श्रीसीतारामसुप्रभातम्

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श्रीसीतारामसुप्रभातम्  
आवरण
श्रीसीतारामसुप्रभातम्, प्रथम संस्करण का आवरण पृष्ठ
लेखक जगद्गुरु रामभद्राचार्य
देश भारत
भाषा संस्कृत
प्रकाशक जगदगुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय
प्रकाशन तिथि जनवरी १४, २००९
मीडिया प्रकार मुद्रण (पेपरबैक)
पृष्ठ २६ पृष्ठ (प्रथम संस्करण)

श्रीसीतारामसुप्रभातम् (२००९), (शब्दार्थ: सीता तथा राम का सुंदर प्रात:काल) जगद्गुरु रामभद्राचार्य (१९५०-) द्वारा २००८ ई में सुप्रभातकाव्य शैली में रचित एक संस्कृत खण्डकाव्य है। काव्य पाँच विभिन्न छंदो के ४३ पद्यो में प्रणीत है। काव्य की एक प्रति कवि की स्वयं की हिन्दी टीका के साथ, जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय, चित्रकूट, उत्तर प्रदेश द्वारा प्रकाशित की गई थी। पुस्तक का विमोचन चित्रकूट में १४ जनवरी २००९ की मकर संक्रांति को कवि के उनसठवें जन्मदिवस के अवसर पर किया गया था। कवि द्वारा स्वयं अपने ही स्वर में बैरागी राग में ध्वनिबद्ध इस रचना की एक ऑडियो सीडी युक्ति कैसेट्स, नई दिल्ली द्वारा प्रस्तुत की जा चुकी है।[1][2]

रचना[संपादित करें]

कवि ने इस काव्य की रचना आश्विन नवरात्र (३० सितम्बर से ८ अक्टूबर) में की थी, जब वे एक कथा कार्यक्रम हेतु तिरुपति में थे। रचना की प्रस्तावना में कवि रामभद्राचार्य कहते हैं कि सुप्रभातकाव्य की परम्परा वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के मात्र एक श्लोक (१.२३.२) से प्रारम्भ हुई थी।[3]

देवनागरी
कौसल्यासुप्रजा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्त्तव्यं दैवमाह्निकम् ॥

हे श्रीरामभद्र! आपश्री को प्रकट करके भगवती कौशल्या जी सुप्रजा अर्थात् सुन्दर सन्तानवती हुईं अथवा हे महारानी कौशल्या के सुन्दर पुत्र प्रभु श्री राम! अब आपश्री का मंगलाशासन करने के लिए प्रातःकाल की संध्या प्रवृत्त हो रही है। हे पुरुषों में व्याघ्रस्वरूप, परम पराक्रमी प्रभु! अब शयन त्यागकर उठ जाइये। अब आपको प्रातःकालीन वैदिक कृत्य करने हैं अर्थात् अब स्नान, वेदाध्ययन आदि देवसम्बन्धी कार्य अनुष्ठान करने का समय हो गया है।

कवि भगवान वेंकटेश्वर के लिए रचित वेंकटेशसुप्रभातम् की प्रसिद्धि का वर्णन करते हुए कहते हैं कि अद्यावधि भगवान श्रीराम की प्रशंसा में कोई विस्तृत सुप्रभातकाव्य उपलब्ध नहीं था। इस रचना के अभाव और तिरुपति के प्रवास दोनों ने कवि को इस खण्डकाव्य के सृजन हेतु प्रेरित किया।[1]

काव्य[संपादित करें]

खण्डकाव्य में ४३ पद्य हैं, जिनमें से सुप्रभातम् ४० पद्यों में रचित है। इसके अतिरिक्त, दो पद्य प्रस्तावना में हैं (जिनमें प्रथम पद्य वाल्मीकि रामायण से उद्धृत है) और एक पद्य उपसंहार में फलाश्रुति के रूप में है। सुप्रभातम् के पद्य निम्न पाँच छन्दों में प्रणीत हैं -

