृत्य सिखाने हेतु बृहन्नला का रूप धारण किया। पौराणिक काल के ‘तैत्तिरीय उपनिषद’, ‘ऐतरेय उपनिषद’, ‘शतपथ ब्राह्मण’ के अलावा ‘याज्ञवल्क्य-रत्न प्रदीपिका’, ‘प्रतिभाष्यप्रदीप’ और ‘नारदीय शिक्षा’ जैसे ग्रन्थों से भी हमें उस समय के संगीत का परिचय मिलता है। चौथी शताब्दी में भरत मुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ के छ: अध्यायों में संगीत पर ही चर्चा की। इनमें विभिन्न वाद्यों का वर्णन, उनकी उत्पत्ति, उन्हें बजाने के तरीकों, स्वर, छन्द, लय व विभिन्न कालों के बारे में विस्तार से लिखा गया है। इस ग्रन्थ में भरत मुनि ने गायकों और वादकों के गुणों और दोषों पर भी खुलकर लिखा है। बाद में छ: राग ‘भैरव’, ‘हिंडोल’, ‘कैशिक’, ‘दीपक’, ‘श्रीराग’ और ‘मेध’ प्रचार में आये। पाँचवीं शताब्दी के आसपास मतंग मुनि द्वारा रचित महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ ‘वृहददेशी’ से पता चलता है कि उस समय तक लोग रागों के बारे में जानने लगे थे। लोगों द्वारा गाये-बजाये जाने वाले रागों को मतंग मुनि ने देशी राग कहा और देशी रागों के नियमों को समझाने हेतु ‘वृहद्देशी’ ग्रन्थ की रचना की। मतंग ही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अच्छी तरह से सोच-विचार कर पाया कि चार या पाँच स्वरों से कम में राग बन ही नहीं सकता। पाणिनी के ‘अष्टाध्यायी’ में भी अनेक वाद्यों जैसे मृदंग, झर्झर, हुड़क तथा गायकों व नर्तकों सम्बन्धी कई बातों का उल्लेख है। सातवीं–आठवीं शताब्दी में ‘नारदीय शिक्षा’ और ‘संगीत मकरंद’ की रचना हुई। ‘संगीत मकरंद’ में राग में लगने वाले स्वरों के अनुसार उन्हें अलग-अलग वर्गों में बाँटा गया है और रागों को गाने-बजाने के समय पर भी गम्भीरता से सोचा गया है।
ग्यारहवीं शताब्दी में मुसलमान अपने साथ फारस का संगीत लाए। उनकी और हमारी संगीत पद्धतियों के मेल से भारतीय संगीत में काफी बदलाव आया। उस दौर के राजा-महाराजा भी संगीत-कला के प्रेमी थे और दूसरे संगीतज्ञों को आश्रय देकर उनकी कला को निखारने-सँवारने में मदद करते थे। बादशाह अकबर के दरबार में 36 संगीतज्ञ थे। उसी दौर के तानसेन, बैजूबावरा, रामदास व तानरंग खाँ के नाम आज भी चर्चित हैं। जहाँगीर के दरबार में खुर्रमदाद, मक्खू, छत्तर खाँ व विलास खाँ नामक संगीतज्ञ थे। कहा जाता है कि शाहजहाँ तो खुद भी अच्छा गाते थे और गायकों को सोने-चाँदी के सिक्कों से तौलवाकर ईनाम दिया करते थे। मुगलवंश के एक और बादशाह मुहम्मदशाह रंगीले का नाम तो कई पुराने गीतों में आज भी मिलता है। ग्वालियर के राजा मानसिंह भी संगीत प्रेमी थे। उनके समय में ही संगीत की खास शैली ‘ध्रुपद’ का विकास हुआ। 12वीं शताब्दी में संगीतज्ञ जयदेव ने ‘गीतगोविन्द’ नामक संस्कृत ग्रन्थ लिखा, इसे सकारण ‘अष्टपदी’ भी कहा जाता है। तेरहवीं शताब्दी में पण्डित शार्ङ्गदेव ने ‘संगीतरत्नाकर’ की रचना की। इस ग्रन्थ में अपने दौर के प्रचलित संगीत और भरत व मतंग के समय के संगीत का गहन अध्ययन मिलता है। सात अध्यायों में रचे होने के कारण इस उपयोगी ग्रन्थ को 'सप्ताध्यायी' भी कहा जाता है। शांरगदेव द्वारा रचित ‘संगीत रत्नाकर’ के अतिरिक्त चौदहवीं शताब्दी में विद्यारण्य द्वारा ‘संगीत सार’, पन्द्रहवीं शताब्दी में लोचन कवि द्वारा ‘राग तरंगिणी’, सोलहवीं शताब्दी में पुण्डरीक विट्ठल द्वारा ‘सद्रागचंद्रोदय’, रामामात्य द्वारा ‘स्वरमेल कलानिधि’, सत्रहवीं शताब्दी में हृदयनारायण देव द्वारा ‘हृदय प्रकाश’ व ‘हृदय कौतुकम्’, व्यंकटमखी द्वारा ‘चतुर्दंर्डिप्रकाशिका’, अहोबल द्वारा‘संगीत पारिजात’, दामोदर पण्डित द्वारा ‘संगीत दर्पण,’ भावभट्ट द्वारा ‘अनूप विलास’ व ‘अनूप संगीत रत्नाकार’, सोमनाथ’ द्वारा’ अष्टोत्तरशतताल लक्षणाम्’ और अठारहवीं शताब्दी में श्रीनिवास पण्डित द्वारा ‘राग तत्व विबोध:’, तुलजेन्द्र भोंसले द्वारा ‘संगीत सारामृतं’ व ‘राग लक्षमण्’ ग्रन्थों की रचना हुई। स्वामी हरिदास, विट्ठल, कृष्णदास, त्यागराज, मुथ्थुस्वामी दीक्षितर और श्यामा शास्त्री जैसे अनेक संत कवि–संगीतज्ञों ने भी उत्तर आदि दक्षिण भारत के संगीत को अनगिनत रचनाएँ दीं। कहा जा सकता है कि भारतीय संगीत शताब्दियों के प्रयास व प्रयोग का परिणाम है।
[संपादित करें] वैदिक काल का संगीत
भारतीय संगीत का आदि रूप वेदों में मिलता है। वेद के काल के विषय में विद्वानों में बहुत मतभेद है, किंतु उसका काल ईसा से लगभग 2000 वर्ष पूर्व था - इसपर प्राय: सभी विद्वान् सहमत है। इसलिए भारतीय संगीत का इतिहास कम से कम 4000 वर्ष प्राचीन है।
वेदों में वाण, वीणा और कर्करि इत्यादि तंतु वाद्यों का उल्लेख मिलता है। अवनद्ध वाद्यों में दुदुंभि, गर्गर इत्यादि का, घनवाद्यों में आघाट या आघाटि और सुषिर वाद्यों में बाकुर, नाडी, तूणव, शंख इत्यादि का उल्लेख है। यजुर्वेद में 30वें कांड के 19वें और 20वें मंत्र में कई वाद्य बजानेवालों का उल्लेख है जिससे प्रतीत होता है कि उस समय तक कई प्रकार के वाद्यवादन का व्यवसाय हो चला था।
संसार भर में सबसे प्राचीन संगीत सामवेद में मिलता है। उस समय "स्वर" को "यम" कहते थे। साम का संगीत से इतना घनिष्ठ संबंध था कि साम को स्वर का पर्याय समझने लग गए थे। छांदोग्योपनिषद् में यह बात प्रश्नोत्तर के रूप में स्पष्ट की गई है। "का साम्नो गतिरिति? स्वर इति होवाच" (छा. उ. 1।8।4)। (प्रश्न "साम की गति क्या है?" उत्तर "स्वर"। साम का "स्व" अपनापन "स्वर" है। "तस्य हैतस्य साम्नो य: स्वं वेद, भवति हास्य स्वं, तस्य स्वर एव स्वम्" (बृ. उ. 1।3।25) अर्थात् जो साम के स्वर को जानता है उसे "स्व" प्राप्त होता है। साम का "स्व" स्वर ही है।
