महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध (द्वितीय विश्वयुद्ध)

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महान् देशभक्तिपूर्ण युद्ध का प्रचारपत्र
"मातृभूमि बुला रही है"
हिटलर वालों का जलूस

सोवियत संघ का महान् देशभक्तिपूर्ण युद्ध (रूसी: Великая Отечественная Война - वेलीकया ओतेचेस्त्वेन्नया वोय्ना) - या द्वितीय विश्वयुद्ध, जो सोवियत जनता के लिए 1941-1945 वर्षों में विशेष रूप से अपने देश के अस्तितव की रक्षा को लेकर सब से बड़ी घटना के रूप में दुनिया के इतिहास में जाना जाता है। इस युद्ध में दो करोड़ अस्सी लाख से ज़्यादा सोवियत निवासी मारे गए।

आरंभ[संपादित करें]

सन् 1933 में जर्मनी में हिटलर के नेतृत्व में फ़ासिस्टों ने सत्ता हथिया ली, जर्मन जनता के जनवादी अधिकारों और आज़ादी को दफ़ना दिया और देश में अपना ख़ूनी तृतीय साम्राज्य (जर्मन: Drittes Reich "द्रीत्तेस रय्ख़्") क़ायम कर लिया। हज़ारों फ़ासिस्ट-विरोधियों को जेलों और नज़रबंद-कैंपों में ठूँस दिया गया। जर्मन सरकार ने बड़ी भारी हमलावर फ़ौज खड़ी की और नवीनतम जंगी साज़-सामान से उसे लैस किया। जर्मनी की सारी अर्थ-व्यवस्था युद्ध की तैयारी में जुट गयी।
फ़ासिस्ट आक्रमण का पहला शिकार हुआ स्पेन। बाद में क्रमशः ऑस्ट्रिया, चेकोस्लोवाकिया और पोलैंड की बारी आयी। ब्रिटेन और फ़्राँस ने सितंबर, 1939 में जर्मनी पर युद्ध की घोषणा कर दी। मई-जून 1940 में फ़ासिस्ट जर्मनी ने फ़्रांस पर क़ब्ज़ा कर लिया। यूरोप के बहुत बडे़ इलाक़े में फ़ासिस्टों की नयी व्यवस्था (जर्मन: Die Neue Ordnung "दी नोइये ओर्दनुंग") लागू कर दी गयी, जिस के कार्यक्रम के अनुसार कुछ जातियों तथा राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से यहूदी, स्लाव, नीग्रो और जिप्सी लोगों का तथा समलिंगी और येहोवा के साक्षियों के विनाश को निश्चित किया जाता था।

सन् 1941 - सोवियत संघ पर चढा़ई[संपादित करें]

सोवियत संघ पर चढा़ई

22 जून 1941 की सुबह को जर्मन फ़ासिस्टों ने सोवियत संघ के साथ हुई अनाक्रमण-संधि भंग कर के सोवियत देश पर चढा़ई कर दी। तब से सोवियत लोगों का महान् देशभक्तिपूर्ण युद्ध शुरू हुआ।
युद्ध के पहले दौर में फ़ासिस्ट सेना के पास लाल सेना के मुक़ाबले में ज़्यादा सैनिक तथा अफ़सर और फ़ौजी साज़-सामान, ख़ास तौर से टैंक तथा विमान थे और इस कारण लाल सेना पीछे हटने के लिए विवश थी। सोवियत सरकार के आह्वान पर फ़ासिस्ट जर्मनी और उस के साथी-राष्ट्रों के ख़िलाफ़ मुक्ति-संग्राम लड़ने के लिए सारी सोवियत जनता उठ खडी़ हो गयी।