  • प्रस्तावना के दो पद्य अनुष्टुप् छन्द में हैं।
  • पद्य १-८ शार्दूलविक्रीडित छन्द में हैं।
  • पद्य ९-३२ वसन्ततिलका छन्द में हैं। यह छन्द अधिकांशत: सुप्रभात शैली के काव्यों में प्रयुक्त होता है।
  • पद्य ३३-३६ स्रग्धारा छन्द में हैं।
  • पद्य ३७-४० मालिनी छन्द में हैं।
  • अन्त में फलाश्रुति वसन्ततिलका छन्द में है।


काव्य के पद्य[संपादित करें]

कौसल्यासुप्रजा राम पूर्वा संध्या प्रवर्तते।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्त्तव्यं दैवमाह्निकम् ॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भो राम उत्तिष्ठ राघव प्रभो।
उत्तिष्ठ जानकीनाथ सर्वलोकं सुखीकुरु ॥

सीताराम जनाभिराम मघवल्लालाममंजुप्रभ
श्रीसाकेतपते पतत्त्रिपतिना नानार्चनैरर्चित।
नित्यं लक्ष्मणभव्य भव्यभरतश्रीशत्रुभित्सन्नते
शंभूयात्तव सुप्रभातमनघं शार्दूलविक्रीडितम् ॥

॥ १ ॥

नीलाम्भोजरुचे चलाम्बरशुचे वन्दारुकल्पद्रुम
ध्येय ज्ञेय सतां यतीन्द्रयमिनां वात्सल्यवारान्निधे।
शार्ंगामोघशिलीमुखेषुधियुत श्रीजानकीवल्लभ
प्रीत्यैस्तात् तव सुप्रभातमनघं हे रावणारे हरे ॥

॥ २ ॥

मन्दं मन्दमवन् पवन् सुपवनः प्रालेयलेपापहृन्
माद्यन्मालयमालतीपरिमलो नद्यः शिवाः सिन्धवः।
भूम्याम्भोहुतभुक्समीरगगनं कालो दिगात्मामनो
लोका वै ब्रुवते प्रसन्नमनसस्त्वत्सुप्रभातं हरे ॥

॥ ३ ॥

वेदाः सुस्मृतयः समे मुनिवराः सप्तर्षिवर्या बुधाः
वाल्मीकिः सनकादयः सुयतयः श्रीनारदाद्या मुहुः।
सन्ध्योपासनपुण्यपूतमनसो ज्ञानप्रभाभासुराः
सानन्दं ब्रुवते महीसुरवरास्त्वत्सुप्रभातं प्रभो ॥

॥ ४ ॥

विश्वामित्रमहावलेपजलधिप्रोद्यत्तपो वाडवो
ब्रह्माम्भोरुहरश्मिकेतुरनघो ब्रह्मर्षिवृन्दारकः।
वेधःसूनुररुन्धतीपतिरसौ विज्ञो वसिष्ठो गुरुः
ब्रूते राघव सुप्रभातममलं सीतापते तावकम् ॥

॥ ५ ॥

विश्वामित्रघटोद्भवादिमुनयो राजर्षयो निर्मलाः
सिद्धाः श्रीकपिलादयः सुतपसो वाताम्बुपर्णाशनाः।
प्रह्लादप्रमुखाश्च सात्वतवरा भक्ताः हनूमन्मुखाः
प्रीता गद्गदया गिराभिदधते त्वत्सुप्रभातं विभो ॥

॥ ६ ॥

सप्ताश्वो ननु भानुमान् स भगवानिन्दुर्द्विजानां पतिः
भौमः सौम्यबृहस्पती भृगुसुतो वैवस्वतो दारुणः।
प्रह्लादस्वसृनन्दनोऽथ नवमः केतुश्च केतोर्नृणां
भाषन्ते च नवग्रहा ग्रहपते सत्सुप्रभातं तव ॥