वैदिक काल में तीन स्वरों का गान 'सामिक' कहलाता था। "सामिक" शब्द से ही जान पड़ता है कि पहले "साम" तीन स्वरों से ही गाया जाता था। ये स्वर "ग रे स" थे। धीरे-धीरे गान चार, पाँच, छह और सात स्वरों के होने लगे। छह और सात स्वरों के तो बहुत ही कम साम मिलते हैं। अधिक "साम" तीन से पाँच स्वरों तक के मिलते हैं। साम के यमों (स्वरों) की जो संज्ञाएँ हैं उनसे उनकी प्राप्ति के क्रम का पता चलता है। जैसा हम कह चुके हैं, सामगायकों को स्पष्ट रूप से पहले "ग रे स" इन तीन यमों (स्वरों) की प्राप्ति हुई। इनका नाम हुआ - प्रथम, द्वितीय, तृतीय। ये सब अवरोही क्रम में थे। इनके अनंतर नि की प्राप्ति हुई जिसका नाम चतुर्थ हुआ। अधिकतर साम इन्हीं चार स्वरों के मिलते हैं। इन चारों स्वरों के नाम संख्यात्मक शब्दों में है। इनके अनंतर जो स्वर मिले उनके नाम वर्णनात्मक शब्दों द्वारा व्यक्त किए गए हैं। इससे इस कल्पना की पुष्टि होती है कि इनकी प्राप्ति बाद में हुई। "गांधार" से एक ऊँचे स्वर "मध्यम" की भी प्राप्ति हुई जिसका नाम "क्रुष्ट" (जोर से उच्चारित) पड़ा। निषाद से एक नीचे का स्वर जब प्राप्त हुआ तो उसका नाम "मंद" (गंभीर) पड़ा। जब इससे भी नीचे के एक और स्वर को प्राप्ति हुई तो उसका नाम पड़ा "अतिस्वार अथवा अतिस्वार्य"। इसका अर्थ है स्वरण (ध्वनन) करने की अंतिम सीमा।
संभाव्य स्वरों के नियत क्रम का जो समूह है वह संगीत में "साम" कहलाता है। यूरोपीय संगीत में इसे "स्केल" कहते हैं।
हम देख सकते हैं कि धीरे-धीरे विकसित होकर साम का पूर्ण ग्राम इस प्रकार बना-
क्रुष्ट, प्रथम, द्वितीय, तृतीय, मंद्र, अतिस्वार्थ
यह हम पहले ही कह चुके हैं कि साम का ग्राम अवरोही क्रम का था। नीचे हम सामग्रम और उनको आधुनिक संज्ञाओं को एक सारणी में देते हैं :
साम आधुनिक
क्रुष्ट मध्यम (म)
प्रथम गांधार (ग)
द्वितीय ऋषभ (रे)
तृतीय षड्ज (स)
चतुर्थ निषाद (नि)
मंद्र घैवत (ध)
अतिस्वार्य पंचम (प)
सामगान के प्राय: सात भाग होते हैं - हुंकार अथवा हिंकार, प्रस्ताव, आदि उद्गीथ, प्रतिहार, उपद्रव और निधन। इसके मुख्य गायक को उद्गाता कहते हैं। उद्गाता के दो सहायक गायक होते हैं जिनको प्रस्तोता और प्रतिहर्ता कहते हैं। गान एक हिंकार अथवा हुंकार से प्रारंभ होता है जिसका उच्चार उद्गाता, प्रस्तोता और प्रतिहर्ता एक साथ करते हैं। उसके मुख्य भाग को उद्गाथ कहते हैं। इसे उद्गाता गाता है। इसके अनंतर एक भाग होता है जिसे प्रतिहार कहते हैं। इसे प्रतिहर्ता गाता है। इसके अनंतर जो भाग आता है उसे उपद्रव कहते हैं। इसे उद्गाता गाता है। निधन या अंतिम भाग को उद्गाता, प्रस्तोता और प्रतिहर्ता तीनों एक साथ मिलकर आते हैं। अंत में सब एक साथ मिलकर प्रणव अर्थात् ओंकार का सस्वर उच्चारण करते हैं।
[संपादित करें] सामगान की स्वरलिपि
सामगान की अपनी विशिष्ट स्वरलिपि (नोटेशन) है। लोगों में एक भ्रांत धारणा है कि भारतीय संगीत में स्वरलिपि नहीं थी और यह यूरोपीय संगीत का परिदान है। सभी वेदों के सस्वर पाठ के लिए उदात्त, अनुदात्त और स्वरित के विशिष्ट चिह्र हैं किंतु सामवेद के गान के लिए ऋषियों ने एक पूरी स्वरलिपि तैयार कर ली थी। संसार भर में यह सबसे पुरानी स्वरलिपि तैयार कर ली थी। संसार भर में यह सबमें पुरानी स्वरलिपि है। सुमेर के गान की भी कुछ स्वरलिपि यत्रतत्र खुदी हुई मिलती है। किंतु उसका कोई साहित्य नहीं मिलता। अत: उसके विषय में विशिष्ट रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता। किंतु साम के सारे मंत्र स्वरलिपि में लिखे मिलते हैं, इसलिए वे आज भी उसी रूप में गाए जा सकते हैं।
आजकल जितने भी सामगान के प्रकाशित ग्रंथ मिलते हैं उनकी स्वरलिपि संख्यात्मक है। किसी साम के पहले अक्षर पर लिखी हुई 1 से 5 के भीतर की जो पहली संख्या होती है वह उस साम के आरंभक स्वर की सूचक होती है। 6 और 7 की संख्या आरंभ में कभी नहीं दी होती। इसलिए इनके स्वर आरंभक स्वर नहीं होते। हम यह देख चुके हैं कि सामग्राम अवरोही क्रम का था। अत: उसके स्वरों की सूचक संख्याएँ अवरोही क्रम में ही लेनी चाहिए।
प्राय: 1 से 5 के अर्थात् मध्यम से निषाद के भीतर का कोई न कोई आरंभक स्वर अर्थात् षङ्ज स्वर होता है। संख्या के पास का "र" अक्षर दीर्घत्व का द्योतक है। उदाहरणार्थ निम्नलिखित "आज्यदोहम्" साम के स्वर इस प्रकार होंगे :
2 र 2 र 2 र 2 र 3 4 र 5
हाउ हाउ हाउ । आ ज्य दो हम्।
स%स स%स स%स । स% नि ध %प
मू2र र्धानं1र दाइ । वा2% 3 अ1 र।
स% रे % रे रे रे स % नि रे रे
2 र 3 4 र 5 2 र 3 4 र 5
आ ज्य दो हम्। आ ज्य दो हम्
स% नि ध % प स % नि ध % प
ति2 पृ3 थि4 व्या:5।
स नि ध प
इस साम में रे, स, नि, ध प - ये पाँच स्वर लगे हैं। संख्या के अनुसार भिन्न भिन्न सामों के आरंभक स्वर बदल जाते हैं। आरंभक स्वरों के बदल जाने से भिन्न भिन्न मूर्छनाएँ बनती हैं जो जाति और राग की जननी हैं। सामवेद के काव्य में स्वर, ग्राम और मूर्छना का विकास हो चुका था। सामवेद में ताल तो नहीं था, किंतु लय थी। स्वर, ग्राम, लय और मूर्छना सारे संगीत के आधार हैं। इसलिए सामवेद को संगीत का आधार मानते हैं।
प्रातिशाख्य और शिखा काल में स्वरों के नाम षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद हो गए। ग्राम का क्रम आराही हो गया : स्वर के तीनों स्थान मंद्र, मध्य और उत्तम (जिनका पीछे नाम पड़ा मंद्र, मध्य और तार) निर्धारित हो गए। ऋक्प्रातिशाख्य में उपर्युक्त तीनों स्थानों और सातों स्वरों के नाम मिलते हैं।
[संपादित करें] महाकाव्य काल में संगीत
