ग्वालियर
| ग्वालियर | |||||||
| — नगर — | |||||||
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| समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०) | |||||||
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| राज्य | मध्य प्रदेश | ||||||
| जिला | ग्वालियर जिला | ||||||
| महापौर | |||||||
| नगर पालिका अध्यक्ष | |||||||
| जनसंख्या • घनत्व |
16,29,881 (2001 के अनुसार [update]) | ||||||
| क्षेत्रफल | 5,214 कि.मी² | ||||||
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विभिन्न कोड
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ग्वालियर भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त का एक प्रमुख शहर है। यह शहर और इसका क़िला उत्तर भारत के प्राचीन शहरोँ के केन्द्र रहे हैँ । यह शहर सदियों से राजपूतों की प्राचीन राजधानी रहा है, चाहे वे प्रतिहार रहे हों या कछवाहा या तोमर। इस शहर में इनके द्वारा छोडे गये प्राचीन चिन्ह स्मारकों, किलों, महलों के रूप में मिल जाएंगे। सहेज कर रखे गए अतीत के भव्य स्मृति चिन्ह इस शहर को पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं। ग्वालियर शहर के इस नाम के पीछे भी एक इतिहास छिपा है; आठवीं शताब्दि में एक राजा हुए सूरजसेन, एकबार वे एक अज्ञात बीमारी से ग्रस्त हो मृत्युशैया पर थे, तब ग्वालिपा नामक संत ने उन्हें ठीक कर जीवनदान दिया। बस उन्हीं के सम्मान में इस शहर की नींव पडी और इसे नाम दिया ग्वालियर।
इसके बाद आने वाली शताब्दियों में यह शहर बडे-बडे राजवंशो की राजस्थली बना। हर सदी के साथ इस शहर के इतिहास को नये आयाम मिले। महान योध्दाओं, राजाओं, कवियों संगीतकारों तथा सन्तों ने इस राजधानी को देशव्यापी पहचान देने में अपना-अपना योगदान दिया। आज ग्वालियर एक आधुनिक शहर है और एक जाना-माना औद्योगिक केन्द्र है।
अनुक्रम |
[संपादित करें] पर्यटन स्थल
सुरज सिंह क़िला
सेन्ड स्टोन से बना यह किला शहर की हर दिशा से दिखाई देता और शहर का प्रमुखतम स्मारक है। एक उ/चे पठार पर बने इस किले तक पहुंचने के लिये एक बेहद ऊंची चढाई वाली पतली सडक़ से होकर जाना होता है। इस सडक़ के आर्सपास की बडी-बडी चट्टानों पर जैन तीर्थकंरों की विशाल मूर्तियां बेहद खूबसूरती से और बारीकी से गढी ग़ई हैं। किले की पैंतीस फीट उंचाई इस किले के अविजित होने की गवाह है। इस किले के भीतरी हिस्सों में मध्यकालीन स्थापत्य के अद्भुत नमूने स्थित हैं। पन्द्रहवीं शताब्दि में निर्मित गूजरी महल उनमें से एक है जो राजा मानसिंह और गूजरी रानी मृगनयनी के गहन प्रेम का प्रतीक है। इस महल के बाहरी भाग को उसके मूल स्वरूप में राज्य के पुरातत्व विभाग ने सप्रयास सुरक्षित रखा है किन्तु आन्तरिक हिस्से को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया है जहां दुर्लभ प्राचीन मूर्तियां रखी गई हैं जो कार्बन डेटिंग के अनुसार प्रथम शती ए डी की हैं। ये दुर्लभ मूर्तियां ग्वालियर के आर्सपास के इलाकों से प्राप्त हुई हैं। यह किला अवश्य देखे | ग्वालिअर का किला आगरा के पास है
[संपादित करें] मानमंदिर महल