पहले फ़ासिस्ट जनरलों का ख़्याल था कि सोवियत संघ पर जल्दी और आसानी से वे विजय हासिल कर लेंगे। 1941 की शरद् में फ़ासिस्ट मास्को के नज़दीक पहुँच गये। मास्को के निकट उन्हों ने अपनी मुख्य फ़ौजें जमा तो कर लीं, मगर मास्को पर क़ब्ज़ा करना उन से न हो सका। दिसम्बर, 1941 में मास्को के पास हिटलरी फ़ौजों की कमर तोड़ दी गयी और उन्हें पीछे खदेड़ दिया गया। पहली बार फ़ासिस्ट सेनाओं को इतनी सख़्त पराजय का मुँह देखना पडा़। इतने में फ़ासिस्टों के क़ब्ज़े में आये हुए इलाक़ों के लोगों से छापेमार संघर्ष चलाने के लिए सोवियत सरकार की ओर से अपील की गयी और इन क्षेत्रों में बहुत से छापेमार दस्ते तथा गुप्त संगठन क़ायम हुए जिन्हों ने फ़ासिस्ट हमलावरों के ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़ दिया और विशाल मोर्चे पर लड़ती सोवियत फ़ौजों को सहायता दी।

लेनिनग्राद की नाक़ेबंदी[संपादित करें]

लेनिनग्राद शहर (1991 से सेंट पीटर्सबर्ग) के नज़दीक फ़ासिस्ट फ़ौजें सितंबर के शुरू में पहुँच गईं और छापा मार कर उस पर क़ब्ज़ा करने की कई बार कोशिश की। पर उन की सभी कोशिशें असफल हो गयीं। तब हिटलरी कमान ने शहर की नाक़ेबंदी शुरू करने का हुक्म दिया। लेनिनग्राद के सभी थल-मार्ग काट दिये गये और शहर सब ओर से फ़ासिस्ट दस्तों द्वारा घेर लिया गया। जर्मनों ने शहर पर गोलाबारी और हवाई बमबारी आरंभ कर दी। नाक़ेबंदी 8 सितंबर 1941 को शुरू हुई और 900 दिन जारी रही। घेरे में रहते समय 9,42,803 लेनिनग्रादवासी भूखों मरे। पर लेनिनग्राद के कारख़ानों में टैंक, तोपें, मशीनगनें वग़ैरह हथियार बनाये जा रहे थे। टैंक कारख़ानों से सीधे ही मोर्चे पर चले जाते थे जो बहुत ही नज़दीक था। लेनिनग्राद की ज़रूरी मदद करने के, मुख्य रूप से खाने की चीज़ें वहाँ पहुँचाने के लिए लदोगा झील पर जमी बर्फ़ के ऊपर से 160 किलोमीटर लंबा रास्ता बनाया गया। लेनिनग्रादवालों के लिए खाने की चीज़ें ले कर लारियाँ इस रास्ते से जाती थीं। फ़ासिस्ट इस पर बम बरसाते थे, फिर भी ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी लेनिनग्राद के रक्षकों को सहायता उत्तरोत्तर अधिक मात्रा में पहुँचती जाती थी।
18 जनवरी 1944 को लाल सेना ने नाक़ेबंदी तोड़ दी और जनवरी महीने के अंत में लेनिनग्राद के पास खडी़ फ़ासिस्ट फ़ौजों को चकनाचूर कर दिया। इस तरह शहर आज़ाद करा दिया गया।

सन् 1942 - स्तालिनग्राद की लडा़ई[संपादित करें]