वाल्मीकि रामायण में भेरी, दुंदुभि, मृदंग, पटह, घट, पणव, डिंडिम, आडंवर, वीणा इत्यादि वाद्यों और जातिगायन का उल्लेख मिलता है। जाति राग का आदिरूप है। महाभारत में सप्त स्वरों और गांधार ग्राम का उल्लेख आता है। महाजनक जातक (लगभग 200 ई. पू.) में चार परम महाशब्दों का उल्लेख है। इन्हें राजा उपाधि रूप में विद्वान् को प्रदान करता था।
पुरनानूरू और पत्तुपाटटु (100-200 ई.) नामक तमिल ग्रंथों में अवनद्ध (चमड़े से मढ़े हुए) वाद्यों का बहुत महत्व दिया गया है। ऐसे वाद्य का विशिष्ट स्थान होता था जिसे "मुरसुकट्टिल" कहते थे। तमिल के परिपादल (100-200 ई.) ग्रंथ में स्वरों और सात पालइ का उल्लेख है। "पालइ" मूर्छना से मिलता है। उसमें "याल" नामक तंत्री वाद्य का भी उल्लेख है। "याल" के एक प्रकार में एक सहस्र तक तार होते थे।
दक्षिण के एक बौद्ध नाटक सिलप्पडिगारन् (300 ई.) में भी कुछ संगीतविषयक बातों का समावेश है। इसमें वीणा, याल, बाँसुरी, पटह इत्यादि वाद्यों का जिक्र है। उस समय के प्रचलित रागों का भी इसमें उल्लेख है। उसी समय के "तिवाकरम्" नामक एक जैन कोश में भी संगीत के विषय में कुछ जानकारी दी गई है। इसमें संपूर्ण षाडव और ओडव रागों का उल्लेख तथा है तथा श्रुतियों और सात स्वरों का भी वर्णन है।
कालिदास के नाटकों में संगीत की चर्चा इतस्तत: आई है। मालविकाग्निमित्र में तो संगीत में दो शिष्यों क पूरी प्रतियोगिता ही दिखलाई गई है।
[संपादित करें] भरतमुनि का नाट्यशास्त्र
भारतीय संगीत का जो सबसे प्राचीन ग्रंथ मिलता है वह है भरत का नाट्यशास्त्र। भरत के काल के विषय में विवाद है। यह एक संग्रह ग्रंथ है। इसलिए इसके काल का निर्णय करना और कठिन हो गया है। विद्वान् लाग इसका काल लगभग ई. पू. 500 से 400 ई. तक मानते हैं। नाट्यशास्त्र में श्रुति, स्वर, ग्राम, मूर्छना, जाति और ताल का विशद विवेचन किया गया है। भरत ने श्रुतियों का विचार स्वर की स्थापना के लिए किया है। उन्होंने 4 श्रुतियों के अंतराल पर षड्ज रखा है, उसके अनंतर 3 श्रुतियों के अंतराल पर ऋषभ, 2 श्रुतियों के अंतराल पर गांधार, 4 श्रुतियों के अंतराल पर मध्यम, फिर 4 श्रुतियों के अंतराल पर पंचम, 3 श्रुतियों के अंतराल पर धैवत, और 2 श्रुतियों के अंतराल पर निपाद रखा है। इस प्रकार श्रुतियों की कुल संख्या 22 मानी है। भरत ने षड्जग्राम और मध्यमग्राम ऐसे दो ग्राम माने हैं। ऊपर जो श्रुतियों का अंतराल दिया है वह षड्ज ग्राम का है। यह ग्राम षड्ज से प्रारंभ होता है। इसलिए इसका षड्जग्राम नाम पड़ा। जो ग्राम मध्यम से प्रारंभ होता है उसका नाम है "मध्यम ग्राम"। मध्यम ग्राम में मध्यम ग्राम में मध्यम चतु:श्रुति, पंचम त्रिश्रुति, धैवत चतुश्रुति, निषाद द्विश्रुति, षड्ज चतु:श्रुति, ऋषभ त्रिश्रुति, एवं गांधार द्विश्रुति होता है। गांधार ग्राम भरत को मान्य नहीं है।
मूर्छना का अर्थ है उभर या चमक। सात स्वरों के क्रमयुक्त प्रयोग की संज्ञा मूर्छना है (क्रमयुक्ता स्वरा: सप्त मूर्च्छनास्त्वभिसंज्ञिता: भरत, व.सं.अ. 28 पृ. 435)। भरत ने षड्ज और मध्यम दोनों ग्रामों में सात सात मूर्छनाएँ मानी हैं। मूर्छनाएँ "जाति" गान का आधार थीं। विशिष्ट स्वर विशेष प्रकार के सन्निवेश में "जाति" कहलाते थे। जिसमें ग्रह, अंश, तार, मंद्र, न्यास, अपन्यास, अल्पत्व, बहुत्व, षाडवत्व और औडुवत्व के नियमों द्वारा स्वरसन्निवेश किया जाता था, वह "जाति" कहलाता था। जातिगान संगीत की बहुत विकसित अवस्था का सूचक है। भरत के समय में जातिगान परिपूर्ण अवस्था का सूचक है। भरत के समय में जातिगान परिपूर्ण अवस्था पर पहुँचा हुआ था। जाति ही राग की जननी है। भरत ने सात ग्रामराग भी गिनाए हैं और यह बतलाया है कि वे जाति से प्रादुर्भूत होते हैं।
नाट्यशास्त्र में चच्चत्पुट, चाचपुट अथवा चंचूपुट, षटपितापुत्र अथवा पंचपाणि, संपत्केष्टक, उद्बद्ध अथवा उद्घट तालों का उल्लेख है। ये क्रमश: 8, 6, 12, 12, और 6 मात्राओं के ताल थे।
[संपादित करें] भरत के अनन्तर
तमिलनाडु के कुडुमियमालइ स्थान में एक उत्कीर्ण लेख मिला है जो संभवत: 7वीं ई. शती का है। इसमें सात जातियों, सात स्वरों और कुछ श्रुतियों का तथा अंतर गांधार और काकलि निषाद का उल्लेख है। इससे यह सिद्ध होता है कि भारत में सातवीं शती तक संगीत की पर्याप्त उन्नति हो चुकी थी और उसके मुख्य विषय उत्तर से दक्षिण तक प्रसिद्ध और ग्राह्य हो चुके थे।
कुछ लोग नारदीय शिक्षा को भी 7वीं शती के आसपास का ग्रंथ मानते हैं। इस ग्रंथ के देखने से तो यही पता चलता है कि यह भरत के नाट्यशास्त्र से अधिक प्राचीन है। इसमें श्रुति, स्वर, ग्राम का उल्लेख तो है ही, वैदिक संगीत और गात्रवीणा का भी विशद वर्णन है। नाट्यशास्त्र में वैदिक संगीत का वर्णन नहीं है।
भरत के अनंतर मतंग ने संगीत पर बहुत प्रकाश डाला है। उनका काल लगभग 850 ई. है। उनकी बृहद्देशी जाति और राग, गांधर्व और देशी संगीत के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। उन्होंने "द्वादशस्वर मूर्च्छना" पद्धति चलाई, जिसका लगभग 200 वर्ष तक प्रभुत्व रहा। अभिनव गुप्त (लगभग 1000 ई.) ने अपने ग्रंथ अभिनव भारती में द्वादश स्वर मूर्छनावाद का खंडन किया है।
11वीं शती में मिथिला के राजा नान्यदेव ने "सरस्वती हृदयालंकार" ग्रंथ की रचना की। यह भरत के संगीत पर एक विस्तृत और सारगर्भ भाष्य है। इस ग्रंथ के अभी तक थोड़े से ही भाग मिले हैं।
पश्चिमी चालुक्यों के वंशज महाराज सोमेश्वर संगीत के प्रकांड विद्वान् थे। उन्होंने अपने "अभिलषितार्थ चिंतामणि" के चौथे प्रकरण में एक हजार एक सौ सोलह श्लोक संगीत पर लिखे हैं। भिन्न प्रकार के प्रबंधों का उदाहरण इस ग्रंथ की विशेषता है। इनक राज्यकाल 1127-1134 ई. है।