इसे 1486 से 1517 के बीच राजा मानसिंह द्वारा बनवाया गया था। सुन्दर रंगीन टाइलों से सजे इस किले की समय ने भव्यता छन जरूर है किन्तु इसके कुछ आन्तरिक व बाह्य हिस्सों में इन नीली, पीली, हरी, सफेद टाइल्स द्वारा बनाई उत्कृष्ट कलाकृतियों के अवशेष अब भी इस किले के भव्य अतीत का पता देते हैं। इस किले के विशाल कक्षों में अतीत आज भी स्पंदित है। यहां जालीदार दीवारों से बना संगीत कक्ष है, जिनके पीछे बने जनाना कक्षों में राज परिवार की स्त्रियां संगीत सभाओं का आनंद लेतीं और संगीत सीखतीं थीं। इस महल के तहखानों में एक कैदखाना है, इतिहास कहता है कि ओरंगज़ेब ने यहां अपने भाई मुराद को कैद रखवाया था और बाद में उसे समाप्त करवा दिया। जौहर कुण्ड भी यहां स्थित है। इसके अतिरिक्त किले में इस शहर के प्रथम शासक के नाम से एक कुण्ड है ' सूरज कुण्ड । नवीं शती में प्रतिहार वंश द्वारा निर्मित एक अद्वितीय स्थापत्यकला का नमूना विष्णु जी का तेली का मन्दिर है, जो कि 100 फीट की ऊंचाई का है। यह द्रविड स्थापत्य और आर्य स्थापत्य का बेजोड संगम है। भगवान विष्णु का ही एक और मन्दिर है सास-बहू का मन्दिर। इसके अलावा यहां एक सुन्दर गुरूद्वारा है जो सिखों के छठे गुरू गुरू हरगोबिन्द जी की स्मृति में निर्मित हुआ, जिन्हें जहांगीर ने दो वर्षों तक यहां बन्दी बना कर रखा था
Ek baat aur hai ki pratihar vansh Gurjar-Pratihar Vansh hai tab use akele pratihar hi kyon likhate hai kya yah Gurjaron ke Shandar Histroy ke khilaph nahi hai.
iska koi mujhe jabab de sakta hai.
[संपादित करें] जयविलास महल और संग्रहालय
यह सिन्धिया राजपरिवार का वर्तमान निवास स्थल ही नहीं एक भव्य संग्रहालय भी है। इस महल के 35 कमरों को संग्रहालय बना दिया गया है। इस महल का ज्यादातर हिस्सा इटेलियन स्थापत्य से प्रभावित है। इस महल का प्रसिध्द दरबार हॉल इस महल के भव्य अतीत का गवाह है, यहां लगा हुए दो फानूसों का भार दो-दो टन का है, कहते हैं इन्हें तब टांगा गया जब दस हाथियों को छत पर चढा कर छत की मजबूती मापी गई। इस संग्रहालय की एक और प्रसिध्द चीज है, चांदी की रेल जिसकी पटरियां डाइनिंग टेबल पर लगी हैं और विशिष्ट दावतों में यह रेल पेय परोसती चलती है। और इटली, फ्रान्स, चीन तथा अन्य कई देशों की दुर्लभ कलाकृतियां यहां हैं।
[संपादित करें] तानसेन स्मारक
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के स्तंभ महान संगीतकार तानसेन जो कि अकबर के नवरत्नों में से एक थे, उनका स्मारक यहां स्थित है, यह मुगल स्थापत्य का एक नमूना है। तानसेन की स्मृति में ग्वालियर में हर वर्ष नवम्बर में तानसेन समारोह आयोजित होता है।
[संपादित करें] रानी लक्ष्मीबाई स्मारक
यह स्मारक शहर के पडाव क्षैत्र में है। कहते हैं यहां झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की सेना ने अंग्रेजों से लडते हुए पडाव डाला और यहां के तत्कालीन शासक से सहायता मांगी किन्तु सदैव से मुगलों और अंग्रेजों के प्रभुत्व में रहे यहां के शासक उनकी मदद न कर सके और वे यहां वीरगति को प्राप्त हुईं। यहां के राजवंश का गौरव तब संदेहास्पद हो गया। इसी प्रकार यहां तात्या टोपे का भी स्मारक है।
[संपादित करें] विवस्वान सूर्य मन्दिर
यह बिरला द्वारा निर्मित करवाया मन्दिर है जिसकी प्रेरणा कोर्णाक के सूर्यमन्दिर से ली गई है।
[संपादित करें] गोपाचल पर्वत