॥ ७ ॥

कौसल्या ननु कैकयी च सरयू माता सुमित्रा मुदा
प्रेष्ठास्ते सचिवाः पिता दशरथः श्रीमत्ययोध्या पुरी।
सुग्रीवप्रमुखा विभीषणयुताः श्रीचित्रकूटो गिरिः
सर्वे ते ब्रुवते सुवैष्णववराः श्रीसुप्रभातं प्रभो ॥

॥ ८ ॥

श्रीरामभद्रभवभावनभानुभानो
प्रोद्दण्डराक्षसमहावनरुट्कृशानो।
वीरासनाश्रयमहीतलमण्डिजानो
सीतापते रघुपते तव सुप्रभातम् ॥

॥ ९ ॥

श्रीरामचन्द्र चरणाश्रितपारिजात
प्रस्यन्दिकारुणि विलोचनवारिजात
राजाधिराज गुणवर्धितवातजात
श्रीश्रीपते रघुपते तव सुप्रभातम्

॥ १० ॥

श्रीराम रामशिव सुन्दरचक्रवर्तिन्
श्रीराम राम भवधर्मभवप्रवर्तिन्
श्रीराम रामनव नामनवानुवर्तिन्
श्रेयःपते रघुपते तव सुप्रभातम्

॥ ११ ॥

श्रीराम राघव रघूत्तम राघवेश
श्रीराम राघव रघूद्वह राघवेन्द्र
श्रीराम राघव रघूद्भव राघवेन्दो
श्रीभूपते रघुपते तव सुप्रभातम्

॥ १२ ॥

श्रीराम रावणवनान्वयधूमकेतो
श्रीराम राघवगुणालयधर्मसेतो
श्रीराम राक्षसकुलामयमर्महेतो
श्रीसत्पते रघुपते तव सुप्रभातम्

॥ १३ ॥

श्रीराम दाशरथ ईश्वर रामचन्द्र
श्रीराम कर्मपथतत्पर रामभद्र।
श्रीराम धर्मरथमाध्वररम्यभद्र
श्रीमापते रघुपते तव सुप्रभातम् ॥

॥ १४ ॥

श्रीराम माधव मनोभवदर्पहारिन्
श्रीराम माधव मनोभवसौख्यकारिन्।
श्रीराम माधव मनोभवमोदधारिन्
श्रीशंपते रघुपते तव सुप्रभातम् ॥

॥ १५ ॥

श्रीराम तामरसलोचनशीलसिन्धो
श्रीराम काममदमोचन दीनबन्धो।
श्रीराम रामरणरोचन दाक्षसान्धो
श्रीमत्पते रघुपते तव सुप्रभातम् ॥

॥ १६ ॥

कौसल्यया प्रथममीक्षितमंजुमूर्तेः
श्रीश्रीपतेर्दशरथार्भकभावपूर्तेः
कोदण्डचण्डशरसर्जितशत्रुजूर्तेः
श्रीराम राघव हरे तव सुप्रभातम्

॥ १७ ॥

नीलोत्पलाम्बुदतनोस्तरुणार्ककोटि-
द्युत्यम्बरस्य धरणीतनयावरस्य
कोदण्डदण्डदमिताध्वरजित्वरस्य
श्रीराम राघव हरे तव सुप्रभातम्

॥ १८ ॥

तातप्रियस्य मखकौशिकरक्षणस्य
श्रीवत्सकौस्तुभविलक्षणलक्षणस्य
धन्वीश्वरस्य गुणशीलविचक्षणस्य
श्रीराम राघव हरे तव सुप्रभातम्

॥ १९ ॥

मारीचनीचपतिपर्वतवज्रबाहोः
सौकेतवीहन उदस्तवपुः सुबाहोः
विप्रेन्द्रदेवमुनिकष्टकलेशराहोः
श्रीराम राघव हरे तव सुप्रभातम्