स्तालिनग्राद की लडा़ई

फ़ासिस्ट जर्मनी से जूझने में सोवियत संघ के मित्र-राष्ट्रों ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका ने पश्चिमी यूरोप में दूसरा मोर्चा खोलने का अपना वादा पूरा नहीं किया जिस से फ़ायदा उठा कर फ़ासिस्टों ने सोवियत-जर्मन मोर्चे के दक्षिणी भाग पर 1942 की गर्मियों में भारी फ़ौजें जमा कीं। उन्हों ने दोनबास पर क़ब्ज़ा कर लिया और स्तालिनग्राद (1961 से वोल्गोग्राद) की ओर बढ़ आये। टैंकों, तोपों तथा हवाई जहाज़ों से लैस दस लाख से ज़्यादा सैनिकों और अफ़सरों को जर्मन कमान ने स्तालिनग्राद पर धावा बोलने के लिए भेजा। पचास हज़ार से ज़्यादा स्तालिनग्रादवालों ने मोर्चेबंदियाँ मज़बूत कीं। युद्धों के इतिहास में सब से सख़्त लडा़ई स्तालिनग्राद के पास लडी़ गई
सितंबर, 1942 के मध्य में जर्मन स्तालिनग्राद के अंदर घुस पडे़। वोल्गा नदी तक पहुँचने में भी फ़ासिस्ट कामयाब हो गये। एक-एक सड़क, एक-एक घर, एक-एक मंज़िल, यहाँ तक कि एक-एक कमरे के लिए भी शहर में घमासान लडा़ई छिड़ गयी, जो एक सौ चालीस दिन जारी रही। आख़िर 19 नवम्बर 1942 की सुबह को लाल सेना के दस्तों ने हमले की कार्रवाइयाँ शुरू कीं और चार दिनों के अंदर स्तालिनग्राद के पास फ़ासिस्टों को घेर लिया। जर्मनों के तीन लाख तीस हज़ार सैनिक तथा अफ़सर बडी़ भारी मात्रा में युद्ध-साधनों समेत लाल सेना के घेरे में आ गये। 2 फ़रवरी 1943 को स्तालिनग्राद के पास की लडा़ई फ़ासिस्टों पर सोवियत सिपाहियों की विजय के साथ समाप्त हो गई। वोल्गा के किनारे और स्तालिनग्राद की दीवारों से फ़ासिस्ट हमलावरों से सोवियत भूमि को मुक्त करने का, फ़ासिस्ट ग़ुलामी से यूरोप की जनताओं को आज़ाद कराने का अभियान शुरू हुआ।

सन् 1943 - सोवियत सेना के मोर्चे पर हमले की कार्रवाइयाँ[संपादित करें]

स्तालिनग्राद के पास सोवियत सैनिकों की विजय ने द्वितीय विश्वयुद्ध का सारा रुख़ बदल दिया। इस विजय के बाद फ़ासी वाद के विरुद्ध यूरोप के लोगों और जापानी साम्राज्यवाद के विरुद्ध एशिया की जनताओं का संघर्ष ज़ोर पकड़ता गया। फ़ासिस्ट सेनाओं की स्तालिनग्राद के पास सख़्त पराजय हुई, पर उन्हों ने एक नयी योजना बनायी और उस का नाम रखा "सिटेडल"। इस योजना के अनुसार फ़ासिस्ट कमान का इरादा था कि कूर्स्क शहर के पास के इलाक़े में सोवियत दस्तों को घेर कर उन का विनाश कर दिया जाए और फिर मास्को पर क़ब्ज़ा कर के लडा़ई को जल्दी से समाप्त कर दिया जाए। फ़ासिस्टों का यह इरादा सोवियत कमान ने भाँप लिया और मोर्चे के कूर्स्कवाले हिस्से पर सोवियत दस्तों ने शक्तिशाली मोर्चेबंदियों का जाल बिछा दिया। 5 जुलाई 1943 की सुबह को फ़ासिस्ट फ़ौजों ने कूर्स्क शहर के पास लाल सेना के दस्तों के ख़िलाफ़ हमले की कार्रवाइयाँ शुरू कर दीं। इस लडा़ई में फ़ासिस्टों ने बेहद बडी़ संख्या में टैंक, विमान और तोपें झोंक दीं।

कूर्स्क का संग्राम

लाल सेना के दस्तों ने फ़ासिस्टों का हमला रोक दिया और फिर ख़ुद उन पर टूट पडे़। कूर्स्क के संग्राम में जर्मन अपने पाँच लाख से ज़्यादा सैनिकों-अफ़सरों से हाथ धो बैठे। कूर्स्क के पास की विजय के बाद सोवियत दस्तों ने उत्तर से दक्षिण तक तमाम विशाल मोर्चे पर हमले की कार्रवाई एक साथ चालू कर दी। 23 अगस्त 1943 के दिन सोवियत दस्तों ने उक्राइना के औद्योगिक शहर ख़ारकोव (खार्कीव्ह) को आज़ाद किया जिस से द्नेपर नदी के बायें तटीय उक्राइना को पूर्ण रूप से मुक्त करने के लिए उचित परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गईं। अक्टूबर, 1943 के शुरू तक सारा उत्तरी कोकेशिया आज़ाद कर दिया गया। साथ ही लाल सेना के दस्ते कई नुक़्तों पर द्नेपर नदी पार कर गये और दायें तटीय उक्राइना से फ़ासिस्ट हमलावरों को खदेड़ना शुरू कर दिया। 9 नवम्बर 1943 को लाल सैनिकों ने उक्राइना की राजधानी कीव शहर को आज़ाद किया। 1943 की गर्मियों और पतझड़ में लाल सेना के दस्तों ने बेहद लंबे-चौडे़ इलाक़े को - जर्मनों के क़ब्ज़े में आयी सोवियत भूमि के दो-तिहाई भाग को - आज़ाद कर दिया।