सोमेश्वर के पुत्र प्रतापचक्रवर्ती हुए जिनका दूसरा नाम जगदेकमल्ल था। इनका राज्यकाल 1134 से 1143 ई. तक रहा। इन्होंने "संगीत चूड़ामणि" नामक ग्रंथ की रचना की। यह बहुत प्रामाणिक ग्रंथ था। अब यह केवल खंडित रूप में मिलता है। बड़ोदा ओरिएंटल इंस्टिट्यूट ने इस खंडित ग्रंथ को 1958 में प्रकाशित किया है। इसमें स्वर, प्रबंध, ताल और राग के प्रकरण दिए हुए हैं। ताल का वर्णन इसमें बहुत विस्तृत है।
चालुक्यवंशीय सौराष्ट्रनरेश महाराज हरिपाल संगीत के प्रसिद्ध विद्वान् थे। इनका काल 1175 ई. है। इन्होंने "संगीत सुधाकर" नामक ग्रंथ की रचना की है जो अभी तक अप्रकाशित है। इसमें लगभग 70 रागों का वर्णन है। इसमें नृत्य, वाद्य और गीत तीनों का प्रतिपादन हुआ है।
सोमराज देव ने 1180 में "संगीतरत्नावली" की रचना की। इनका दूसरा नाम सोमभूपाल था। यह सम्राट् अजयपाल के वेत्रधर थे। इनके ग्रंथ में स्वर, ग्राम, प्रबंध, राग, ताल, सभी का विशद वर्णन है। इन्होंने एकतंत्री और आलापिनी वीणा के भी लक्षण दिए हैं।
12वीं शती ई. में जयदेव ने "गीतगोविंद" की रचना की। इनका जन्म बोलपुर के पास केंदुला ग्राम में हुआ था। जयदेव ने विभिन्न राग और तालों में प्रबंध लिखे हैं। उन्होंने मालव, गुर्जरी, वसंत, रामकरी, मालवगौड़, कर्णाट, देशाख्य, देशीवराडी, गोंडकरी, भैरवी, वराडी, विभास, इत्यादि रागों और रूपक, यति, एकताल, इत्यादि तालों का प्रयोग किया है। अपने प्रबंधों की उन्होंने स्वरलिपि नहीं दी है, अत: यह कहना कठिन है कि वह इन्हें किस प्रकार गाते थे। किंतु इतना स्पष्ट है कि 12वीं शती तक प्रबंध की गायनशैली ख्याति प्राप्त कर चुकी थी और कई राग और ताल लोकप्रिय हो गए थे।
पाल्कुरिकि सोमनाथ ने तेलगु में 1270 ई. में "पंडिताराध्यचरितम्" नामक एक ग्रंथ लिखा। इसमें लगभग 32 प्रकार की वीणाओं का उल्लेख है और मृंदग में समहस्त और वैशलम् इत्यादि की चर्चा है। इसके अतिरिक्त गमक, ठाय, नृत्य इत्यादि का भी इसमें विस्तृत वर्णन है।
भारतीय संगीत का "नाट्यशास्त्र" के अंनतर सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ शार्ङ्गदेव का "संगीतरत्नाकर" है। शार्ङ्गदेव के पूर्वज कश्मीर से आए थे और दक्षिण के यादववंश के देवगिरि के राजा के यहाँ नियुक्त हो गए। अत: शार्ङ्गदेव को उत्तर और दक्षिण दोनों की संगीतपद्धतियों के अध्ययन का सुअवसर प्राप्त हुआ और उन्होंने समस्त भारतीय संगीत का विस्तृत शास्त्र "संगीतरत्नाकर" में दिया है। इसमें श्रुति, स्वर, ग्राम, जाति, राग, प्रबंध, नृत्य, ताल सभी पर प्रकाश डाला गया है। इसमें संदेह नहीं कि यह भारतीय संगीत का आकर ग्रंथ है। इसकी रचना 13वीं शती में हुई थी।
शाकंभरि के राजा हम्मीर ने लगभग 1300 ई. में "श्रृंगारहार" की रचना की। इसमें भाषारागों और देशी रागों का वर्णन है। 120 ताल और एकतंत्री, नकुला, किन्नरी और आलापिनी इत्यादि वीणाओं की भी चर्चा है। जैन आचार्य पार्श्वदेव ने लगभग 1300 में "संगीत-समय-सार" की रचना की, जिसमें उस समय के संगीत का बहुत ही विशद वर्णन है।
[संपादित करें] मुसलमानों के आगमन के पश्चात
14वीं और 15वीं शती में उत्तरी भारत के संगीत पर मुसलमानों के प्रभुत्व के कारण ईरानी संगीत का प्रभाव पड़ने लगा। सुल्तान अलाउद्दीन (1295-1316 ई.) के दरबार में अमीर खुसरों संगीत के अच्छे ज्ञाता थे। उन्होंने कव्वाली मान का प्रचार किया। कहा जाता है, सितार वाद्य का भी निर्माण इन्हीं ने किया। किंतु "सहतार" वाद्य ईरान में पहले से वर्तमान था। हो सकता है, इसका कुछ रूपांतर करके उन्होंने इसे भारत में प्रोत्साहन दिया हो। कहा जाता है, तबला भी इन्हीं का निर्माण किया हुआ है। ख्याल गायकी का भी आरंभ इन्होंने किया। इन्होंने ईरानी धुनों का मिश्रण करके कुछ नए राग भी बनाए।
जौनपुर के सुलतान इब्राहीम शर्की (1400-1440 ई.) के समय मलिक सुलतान कड़ा (प्रयाग के समीप) के अधिपति थे। इनके पुत्र बहादुर मलिक संगीत के बहुत प्रेमी थे। इन्होंने प्राय: सभी संगीतग्रंथों को एकत्र किया और सारे भारत से संगीत के विद्वानों को आमंत्रित किया। उनको आदेश दिया कि सब ग्रंथों का अध्ययन करके एक ऐसे ग्रंथ की रचना करें जिसमें संगीत संबंधी मतभेदों का निर्णय हो। इन पंडितों ने बहुत कुछ विचार विमर्श के अनंतर एक ग्रन्थ की रचना की जिसका नाम उन्होंने "संगीतशिरोमणि" रखा। भारतीय संगीत के इतिहास में यह पहला प्रयत्न था जब विविध मतों पर विचार करके एक समन्वयात्मक ग्रंथ लिखा गया। इस दृष्टि से यह ग्रंथ बहुत ही महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्यवश इस ग्रंथ के इस समय केवल प्रथम और चतुर्थ अध्याय ही प्राप्य है। यदि सपूर्ण ग्रंथ मिल जाए तो भारतीय संगीत पर बहुत बड़ा प्रकाश पड़ सकता है।
मेवाड़ के महाराणा कुंभ (1431-1469 ई.) जैसे वीर थे वैसे ही संगीत के भी बहुत प्रख्यात विद्वान् थे। यह भरत पद्धति से पूर्णतया परिचित थे। इन्होंने "गीतगोविंद" पर रसिकप्रिया नाम की एक टीका लिखी और संगीत पर "संगीतराज" नामक ग्रंथ की रचना की। यह ग्रंथ 16 सहस्र श्लोको में पूर्ण हुआ है और गीत, वाद्य, नृत्य सभी पर इसमें पूर्ण प्रकाश डाला गया है।
लोचन कवि ने रागतरंगिणी का प्रणयन संभवत: 15वीं शती में किया। इसमें रागों का वर्गीकरण बारह ठाठों में किया गया है। 15वीं शती में चैतन्य महाप्रभु के प्रभाव से बंगाल में भक्तिसंगीत का अधिक प्रचार हुआ और संकीर्तन बहुत ही लोकप्रिय हो गया।
ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर (15वीं शती) ने ध्रुवपद शैली के गायन का विकास किया। संभवत: नायक बैजू इनके दरबार में थे। इन्होंने हिंदी में "मानकुतूहल" नामक ग्रंथ की रचना की। संगीत पर हिंदी में कदाचित् यह पहला ग्रंथ है। इसमें उस समय के रागों पर पर्याप्त प्रकाश डाल गया है।