॥ २० ॥

शापाग्निदग्धमुनिदारशिलोद्धरांघ्रेः
सीरध्वजाक्षिमधुलिड्वनरुड्वरांघ्रेः।
कामारिविष्णुविधिवन्द्यमनोहरांघ्रेः
श्रीराम राघव हरे तव सुप्रभातम् ॥

॥ २१ ॥

कामारिकार्मुककदर्थनचुंचुदोष्णः
पेपीयमानमहिजावदनेन्दुयूष्णः।
पादाब्जसेवकपयोरुहपूतपूष्णः
श्रीराम राघव हरे तव सुप्रभातम् ॥

॥ २२ ॥

देहप्रभाविजितमन्मथकोटिकान्तेः
कान्तालकस्य दयितादयितार्यदान्तेः।
वन्यप्रियस्य मुनिमानससृष्टशान्तेः
श्रीराम राघव हरे तव सुप्रभातम् ॥

॥ २३ ॥

मायाहिरण्मयमृगाभ्यनुधावनस्य
प्रत्तात्मलोकशबरीखगपावनस्य।
पौलस्त्यवंशबलवार्धिवनावनस्य
श्रीराम राघव हरे तव सुप्रभातम् ॥

॥ २४ ॥

साकेतकेत कृतसज्जनहृन्निकेत
सीतासमेत समदिव्यगुणैरुपेत।
श्रीराम कामरिपुपूतमनःसुकेत
श्रीसार्वभौमभगवंस्तव सुप्रभातम् ॥

॥ २५ ॥

सीताकराम्बुरुहलालितपादपद्म
सीतामुखाम्बुरुहलोचनचंचरीक।
सीताहृदम्बुरुहरोचनरश्मिमालिन्
श्रीजानकीशभगवंस्तव सुप्रभातम् ॥

॥ २६ ॥

श्रीमैथिलीनयनचारुचकोरचन्द्र
श्रीस्वान्तशंकरमहोरकिशोरचन्द्र।
श्रीवैष्णवालिकुमुदेशकठोरचन्द्र
श्रीरामचन्द्रशभगवंस्तव सुप्रभातम् ॥

॥ २७ ॥

श्रीकोसलाहृदयमालयमामयूख
प्रेमोल्लसज्जनकवत्सलवारिराशे।
शत्रुघ्नलक्ष्मणभवद्भरतार्चितांघ्रे
श्रीरामभद्रभगवंस्तव सुप्रभातम् ॥

॥ २८ ॥

श्रीमद्वसिष्ठतनयापुलिने कुमारै-
राक्रीडतोऽत्र भवतो मनुजेन्द्रसूनोः।
कोदण्डचण्डशरतूणयुगाप्तभासः
श्रीकोसलेन्द्रभगवंस्तव सुप्रभातम् ॥

॥ २९ ॥

नक्तंचरीकदन नन्दितगाधिसूनो
मारीचनीचसुभुजार्दनचण्डकाण्ड।
कामारिकार्मुकविभन्जन जानकीश
श्रीराघवेन्द्रभगवंस्तव सुप्रभातम् ॥

॥ ३० ॥

गुर्वर्थमुज्झितसुरस्पृहराज्यलक्ष्मीः
सीतानुजानुगतविन्ध्यवनप्रवासिन्।
पौरन्दरिप्रमदवारिधिवाडवाग्ने
श्रीपार्थिवेन्द्र भगवंस्तव सुप्रभातम् ॥

॥ ३१ ॥

प्रोद्दण्डकाण्डहुतभुक्छलभीकृतारे
मारीचमर्दन जनार्दन जानकीश।
पौलस्त्यवंशवनदारुणधूमकेतो
श्रीमानवेन्द्र भगवंस्तव सुप्रभातम् ॥

॥ ३२ ॥

कौसल्यागर्भदुग्धोदधिविमलविधो सर्वसौन्दर्यसीमन्
प्रोन्मीलन्मंजुकंजारुणनवनयनव्रीडितानेककाम।
कन्दश्यामाभिरामप्रथितदशरथब्रह्मविद्याविलासिन्
भूयात्त्वत्सुप्रभातं भवभयशमनं श्रीहरे ताटकारे ॥