सन् 1944 - पश्चिमी मोर्चा[संपादित करें]

पश्चिमी यूरोप में दूसरा मोर्चा:
नार्मंडी की लडा़ई

1944 की गर्मियाँ होते-न-होते सोवियत उक्राइना का क्षेत्र हमलावरों से मुक्त हो गया। लाल सेना के दस्ते चेकोस्लोवाकिया और रोमानिया की राज्य-सीमा पार कर गये। मोर्चे पर की स्थिति बदल गयी। यह साफ़ हो गया कि सोवियत संघ अपनी ही ताक़त से फ़ासिस्ट जर्मनी को और उस के साथी-राष्ट्रों को हरा सकता है और फ़ासिस्ट ग़ुलामी से यूरोप की जनताओं को आज़ाद करा सकता है। इन परिस्थितियों के अनुकूल सोवियत संघ के जंगी मित्र-राष्ट्रों - ब्रिटेन और सं० रा० अमेरिका - ने 9 जून 1944 को नार्मंडी में अपना फ़ौजें उतारीं। इस तरह पश्चिमी यूरोप में दूसरा मोर्चा आख़िर खुला तो, मगर दो साल की देरी से। फ़ासिस्ट जर्मनी सोवियत संघ के जंगी मित्र-राष्ट्रों की फ़ौजों का डट कर मुक़ाबला न कर सकी, क्योंकि उस की सभी मुख्य सेनाएँ सोवियत-जर्मन मोर्चे पर उलझी हुई थीं।

1944 की गर्मियों में सोवियत सेना के दस्तों ने फ़ासिस्ट फ़ौजों पर मुँह-तोड़ वार किये और तेज़ी से पश्चिम की ओर बढ़ते चले। जून-अगस्त, 1944 में सोवियत दस्तों ने बेलारूस में फ़ासिस्ट सेना के सब से बडे़ टुकडे़ को घेर कर चकनाचूर कर दिया। जर्मन के पाँच लाख चालीस हज़ार सैनिक मारे गये और बंदी बनाये गये। इस तरह 1944 की पतझड़ तक सोवियत सेना ने फ़ासिस्टों के क़ब्ज़े में आयी सारी सोवियत धरती आज़ाद कर ली। लेकिन जर्मनों के पास अब भी लड़ने की बडी़ ताक़त बाक़ी थी। फ़ासिस्ट सेना की मुख्य शक्तियाँ - 200 से अधिक डिवीजनें - पहले ही की तरह सोवियत-जर्मन मोर्चे पर जमा थीं। अपने क्षेत्र को आज़ाद करने के बाद सोवियत सेना के दस्तों ने यूरोप के लोगों को फ़ासिस्ट ग़ुलामी से मुक्त होने में मदद दी। 1944 की गर्मियों में पोलिश सेना खडी़ करने, उसे हथियारों से लैस करने और पोलैंड से फ़ासिस्टों को खदेड़ने में सोवियत सैनिकों ने पोलिश जनता की सहायता की। पोलिश जनता ने जन-सरकार क़ायम की। सोवियत सेना के दस्तों के वारों से फ़ासिस्ट गुट गिर पडा़। फ़ासिस्ट जर्मनी के साथी-राष्ट्र एक के बाद एक उस से अलग हो गये। रोमानिया, बुल्गारिया और हंगरी के जनताओं ने अपने यहाँ की फ़ासिस्ट सरकारों को उलट दिया और जन-सरकारें क़ायम कीं जिन्हों ने फ़ासिस्ट जर्मनी पर युद्ध की घोषणा कर दी। फिर सोवियत सेना के दस्तों ने युगोस्लाव मुक्ति-सेना से मिल कर फ़ासिस्टों को युगोस्लाविया से भी मार भगाया।