मुगल बादशाहों में अकबर (1556-1605 ई.) ने संगीत को सबसे अधिक प्रोत्साहन दिया। इस काल में वृंदावन में स्वामी हरिदास संगीत के बहुत ही प्रख्यात आचार्य थे। कहा जाता है, तानसेन ने संगीत में शिक्षा पाई थी। इन्होंने सैकड़ों ध्रुवपद और धमार की रचना की। सूरदास, नंददास, कुंभनदास, गोविंदस्वामी इत्यादि वैष्णव कवियों ने "विष्णुपद" की रचना की जो मंदिरों में गाए जाते थे। ये छंद में आबद्ध थे, किंतु ध्रुवपद की शैली में गाए जाते थे।
तानसेन पहले रीवाँ के महाराज रामचंद्र बघेल के दरबार में थे। अकबर ने उन्हें वहाँ से बुलवाकर अपना दरबारी गायक नियुक्त किया। तानसेन की प्रचलित गानपद्धति का ज्ञान तो था ही, वह प्राचीन संगीत पद्धति से भी परिचित थे। इन्होंने दरबारी कानडा, मियाँ की तोड़ी, मियाँपल्लार इत्यादि रागों का निर्माण किया। वह अनुपम गायक थे। उनके वंशजों ने ध्रुवपद धमार की गायकी और वीणा और रवाव वादन को 20वीं शती तक जीवित रखा।
16वीं शती में पुंडरीक विट्ठल संगीतशास्त्र के अच्छे विद्वान् हुए हैं। वह कर्णाटक के शिवगंगा नामक गाँव में पैदा हुए थे किंतु उनका अधिक समय बीता खानदेश प्रांत के बुरहानपुर नगर में। जब अकबर ने खानदेश को 1599 में जीत लिया तो संभवत: वह दिल्ली आए। वह उत्तर भारतीय और कर्णाटक संगीत दोनों के पंडित थे। उनके लेख से ऐसा जान पड़ता है कि बुरहान खाँ ने उन्हें दोनों के समन्वय का आदेश दिया था। उन्होंने षड्रागचंद्रोदय, रागमाला, रागमंजरी और नर्तननिर्णय नाम के चार ग्रंथ लिखे। उनके ग्रंथों में स्वयंभू स्वर का उल्लेख मिलता है।
कर्णाटक संगीत के विद्वान् रामामाला ने 1550 ई. के लगभग "स्वरमेलकलानिधि" की रचना की। उन्होंने 19 मेलों में रागों का वर्गीकरण किया। उनके ग्रंथ में भी स्वयंभू स्वर का उल्लेख मिलता है।
1609 ई. में सोमनाथ ने रागविबोध लिखा। यह दक्षिण में संभवत: राजमुंद्री के पास के रहनेवाले थे। इन्होंने रुद्रवीणा, शुद्ध और मध्यम मेल वीणा का विस्तृत वर्णन दिया है। इन्होंने जनक और जन्य के आधार पर रागों का वर्गीकरण किया है।
तंजोर के राजा रघुनाथ ने अपने मंत्री गोविंद दीक्षित की सहायता से 1620 ई. में "संगीतसुधा" का प्रणयन किया। उन्होंने पंद्रह मुख्य मेलों और पचास मुख्य रागों का विस्तृत वर्णन किया है। उन्होंने 264 रागों का साधारण परिचय दिया है।
सन् 1630 ई. में व्यंकटमखी ने "चतुर्दंडीप्रकाशिका" लिखी। यह तंजोर के राजा रघुनाथ के सुपुत्र विजयराघव के आश्रय में थे। यह गोविंद दीक्षित के सुपुत्र थे। इन्होंने 72 मेलों में रागों का वर्गीकरण किया है, और शुद्ध तथा मध्यममेल वीणा का वर्णन किया है।
लगभग सन् 1630 ई. में दामोदर मिश्र ने "संगीतदर्पण" लिखा जो उस समय के उत्तरी भरत के संगीत पर अच्छा प्रकाश डालता है। इन्होंने गीत, ताल और नृत्त तीनों का विस्तृत वर्णन किया है।
17वीं शती में गोविंद ने "संग्रहचूड़ामणि" लिखा। इसमें 72 मेलकर्ता और वीणा का विस्तृत वर्णन है। गोविंद दक्षिण के निवासी थे। उन्होंने संभवत: 1680 और 1700 के बीच में उपर्युक्त ग्रंथ लिखा।
17वीं शती में ही अहोबल ने "संगीतपारिजात" नामक ग्रंथ लिखा। इस ग्रंथ का महत्व यह है कि इसमें वीणा के तार की लंबाई के द्वारा स्वरों के अंतराल समझाए गए हैं।
18वीं शती में श्रीनिवास ने "रागतत्वविबोध" लिखा। इन्होंने भी वीणा के तार द्वारा शुद्ध और विकृत स्वरों के स्थान बतलाए हैं। 17वीं-18वीं शती के बीच भावभट्ट ने अनूपविलास, अनूप संगीतरत्नाकर और अनूपांकुश की रचना की। यह बीकानेर के महाराज अनूपसिंह (1674-1709 ई.) के दरबार के पंडित थे। इनके ग्रंथ उत्तर भारत के संगीत पर अच्छा प्रकाश डालते हैं। अपने ग्रंथ में इन्होंने ध्रुवपद का भी उल्लेख किया है।
वैसे तो ख्याल की गायकी अमीर खुसरो से प्रारंभ हो गई थी, किंतु जौनपुर के शर्की राजाओं के समय में यह अधिक पनपी और मुहम्मद शाह (1719) के समय में पुष्पित हुई। इने दरबार में अदारंग और सदारंग दो प्रसिद्ध बीनकार और गायक थे। इन लोगों ने सबसे अधिक ख्याल गायकी को प्रोत्साहन दिया और सैकड़ों ख्यालों की विभिन्न रागों में रचना की।
18वीं शती में तंजोर के मराठा राजा तुलजा जी ने "संगीतसारामृतम्" की रचना की। यह संगीत के अच्छे विद्वान् थे। इन्होंने 21 मेल माने हैं।
1823 ई. में पटना के मुहम्मद रज़ा ने "नगमाते असफ़ी" की रचना की। इन्होंने मुख्य समानताओं के आधार पर रागों का वर्गीकरण किया है, और बिलाबल को शुद्ध ठाठ माना है।
जयपुर के महाराज प्रतापसिंह (1779-1804 ई.) ने देश भर के संगीत के विद्वानों को एकत्र किया। उन सबके परामर्श से "संगीतसार" नामक ग्रंथ रचा गया। इसमें भी बिलाबल शुद्ध ठाठ माना गया है।
19वीं शती में दक्षिण में त्यागराज ने बहुत सी कृतियों और कीर्तनों की रचना की। इन्होंने अपनी रचनाओं में रागों की स्वरसंगतियों को बहुत सुंदर रीति से ग्रंथित किया है। मुत्तुस्वामी दीक्षित और श्याम शास्त्री उनके समकालीन थे। इन्होंने भी बहुत सी सुंदर कृतियों और कीर्तनों की रचना की।
19वीं शती के अंतिम भाग में बंगाल के राजा शौरींद्र मोहन ठाकुर ने भारतीय संगीत को बहुत प्रोत्साहन दिया और "यूनिवर्सल हिस्टरी आफ़ म्यूज़िक" नामक ग्रंथ लिखा।
20वीं शती में पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने शास्त्रीय संगीत के प्रचार के लिए बहुत प्रयत्न किया और लगभग 35-40 पुस्तकों में गीतों को स्वरलिपि में प्रकाशित किया।
पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने संगीतशास्त्र पर "हिंदुस्तानी संगीत पद्धति" नामक ग्रंथ चार भागों में प्रकाशित किया और ध्रुवपद, धमार, तथा ख्यात का संग्रह करके "हिंदुस्तानी संगीत क्रमीक" नामक ग्रंथ के छह भाग प्रकाशित किए।
तत वाद्यों में भारत में इस समय मुख्यत: वीणा, सितार, इसराज और सरोद तथा सारंगी उपयोग में आ रहे हैं। सुषिर वाद्यों में बाँसुरी, अलगोजा, शहनाई, तूर या तुरही, सिंगी (श्रृंगी) और शंख, अवनद्ध या आनद्ध वाद्यों में मृदंग (पखावज), मर्दल (मादल या मादिलरा) हुडुक्क, दुंदुभि (नगाड़ा), ढोलक या ढोल, डमरू, डफ, खंजरी, तथा धन वाद्यों में कठताल, झाँझ, और मंजीरा प्रचलित हैं।
[संपादित करें] भारत में संगीत-शिक्षण
१८ वीं शताब्दी में घराने एक प्रकार से औपचारिक संगीत शिक्षा के केन्द्र थे परन्तु ब्रिटिश शासनकाल का आविर्भाव होने पर घरानों की रूपरेखा कुछ शिथिल होने लगी क्योंकि पाश्चात्य संस्कृति के व्यवस्थापक कला की अपेक्षा वैज्ञानिक प्रगति को अधिक मान्यता देते थे और आध्यात्म की अपेक्षा इस संस्कृति में भौतिकवाद प्रबल था।
भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के अन्तर्गत कला को जो पवित्रता एवं आस्था का स्थान प्राप्त था तथा जिसे कुछ मुसलमान शासकों ने भी प्रश्रय दिया और संगीत को मनोरंजन का उपकरण मानते हुए भी इसके साधना पक्ष को विस्मृत न करते हुए संगीतज्ञों तथा शास्त्रकारों को राज्य अथवा रियासतों की ओर से सहायता दे कर संगीत के विकासात्मक पक्ष को विस्मृत नहीं किया। परन्तु ब्रिटिश राज्य के व्यस्थापकों ने संगीत कला के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण अपना कर उसे यद्यपि व्यइतत्व के विकास का अंग माना परन्तु यह दृष्टिकोण आध्यात्मिकता के धरातल पर स्थित न था। उन्होंने अन्य विषयों के समान ही एक विषय के रूप में ही इसे स्वीकार किया, परन्तु वैज्ञानिक प्रगति की प्रभावशीलता के कारण यह विषय अन्य पाठ्य विषयों के बीच लगभग उपेक्षित ही रहा।
[संपादित करें] शास्त्रीय संगीत का पुनरुत्त्थान
संगीत के पुनरुत्थान की दृष्टि से इस समय में घरानों की अन्तिम कड़ी के रूप में पं. भारतखण्डे एवं पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर यह दो ऐसे महान संगीतज्ञ हुए जिन्होंने संगीत के पुनरुद्धार के लिए परिश्रम किए और संगीत के आध्यात्मिक धरातल को सुदृढ़ रखते हुए ही उसकों सर्वजन सुलभ बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। पं. भातखण्डे जी स्वयं एक शिक्षित व्यक्ति थे जिन्होंने प्रमुख रुप से `विधि' (ळत्) शिक्षा ग्रहण की थी परन्तु संगीत में विशेष रूचि रखने के कारण उन्होंने संगीत के ग्रन्थों का अध्ययन तथा विशद विश्लेषण करके संगीत को वर्तमान स्थिति के अनुकूल बनाने की दृष्टि से संगीत के कुछ मान्य सिद्धान्तों एवं क्रियात्मक प्रयोगों में परिवर्तन व परिवर्द्धन किए। `संगीत शास्त्र' (१-४) `संगीत पद्धतियों का तुलनात्मक अध्ययन', उत्तररभारतीय संगीत का इतिहास', `श्री मल्लक्ष्य संगीतम्', `क्रमिक पुस्तक मालिका' (१-६) आदि ग्रन्थ लिखकर संगीत को विद्यार्थियों के लिए सुलभ बनाने का प्रयत्न किया। अनेकानेक संगीतज्ञों से मिलकर प्राचीन बन्दिशें एकत्रित करने तथा सरल स्वरलिपि पद्धति का निर्माण कर उन बन्दिशें के संरक्षण प्रदान किया । आप ही ने रागों को दस थाटों में वर्गीकृत करने का सफल प्रयास किया। इसी प्रकार पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने भिन्न-भिन्न स्थानों का भ्रमण करके संगीत का प्रचार एवं प्रसार करते हुए समाज में पुन: संगीत के प्रति सम्मानीय भाव स्थापित किया जो सम्भवत: मध्यकाल एवं उत्तर मध्यकाल की राजनीतिक परिस्थितियों के कारण लुप्त हो चुका था और संगीत साधारण जनता के लिए केवल मात्र विलासिता का उपकरण ही रह गया था। पं. विष्णु दिगम्बर ने भी `संगीत बाल प्रकाश', `संगीत बाल बोध' आदि पुस्तकें लिखकर विद्यार्थियों के लिए संगीत सामग्री को उपलब्ध कराया तथा स्वतंत्र रूप से एक स्वरलिपि पद्धति का निर्माण करके उसके माध्यम से स्वर व लय के सूक्ष्म विभाजनों को सांकेतिक चिन्हों द्वारा इंगित करने तथा प्राप्त बन्दिशों को संरक्षण प्रदान करने का कार्य किया। इसके अतिरिक्त इन दोनों महान विभूतियों के प्रयत्नों से अनेक संगीत विद्यालय स्थापित किए गए।
संगीत का संस्थागत शिक्षण: १८ वीं शताब्दी का अन्त तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ भारतीय संगीत के पुनरुत्थान का काल माना जाता है। इस समय वह कला जो सभ्य समाज से बहिष्कृत व तिरस्कृत होकर राजा महाराजाओं की विलासपूर्ण मनोरंजन का साधन बन कर रह गई थी, अनुकूल धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक वातावरण से एक अपूर्व चेतना का कारण बनी। जिसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण बड़ौदा में स्वर्गीय मौलाबख्श विस्से खां द्वारा १८८६ ई. में प्रस्थापित सर्वप्रथम संगीत विद्यालय था जो बाद में बड़ौदा स्टेट म्यूजिक स्कूल के नाम जाना गया। यह विद्यालय बड़ौदा रियासत की ओर से प्रदान की गई आर्थिक सहायता से संचालित किया जाता था।
सन् १९०१ में लाहौर में की गई `गान्धर्व महाविद्यालय' की स्थापना संगीत शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रान्तिकारी परीक्षण था जिसमें प्राचीन गुरुकुल प्रणाली तथा आधुनिक संस्थागत शिक्षण प्रणाली का अदभुत समन्वय था। इस विद्यालय में निश्चित समय पर आकर सीखने वाले जिज्ञासुओं के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी विद्यार्थी थे जो आश्रमवासियों के रूप में रह कर गुरु के साइनध्य में दीर्घकाल तक संगीत की साधना करते थे।