गोपाचल पर्वत ग्वालियर के किले के अंचल में , प्राचीन कलात्मक जैन मूर्ति समूह का अद्वितीय स्थान है। यहाँ पर हजारों विशाल दि. जैन मूर्तियाँ सं. 1398 से सं. 1536 के मध्य पर्वत को तराशकर बनाई गई हैं। इन विशाल मूर्तियों का निर्माण तोमरवंशी राजा वीरमदेव, डूँगरसिंह व कीर्तिसिंह के काल में हुआ। अपभ्रंश के महाकवि पं. रइधू के सान्निध्य में इनकी प्रतिष्ठा हुई।
[संपादित करें] ग्वालियर के कुम्हार
ग्वालियर मृणशिल्पों की द्वष्टि से आज उतना समृद्व भले ही न दीखता हो किन्तु लगभग पच्चीस वर्ष पहले तक यहां अनेक सुन्दर खिलौने बनाये जाते थे। दीवाली दशहरे के समय यहां का जिवाजी चौक जिसे बाड़ा भी कहा जाता है, में खिलौनों की दुकाने बड़ी संखया में लगती थी। मिटटी के ठोस एवं जल रंगों से अलंकृत वे खिलौने अधिकांशतः बनना बन्द हो गए हैं। गूजरी, पनिहारिन, सिपाही, हाथी सवार, घोड़ा सवार, गोरस, गुल्लक आदि आज भी बिकते है। अब यहां मिटटी के स्थान पर कागज की लुगदी के खिलौने अधिक बनने लगे हैं जिन पर स्प्रेगन की सहायता से रंग ओर वार्निश किया जाता है।
यहां बनाये जाने वाले मृण शिल्पों में अनुष्ठानिक रुप से महत्वपूर्ण है, महालक्ष्मी का हाथी, हरदौल का धोड़ा, गाणगौर, विवाह के कलश, टेसू, गौने के समय वधू को दी जाने वाली चित्रित मटकी आदि।
ग्वालियर, कुम्हार समुदाय की सामाजिक संरचना के अध्ययन की द्वष्टि से भी अत्यनत महत्वपूर्ण है, कयोंकि यहां हथेरिया एवं चकरेटिया दौनों ही प्रकार के कुम्हार पाये जाते है। हथरेटिया कुम्हार, चकरेटिया कुम्हारों की भांति बर्तन बनाने हेतु चाक का प्रयोग नहीं करते, वे हाथों से ही, एक कूंढे की सहायता से मिटटी को बर्तनों को आकार देते हैं। उनके बनाये बर्तनों की दीवारें मोटी होती हैं। ये लोग खिलौनें बनाने में दक्ष होते है।
[संपादित करें] ग्वालियर से प्रकाशित होने वाली हिन्दी की लघु-पत्रिकायें
- आचार्य कुल
- चैतन्य प्रकाश
- सुनहरा सन्सार
[संपादित करें] शिक्षा एवं शिक्षण संस्थान
ग्वालियर में जीवाजी विश्वविद्यालय (1964) और इससे संबंद्ध कला, विज्ञान, वाणिज्य, चिकित्सा तथा कृषि महाविद्यालय हैं और नगर में साक्षरता की दर काफ़ी ऊंची है। ग्वालियर में संगीत की यशस्वी परंपरा रही है और उसकी अपनी ख़ास शैली रही है। जो ग्वालियर 'घराना' नाम से प्रसिद्ध है।
- मिस हिल विद्यालय, ग्वालियर
- गजरा राजा चिकित्सा महाविद्यालय, ग्वालियर
- कमला राजा महिला महाविद्यालय, ग्वालियर
- सिंधिया स्कूल, ग्वालियर
- सिंधिया कन्या विद्यालय, ग्वालियर
- माधव प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान, ग्वालियर
- पद्मा राजे कन्या विद्यालय, ग्वालियर
- रुस्तमजी प्रौद्योगिकी संस्थान, टेकनपुर
- आई आई आई टी एम, ग्वालियर
- लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फिज़िकल एजुकेशन
- राष्ट्रीय पर्यटन संस्थान, ग्वालियर
- प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन संस्थान, ग्वालियर
- महाराणा प्रताप कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी, ग्वालियर
- आई पी एस कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एन्ड मेनेजमेन्ट , ग्वालियर
[संपादित करें] बाहरी कड़ियाँ
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