सन् 1945 - सत्तावादी जर्मनी पर विजय[संपादित करें]

बर्लिन के "रय्ख़्स्ताग" पर सोवियत संघ का झंडा

1945 के शुरू तक फ़ासिस्ट जर्मनी अपने तमाम साथियों को खो चुकी थी। फिर भी लडा़ई जारी रही। जर्मनों की प्रधान सेनाएँ सोवियत सेना के दस्तों से भिडी़ हुई थीं। पस्चिमी यूरोप के मोर्चे पर फ़ासिस्ट सेना यद्यपि कम संख्या में थी तथापि हिटलरी कमान ने दिसम्बर, 1944 के शुरू में आर्डेंस के पहाडी़ क्षेत्र में ब्रिटिश तथा अमेरिकी फ़ौजों के ख़िलाफ़ हमला आरंभ कर दिया। सत्तावादी प्रभाग मोर्चा तोड़ कर आगे बढ़ीं। ब्रिटिश तथा अमरीकी फ़ौजें ज़बरदस्त ख़तरे में पड़ गयीं। इसलिए ब्रिटिश सरकार ने सोवियत संघ की सरकार से अपील की कि वह सोवियत-जर्मन मोर्चे पर लाल सेना के दस्तों का हमला जल्दी शुरू करे। सोवियत सरकार ने लाल सेना के दस्तों को आदेश दिया कि वे 12 जनवरी 1945 को, निर्धारित समय से डेढ़ हफ़्ते पहले ही हमला शुरू कर दें। सोवियत दस्तों का अभियान बाल्टिक सागर से ले कर कार्पथियाई पहाड़ों तक के विशाल मोर्चे पर एक साथ शुरू हुआ। इस तरह सोवियत सैनिकों ने मित्र-राष्ट्रों की सेनाओं को पराजय से बचाया। सोवियत दस्तों के हमले ने सत्तावादी कमान को पश्चिम में जंगी कार्रवाइयाँ बंद कर अपनी डिवीजनें सोवियत-जर्मन मोर्चे पर वापस लाने के लिए विवश किया।

सोवियत दस्ते सत्तावादी जर्मनी की राजधानी बर्लिन के निकट पहुँच गये। अब सत्तावादी जर्मनी की सेना पूर्ण पराजय से कोई भी चीज़ बचा नहीं सकती थी। 25 अप्रैल 1945 को सोवियत दस्तों ने बर्लिन की रक्षा-सेना को घेर लिया। सोवियत सैनिकों का बर्लिन पर हमला 29 अप्रौल को शुरू हुआ और 27 अप्रैल तक इस विशाल नगर का बहुत बडा़ हिस्सा सोवियत दस्तों के क़ब्ज़े में आ चुका था। 30 अप्रैल को सोवियत सिपाहियों ने बर्लिन शहर के संसद-भवन (जर्मन: Reichstag "रय्ख़्स्ताग") पर छापा मार कर क़ब्ज़ा कर लिया और उस पर लाल झंडा फहरा दिया। 2 मई को सोवियत दस्तों ने सारे बर्लिन शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया और फ़ासिस्ट नगर-सेना के बचे सैनिकों ने अपने अफ़सरों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। बर्लिन पर क़ब्ज़ा करने के बाद सोवियत दस्तों ने चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग को आज़ाद कराया। प्रागवालों ने हथियारबंद विद्रोह किया था, इस कारण फ़ासिस्ट शहर का विनाश करना और सभी शहरियों को क़त्ल करना चाहते थे। सोवियत टैंकों ने बर्लिन से प्राग तक का फ़ासला एक ही दिन में तय कर के प्राग को बचा दिया। 8 मई 1945 को फ़ासिस्ट जर्मनी के बिला शर्त आत्मसमर्पण करने के संधिपत्र पर हस्ताक्षर हुए। महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध फ़ासिस्ट राज्यों के हमलावर गुट की पूरी पराजय के साथ समाप्त हो गया।
9 मई 1945 को सोवियत संघ ने फ़ासिस्ट जर्मनी को चकनाचूर कर के उस पर विजय का दिवस मनाया।