वास्तव में पं विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के समक्ष एक और भारतीय संगीत आध्यात्मिकता थी तो दूसरी ओर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थापित ईसाई मिशनरी संस्थाओं के रूप में चलाए गए कालेज आदि की व्यवस्था थी जिसमें शिक्षा प्रदान करना एक मानवीय लक्ष्य (mission) था तथा सेवा-भाव की प्रधानता थी, अत: पांच मई १९०१ को लाहौर में `गान्धर्व महाविद्यालय' की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई कि जिस में सात्विक वृत्ति से युक्त संगीत के कलाकार विशुद्ध भारतीय संगीत का शिक्षण मानवीय सेवा भावना (missionary) के उद्देश्य से करे। इसके लिए सुव्यवस्थित अभ्यास क्रम तथा सुसंस्कृति निर्व्यसनी एवं चरित्रवान, कुशल संगीत शिक्षकों का प्रबन्ध भारत के बड़े-बड़े शहरों में स्थापित गान्धर्व महाविद्यालय की अनेक शाखाओं के लिए किया गया। इन शिक्षकों को `उपदेशक' की संज्ञा दी गई. १९०८ में गान्धर्व महाविद्यालय का ही एक केन्द्र बम्बई में खोला गया। प्रयोगात्मक रूप में यहां विद्यार्थियों के भोजन-वस्त्रादि का प्रबन्ध विद्यालय की ओर से किया। विद्यालय की साफ-सफाई, भोजन प्रबन्ध, सामग्री संचय आदि सभी व्यवस्थाओं का भार विद्यार्थियों पर डाला गया और एक प्रकार से विद्यालयीन वातावरण को गुरूकुल वातावरण के समकक्ष बनाने का प्रयत्न किया गया। अनुशासन, संयम, नियमबद्धता तथा क्रम को विशेष महत्त्व देते हुए एवं धार्मिक संस्कारों की शिक्षा से अनुप्राणित संगीत शिक्षा प्रदान करना ही उसका प्रमुख लक्ष्य माना गया।
संगीत शिक्षा को सामाजिक संरक्षण प्रदान करने की दृष्टि से यह विद्यालय समाज की धन-राशि पर ही आश्रित था। स्वयं संगीत कार्यक्रम आयोजित करके जो धन जनता से प्राप्त होता था उसे ही पुन: विद्यालय स्तर पर खर्च कर दिया जाता था क्योंकि पंडित जी का उद्देश्य धन अर्जित करना नहीं वरन् संगीत विद्या को अन्य विद्याओं के समान समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान दिलवाना था। फलस्वरूप उसके नियमन के लिए तथा संगीत शिक्षा को विधिवत बनाने के लिए पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकों, स्वरलिपि तथा परीक्षा के उपरान्त कुछ उपाधि वितरण का उपक्रम कर के संगीत शिक्षा को एक विशिष्ट आकार प्रदान करने का प्रयास किया।
धीरे-धीरे पूना, नागपुर, बम्बई तथा अन्य अनेक स्थानों पर गान्धर्व महाविद्यालय की अनेक शाखाएं स्थापित हो गई. इन शाखाओं में प्रबन्ध की एकरूपता स्थापित करने की दृष्टि से दिसम्बर १९३१ ई. में `अखिल भारतीय गान्धर्व महाविद्यालय मण्डल' की स्थापना पं नारायण मोरेश्वर खरे एवं पं. शंकरराव व्यास के नेतृत्व में की गई जिसके संचालन एवं संगठन की व्यवस्था में पण्डित ओंकार नाथ ठाकुर, पं वामन राव पाध्ये, प्रो। देवधर, आदि (पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के अनेक शिष्य) ने अपने महत्त्वपूर्ण योगदान से मण्डल के संचालन में निरन्तर वृद्धि की। इस संस्था के माध्यम से संगीत के शिक्षाकार्य, संगठनात्मक कार्य, कलाकारों एवं विद्वानों की सामाजिक प्रतिष्ठा का कार्य, कलाकारों एवं विद्वानों की सामाजिक प्रतिष्ठा का कार्य, शिक्षकों, एवं कलाकारों की सामाजिक समस्याओं के समाधान खोजने का कार्य, संगीत की साहित्यिक सुदृढ़ता का कार्य, संशोधनात्मक कार्य तथा जनसाधारण में शास्त्रीय संगीत के प्रति अभिरुचि उत्पन्न करने आदि कार्य अत्यन्त सुचारु रूप से किया गया। यद्यपि विष्णु दिगम्बर जी ग्वालियर घराने के अनुयायी थे परन्तु उनके द्वार आ प्रस्थापित `गान्धर्व महाविद्यालय' विशिष्ट गायकी की परम्परा का विस्तार करने वाली या ग्वालियर घराने की ही गायकी का आग्रह करने वाली संस्था के रुप में स्थापित नहीं की गई थी बल्कि इसका उद्देश्य केवल मात्र संगीतकारों को संगीत क्षेत्र में कार्य प्रवृत करना, संगीतकारों से संगीत शिक्षण कार्य में लाभ उठाना, तथा संगीतकारों के लिए समाज में प्रतिष्ठा स्थापित करना और उन सब कार्यो से संगीत को अन्य कलाओं तथा विद्याओं के समान स्तर पर सामाजिक रुप से ग्राह्य बनाना था। अत: संगीत के प्रति आस्था रखने वाला जिज्ञासु किसी भी घराने या किसी भी सम्प्रदाय का अनुयायी क्यों न हो, इस संस्था में संगीत सीखने का अधिकारी हो सकता था। इस प्रकार विष्णु दिगम्बर जी के घराना परम्परा से संगीत की शिक्षा ग्रहण करके संस्थागत शिक्षण के रूप में संगीत शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार के कार्य में महान योगदान दिया।
गान्धर्व महाविद्यालय मंडल की सफलता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रारम्भिक से लेकर विशारद, अलंकार एवं आचार्य स्तर की परीक्षा तक गान्धर्व महाविद्यालय के लगभग ४५० केन्द्रों की ओर से लगभग तीस हजार परीक्षार्थी प्रतिवर्ष परीक्षा देते हैं। इस सम्पूर्ण व्यवस्था में लगभग दो हजार से अधिक संगीत शिक्षक कार्यरत हैं। मण्डल के प्रकाशन विभाग द्वारा संगीतोपयोगी पुस्तकों का प्रकाशन तथा `संगीतकला विहार' पत्रिका का प्रकाशन विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
मण्डल की ओर से त्रैवार्षिक अखिल भारतीय संगीत शिक्षक सम्मेलन का आयोजन, संगीत शिक्षकों की समस्याओं, विचार विनिमय, मार्ग दर्शन, संगीत शिक्षा की गतिमानता, शास्त्र और क्रिया में एकसूत्रता आदि लाने की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ है।
पं. विष्णु दिगम्बर जी के शिष्यों में पं. विनायक राव पटवर्धन ने `नाट्यसंगीत प्रकाश', `राग विज्ञान' (१-७) `बाल-संगीत'(२३) `माझे गुरु चरित्र' आदि कई पुस्तकें संगीत के शैक्षणिक दृष्टिकोण से लिखी और १९५२ ई. में `विष्णु दिगम्बर संगीत विद्यालय' की स्थापना की। पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के पुत्र पं. दत्तोत्रेय विष्णु पलुस्कर को भी आपने संगीत की शिक्षा प्रदान की।