॥ ३३ ॥

विश्वामित्राध्वरारिप्रबलखलकुलध्वान्तबालार्करूप
ब्रह्मस्त्रीशापतापत्रितयकदनकृत्पादपाथोज राम।
भूतेशेष्वासखण्डिन्भृगुवरमदहृन्मैथिलानन्दकारिन्
सीतापाणिग्रहेष्ट प्रभवतु भवतो मंगलं सुप्रभातम् ॥

॥ ३४ ॥

विभ्राणामोघबाणं धनुरिषुधियुगं पीतवल्कं वसान
त्यक्त्वायोध्यामरण्यं प्रमुदितहृदयन् मैथिलीलक्ष्मणाभ्याम्।
राजच्छ्रीचित्रकूट प्रदमितहरिभूर्दूषणघ्नः खरारे-
र्भूयाद्भग्नत्रिमूर्ध्न स्तव भवजनुषां श्रेयसे सुप्रभातम् ॥

॥ ३५ ॥

मायैणघ्नो जटायुःशवरिसुगतिदस्तुष्टवातेर्विधातु
सुग्रीवं मित्रमेकाशुगनिहतपतद्वालिनो बद्ध सिन्धोः।
लंकातंकैकहेतोः कपिकटकभृतो जाम्बवन्मुख्यवीरै-
र्हत्वा युद्धे दशास्यं स्वनगरमवतः सुप्राभातं प्रभो ते ॥

॥ ३६ ॥

कलितकनकमौलेर्वामभागस्थसीता-
ननवनजदृगालेः स्वर्णसिंहासनस्थः।
हनुमदनघभक्तेः सर्वलोकाधिपस्य
प्रथयति जगतेदद्राम ते सुप्रभातम् ॥

॥ ३७ ॥

दिनकरकुलकेतो श्रौतसेतुत्रहेतो
दशरथनृपयागापूर्व दुष्टाब्धिकौर्व।
अवनिदुहितृभर्तुश्चित्रकूटविहर्तु-
स्त्रिभुवनमभिधत्ते राम ते सुप्रभातम् ॥

॥ ३८ ॥

सकलभुवनपाला लोकपाला नृपालाः
सुरमुनिनरनागाः सिद्धगन्धर्वमुख्याः।
कृतविविधसपर्या राम राजाधिराज
प्रगृणत इम ईड्यं सुप्रभातं प्रभाते ॥

॥ ३९ ॥

अनिशममलभक्त्या गीतसीताभिरामो
दशदिशमभि सीतावत्सलाम्बोधिचन्द्रः।
हृदयहरिनिवासोऽप्युत्तरारण्यवासः
प्रणिगदति हनूमान् राम ते सुप्रभातम् ॥

॥ ४० ॥

श्रीश्रीनिवाससविधे तदनुज्ञया वै
सीतापतेर्हरिपदाम्बुजचिन्तकेन।
गीतं मया गिरिधरेण हि रामभद्रा-
चार्येण भद्रमभिशंसतु सुप्रभातम् ॥

॥ ४१ ॥

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. रामभद्राचार्य स्वामी २००९, पृष्ठ "क"–"ख"
  2. रामभद्राचार्य, स्वामी (गीतकार एवं गायक). (२००९). "[सीता और राम का सुन्दर प्रातः काल]" (संस्कृत में). श्रीसीतारामसुप्रभातम्. [सीडी]. दिल्ली, भारत: यूकी कैसेट्स. वाईसीडी-१५५. 
  3. मूर्ति, के.एम.के.; राव, देशिराजू हनुमंता (सितम्बर २००९), वाल्मीकि रामायण-बालकाण्ड-अध्याय २३, अभिगमन तिथि जून १८, २०१३ |year= / |date= mismatch में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)