पं. ओंकार नाथ ठाकुर ने `प्रणवभारती' तथा संगीतांजली' (१-६) नामक पुस्तकें लिखकर संगीत की सेवा की। पं. वी। आर। देवधर ने बम्बई में `स्कूल आफ इण्डियन म्यूजिक' नामक संस्था की स्थापना जिसका उद्घाटन पं. विष्णु दिगम्बर जी ने १३ नवम्बर १९२५ को अपने करकमलों से किया। गान्धर्व महाविद्यालय के आधार पर ही इस संस्था में भी रविवार को एक घण्टे के लिए नि:शुल्क शिक्षण प्रारम्भ किया गया। संगीत के प्रचार और प्रसार की दृष्टि से विद्यालय की ओर से गुणी कलाकारों को आमन्त्रित कर जलसे आयोजित करने का कार्य भी किया गया। संस्था के संचालन में आर्थिक कठिनाईयों के कारण शिष्यों ने समाज के घनिष्ठ वर्ग से धन इकट्ठा करना आरम्भ किया। इस प्रयास को व्यवस्थित रूप देने की दृष्टि से श्री मोतीराम पैंजी ने `बाम्बे म्यूजिक सर्कल' नामक संस्था की स्थापना की जिस के प्रत्येक सदस्य से प्रतिमास एक रूपया चन्दे के रूप में लिया जाता था और प्रत्येक माह एक जलसे का आयोजन किया जाता था। संस्था में विविध जलसों और सांगीतिक कार्यक्रमों से प्रभावित होकर सिनेकृष्ण कंपनी के संचालक ने १९३१ में बम्बई में "स्कूल आफ इण्डियन म्यूजिक" का पहला चित्रपट (वृत च इत्र) तैयार किया।
इस प्रकार संगीत के क्षेत्र में पं. विष्णु दिगम्बर जी ने जहां संगीत के क्रियात्मक पक्ष को समाज में प्रवाहित करने का सफल एवं सतत प्रयास किया वहां संगीत शिक्षण के शास्त्र पक्ष में पं. भातखण्डे का योगदान अपूर्व एवं अलौकिक रहा। १९०९-१९१० से भातखण्डे जी के ग्रन्थों का सृजन काल आरम्भ होता है। उन्होंने सर्वप्रथम `श्रीमल्लक्ष्य संगीतम', नामक ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखा और `चतुर' उपनाम से प्रकाशित कराया, तत्पश्चात १९१० ई. में `हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति' नामक ग्रन्थ अपने निजि काम `विष्णु शर्मा' के नाम से प्रकाशित कराया। रागों के दस थाटों में विभाजन करते हुए रागों के प्रत्यक्ष उदाहरण देकर उसके स्वरुप, तथा चलन भेद स्पष्ट करने वाली तालबद्ध सरगमों का संग्रह करके `स्वर मालिका' नामक पुस्तक को प्रकाशित कराया। इसी काल में श्री गणपति बुवा भीलवड़ीकर से ४०० गीत प्राप्त किए। इन्होंने दक्षिण के पं. रामामात्यकृत `स्वरमेल क्लानिधि' का अनुवाद किया तत्पश्चात `संगीत परिजात' राग विबोध, `संगीत सारामृतोद्धार' की श्रुति स्वर चर्चा पर टिप्पणी देकर उन्हें प्रकाशित कराया। १९११ ई. में `अष्टोत्तर शतताल लक्षणम' शीर्षक के ताल शास्त्र पर संस्कृत भाषा में तथा `संगीत रत्नाकर' एवं `संगीत दर्पण' के स्वराध्यायों के मूल पाठ सहित गुजराती में भाषान्तर तथा प्रकाशन कराया। अप्पा तुलसीकृत `राग कल्पद्रुमांकुर' `राग चन्द्रिकासार' तथा पुण्डरीक विट्ठल के `सद्रागचन्द्रोदय' का भी प्रकाशन कराया।
१९१४ में `हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति' का द्वितीय भाग, पुण्डरीक विट्ठल कृत `रागमाला', `राग मंजरी', अप्पा तुलसी कृत `अभिनव ताल मंजरी', तथा `रागलक्षणम्' का प्रकाशन कराने के साथ-साथ शारदा संगीत मण्डल के तत्वाधान में संगीत की शिक्षा का कार्य भी प्रारम्भ किया।
१९१५-१६ ई. में बड़ौदा में आयोजित अखिल भारतीय संगीत समारोह के सचिव पद से अंग्रेजी में वक्तव्य दिया जो कि बाद में ध्ध्ध् के नाम से प्रकाशित हुआ। सन् १९१७ में बड़ौदा एवं ग्वालियर के नरेशों से भेंट होने पर दोनों स्थानों पर संगीत विद्यालय खोलने के उद्देश्य से आपने चुने हुए संगीतज्ञों को प्रशिक्षण दिया। ई. १९१८ में ग्वालियर में `माधव संगीत विद्यालय' की स्थापना की गई यहां के विद्यालय का कार्य राजा भैया पूंछ वाले को सौंपा गया। इसी वर्ष `क्रमिक पुस्तक मालिका' के प्रथम भाग तथा भावभट्ट द्वारा रचित `अनूप संगीत रत्नाकर' तथा `संगीत अनुपांकुश' का प्रकाशन भी कराया। १९२० ई. में बड़ौदा में संगीत विद्यालय की स्थापना की। १९२० ई. में ग्वालियर एवं बड़ौदा के विद्यालयों में पाठ्यक्रम निर्धारण हेतु पाठ्य पुस्तकों की योजना बना कर १९२१ ई. में `क्रमिक पुस्तक मालिका' के द्वितीय भाग, संस्कृत भाषा के स्वरचित `अभिनव राग मंजरी' तथा भावभट्ट विरचित `अनूप संगीत विलास' का प्रकाशन कराया। १९२२ ई. हरिद्वार में एक सेमिनार का आयोजन करके भाषा एवं राग शुद्धि की दृष्टि से सर्वमान्य पाठ विरचित किए। इसी वर्ष `क्रमिक पुस्तक मालिका' का तृतीय भाग प्रकाशित कराया।
ई १९२३ में `माधव संगीत विद्यालय' में स्नातकीय स्तर की परीक्षा का संचालन कराया तथा `क्रमिक पुस्तक मालिका' का चतुर्थ भाग भी प्रकाशित कराया। १९२५-२६ ई. में अखिल भारतीय संगीत परिषद् के चतुर्थ अधिवेशन को आयोजित किया तथा `मैरिस कालिज आफ म्युजिक' की स्थापना लखनऊ में की जो भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय के नाम से विख्यात है। ई. १९२७ में `राग दर्पण' का प्रकाशन करने के उपरान्त १९२८ ई. में लखनऊ के विद्यालय की व्यवस्था अपने शिष्य श्री कृष्ण नारायण रातंजनकर को सौंप दी। १९२९ ई. से १९३९ ई. के मध्य `क्रमिक पुस्तक मालिका' के पांचवें व छठे भाग का लेखन कार्य किया। १९३२ ई. में ग्वालियर व लखनऊ के विद्यालयों में परीक्षाओं का संचालन किया तथा `हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति' का चतुर्थ भाग प्रकाशित कराया। यह सभी पुस्तकें संगीत के विद्यालयों के संगीत के पाठ्यक्रम में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुई।